Chunane ka apradhbodh books and stories free download online pdf in Hindi

चुनने का अपराधबोध

व्यंग्य कथा

चुनने का अपराधबोध

- सुरजीत सिंह

उसकी गलती क्या थी!

बस, इतनी सी कि उसने जरा सा महंगाई पर सवाल उठा दिया। लोगों ने पहले तो उसे 'ये मुंह और मसूर की दाल' की तरह घूरा, फिर गिरेबान पकडक़र चार चांटे धरे और महंगाई वाली सरकार चुनने का ठीकरा उसी के सिर फोड़ दिया। सच कहा है, दुनिया की नजर में उठ जाने लायक आदमी सवाल उठाने का हक नहीं रखता। अब इसे सवाल भी क्या कहें, रोकते-रोकते मुंह से दो शब्द निकल गए...! चार शब्द लोगों ने हलक में हाथ डालकर खींच लिए। दस अपनी ओर से मिला दिए। क्यों बे, यह सवाल मुंह में कितने दिन से दबाए घूम रहा था, शब्दों का बूरी तरह हुलिया बिगाड़ रखा है। तेरी अदा के कहने, चिट भी तेरी, पट भी तेरी! वह बुरी तरह झेंप गया। दो-चार ने हाथ ढीले कर लिए, पहले सरकार चुनता है, फिर सवाल भी उठाता है।

आम आदमी ठहरा। वह इसी किस्म का मैटेरियल होता है कि न बोलकर भी मरता है और बोलकर भी।

वैसे सोच तो वह कई दिन से रहा था कि वह भी मुंह खोले। आजकल हर कोई मुंह खोले घूम रहा है। चार शब्द भी पान की तरह मुंह में छुपाकर रख लिए। बोलने के लिए भांति-भांति के मुद्दे हवा में हैं। जितने मुंह, उतने मुद्दे। उसका भी जी करता है। आखिर वह भी इस देश का नागिरक है। सांस लेता है। मरने की आशंका में सोता है, रोज सुबह खुद को आश्चर्य के साथ जिंदा पाता है। हिलाने पर हाथ-पैर हिलते हैं। मुंह खुलता है। भीतर जुबान भी है। वोट देता है। उसके बाप-दादा भी देते थे। बदले में कभी कुछ नहीं लेता। तब इत्ता सा हक तो बनता है, बनता है कि नहीं!

उसकी न बोलने की प्रवृत्ति पर पत्नि भी कई बार टोक चुकी कि आप भी बोला करिए कभी तो! सब बोलते हैं। उसकी आत्मा को यह कहकर झिंझोड़ा कि घर में तो बड़े शेर बनते हो, कोई मौका नहीं छोड़ते बोलने का, फिर बाहर कैसे म्याऊं हो जाते हो। आखिर में हडक़ा भी दिया कि आप कब बोलोगे, तब, जब मुंह में जुबान ही नहीं रहेगी। न काम आने से मनुष्यों की दुमें गायब हो गईं। अब यह अलग बात है कि जबर्दस्त इच्छाशक्ति के बूते कुछ लोगों ने पुन: उगा ली। आपसे तो वह भी नहीं होगा! कम से कम इस बहाने भड़ास तो निकल ही जाएगी।

बोलने को उद्दत होकर चुप रहने का उसका लंबा इतिहास रहा है। जब प्याज-टमाटर के दाम बढ़े, तब भी वह चुप रहा। दालें उसके बूते से बाहर हुईं, तब भीतर शब्द खदबदाने लगे। गले में आकर अटक गए। दम घुटने लगा। तब भी उसने जान की जोखिम पर खुद को बोलने से रोक लिया। जब सरसों तेल के भाव भी बढ़ गए, तो जी में आया, अब तो एक दफा बोल ही दे। और नहीं तो बोलकर पिंड छुड़ाए। सिर से बोझ भी उतर जाएगा। लेकिन आदत नहीं थी। जुबान तालू से चिपकी थी। अब गरीब आदमी बोलने का अभ्यास करे कि जीने की जद्दोजहद! तालू से जुबान हटाने में ताकत लगाए कि दो वक्त की रोटी कमाने में!

फिर भी उस पर बोलने का भारी प्रेशर आ रहा था। थोड़ा-थोड़ा सोई आत्मा भी जम्हाई लेने लगी थी। सो, आज वह घर से तय करके निकला था कि कुछ भी हो जाए, आज बोलकर रहेगा, फिर होगा सो देखा जाएगा। अब जो है, उससे ज्यादा और क्या बिगड़ेगा! पहले घर पर खूब प्रेक्टिस की। शब्दों को दीवारों के साथ आजमाकर देखा। पहली बार बोलने जा रहा था। डर था, कहीं जगहंसाई न हो जाए। कहीं अंडबंड न निकल जाए कि अर्थ का अनर्थ हो जाए। निकलते समय ध्यान आया, थोड़ी हिम्मत भी बांध ले। जरा सी ही तो थी, जो बरसों पहले कहीं रखकर भूल गया था। ढूंढऩे पर बड़ी मुश्किल से मिली। खंखार कर गला चैक किया, ठीक था।

बाहर देखा लोग महंगाई, असहिष्णुता, कट्टरता आदि पर चर्चा कर रहे हैं। सरकार को कोस रहे हैं। एक-एक मु_ी में क्रांति भिंची है। उसे लगा, इससे बढिय़ा मौका शायद फिर नहीं मिलेगा। किसी को अहसास भी नहीं होगा। उसने हिम्मत बटोर कर लोगों के सुर में सुर मिला दिया, जिसका अर्थ लोगों ने यह निकाला कि महंगाई बहुत बढ़ रही है, देश में माहौल भी कुछ ठीक नहीं लग रहा है, असहिष्णुता वगैरह बढ़ रही है, सरकार क्या कर रही है!

उसका इतना बोलना था कि लोग सरकार को कोसना छोडक़र उसकी तरफ लपके। जैसे उनके बीच किसी दूसरे ग्रह का प्राणी आ गया हो। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि यह बोल भी सकता है! कुछ लोग बोलने का सर्वाधिकार खुद के पास ही सुरक्षित समझते हैं। दूसरों के हिस्से का भी खुद ही बोल लेते हैं। सबको यूं घूरते देखकर, उसे भी लगा कहीं वह आदमी से जोकर में तब्दील तो नहीं हो गया है! गर्दन झुक गई। भय से कांप उठा। मुख पीला पड़ गया। यह क्या हो गया। उसे क्या पता था, उसके जरा से बोलने पर लोग इतना सीरियस हो जाएंगे। कुछ शंकालु लोगों ने उसके हलक में हाथ डालकर चैक किया, मुंह के भीतर जुबान भी रखता है स्साला यह तो! लोगों को अनुमान था कि इत्ते साल न बोलने से इसकी जुबान गायब हो चुकी होगी। उसके अधबोले शब्द भी निकाल लिए गए। फिर उसे धोबीघाट पर गीले कपड़े की तरह पछीटा, काय रे, सरकार चुनी किसने थी! तूने! अब भुगत! लोग उसे कोस रहे थे। वह चुप खड़ा था। शर्मिन्दगी से गड़ा जा रहा था। काश, इसी वक्त जमीन फट जाती, तो वह उसमें समा जाता। अब वह खुले मुंह से किस-किस का सामना करेगा। कमजोर आदमी सामना करने से डरता है। क्या जरूरत पड़ी थी बोलने की। बिना बोले भी तो जी रहा था!

यह बात दावानल की तरह फैल गई कि यह आदमी आज बोला है, कल कुछ कर भी सकता है। रास्ते में जो भी मिला, खूब खरी-खोटी सुनाई कि भइया, अब बोलने से क्या फायदा, सरकार चुनी तो तुमने ही थी। कुछ लोगों ने उसकी खिल्ली उड़ाई, देखो भाइयो, इसे चाहिए सस्ते प्याज, सस्ते टमाटर, सस्ता तेल, सस्ती दालें! अरे भाई, सस्ताई चाहिए थी, तो ऐसी महंगाई वाली सरकार क्यों चुनी थी! खुद ही चुनते हो, खुद ही दोष दे रहे हो। देना है, तो खुद को दो! खुद के सिर जूते मारो, ताकि कुछ अक्ल आए!

चिंतकों को भनक लगी, तो उन्होंने उसकी खबर ली, अब पछताने में क्या सार, जब चुन ली सरकार! हमने तो लाख सिर पटका, समझाया, शब्द धुने, मगर तुम्हारे भेजे में बात ना घुसी कि किसे चुनना है, किसे नहीं!

सकते में आया आदमी यहां से कन्नी काटकर निकला ही था कि सांड की तरह बिगड़े एक सरकारी कारिन्दे ने पकड़ लिया, क्यों बे लोकतंत्र के राजा, सुना है आजकल बहुत बोलने लगा है। पहले चुनता है, फिर सिर धुनता है। एक बार चुन लिया है, तो सरकार को सिर का ताज बना। हार की बात मत करे, गले का हार बना!

माई बाप, गलती हो गई! उसने कान पकडक़र माफी मांगी और वहां से सरपट भागा। हड़बड़ी में ठोकर खाकर धड़ाम गिरा। ऐसे वक्त में राह के पत्थर भी उसके दुश्मन हो जाता है। एक पुलिस वाले ने डण्डे से उसकी ठुड्डी को ऊपर उठाते हुए पूछा, क्यों रे आम आदमी के पट्ठे, कहां भागा जा रहा है, तेरा हुलिया बता रहा है, कहीं कोई सवाल तो नहीं उठा आया! सुनते ही उसकी गर्दन जनलोकपाल बिल की तरह लटक गई। खून सूख गया। लो, इसने भी ताड़ लिया। कलेजा मुंह को आने लगा।

एक नेता चमचे ने शिकारी कुत्ते की तरह पीछे लगकर उसे बुरी तरह दौड़ाया, तेरी हिम्मत कैसे हुई रे बोलने की। चुना तो तुमने ही था। नेताजी के पालतु गुंडे ने गुंडई के जौहर दिखाए। सात पीढिय़ों तक भी सवाल न उठाने का संकल्प लिया, तब जाकर जान छूटी। वह पूरा दम लगाकर भागा। गिरते-पड़ते घर आकर दम लिया।

उफ्फ, यह क्या पंगा ले लिया आज! कैसा अपराध कर बैठा! अब किस-किस को सफाई दे कि उसकी कोई गलती नहीं, किसी ने लोकतंत्र का राजा बोलकर उसे चने के झाड़ पर चढ़ा दिया था। जब तक राजसी नशा हिरण होता, उससे अपराध हो चुका था, चुनने का अपराध। उसे अपराधबोध हो रहा था।

वह समझ नहीं पा रहा था, उसने बोलकर ज्यादा गलती की या वोट देकर!

सुरजीत सिंह,

36, रूप नगर प्रथम, हरियाणा मैरिज लॉन के पीछे,

महेश नगर, जयपुर -302015

(मो. 09680409246)