rain and pakode in Hindi Children Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | बारिश और पकौड़े

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बारिश और पकौड़े



नवंबर की सुबह थी। सुबह से ही रिमझिम बारिश हो रही थी। हल्की-हल्की ठंड ने पूरे घर को अपने आगोश में ले रखा था।

आर्यन स्कूल से लौटा तो उसका बस्ता पूरी तरह भीगा हुआ था। उसने जूते दरवाजे पर ही उतारे और बस्ता कोने में फेंक कर सीधा रसोई की ओर भागा।

"माँ... ओ माँ! आज क्या बनाया है? बहुत तेज़ भूख लगी है।"

मीना रसोई में खड़ी थी। सुबह से उसने सरसों का साग और मक्के की रोटी बनाई थी। उसने प्यार से थाली लगाते हुए कहा, "आ जा बेटा, गरम-गरम साग और रोटी बनाई है, खा ले।"

आर्यन ने थाली देखी और मुँह बना लिया। खिड़की के बाहर बारिश को देखते हुए बोला, "माँ, सुबह से बारिश हो रही है, ठंड भी लग रही है। इस मौसम में साग-रोटी कौन खाता है? पकौड़ी बना दो न, गरम-गरम।"

मीना मुस्कुराकर कुछ जवाब देती, तभी मुख्य दरवाजा खुला। आर्यन के पापा भी ऑफिस से लौटे थे। वे भी बारिश में पूरी तरह भीग गए थे। कोट उतारते हुए उन्होंने आवाज लगाई, "मीना, कहाँ हो? आज तो मैं भी बारिश में भीग गया। जरा गरमा-गरम पकौड़े बना दो न, मैं हाथ-मुँह धोकर आता हूँ।"

बेचारी मीना कुछ न कह सकी। उसने चुपचाप परोसी हुई साग-रोटी की थालियाँ उठाकर फिर से ढक कर रख दीं। पति और बेटे की एक ही फरमाइश के आगे उसकी क्या चलती? वह फिर से रसोई में जाकर आलू, प्याज, गोभी काटने लगी, बेसन घोलने लगी।

कुछ ही देर में पूरे घर में घी और पकौड़ों की सोंधी-सोंधी खुशबू फैल गई। मीना ने बड़ी सी प्लेट में गरम-गरम आलू-प्याज के पकौड़े और हरी-धनिये की चटनी के साथ मेज पर सजा दिए।

पापा और आर्यन तो टूट पड़े। "वाह माँ, मजा आ गया!" आर्यन बड़े शौक से खा रहा था।

पर मीना वहीं कुर्सी पर बैठी रही। उसने एक भी पकौड़ा नहीं लिया।

आर्यन ने देखा तो बड़े प्यार से पूछा, "माँ, क्या हुआ? तुम क्यों नहीं खा रही? तुमने बनाए हैं, तुम भी खाओ न।"

मीना ने एक फीकी हँसी हँसी और बोली, "नहीं बेटा, तुम लोग खाओ। मुझसे अब ये पकवान पचते नहीं हैं। एसिडिटी हो जाती है।"

"तो क्या हुआ? एक तो खा लो?" पापा ने भी कहा।

मीना ने गंभीर होकर कहा, "नहीं, एक दौर था जब मुझे भी बहुत शौक था। आलू, गोभी, प्याज, पालक, पनीर के पकौड़े... नाम सुनते ही मुँह में पानी आ जाता था। मैं सोचती थी, बारिश हो और पकौड़े न बनें, ऐसा हो ही नहीं सकता। पर अब... अब तो बाइपास हो गया है। अब कुछ भी खाने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है, डर लगता है। अब तो सादा फुल्का और उबली सब्जी भी पच जाए तो गनीमत है।"

इतना कहकर वह उठी और अपनी प्लेट लिए बालकनी में चली गई। वह पौधों को पानी देने लगी।

बाहर बारिश अब भी हो रही थी, पर मीना का मन कहीं और था। पानी देते-देते वह अतीत की यादों में चली गई।

उसे अपना बचपन याद आया। जब वह खुद छोटी बच्ची थी, तब उसे भी पकौड़ों का बेहद शौक था। उसके मायके में संयुक्त परिवार था। दादा-दादी, चाचा-चाची, सारे भाई-बहन, सब एक साथ।

बारिश का मौसम आते ही उसकी दादी सबसे पहले रसोई में जाती और कहती, "चलो बच्चों, आज पकौड़े बनाते हैं।" फिर क्या था, पूरी रसोई में मेला लग जाता। कोई प्याज काटता, कोई बेसन घोलता, कोई चटनी पीसता। और फिर सब आंगन में बैठकर एक साथ खाते। कितना मन लगता था। कितनी हँसी-ठहाके होते थे।

उसकी दादी को तो चाट-पकौड़ों का बहुत ही शौक था। वह बड़े चाव से खाती थी।

फिर धीरे-धीरे दादी की उम्र हो गई। उनका लीवर कमजोर हो गया। डॉक्टर ने तला-भुना, चटपटा सब बंद करवा दिया। खाना पचना ही बंद हो गया। मीना को याद है, दादी आखिरी दिनों में रसोई के बाहर चुपचाप बैठी रहती, सबको खाते हुए देखती, पर खुद कुछ नहीं खा पाती। एक महीने तक अस्पताल में रहीं और एक दिन सबको छोड़कर चल बसीं। उस दिन मीना बहुत रोई थी।

तब मीना ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन यही कहानी उसकी भी होगी।

उसे क्या पता था कि एक दिन उसे भी पकौड़े छोड़ने पड़ेंगे। आज वह बिल्कुल अपनी दादी की जगह पर खड़ी थी। सबके लिए गरम-गरम पकौड़े बनाती, सबको खिलाती, पर खुद एक निवाला भी नहीं खा पाती।

बालकनी में खड़ी मीना की आँखें भर आईं। उसे लगा, ये सिर्फ पकौड़े छोड़ने की बात नहीं है। ये तो जिंदगी का दस्तूर है। बचपन में हम शौक से खाते हैं, जवानी में हम सबके लिए बनाते हैं, और बुढ़ापे में हम सिर्फ दूसरों को खाते देखकर खुश होते हैं।

तभी पीछे से नन्हे आर्यन के कदमों की आहट आई। उसने एक गरम पकौड़ा हाथ में लिया और मीना की ओर बढ़ाया।

"माँ, एक तो खा लो न। देखो, मैंने फूंक मार के ठंडा भी कर दिया है। कुछ नहीं होगा।"

मीना ने आँसू पोंछे और आर्यन के हाथ से पकौड़ा लेकर वापस उसकी प्लेट में रख दिया। उसने बेटे का माथा चूमा और कहा, "तू खा बेटा, तुझे खाते देखकर ही मेरा पेट भर जाता है। माँओं का पेट अपने बच्चों की खुशी से ही भरता है।"

आर्यन ने माँ को गले लगा लिया।

बाहर बारिश अब भी हो रही थी। रिमझिम, हल्की-हल्की। मीना को अब ये बारिश उदास नहीं लग रही थी। उसे समझ आ गया था कि उसकी दादी भी इसी तरह, बिना खाए, उन्हें खाते देखकर खुश होती होगी। क्योंकि त्याग में भी एक स्वाद है, जो दुनिया के किसी भी पकौड़े से ज्यादा मीठा और ज्यादा अपना होता है।