Namrata in Hindi Love Stories by महेश रौतेला books and stories PDF | नम्रता

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नम्रता

नम्रता:

नम्रता का फोन आया," रिश्ते के लिये एक लड़का है, उसके पिता आपको जानते हैं। यहां मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं। उनका फोन नम्बर लिखिये। बात कर लेना।" आलोक ने फोन मिलाया। बातें हुईं। फेसबुक पर फोटो देखी गयीं। लड़का अमेरिका में था। बहुत मोटा था देखने में। कुछ दिन बाद नम्रता का फोन आया ," बातें हुईं क्या? क्या हुआ?" आलोक बोला," बात हुई। लड़का बहुत मोटा है और उम्र का अन्तर भी अधिक है।" नम्रता बोली," क्या फर्क पड़ता है? मेरी जिन्दगी सुन्दरता के चक्कर में कैसी खराब हो गयी है, आप देख रहे हैं।" आलोक ने सोचा," कोई देखकर तो मक्खी नहीं निगलता है।" नम्रता आलोक को तब से जानती है जब वह सोलह साल की थी। आलोक उनके घर आता-जाता था। वह उससे मन ही मन चाहने लगी थी।लेकिन तब आलोक के पास उपयुक्त रोजगार नहीं था।वह अच्छी नौकरी की तलाश में लगा था।नम्रता खाते-पीते घर की थी।समय बीतता गया ,उच्च शिक्षा लेते समय नम्रता का प्रेम उसी के साथ पढ़ने वाले लड़के के साथ हो गया। लड़का देखने में सुन्दर था। दोनों अलग-अलग प्रदेशों से थे। लड़के के घरवाले दहेज प्रथा के समर्थक थे जबकि नम्रता के समाज में यह प्रथा नहीं थी। लेकिन दोनों ने शादी करने का फैसला किया। शादी के बाद नम्रता की सास ताने देती थी," इसका बाप तो भिखारी है।" नम्रता की प्रेक्टिस खूब चलने लगी थी। इस बीच दो बच्चे भी हो गये। पति-पत्नी के बीच मन मुटाव बढ़ने लगे थे। स्थानीय अखबारों में भी इसकी चर्चा होने लगी।घर में काफी कलह रहने लगा। नम्रता ने ससुराल छोड़ दिया और एक पहाड़ी शहर में रहने लगी। वहीं उसने अपनी प्रक्टिस शुरु की। आलोक एक बार उस शहर में गया था और जब उसे पता लगा नम्रता वहाँ रहती है तो वह उससे मिलने का मन बनाया। होटल से निकलते समय उसके मन में असीम उत्सुकता भरी थी। उसके घर पहुंच कर उसने जैसे ही उसे देखा उसका उत्साह मलिन हो गया। उसका सौंदर्य बहुत फीका हो चुका था। एक उदासी चेहरे पर साफ दिख रही थी। वह पानी लेने अन्दर गयी तो आलोक का मन हुआ पानी पीकर लौट जाय। लेकिन फिर सोचा यह अभद्रता होगी। अतः बेमन हो बैठा रहा। नम्रता प्यार से उसे देख रही थी। उसने उसे बताया," मैंने उच्च न्यायालय से तलाक ले लिया है।एक लड़का मेरे साथ रहता है और एक अपने पिता के साथ।" आलोक ने कहा सुलह नहीं हो सकती है क्या अभी? वह बोली," नहीं, वह कमीना, नीच है। मारपीट करता है। अपशब्दों का प्रयोग करता है। ससुराल वाले मेरी सम्पत्ति पर नजर लगाये हुए हैं। सब कमीने हैं। मेरे मायके वालों को भिखारी कहते हैं। मैं तो अवसादग्रस्त हो गयी थी दो-तीन साल तक।"

वह आलोक को तन्मय होकर देखती है। उसे अतीत याद आने लगता है जब वह उनके घर आता था और तब वह अतुलनीय, अद्भुत आनन्द अनुभव करती थी। आलोक उसे देखता है और फिर दृष्टि झुका लेता है। वह चाय बनाने चले जाती है।दोनों साथ-साथ चाय पीते हैं। एक सन्नाटा दोनों के बीच छा जाता है।

इतने में आलोक का फोन आता है। फोन में उसका बचपन का दोस्त अपना परिचय देता है। पुरानी यादें सजीव होने लगती हैं, और उस समय के प्रधानाध्यापक की चर्चा होती है। उसने बताया कि वे आजीवन अविवाहित रहे। विद्यालय के विकास और पढ़ाने में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था।पेड़ लगाने का उन्हें बहुत शौक था। बच्चों से श्रमदान करा कर उन्होंने बहुत से काम कराये थे। सेवानिवृत्ति के बाद अपने गांव चले गये। गांव में मंदिर के समीप एक छोटी कुटिया बनाकर रहने लगे। एक महिला को घर के काम करने के लिये रख लिया।वे नब्बे साल से अधिक जिये। उनकी मृत्यु फूलों को पानी देते समय हुई।

आलोक ने पूछा," वह कुआं अभी है क्या, जिसके बारे में विश्वास था कि उसके पानी पीने से बिमारियां ठीक हो जाती थीं। जहां दूर दूर से लोग आते थे।" वह बोला," नहीं, वह सूख चुका है। उसमें गिरकर एक आदमी मर गया था, उसके बाद धीरे धीरे वह सूख गया।" आलोक ने फोन नीचे रखा और जाने की अनुमति मांगी।नम्रता ने उसके हाथ में सौंफ रखा और उसने मुट्ठी बंद कर ली। वह चला गया,मानो एक युग बीत गया। रास्ते में मुट्ठी खोली और सौंफ चबाते-चबाते होटल पहुंच गया।

दो साल बीत गये।एक सामाजिक आयोजन में आलोक उस पहाड़ी शहर में गया था। नम्रता को उसने आते देखा। वह साड़ी में सजी मुस्कुराते हुए आलोक की ओर बढ़ रही थी और आलोक उसकी ओर। आलोक ने अचानक उसके गाल को अपने हाथ से पकड़ कर उसे हतप्रभ कर दिया। फिर बोला,"कैसी हो?" उसने कहा," अच्छी हूँ।" दोनों थोड़ी देर साथ साथ बैठै। आलोक ने पूछा," उससे, सुलह नहीं हो सकती है क्या?" वह बोली नहीं, बीस साल हो चुके हैं। आलोक उठकर किसी काम से दूसरी जगह चला गया। उस दिन फिर दोनों की भेंट नहीं हुई। फोन पर आलोक ने पूछा," खाना खाया क्या?" नम्रता बोली," नहीं, एक जरूरी केस आ गया था, अतः मैं चली आयी।" आलोक को लगा कहीं उसके आत्मीय स्पर्श से तो वह विचलित नहीं हो गयी हो।अतीत उसे भावुक और द्रवित न कर गया हो। लेकिन उस बात का दोनों ने जिगर नहीं किया। एक सप्ताह बाद आलोक नम्रता से मिलने उसके घर गया। वह अपनी माँ के साथ बैठी थी। इधर-उधर की बातें होती रहीं। नम्रता की माँ ने आलोक के कंधे को थपथपाया और कहा बुढ़ापे में बेटा साथ हो तो ऐसे उसके कंधे पर हाथ रख सकते हैं। नम्रता ने खाना बनाया और सबको खिलाया। और फिर बैठक में बैठ कर पुरानी बातें उकेरने लगे। नम्रता ने आलोक के हाथ में अलसी के बीज रखे और थोड़ी देर में वह उठ कर जाने के लिए बोला। नम्रता उसे छोड़ने दरवाजे तक आयी। और बोली बहुत उदास और अकेली हो गयी हूँ। आलोक मुस्कुराते हुए बोला फिर शादी कर लो। वह बोली किस से। उसने कहा मेरे से। वह बोली," तब नहीं हुई।" वह बोला," तब मैं किसी और से प्यार करता था।" उसने पूछा," फिर उससे हुई?" उसने कहा," नहीं, प्यार अधूरा ही अच्छा होता है।" और दोनों मुस्कराने लगे। फिर आलोक अलसी के बीज चबाते- चबाते अपनी राह पर आगे चल दिया। नम्रता उसे आँखों से ओझल होने तक देखती रही।

महेश रौतेला