prem ka chhatnar vriksh in Hindi Poems by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | प्रेम का छतनार वृक्ष - 2

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प्रेम का छतनार वृक्ष - 2

कविता (1) प्रेम का तारा

पथिक

को

रात में अंबर के करोड़ों 

टिमटिमाते तारों के मध्य

दिखते हो तुम 

बिलकुल एक अलग 

चमकते तारे,

उस अँधेरे के राही को

राह दिखाते।

तुम्हें पता नहीं शायद

वह तुम्हें ही देखकर

लगाता है अनुमान

दिशाओं का।

रात के अँधेरे में 

टटोलकर बढ़ता,

घुप अंधकार भरी राह में

मार्ग ढूंढ़ता।

रात भर

वह यूँ ही चलता है,

और मार्ग ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ही

सुबह हो जाती है।

भोर हो जाने पर

मार्ग ढूंढ़ना भी 

आसान होता है

साथ देने वाले भी

मिल जाते हैं,

मगर

दिन के उजाले से

अधिक प्रिय है उसे,

वो अँधियारी रात,

जब तुम उसे साफ दिखाई देते हो।

अंबर में तारों की भीड़ में भी

वह रोज तुम्हें ढूँढ़ लेता है,

तुम्हें ही महसूस करता है।

ठीक उस तरह

जिस तरह 

उस दिन सबसे पहले

उसने तुम्हें देखा था

अनायास,

नदी के उस पार के

पेड़ के ठीक ऊपर,

एक अलग आभा से

चमकते सितारे,

मध्य रात्रि में।

तब से वह 

प्रतीक्षा करता है तुम्हारी

रोज़ रात्रि में देर तक

तुम्हारी एक झलक को,

यहाँ तक कि

बरसात के मौसम में भी

भीगते,पहुंचकर नदी तट पर

जब बारिश,बूँदों और बिजली में 

तुम दिखाई नहीं देते

क्षितिज पर,

तब भी वह 

महसूस करता है तुम्हें

बिना तुम्हारे जाने ही।

उसे लगता है

इस जग में 

कोई तो है

जो रात के अंधेरे में

उसके साथ चलता है,

उसे राह दिखाता है,

तब भी,

जब और छोड़ देते हैं साथ।

"हम दोनों कभी मिलते हैं नहीं

पर

हम दोनों का है बंधन अटूट"

-यही मानकर,

तुम्हारी हर चीज से

बेख़बर,बेपरवाह

अभी भी तुम्हें

प्रेम करता है, 

सुबह के उजाले में 

अपने खो जाने तक

पथिक।

कविता (2) प्रेम का छतनार वृक

प्रेम का निःशब्द बीज

बोया जाता है अंतस्तल में,

ताकि अंकुरित हो सके,

प्रेम का पौधा

और शाखाएं फूटे इससे अगणित

कि लहलाने लगे प्रेम,

धरती में इस ओर से उस ओर

और आकाश में सदैव दिखाई देने वाले

ध्रुव तारे की तरह,

और पूरी धरती पर आच्छादित

इस प्रेम के आनंद-फल को

मीलों दूर से भी

हृदय चख सके

और महसूस कर सके

उस अव्यक्त प्रेम को

जो कृष्ण ने किया था राधा से

और जो

युगों की सीमा का अतिक्रमण कर

पहुंचा राधा तक।

और फिर जैसे समय एक हो जाता है।

मीरा द्वापर में पहुंचती हैं

और कृष्ण आ जाते हैं कलियुग में ।

कविता (3) प्रेम होता है केवल प्रेम

इसका कोई रूप नहीं,

इसका कोई रंग नहीं,

इसका कोई आकार नहीं।

प्रेम होता है केवल प्रेम।

इसकी कोई चाह नहीं,

इसकी कोई वजह नहीं,

इसमें कोई स्वार्थ नहीं।

प्रेम होता है केवल प्रेम।

यह कोई सौदा नहीं,

यह कोई लब्धि नहीं,

यह कोई रिश्ता नहीं।

प्रेम होता है केवल प्रेम।

एक को लगती है चोट,

तो होता है दर्द दूजे को,

एहसास की बँधी डोर।

इसमें होता है केवल प्रेम।

मीलों दूर रहके भी, 

किसी के साथ होने

का होता है एहसास।

ऐसा होता है प्रेम।

मिली बस एक ही रोटी,

स्वयं भूखी रहकर भी,

संतान को खिलाती माँ,

इसमें होता है केवल प्रेम।

बिसराकर निज,जो सैनिक,

सरहद पर बढ़ते शत्रु की,

पहली गोली खाता सीने पर।

इसमें होता है केवल प्रेम।

कविता (4) प्रेम

स्वच्छ होता है प्रेम

बारिश थमने के बाद

भीगे अंबर सा।1।

हल्का होता है प्रेम

आकाश में उड़ते

बच्चों के पतंग सा।2।

कोमल होता है प्रेम

तितलियाँ पकड़ते 

बच्चों के नाजुक हाथ सा।3।

नितांत निजी होता है प्रेम

कभी मीलों दूर पहुँचने पर भी

प्रिय के उसी अहसास सा।।4।।

तृप्ति होता है प्रेम

खुद से पहले भोजन कराती

प्रिय के हाथ की 

बनी पहली रोटी सा।5।

सुखद होता है प्रेम

लोरियां गाकर सुलाती 

मां की थपकियों सा।5।

निश्छल होता है प्रेम

पालने में लेटे 

शिशु की मुस्कान सा।6।

पवित्र होता है प्रेम

सुबह-सुबह देव प्रतिमा पर

अर्पित ताजे पुष्पों सा।7।

प्रतीक्षा होता है प्रेम

प्यासे चातक पक्षी के लिए

बारिश की पहली बूँद सा।8।

अकुलाहट होता है प्रेम

आषाढ़ में मेघों की प्रतीक्षा

करती प्यासी धरती सा।9।

कर्तव्य होता है प्रेम

मिलन को प्रतीक्षारत प्रिया

को छोड़ ड्यूटी पर लौटे सैनिक सा।10।

डॉ. योगेंद्र कुमार पांडेय 

(कॉपीराइट रचना ©)