hukm aur hasarat in Hindi Love Stories by Diksha mis kahani books and stories PDF | हुक्म और हसरत -41

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हुक्म और हसरत -41

🔥♥️ हुक्म और हसरत ♥️🔥
2894 words chapter...

#Arsia

एपिसोड 41: एक अनजानी जलन 

सुबह के दस बज चुके थे।

रायगढ़ पैलेस के ऑफिस में सिया अपनी मेज पर बैठी बार-बार फोन की स्क्रीन देख रही थी। कल रात से ही उसके मन में एक अजीब-सी उत्सुकता थी। मिस्टर एस. के ऑफिस से आया ईमेल उसने कई बार पढ़ लिया था, फिर भी हर बार उसे पढ़ते हुए उसके चेहरे पर वही मुस्कान आ जाती।

कल दोपहर बारह बजे उसकी मुलाकात मिस्टर एस. से होने वाली थी।

वह शख्स, जिसके बारे में पूरा बिज़नेस जगत बात करता था। जिसकी पहचान उसके काले नकाब के पीछे छिपी थी। जिसकी आवाज़ सिया को पहली बार सुनने पर ही जानी-पहचानी लगी थी।

और अब आखिरकार उसे उससे आमने-सामने बात करने का मौका मिलने वाला था।

“राजकुमारी!”

अर्जुन की आवाज़ सुनकर सिया ने तुरंत फोन उलटकर मेज पर रख दिया।

“जी?”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा, फिर मेज पर रखी फाइल की तरफ।

“पिछले पंद्रह मिनट से आप उसी ईमेल को देख रही हैं। अगर कोई नई जानकारी आई है, तो मुझे भी बता दीजिए।”

सिया ने अपनी मुस्कान छिपाते हुए कहा, “आपको हर बात बताना जरूरी है क्या?”

“नहीं। लेकिन अगर आपकी किसी मुलाकात का संबंध आपकी सुरक्षा से है, तो जानकारी रखना मेरा काम है।”

“ओह, तो आपको मेरी मुलाकात की चिंता है?”

“मुझे आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है, राजकुमारी। चिंता और जिम्मेदारी में अंतर होता है।”

सिया ने आँखें घुमाईं।

“आपसे कोई रोमांटिक जवाब माँगना ही बेकार है।”

यह कहते ही वह खुद चुप हो गई।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“आपने कुछ कहा?”

“मैंने कहा कि कल की मीटिंग के लिए मुझे तैयारी करनी है।”

“तो फिर आपको ईमेल पढ़ने के बजाय प्रस्ताव की फाइल देखनी चाहिए।”

“आपको पता है, आप कभी-कभी बहुत ज्यादा बोलते हैं?”

“और आप कभी-कभी जरूरत से ज्यादा बातें करती हैं।”

सिया ने मुँह बनाकर फाइल खोल ली।

“खड़ूस!”

“जी, राजकुमारी?”

“कुछ नहीं!”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया। वह दूसरी फाइल उठाकर अपने काम में लग गया।

लेकिन सिया के मन में अगले दिन की मुलाकात का उत्साह कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

वह बार-बार सोच रही थी कि मिस्टर एस. सामने से कैसे होंगे। क्या उनकी आवाज़ सच में उतनी ही प्रभावशाली होगी, जितनी समारोह में सुनाई दी थी? क्या वह अपने नकाब के पीछे छिपे रहस्य के बारे में कुछ बताएँगे? और सबसे बड़ा सवाल—उन्हें रायगढ़ के मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों थी?

सिया को अपने सवालों के जवाब चाहिए थे।

और कल शायद उसे उनमें से कुछ जवाब मिल सकते थे।

उसे क्या पता था कि उसी मुलाकात का ख्याल किसी दूसरे इंसान के मन में भी एक ऐसी हलचल पैदा कर रहा था, जिसका नाम वह खुद नहीं जानता था।

---

अर्जुन फाइल पढ़ रहा था, लेकिन उसका ध्यान बीच-बीच में सिया की तरफ चला जाता।

सिया कभी अपने फोन पर ईमेल खोलती, कभी अपनी नोटबुक में कुछ लिखती और फिर अचानक मुस्कुरा देती।

अर्जुन ने एक बार उसकी तरफ देखा।

फिर दूसरी बार।

फिर उसने खुद को फाइल पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया।

आखिर इस मिस्टर एस. में ऐसा क्या खास है?

उसने मन ही मन सवाल किया।

एक बिज़नेसमैन ही तो है। नकाब पहनता है, कम बोलता है, अपनी पहचान छिपाकर रखता है। इसमें इतना उत्साहित होने वाली क्या बात है?

उसने पन्ना पलटा।

और राजकुमारी को भी न जाने क्यों उससे मिलने की इतनी जल्दी है। अभी तक मिली भी नहीं हैं, फिर भी ऐसे खुश हो रही हैं जैसे कोई बहुत पुराना परिचित मिलने आ रहा हो।

अर्जुन की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ गईं।

मुझे क्या? वह किसी से भी मिलें, मुझे क्या फर्क पड़ता है?

उसने फाइल बंद की और दूसरी फाइल उठा ली।

लेकिन कुछ ही क्षणों बाद उसकी नजर फिर सिया की तरफ चली गई।

इस बार सिया काव्या से फोन पर बात कर रही थी।

“हाँ, काव्या, कल की मीटिंग तय हो गई है। हमें बारह बजे वहाँ पहुँचना है।”

फोन के दूसरी तरफ से काव्या की उत्साहित आवाज़ सुनाई दी।

“राजकुमारी, सच में? यानी आप कल मिस्टर एस. से मिलेंगी? ओह, यह तो कमाल हो गया! आपको पता है, मैं कब से चाहती थी कि आप उनसे मिलें!”

सिया हँस पड़ी।

“तुम चाहती थीं कि मैं उनसे मिलूँ या तुम खुद उनसे मिलना चाहती थीं?”

“दोनों बातें अलग नहीं हैं, राजकुमारी!”

“अच्छा जी!”

“और प्लीज, उनसे उनकी आवाज़ के बारे में जरूर पूछिएगा। मैं आज तक नहीं समझ पाई कि कोई इंसान इतनी गहरी और आकर्षक आवाज़ में कैसे बात कर सकता है।”

सिया ने हँसते हुए कहा, “तुम्हें उनके बिज़नेस से ज्यादा उनकी आवाज़ में दिलचस्पी है।”

“मैंने कब मना किया?”

अर्जुन के हाथ में पकड़ी फाइल वहीं रुक गई।

उसने अनजाने में अपनी नजरें सिया की तरफ उठा दीं।

काव्या की आवाज़ फोन पर अब भी सुनाई दे रही थी।

“वैसे, अगर मौका मिले तो उनका नकाब हटाने के बारे में भी पूछिएगा!”

“काव्या!” सिया हँसते हुए बोली। “मैं उनसे मीटिंग करने जा रही हूँ, कोई पूछताछ नहीं।”

“ठीक है, ठीक है। लेकिन लौटकर सब कुछ बताना पड़ेगा।”

“देखते हैं।”

फोन कट गया।

सिया ने फोन मेज पर रखा और अपनी नोटबुक में कुछ लिखने लगी।

अर्जुन ने दोबारा फाइल पर नजरें टिकाईं।

कमाल है। अब काव्या भी उसी के पीछे पड़ी है।

उसने मन ही मन कहा।

एक आवाज़ सुन ली और बस! जैसे दुनिया में उससे बेहतर कोई इंसान ही नहीं है।

वह खुद अपनी सोच पर एक पल के लिए ठिठका।

मैं इन सब बातों के बारे में सोच क्यों रहा हूँ?

उसने फाइल के पन्ने ठीक किए।

मुझे इससे क्या लेना-देना?

लेकिन उसका मन बार-बार उसी बात पर लौट रहा था।

सिया कल उस आदमी से मिलने जा रही थी।

एक ऐसे आदमी से, जिसे वह जानती तक नहीं थी।

और न जाने क्यों, यह बात अर्जुन को बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी।

उसने अपनी जबड़े की मांसपेशियाँ भींचीं और खुद को समझाया कि यह केवल उसकी जिम्मेदारी का मामला है। किसी अनजान व्यक्ति से मुलाकात थी, इसलिए सावधानी जरूरी थी।

बस इतनी-सी बात थी।

कम से कम वह खुद को यही समझा रहा था।

---

दोपहर के समय सिया अपने कमरे में जाने के लिए उठी तो अर्जुन ने भी अपनी फाइलें समेट लीं।

“राजकुमारी, कल की मुलाकात के लिए प्रस्ताव की पूरी जानकारी तैयार रखिएगा। वहाँ आपको अचानक किसी सवाल का जवाब देना पड़ सकता है।”

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“आपको लगता है कि मैं बिना तैयारी के जा रही हूँ?”

“मैंने ऐसा नहीं कहा।”

“लेकिन आपका मतलब वही था।”

“मेरा मतलब केवल इतना था कि तैयारी पूरी होनी चाहिए।”

सिया ने मुस्कुराकर कहा, “आपको पता है, मैं कल मिस्टर एस. से मिलने जा रही हूँ।”

“जी। आपने यह जानकारी आज कई बार दी है।”

“और आपको कोई उत्सुकता नहीं है?”

“किस बात की?”

“यही कि वह कैसे होंगे, क्या कहेंगे, कैसे बात करेंगे?”

अर्जुन ने बिना किसी विशेष भाव के जवाब दिया, “मैं उनसे मिलने नहीं जा रहा। मुझे केवल आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी है।”

सिया ने कुछ पल उसे देखा।

“आप सच में बहुत बोरिंग हैं।”

“यह भी आप पहले कह चुकी हैं।”

“और आप फिर से वही जवाब दे रहे हैं!”

सिया सिर हिलाती हुई आगे बढ़ गई।

अर्जुन उसे जाते हुए देखता रहा।

उसके कदमों की आवाज़ गलियारे में धीरे-धीरे दूर होती गई।

अर्जुन ने एक गहरी साँस ली।

कल की मीटिंग है। मुझे बस यह सुनिश्चित करना है कि वहाँ सब कुछ ठीक रहे।

उसने अपने मन को समझाया।

राजकुमारी किसी से भी मिलें, उससे मुझे क्या फर्क पड़ता है?

कुछ पल बाद वह भी वहाँ से चला गया।

लेकिन उसके भीतर उठी हल्की-सी बेचैनी उसके साथ ही चलती रही।

---

शाम ढलने लगी थी।

पैलेस के ऑफिस का काम लगभग पूरा हो चुका था। अर्जुन अपनी कुछ जरूरी रिपोर्ट लेकर मुख्य गलियारे से गुजर रहा था, तभी उसे बालकनी की तरफ से विवेक की आवाज़ सुनाई दी।

“सच बताऊँ, कभी-कभी मुझे समझ नहीं आता कि इन दोनों को हुआ क्या है।”

अर्जुन के कदम रुक गए।

विवेक बालकनी की रेलिंग के पास खड़ा था। उसके हाथ में एक कप था और चेहरे पर साफ झुंझलाहट थी।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“किसकी बात कर रहे हैं आप?”

विवेक ने मुड़कर देखा।

“ओह, अर्जुन! मैं सिया और काव्या की बात कर रहा हूँ।”

अर्जुन बालकनी की तरफ बढ़ गया।

“क्या हुआ उन्हें?”

विवेक ने एक लंबी साँस छोड़ी।

“क्या हुआ? अरे, तुमने देखा नहीं? सुबह से दोनों मिस्टर एस. के नाम पर ऐसे उत्साहित हैं, जैसे वह कोई फिल्मी हीरो हो।”

अर्जुन ने अपना चेहरा सामान्य रखा।

“राजकुमारी की उनसे व्यावसायिक मुलाकात तय हुई है। उत्साहित होना स्वाभाविक है।”

“व्यावसायिक मुलाकात?” विवेक ने उसकी तरफ देखा। “तुम सच में ऐसा सोचते हो?”

“और क्या सोचूँ?”

विवेक ने कप रेलिंग पर रखा।

“सिया की बात फिर भी समझ आती है। वह उससे मिलने जा रही है, उसके प्रस्ताव पर चर्चा करनी है। लेकिन काव्या? भाई, काव्या तो जैसे उस आदमी की दीवानी हो गई है!”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

विवेक खुद ही बोलता चला गया।

“उसकी आवाज़ अच्छी है, उसका नकाब रहस्यमयी है, वह बड़ा बिज़नेसमैन है… बस, अब और क्या चाहिए? काव्या को तो लगता है कि मिस्टर एस. में दुनिया की सारी खूबियाँ हैं।”

अर्जुन की नजरें सामने फैले बगीचे पर टिक गईं।

“हर किसी की अपनी पसंद होती है।”

“पसंद?” विवेक हल्का-सा हँसा, लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “तुमने उसकी बातें सुनी होतीं तो यह नहीं कहते। सुबह से कम से कम पाँच बार मिस्टर एस. का नाम ले चुकी है। और हर बार उसकी आवाज़ का जिक्र जरूर करती है।”

अर्जुन ने रेलिंग के पास खड़े होकर अपनी बाँहें सीने पर बाँध लीं।

“तो आपको इससे परेशानी क्यों हो रही है?”

विवेक कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने नजरें फेर लीं।

“परेशानी? मुझे क्यों परेशानी होगी?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं।

विवेक ने खुद ही अपनी बात आगे बढ़ाई।

“बस, मुझे समझ नहीं आता कि किसी ऐसे इंसान के पीछे इतना उत्साहित होने का क्या मतलब है, जिसके बारे में हम कुछ जानते तक नहीं। हो सकता है वह वैसा हो ही नहीं, जैसा सब सोच रहे हैं।”

अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा, “यह बात सही है। किसी को जाने बिना उसके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए।”

“बिल्कुल!”

विवेक तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।

“और यही बात काव्या को कौन समझाए? अगर मैं कुछ कहूँ तो उसे लगता है कि मैं बेवजह टिप्पणी कर रहा हूँ।”

“तो मत कीजिए टिप्पणी।”

विवेक ने उसे घूरा।

“तुम भी न, अर्जुन! मैं तुमसे अपनी परेशानी साझा कर रहा हूँ और तुम मुझे ही चुप करा रहे हो।”

“मैं केवल समाधान बता रहा हूँ।”

विवेक ने सिर हिलाया।

“तुम्हारे साथ बात करना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।”

अर्जुन के होंठों पर बहुत हल्की-सी मुस्कान आई।

“यह बात आज तीसरी बार सुनी है।”

“किससे?”

“राजकुमारी से।”

विवेक हँस पड़ा।

“अच्छा! तो तुम भी उनके खड़ूसपन का शिकार हो।”

“मैं अपने काम से काम रखता हूँ।”

“हाँ, यह तो दिखता है।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर विवेक ने अचानक पूछा, “वैसे, तुम्हें बुरा नहीं लगता?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“किस बात से?”

“यही कि सिया भी मिस्टर एस. से मिलने के लिए इतनी उत्साहित है। और काव्या तो खैर… उसका तो पूछो ही मत।”

अर्जुन की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं।

“राजकुमारी को अपने काम से संबंधित लोगों से मिलने का पूरा अधिकार है।”

“मैं अधिकार की बात नहीं कर रहा।”

“तो किस बात की कर रहे हैं?”

विवेक कुछ क्षण सोचता रहा।

“पता नहीं। शायद मुझे लगता है कि लोग किसी रहस्यमयी इंसान की चमक-दमक देखकर जरूरत से ज्यादा प्रभावित हो जाते हैं। और फिर उसके बारे में कुछ भी जाने बिना उसे खास समझने लगते हैं।”

अर्जुन ने सामने देखा।

“हो सकता है।”

उसका जवाब सामान्य था, लेकिन उसके भीतर कुछ और चल रहा था।

सिया की मुस्कान उसके मन में उभर आई।

वह मुस्कान, जो सुबह से उसके चेहरे पर बार-बार आ रही थी।

वह उत्साह, जो उसकी आँखों में दिखाई दे रहा था।

और वह आदमी, जिसके बारे में वह इतनी उत्सुक थी।

अर्जुन की उँगलियाँ रेलिंग पर कस गईं।

आखिर वह आदमी है कौन?

यह सवाल उसके मन में फिर उठा।

ऐसा क्या है उसमें, जो राजकुमारी को उससे मिलने के लिए इतना उत्साहित कर रहा है?

उसने तुरंत अपनी सोच को रोका।

मुझे इससे क्या मतलब?

लेकिन अगले ही पल उसके मन में एक और ख्याल आया।

अगर वह आदमी राजकुमारी के बहुत करीब आने की कोशिश करे तो?

अर्जुन का जबड़ा कस गया।

उसने खुद को स्थिर रखा, लेकिन उसके भीतर उठी बेचैनी अब पहले से ज्यादा स्पष्ट थी।

विवेक ने उसकी तरफ देखा।

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने तुरंत अपना चेहरा सामान्य कर लिया।

“कुछ नहीं।”

“तुम्हारा जबड़ा इतना कसा हुआ क्यों है?”

अर्जुन ने उसे देखा।

“है?”

“हाँ, अभी ऐसा लग रहा है जैसे तुम किसी से लड़ने की तैयारी कर रहे हो।”

“शायद आपको ऐसा लग रहा है।”

विवेक ने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, फिर हल्का-सा मुस्कुराया।

“अच्छा। मान लिया।”

वह फिर रेलिंग की तरफ मुड़ गया।

“वैसे, कल की मुलाकात में तुम भी जाओगे न?”

“बिल्कुल।”

“तो कम से कम तुम पता लगा लेना कि उस मिस्टर एस. में ऐसा क्या है, जिसने दोनों को इतना प्रभावित कर दिया है।”

अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“मैं वहाँ किसी की पसंद-नापसंद का विश्लेषण करने नहीं जा रहा।”

“अरे, मैं तो बस कह रहा हूँ!”

“और मैं बता रहा हूँ कि मेरा काम क्या है।”

विवेक हँस पड़ा।

“ठीक है, जनाब। तुम अपना काम करना। मैं अपनी जलन…”

वह कहते-कहते अचानक रुक गया।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या कहा आपने?”

विवेक ने तुरंत कप उठा लिया।

“कुछ नहीं! मैंने कहा, मैं अपनी जिंदगी में खुश हूँ।”

अर्जुन ने उसे कुछ पल देखा, फिर नजरें फेर लीं।

विवेक ने मन ही मन खुद को कोसा।

मैं जल क्यों रहा हूँ? काव्या किसी की आवाज़ की तारीफ कर रही है, तो करने दो। मुझे क्या फर्क पड़ता है?

उसने कप से एक घूँट लिया।

लेकिन काव्या का उत्साहित चेहरा उसके मन में घूमता रहा।

उधर अर्जुन भी अपनी ही सोच में उलझा हुआ था।

दोनों पुरुष बालकनी में खड़े थे, दोनों के मन में एक अनकही बेचैनी थी, लेकिन दोनों में से कोई भी उसे सही नाम देने को तैयार नहीं था।

---

“वैसे, अर्जुन,” विवेक ने कुछ देर बाद कहा, “तुम्हें नहीं लगता कि सिया को कल की मुलाकात में थोड़ा सावधान रहना चाहिए?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“वह मेरी जिम्मेदारी है। मैं सावधानी का पूरा ध्यान रखूँगा।”

“मैं जानता हूँ। लेकिन मेरा मतलब सिर्फ सुरक्षा से नहीं है।”

“तो?”

विवेक ने थोड़ा झिझककर कहा, “कभी-कभी लोग किसी की बातों और व्यक्तित्व से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। खासकर जब सामने वाला रहस्यमयी हो। मुझे लगता है, सिया को अपनी सीमाएँ याद रखनी चाहिए।”

अर्जुन कुछ क्षण चुप रहा।

उसके मन में विवेक की बात घूमने लगी।

अपनी सीमाएँ…

उसने सिया की कल्पना की, जो उस अनजान आदमी के सामने बैठी उससे सवाल पूछ रही होगी। शायद मुस्कुराकर बात करेगी। शायद उसकी तारीफ भी करेगी। शायद उस आदमी की आवाज़ सुनकर फिर वही परिचित-सा एहसास उसके मन में उठेगा।

अर्जुन की आँखें कठोर हो गईं।

वह उससे इतनी आसानी से प्रभावित क्यों हो?

अगले ही पल उसने अपने विचार पर खुद को ही रोक दिया।

यह क्या सोच रहा हूँ मैं? राजकुमारी कोई बच्ची नहीं हैं। वह अपना फैसला खुद ले सकती हैं। और मिस्टर एस. से उनकी मुलाकात सिर्फ एक व्यावसायिक बैठक है।

उसने अपनी बाँहें सीने से खोल लीं।

मुझे सिर्फ अपनी जिम्मेदारी निभानी है। बस।

लेकिन उसके भीतर की बेचैनी ने मानो उसकी बात मानने से इनकार कर दिया था।

विवेक ने उसकी ओर देखा।

“तुम कुछ कह क्यों नहीं रहे?”

अर्जुन ने जवाब दिया, “क्योंकि इस विषय पर चर्चा करने से कुछ बदलने वाला नहीं है।”

“तुम हमेशा इतने व्यावहारिक कैसे रह लेते हो?”

“अभ्यास।”

“काश, मेरे पास भी यह अभ्यास होता।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“आपको अपने मन की बात स्वीकार करने का अभ्यास करना चाहिए।”

विवेक कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया।

फिर उसने आँखें सिकोड़कर पूछा, “तुम किस मन की बात की बात कर रहे हो?”

“यह तो आपको बेहतर पता होगा।”

विवेक ने तुरंत नजरें फेर लीं।

“तुम्हें बहुत गलतफहमी है।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह अपनी फाइल उठाकर बालकनी से बाहर निकल गया।

लेकिन जाते हुए उसके कदमों में पहले जैसी सहजता नहीं थी।

---

रात को अपने कमरे में पहुँचकर अर्जुन ने अगले दिन की मुलाकात से संबंधित सारी जानकारी दोबारा जाँची। स्थान, समय, प्रवेश की अनुमति, सुरक्षा व्यवस्था—हर बात को उसने व्यवस्थित कर लिया।

काम पूरा होने के बाद भी वह कुछ देर मेज के सामने बैठा रहा।

उसकी नजरें बंद फाइल पर थीं, लेकिन मन कहीं और था।

उसे सिया का सुबह वाला उत्साहित चेहरा याद आ रहा था।

फिर काव्या की आवाज़।

फिर विवेक की बातें।

और अंत में वह कल्पना, जिसमें सिया किसी दूसरे आदमी के सामने बैठी उससे मुस्कुराकर बात कर रही थी।

अर्जुन ने तुरंत अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई और उठ खड़ा हुआ।

“बकवास।”

उसके मुँह से धीमे से निकला।

उसने खुद को आईने में देखा।

“तुम्हें क्या हो गया है, अर्जुन? वह राजकुमारी हैं। उनका काम है लोगों से मिलना, बातचीत करना और अपने फैसले लेना। तुम्हारा काम उनकी सुरक्षा करना है। बस।”

वह कुछ क्षण अपनी ही आँखों में देखता रहा।

“तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किससे मिलती हैं।”

उसने यह बात खुद से कही।

एक बार।

फिर दूसरी बार।

लेकिन शब्दों के बावजूद उसके मन में उठी बेचैनी पूरी तरह शांत नहीं हुई।

उसे सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि वह खुद नहीं समझ पा रहा था कि आखिर उसे परेशानी किस बात से हो रही है।

क्या उसे मिस्टर एस. पर भरोसा नहीं था?

क्या उसे एक अनजान व्यक्ति के साथ सिया की मुलाकात की चिंता थी?

या फिर बात कुछ और थी?

अर्जुन ने तुरंत आखिरी सवाल को अपने मन से निकाल दिया।

“फालतू सोचने का समय नहीं है।”

उसने लाइट बंद की और कमरे से बाहर निकल गया।

लेकिन एक बात वह खुद से छिपा गया।

कल की मुलाकात में उसकी नजरें केवल सुरक्षा पर नहीं रहने वाली थीं।

वह उस आदमी को भी देखना चाहता था, जो बिना अपना चेहरा दिखाए सिया की उत्सुकता का केंद्र बन गया था।

वह जानना चाहता था कि उस नकाब के पीछे कैसा इंसान छिपा है।

और शायद, अनजाने में, वह यह भी सुनिश्चित करना चाहता था कि वह आदमी सिया के बहुत करीब न आ पाए।

उसे अभी अपनी इस बेचैनी का नाम नहीं पता था।

वह इसे जिम्मेदारी समझ रहा था।

सावधानी समझ रहा था।

लेकिन उसके मन में उठता एक सवाल बार-बार लौट रहा था—

अगर कल मिस्टर एस. ने राजकुमारी के सामने अपनी आवाज़ में कोई तारीफ भरी बात कह दी, तो अर्जुन को इतना गुस्सा क्यों आएगा?

इस सवाल का जवाब उसके पास नहीं था।

और फिलहाल, वह जवाब जानना भी नहीं चाहता था।

जारी रहेगा…

सुनते रहिए… ‘हुक्म और हसरत’ ❤️

© Diksha 

आपकी लेखिका की ओर से ढेर सारा प्यार! 🫶🏻
Har 2 din bad naye episode padne k liye mujhe follow kre…

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1. अनुबंध — पूर्ण
2. वो जो चुपके से देखा करता था — पूर्ण
3. अनचाही मोहब्बत — पूर्ण
4. हुक्म और हसरत — जारी है