Dr. Pradeep Kumar Sharma in Hindi Classic Stories by Dr. Pradeep Kumar Sharma books and stories PDF | डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा की लघुकथाएँ - 12

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डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा की लघुकथाएँ - 12

लघुकथा - 1 

 
स्वाभिमानी किसान
 
"नमस्कार मैनेजर साहब।" मैनेजर के चैंबर में घुसते हुए रामलाल बोला।
"नमस्कार, आइए-आइए, रामलाल जी। बैठिए। बताइए क्या सेवा करूँ आपकी ?" गाँव के मँझोले किसान रामलाल जी को मैनेजर साहब अच्छे से पहचानते थे। पिछले तीन साल से हर महीने की ठीक सात तारीख को ही किश्त जमा करने जो आता है।
"एक जमा पर्ची दे दीजिए, किश्त जमा करनी है।'' रामलाल विनम्रतापूर्वक बोला।
"अभी कुछ दिन रूक जाओ रामलाल। सरकार सभी किसानों का कर्जा माफ करने वाली है।" मैनेजर ने उसे समझाते हुए कहा।
"क्या मैनेजर साहब आप भी, कैसी बात करते हैं। अभी की किश्त तो जमा कर लीजिए। जब होगा माफ, तब देख लेंगे।" रामलाल बोला।
"रामलाल जी, आपके ही भले के लिए बता रहा हूँ। सचमुच सरकार किसानों का कर्जा माफ कर रही है।" मैनेजर ने बताया।
"मैनेजर साहब, मैं मोहताज नहीं, सक्षम हूँ। मैंने इस विश्वास के साथ कर्जा लिया था, कि लौटा दूँगा। माफी की उम्मीद पर कर्ज नहीं ली थी। लाइए, दीजिए एक पर्ची।" उसने आगे हाथ बढ़ाते हुए कहा।
आज मैनेजर खुद को रामलाल के सामने बहुत ही छोटा महसूस कर रहा था। वह अपनी जिंदगी में पहली बार किसी स्वाभिमानी किसान से मिल रहा था। अपनी टेबल दराज से एक फॉर्म निकाल कर देते हुए बोला, "लीजिए फॉर्म, काश ! सारे किसान आपकी तरह होते।''
 
*****
 
लघुकथा - 2 
 
थोड़ा-सा मान
 
"बहू, हमारे गृह-प्रवेश के कार्यक्रम में आमंत्रित करने के लिए तुमने अपने भैया की बजाय भाभी को फोन करके क्यों आमंत्रित किया ?" सास ने पूछा।
"माँ जी, भैया तो मेरे अपने हैं। वे तो आएंगे ही। भाभी को फोन करके मैंने उन्हें थोड़ा-सा सम्मान देने की कोशिश की है, ताकि उन्हें ये न लगे कि उनको तो पूछा ही नहीं।''
"हूँ।"
"माँ जी, जब लोग अपने घर के किसी भी कार्यक्रम में अपनी बेटी की बजाय दामाद जी या समधी जी को फोन करके बुला सकते हैं, तो क्या हम घर की बहू को इतना भी सम्मान नहीं दे सकते ?"
"बिल्कुल दे सकते हैं बेटा। मुझे गर्व है कि मेरी बहू इतनी समझदार है।" सास ने बहू को गले से लगा लिया।
*****
 
लघुकथा - 3 
 
प्री-वेडिंग फोटो शूट 
 
राष्ट्रीय स्तर के उस प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में प्री-वेडिंग फोटो शूट के नाम पर अनावश्यक रूप से एक कुप्रथा को शुरू होने से पूर्व ही खत्म करने के संबंध में लिखित उनके प्रेरक आलेख से प्रभावित होकर उन्हें दिए गए मोबाइल नंबर पर फोन करके बधाई देने से खुद को नहीं रोक सका।
"हेलो... क्या मेरी बात मिस्टर सिंह से हो रही है ?"
"हाँ जी, फरमाइए। मैं मिस्टर सिंह ही बोल रहा हूँ।"
"सर, मैं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रदीप शर्मा बोल रहा हूँ। सर फलाँ पत्रिका में प्री वेडिंग फोटो शूट पर आधारित आपके आलेख को पढ़कर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। क्या गज्जब का लिखा है सर आपने। दिल खुश हो गया पढ़कर। इतना अच्छा आलेख आजकल बहुत ही कम पढ़ने को मिलता है।"
"प्रदीप जी, कोई जरुरी बात हो, तो प्लीज़ शार्ट में कहिए। दरअसल मैं अभी अपनी प्री-वेडिंग फोटो शूट के लिए ही दार्जिलिंग आया हुआ हूँ... हेलो, हेलो... लगता है फोन काट दिया। अजीब आदमी था। पूरी बात सुनने से पहले ही फोन काट दिया।"
कथनी और करनी का भेद समझते देर नहीं लगी, सो मैंने फोन काट दिया था।
_ डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा 
रायपुर, छत्तीसगढ़