कल की बात
लेखक: विजय शर्मा एरी
(लगभग 2000 शब्द)
रात के बारह बज रहे थे। कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और पंखे की धीमी आवाज़ थी। मैं अपने पुराने लकड़ी के डेस्क पर बैठा था। सामने एक खुली डायरी पड़ी थी, जिसका पहला पन्ना अभी भी खाली था। कल का दिन इतना भारी पड़ गया था कि नींद आना नामुमकिन लग रहा था।
कल की बात है…
सुबह जब मैं उठा तो आसमान में बादल छाए हुए थे। बरसात का मौसम था, पर बारिश अभी रुकी हुई थी। घर के आँगन में माँ तुलसी के पौधे को पानी दे रही थीं। पिताजी अखबार पढ़ते हुए चाय पी रहे थे। सब कुछ सामान्य लग रहा था, जैसे हर दिन होता है। पर आज कुछ अलग था। आज मुझे दिल्ली जाना था—नौकरी के इंटरव्यू के लिए।
तीन साल से मैं गाँव में बैठा था। पढ़ाई पूरी होने के बाद शहर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। पिताजी कहते थे, “बेटा, जब मन करे तब जाना। जबरदस्ती कुछ नहीं होता।” माँ चुपचाप देखती रहती थीं। उनकी आँखों में हमेशा एक सवाल रहता था—कब जाएगा मेरा बेटा अपनी किस्मत आजमाने?
आज वह दिन आ गया था।
मैंने बैग पैक किया। दो जोड़ी कपड़े, एक फाइल जिसमें सर्टिफिकेट थे, और माँ का बनाया हुआ पराठा। स्टेशन जाने से पहले माँ ने मेरा माथा चूमते हुए कहा, “जो भी हो, सच बोलना। झूठ से काम नहीं बनता।” पिताजी ने बस इतना कहा, “अपना ध्यान रखना।”
ट्रेन लेट थी। प्लेटफॉर्म पर भीड़ थी। मैं एक कोने में खड़ा बैग थामे सोच रहा था—क्या होगा अगर इंटरव्यू में रिजेक्ट हो गया? लोग क्या कहेंगे? गाँव वाले हँसेंगे कि देखो, शहर जाकर भी कुछ नहीं कर पाया।
ट्रेन आई। मैं जनरल डिब्बे में घुस गया। सीट नहीं मिली तो खिड़की के पास खड़ा हो गया। बाहर खेत भाग रहे थे, पेड़ दौड़ रहे थे। ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही लगती है—कभी रुकती नहीं, बस भागती रहती है।
दिल्ली पहुँचा तो दोपहर हो चुकी थी। शहर की हवा अलग थी—धुएँ, हॉर्न और भीड़ की। मैंने ऑटो लिया। ड्राइवर ने पूछा, “कहाँ जाना है भाई?” मैंने पता बताया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “इंटरव्यू है क्या? भाग्य आजमा रहे हो?” मैंने सिर हिलाया।
ऑफिस की बिल्डिंग ऊँची थी। ग्लास की दीवारें चमक रही थीं। अंदर घुसा तो एयर कंडीशन की ठंडी हवा लगी। रिसेप्शन पर एक लड़की बैठी थी। उसने मेरा नाम नोट किया और कहा, “तीसरे फ्लोर पर जाइए। वेटिंग में बैठ जाइए।”
वेटिंग रूम में कई लोग बैठे थे। कुछ कॉन्फिडेंट लग रहे थे, कुछ नर्वस। मैंने अपनी फाइल खोली और सर्टिफिकेट दोबारा चेक किए। हाथ काँप रहे थे।
मेरा नंबर आया। कमरे में तीन लोग बैठे थे। एक मिडिल-एज सज्जन, एक महिला और एक युवा आदमी। उन्होंने मुझसे पूछा—पढ़ाई कहाँ से की, अनुभव क्या है, गाँव से क्यों आए, शहर में कैसे रहोगे?
मैंने सच-सच बताया। कोई झूठ नहीं बोला। कहा कि अनुभव नहीं है, पर सीखने की इच्छा है। गाँव में रहकर खेती में मदद की है, स्कूल में ट्यूशन पढ़ाई है। पैसे कम हैं, पर मेहनत करने का हौसला है।
वे चुपचाप सुनते रहे। फिर महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है। हम आपको कॉल करेंगे।”
बाहर निकलते समय दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया। शहर की सड़कों पर चलते हुए सोच रहा था—अब क्या? वापस गाँव जाऊँ? या यहीं ठहरूँ किसी होटल में?
तभी बारिश शुरू हो गई। भारी बारिश। मैं एक चाय की दुकान के नीचे खड़ा हो गया। दुकानदार ने पूछा, “क्या हुआ बेटा? उदास लग रहे हो।” मैंने कहानी सुना दी। उसने चाय बनाते हुए कहा, “इंटरव्यू तो रोज होते हैं। लेकिन हिम्मत रोज नहीं आती। तुमने हिम्मत दिखाई, बाकी भगवान पर छोड़ दो।”
बारिश रुकी तो मैं स्टेशन की ओर चल पड़ा। ट्रेन रात को थी। प्लेटफॉर्म पर बैठे-बैठे समय कट रहा था। तभी फोन बजा। अननोन नंबर।
“हैलो, अमित शर्मा?”
“जी।”
“मैं आर.के. एंटरप्राइजेज से बोल रहा हूँ। आपका इंटरव्यू हुआ था आज। हम आपको जॉब ऑफर करना चाहते हैं। कल सुबह दस बजे ऑफिस आ जाइए। डॉक्यूमेंट्स लेकर।”
मैं कुछ सेकंड के लिए बोल नहीं पाया। फिर धीरे से कहा, “जी… जी ठीक है। धन्यवाद।”
फोन रख दिया। आँखों में पानी आ गया। चारों ओर लोग थे, पर मुझे लगा जैसे अकेला हूँ इस खुशी में। माँ को फोन किया। उन्होंने सुना तो रो पड़ीं। पिताजी ने बस इतना कहा, “अच्छा किया बेटा। अब ध्यान से काम करना।”
रात की ट्रेन में बैठकर मैं दिल्ली लौट रहा था—नहीं, अब रहने के लिए जा रहा था। खिड़की से बाहर देख रहा था। अँधेरा था, पर कभी-कभी बिजली चमक जाती थी और खेत रोशन हो जाते थे। लगा जैसे ज़िंदगी भी ऐसी ही है। अँधेरा रहता है, पर रोशनी का एक पल सब बदल देता है।
कल की बात याद करके आज भी दिल भर आता है।
वह दिन सिर्फ एक इंटरव्यू का दिन नहीं था। वह दिन था जब मैंने अपने डर को पार किया। जब मैंने माँ-बाप की उम्मीदों को अपने कंधों पर उठाया। जब मैंने समझा कि मौका नहीं आता, मौका बनाया जाता है।
आज तीन साल बीत गए। मैं उसी कंपनी में हूँ। प्रमोशन भी मिला। शहर की भाग-दौड़ में खो गया हूँ। पर जब भी रात को अकेला बैठता हूँ तो वही दिन याद आता है—बारिश, चाय की दुकान, फोन की घंटी और माँ की आवाज़।
कल की बात कभी सिर्फ कल की नहीं रहती। वह आज भी साथ चलती है। वह सिखाती है कि हिम्मत एक बार दिखाओ तो रास्ते खुद खुल जाते हैं। वह याद दिलाती है कि घर छोड़ना आसान नहीं होता, पर घर की इज्जत बढ़ाने के लिए कभी-कभी घर छोड़ना पड़ता है।
अब जब भी कोई नया लड़का गाँव से शहर आता है इंटरव्यू देने, तो मैं उसे चाय पिलाता हूँ और कहता हूँ—“डरो मत। कल की बात याद रखना। एक दिन तुम्हारी भी ऐसी ही कहानी होगी।”
और वह मुस्कुरा देता है।
क्योंकि हर किसी के जीवन में एक “कल” होता है—जब सब कुछ बदल जाता है। बस जरूरत होती है हिम्मत की, और थोड़ी सी बारिश की, जो दिल की धूल धो दे।
आज रात फिर वही डायरी खोली है। इस बार पहला पन्ना खाली नहीं है। उस पर लिखा है—
“कल की बात… आज भी जिंदा है।”
(समाप्त)