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खुद को पहचानिए

📖 खुद को पहचानिए

दूसरों से आगे निकलने की नहीं, खुद को बेहतर बनाने की दौड़ में शामिल हो जाइए।

लेखक: कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

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🌅 भूमिका — आपकी जिंदगी अभी बाकी है!

एक सवाल अपने आप से पूछिए—अगर आज आपकी उम्र 60, 65 या 70 वर्ष है, तो क्या आपकी जिंदगी के सपने भी बूढ़े हो गए हैं?

क्या अब आपके जीवन में कुछ नया करने की संभावना समाप्त हो गई है?

क्या अब आपके अनुभवों का कोई मूल्य नहीं रहा?

क्या अब आपके सपनों को केवल इसलिए चुप हो जाना चाहिए, क्योंकि आपकी उम्र बढ़ गई है?

यदि आपका उत्तर नहीं है, तो इस विचार को अपने दिल में जगह दीजिए—

“उम्र आपके जीवन के बीते हुए वर्षों की गिनती है, आपके भीतर बची हुई संभावनाओं की नहीं।”

कभी-कभी हम अपनी जिंदगी दूसरों को देखकर मापने लगते हैं।

किसी ने कम उम्र में बड़ा मकान बना लिया…

किसी ने करोड़ों रुपये कमा लिए…

किसी ने दुनिया घूम ली…

किसी के बच्चे विदेश में बस गए…

और किसी को समाज में बहुत सम्मान मिलने लगा।

इन सबको देखकर हम अपनी जिंदगी का हिसाब लगाने बैठ जाते हैं।

हम सोचते हैं—उसने इतना सब कर लिया, लेकिन मैंने क्या किया?

यहीं से हमारे मन में असंतोष जन्म लेने लगता है।

हम अपनी उपलब्धियों को छोटा और दूसरों की उपलब्धियों को बड़ा समझने लगते हैं। धीरे-धीरे हम अपनी खुशियों का फैसला भी दूसरों की जिंदगी देखकर करने लगते हैं।

लेकिन जरा ठहरिए!

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस व्यक्ति से आप अपनी तुलना कर रहे हैं, उसकी परिस्थितियाँ आपकी जैसी थीं भी या नहीं?

उसके अवसर आपके जैसे थे?

उसकी जिम्मेदारियाँ आपकी जैसी थीं?

और सबसे जरूरी बात—क्या उसकी मंजिल वही है, जो आपकी मंजिल है?

जब रास्ते अलग हैं, परिस्थितियाँ अलग हैं और मंजिलें अलग हैं, तो तुलना कैसी?

फूल और पेड़ की तुलना नहीं की जाती। दोनों की प्रकृति अलग है, दोनों का महत्व अलग है और दोनों का खिलने का समय भी अलग है।

फिर हम इंसानों को एक ही तराजू में क्यों तौलते हैं?

किसी की सफलता देखकर प्रेरणा लीजिए, लेकिन अपनी कीमत कम मत कीजिए। किसी की उपलब्धि देखकर सीखिए, लेकिन अपने जीवन को असफल घोषित मत कीजिए।

क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि आपने किसी दूसरे को पीछे छोड़ दिया।

सबसे बड़ी सफलता यह है कि आपने अपनी कमियों को पहचाना, अपनी क्षमताओं को जगाया और कल के मुकाबले आज खुद को थोड़ा बेहतर बनाया।

और इस बात का प्रमाण देने के लिए मैं आपको किसी बड़े उद्योगपति, प्रसिद्ध अभिनेता या महान खिलाड़ी की कहानी ही नहीं सुनाना चाहता।

मैं आपको अपने जीवन का एक छोटा-सा अनुभव बताना चाहता हूँ।

एक ऐसा अनुभव, जो शायद उन लोगों के मन में नई उम्मीद जगा सके, जिन्हें लगता है कि अब उनकी उम्र निकल चुकी है।

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🌟 1. मेरी जिंदगी, मेरा उदाहरण

कौन कहता है कि 60 वर्ष के बाद इंसान की जिंदगी सिर्फ आराम करने के लिए रह जाती है?

कौन कहता है कि उम्र बढ़ने के साथ सपने देखना बंद कर देना चाहिए?

और कौन कहता है कि जीवन में कुछ नया शुरू करने का समय निकल जाने के बाद कोई नई राह नहीं बनाई जा सकती?

मेरी जिंदगी इन सवालों का एक छोटा-सा जवाब है।

मैंने अपने जीवन के 57वें वर्ष में लेखन की शुरुआत की।

उस उम्र में, जब बहुत से लोग अपने जीवन की जिम्मेदारियों को समेटने और आराम करने के बारे में सोचने लगते हैं, मैंने एक नई राह चुनने का निर्णय लिया।

मेरे हाथ में कलम थी, मन में विचार थे और दिल में एक इच्छा थी—अपने अनुभवों, भावनाओं और समाज की सच्चाइयों को शब्दों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाना।

मैंने लिखना शुरू किया।

कभी जीवन पर लिखा, कभी रिश्तों पर। कभी माता-पिता के त्याग को शब्द दिए, कभी समाज की समस्याओं को उठाया। कभी ऐसी कहानियाँ लिखीं, जो पाठकों के दिल को छू सकें, तो कभी ऐसी पुस्तकें लिखीं, जो उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।

आज, 73 वर्ष की उम्र में, मैं 94 पुस्तकें लिखने का सफर तय कर चुका हूँ। मेरी लेखनी में प्रेरणादायक, सामाजिक और भावनात्मक विषयों को विशेष स्थान मिला है।

जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मन में एक विचार आता है—

अगर मैंने 57 वर्ष की उम्र में यह सोचकर कलम नहीं उठाई होती कि अब बहुत देर हो चुकी है, तो शायद मेरी जिंदगी का यह खूबसूरत अध्याय कभी लिखा ही नहीं जाता।

मेरे लिए 57 वर्ष की उम्र अंत नहीं थी।

वह एक नई शुरुआत थी।

मैं यह नहीं कहता कि हर व्यक्ति को लेखक बनना चाहिए। मेरा संदेश केवल इतना है कि हर इंसान के भीतर कोई न कोई प्रतिभा, सपना या अधूरी इच्छा होती है।

किसी को संगीत सीखना है।

किसी को चित्रकारी करनी है।

किसी को समाजसेवा करनी है।

किसी को नई भाषा सीखनी है।

किसी को अपने अनुभवों को लिखकर अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है।

तो फिर उम्र को बहाना क्यों बनाया जाए?

हो सकता है आपकी शुरुआत में दुनिया आपकी प्रशंसा न करे। हो सकता है कुछ लोग कहें कि अब इस उम्र में नया क्या करना है। लेकिन आपको अपनी जिंदगी दूसरों की सोच के अनुसार नहीं जीनी चाहिए।

आपकी उम्र आपके अनुभवों की गवाही है, आपके सपनों की समाप्ति का प्रमाण नहीं।

💖 मेरी कलम से निकला एक संदेश

“मैंने 57वें वर्ष में कलम उठाई,
और 73वें वर्ष तक 94 पुस्तकें लिखने का सफर तय किया।
मैंने उम्र से नहीं पूछा कि क्या मैं शुरुआत कर सकता हूँ…
मैंने अपने मन से पूछा कि क्या मैं कोशिश कर सकता हूँ।”

आज भी मेरा विश्वास है—

जब तक साँस है, तब तक सीखने का अवसर है।

जब तक विचार हैं, तब तक सृजन का अवसर है।

और जब तक दिल में कुछ अच्छा करने की इच्छा है, तब तक जिंदगी में नई शुरुआत की गुंजाइश है।

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🌱 2. दूसरों की सफलता से जलिए मत, सीखिए

कल्पना कीजिए कि आपके पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति ने नया मकान बनाया है।

आपके एक परिचित ने नई गाड़ी खरीदी है।

आपका कोई मित्र आपसे अधिक पैसा कमाने लगा है।

अब आपके सामने दो रास्ते हैं।

पहला—आप उनकी उपलब्धियों को देखकर परेशान हों, अपनी परिस्थितियों को कोसें और मन में ईर्ष्या पाल लें।

दूसरा—आप उनकी सफलता से प्रेरणा लें, अपनी जरूरतों का आकलन करें और अपने जीवन को बेहतर बनाने की योजना बनाएँ।

दोनों रास्तों का परिणाम अलग होगा।

पहला रास्ता आपको मानसिक रूप से थका देगा।

दूसरा रास्ता आपको आगे बढ़ने की दिशा देगा।

याद रखिए, किसी की सफलता आपके हिस्से की सफलता कम नहीं करती।

दूसरे के घर में दीपक जलने से आपके घर का दीपक बुझ नहीं जाता।

फिर किसी और की खुशी देखकर आपके मन में अंधेरा क्यों पैदा हो?

यदि किसी ने अच्छा व्यवसाय खड़ा किया है, तो उससे सीखिए कि उसने मेहनत कैसे की।

यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार को अच्छी तरह संभालता है, तो उससे सीखिए कि रिश्तों को समय कैसे दिया जाता है।

यदि कोई व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहता है, तो उससे सीखिए कि धैर्य कैसे रखा जाता है।

दूसरों की अच्छाइयों को अपनी सीख बनाइए, उनकी उपलब्धियों को अपनी परेशानी नहीं।

आपकी जिंदगी में भी कुछ ऐसा जरूर होगा, जो किसी दूसरे के लिए प्रेरणा बन सकता है।

बस जरूरत है अपनी खूबियों को पहचानने की।

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🌼 3. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से सीखिए

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन इस बात की प्रेरणा देता है कि साधारण परिस्थितियों से शुरुआत करने वाला व्यक्ति भी अपने प्रयासों से बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कर सकता है।

उनका बचपन रामेश्वरम में बीता। शुरुआती जीवन में उन्होंने परिवार की मदद के लिए अखबार बाँटने का काम भी किया। आगे चलकर उन्होंने विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया और देश के राष्ट्रपति बने।

उनकी यात्रा हमें यह नहीं सिखाती कि हर व्यक्ति को वैज्ञानिक या राष्ट्रपति बनना चाहिए।

वह हमें यह सिखाती है कि अपनी शुरुआत को अपनी अंतिम मंजिल मत समझिए।

आज आपके पास सीमित साधन हो सकते हैं।

आज आपके पास कम अवसर हो सकते हैं।

आज आपको अपनी क्षमता पर भी संदेह हो सकता है।

लेकिन यदि आप सीखना जारी रखते हैं, मेहनत करते हैं और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहते हैं, तो आप अपने जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।

छोटी शुरुआत शर्म की बात नहीं है। कोशिश न करना और अपनी संभावनाओं को समय से पहले समाप्त मान लेना अधिक दुखद है।

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🌿 4. मैरी कॉम से सीखिए—अपनी राह खुद बनाइए

भारतीय मुक्केबाज मैरी कॉम ने कठिन परिस्थितियों में मेहनत करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। विवाह और मातृत्व के बाद भी उन्होंने खेल में वापसी की और अपनी क्षमता का प्रदर्शन जारी रखा।

उनका जीवन बताता है कि जिम्मेदारियाँ आने के बाद भी किसी लक्ष्य की ओर लौटने का रास्ता खोजा जा सकता है।

हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। हर किसी की यात्रा आसान नहीं होती।

लेकिन अपनी परिस्थितियों को समझने और उनके अनुसार रास्ता बनाने की कोशिश हमें आगे बढ़ा सकती है।

आपके सामने भी जिम्मेदारियाँ होंगी।

परिवार होगा।

स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति से जुड़ी चुनौतियाँ होंगी।

लेकिन हर परिस्थिति में अपने लिए कुछ समय निकालना संभव हो, तो अपने सपने को पूरी तरह छोड़ने से पहले एक बार जरूर सोचिए।

हो सकता है आप पहले जितनी तेजी से आगे न बढ़ सकें।

कोई बात नहीं।

धीरे चलना, रुक जाने से बेहतर हो सकता है।

अपनी गति पहचानिए। अपनी क्षमता के अनुसार कदम उठाइए और अपनी राह पर चलते रहिए।

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🌺 5. अपनी कमियों से भागिए मत

खुद पर ध्यान देने का अर्थ केवल अपनी तारीफ करना नहीं है।

इसका अर्थ है अपने भीतर झाँकने की हिम्मत रखना।

अपनी गलतियों को स्वीकार करना।

अपनी कमजोरियों को पहचानना।

और हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर बनाने का प्रयास करना।

यदि आपसे कोई गलती हुई है, तो उसे अपनी पहचान मत बनाइए। उससे सीखिए।

यदि किसी काम में असफल हुए हैं, तो यह मत मानिए कि आप जीवन में असफल हैं। हो सकता है आपको एक नया तरीका सीखने की जरूरत हो।

यदि किसी ने आपका अपमान किया है, तो अपनी पूरी जिंदगी उसे गलत साबित करने में मत लगा दीजिए।

अपने काम से, अपने व्यवहार से और अपने धैर्य से खुद को बेहतर बनाइए।

मान लीजिए, आप अपने परिवार के सदस्यों पर जल्दी नाराज हो जाते हैं। हर बार यह सोचने के बजाय कि दूसरे आपको समझते क्यों नहीं, एक बार खुद से पूछिए—क्या मैं उनकी बात पूरी तरह सुनता हूँ?

यदि आप अपने व्यवसाय में अपेक्षित सफलता नहीं पा रहे हैं, तो केवल बाजार या ग्राहकों को दोष देने के बजाय अपनी सेवा, व्यवहार और काम करने के तरीके की समीक्षा कीजिए।

यदि आप अकेलापन महसूस करते हैं, तो केवल दूसरों की शिकायत करने के बजाय यह भी देखिए कि क्या आप अपने प्रियजनों से बातचीत करने का समय निकालते हैं।

यह आत्मचिंतन है।

यह खुद को दोष देना नहीं, बल्कि खुद को समझने का प्रयास है।

आपकी सबसे बड़ी जीत वह दिन है, जब आप दूसरों को नीचा दिखाने के बजाय खुद को ऊँचा उठाना शुरू कर देते हैं।

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🕯️ 6. जीवन बहुत छोटा है—इसे तुलना में मत गँवाइए

एक दिन हम सब पीछे मुड़कर अपनी जिंदगी को देखेंगे।

उस दिन शायद हमें यह याद नहीं रहेगा कि किसके पास हमसे बड़ा घर था, किसने हमसे ज्यादा पैसा कमाया या किसे समाज में अधिक प्रसिद्धि मिली।

लेकिन हमें वे पल जरूर याद आएँगे, जब हमने अपने परिवार के साथ हँसी बाँटी थी।

जब किसी दुखी इंसान का सहारा बने थे।

जब किसी की आँखों के आँसू पोंछे थे।

जब मुश्किल समय में हार मानने के बजाय हिम्मत दिखाई थी।

और जब हमने दूसरों की अपेक्षाओं से बाहर निकलकर अपने दिल की सच्ची आवाज सुनी थी।

इसलिए अपनी जिंदगी दूसरों को प्रभावित करने में मत गँवाइए।

ऐसा जीवन बनाइए, जिसमें आपको स्वयं से नजरें मिलाने में शर्म न आए।

दूसरों की सफलता पर खुश होना सीखिए। उनकी अच्छाइयों से प्रेरणा लीजिए, लेकिन अपनी यात्रा का सम्मान करना मत भूलिए।

किसी और की रोशनी देखकर अपनी लौ बुझा मत दीजिए।

आपकी रोशनी भी किसी अँधेरे जीवन के लिए उम्मीद बन सकती है।

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🌅 7. आज से एक नई शुरुआत कीजिए

सुबह उठकर खुद से तीन सवाल पूछिए—

1. आज मैं कल से बेहतर क्या कर सकता हूँ?
2. आज मैं अपनी कौन-सी कमजोरी सुधार सकता हूँ?
3. आज मैं किसके जीवन में थोड़ी-सी खुशी जोड़ सकता हूँ?

फिर अपने उत्तर के अनुसार एक छोटा कदम उठाइए।

हर दिन बड़ी उपलब्धि हासिल करना जरूरी नहीं है। जरूरी है कि आप प्रयास करना न छोड़ें।

अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए।

अपने परिवार को समय दीजिए।

अपने ज्ञान को बढ़ाइए।

अपनी गलतियों से सीखिए।

और अपने मन को दूसरों की ईर्ष्या तथा अनावश्यक तुलना से मुक्त रखिए।

जब आप अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वीकार कर लेते हैं, तब धीरे-धीरे आपकी सोच बदलने लगती है।

आप दूसरों को देखकर परेशान होने के बजाय उनसे सीखने लगते हैं।

दूसरों की प्रशंसा देखकर दुखी होने के बजाय अपनी मेहनत पर ध्यान देने लगते हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—

आप अपनी खुशी का नियंत्रण दूसरों के हाथों में देना बंद कर देते हैं।

आपको पूरी दुनिया को हराने की जरूरत नहीं है। आपको अपने भीतर की निराशा, आलस्य और डर पर धीरे-धीरे विजय प्राप्त करनी है।

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🌹 प्रेरणादायक स्लोगन

दूसरों से आगे निकलने की दौड़ छोड़ दीजिए,
खुद को बेहतर बनाने की यात्रा शुरू कीजिए।
क्योंकि जिंदगी की सबसे खूबसूरत जीत
अपने ही कल से आगे निकलना है।

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💖 लेखक के भावुक शब्द

मेरे प्रिय पाठकों,

जीवन में मैंने एक बात महसूस की है—इंसान दूसरों को समझने और परखने में जितना समय लगाता है, यदि उसका थोड़ा-सा समय भी स्वयं को समझने में लगा दे, तो उसका जीवन बहुत बदल सकता है।

दूसरों की कमियाँ गिनना आसान है, लेकिन अपनी कमियों को स्वीकार करना साहस माँगता है।

दूसरों की सफलता पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन अपनी असफलताओं से सीखना परिपक्वता माँगता है।

और दुनिया से सम्मान माँगना आसान है, लेकिन ऐसा चरित्र बनाना, जो सम्मान के योग्य हो—इसके लिए धैर्य, ईमानदारी और निरंतर प्रयास चाहिए।

मैंने अपने जीवन के 57वें वर्ष में लेखन शुरू किया। आज 73 वर्ष की उम्र में 94 पुस्तकें लिखने का सफर तय कर चुका हूँ।

यह सफर मेरे लिए केवल पुस्तकों की संख्या नहीं है। यह इस बात की याद दिलाता है कि जीवन में नई शुरुआत करने के लिए हमेशा एक अवसर तलाशा जा सकता है।

मैंने उम्र को अपनी लेखनी के रास्ते में दीवार नहीं बनने दिया। मैंने अपनी रुचि को समय दिया, अपने विचारों को शब्द दिए और समाज के लिए कुछ अच्छा लिखने का प्रयास किया।

इसीलिए मैं आपसे कहना चाहता हूँ—

अपनी उम्र को अपनी कमजोरी मत बनाइए। अपने अनुभवों को अपनी ताकत बनाइए।

हो सकता है आज आपकी मेहनत का परिणाम दिखाई न दे। हो सकता है लोग आपकी कोशिशों को न समझें। हो सकता है आपकी मंजिल अभी बहुत दूर हो।

फिर भी चलते रहिए।

क्योंकि आपकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।

आपको दुनिया का सबसे सफल इंसान नहीं बनना है। आपको अपने भीतर के सबसे अच्छे इंसान को जगाना है।

जब तक जीवन है, तब तक सीखने, सुधारने और कुछ अच्छा करने की संभावना है।

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👤 लेखक परिचय

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया' संवेदनशील लेखनी के माध्यम से जीवन, रिश्तों, मानवीय भावनाओं और सामाजिक मूल्यों को शब्द देने वाले लेखक हैं।

उन्होंने अपने जीवन के 57वें वर्ष में लेखन की शुरुआत की। आज 73 वर्ष की उम्र में वे 94 पुस्तकों के लेखन का सफर तय कर चुके हैं। उनकी लेखनी में प्रेरणादायक, सामाजिक और भावनात्मक विषयों को विशेष स्थान मिला है।

उनकी रचनाओं का उद्देश्य केवल पाठकों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उनके भीतर आत्मचिंतन, सकारात्मक सोच, मानवीय संवेदना और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा जगाना है।

उनका विश्वास है कि अनुभवों को शब्द देकर समाज तक पहुँचाना भी एक प्रकार की सेवा है। उनकी लेखनी जीवन की सच्चाइयों, रिश्तों की गरिमा और इंसानियत के महत्व को सामने लाने का प्रयास करती है।

✍️ उनका संदेश

“दुनिया को बदलने की इच्छा रखने से पहले, स्वयं में वह बदलाव लाइए, जिसे आप दुनिया में देखना चाहते हैं।”

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🌻 अंतिम संदेश — आपकी जिंदगी अभी बाकी है!

यदि आपकी उम्र 40 वर्ष है, तो शुरुआत कीजिए।

यदि आपकी उम्र 60 वर्ष है, तो शुरुआत कीजिए।

यदि आपकी उम्र 70 वर्ष है, तब भी अपनी परिस्थितियों और क्षमता के अनुसार कोई नया कदम उठाने की संभावना तलाशिए।

जरूरी नहीं कि आप कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करें।

किसी बच्चे को पढ़ाना भी अच्छा काम है।

किसी जरूरतमंद की मदद करना भी अच्छा काम है।

कोई नया कौशल सीखना भी अच्छी शुरुआत है।

अपने परिवार के साथ संबंध सुधारना भी प्रगति है।

और अपने अनुभवों से किसी दूसरे व्यक्ति को प्रेरित करना भी एक महत्वपूर्ण योगदान है।

जिंदगी का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि आपने कितने वर्ष जीए, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि आपने अपने समय, अनुभव और क्षमताओं का उपयोग कैसे किया।

इसलिए आज से दूसरों की जिंदगी का हिसाब लगाना बंद कीजिए।

अपने सपनों की ओर देखिए।

अपने भीतर झाँकिए।

अपनी क्षमता पर विश्वास कीजिए।

और अपनी परिस्थितियों के अनुसार पहला कदम उठाइए।

कौन कहता है कि 60 के बाद जिंदगी सिर्फ आराम करने के लिए होती है?

जब तक मन में सीखने की इच्छा, दिल में कुछ करने का उत्साह और जीवन में उद्देश्य बाकी है—तब तक नई शुरुआत का द्वार खुला है।

दूसरों से अपनी तुलना मत कीजिए।
अपनी कल की जिंदगी से आज की जिंदगी को बेहतर बनाइए।

— कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'