दो क़ौमैं

दो क़ौमैं

मुख़तार ने शारदा को पहली मर्तबा झरनों में से देखा। वो ऊपर कोठे पर कटा हुआ पतंग लेने गया तो उसे झरनों में से एक झलक दिखाई दी। सामने वाले मकान की बालाई मंज़िल की खिड़की खुली थी। एक लड़की डोंगा हाथ में लिए नहा रही थी। मुख़तार को बड़ा ताज्जुब हुआ कि ये लड़की कहाँ से आगई, क्योंकि सामने वाले मकान में कोई लड़की नहीं थी। जो थीं, ब्याही जा चुकी थीं। सिर्फ़ रूप कौर थी। उस का पिलपिला ख़ाविंद कालू मिल था। उस के तीन लड़के थे और बस।

मुख़तार ने पतंग उठाया और ठिठक के रह गया...... लड़की बहुत ख़ूबसूरत थी इस के नंगे बदन पर सुनहरे रोएँ थे। इन में फंसी हुई पानी की नन्ही नन्ही बून्दनयां चमक रही थीं। उस का रंग हल्का साँवला था, साँवला भी नहीं। ताँबे के रंग जैसा, पानी की नन्ही नन्ही बून्दनयां ऐसी लगती थीं जैसे उस का बदन पिघल कर क़तरे क़तरे बन कर गिर रहा है।

मुख़तार ने झरने के सूराखों के साथ अपनी आँखें जमा दीं और उस लड़की के जो डोंगा हाथ में लिए नहा रही थी, दिलचस्पी और ग़ौर से देखना शुरू कर दिया। उस की उम्र ज़्यादा से ज़्यादा सोला बरस की थी गीले सीने पर उस की छोटी छोटी गोल छातियां जिन पर पानी के क़तरे फिसल रहे थे बड़ी दिलफ़रेब थीं। उस को देख कर मुख़तार के दिल-ओ-दिमाग़ में सुफली जज़बात पैदा न हुए। एक जवान, ख़ूबसूरत, और बिलकुल नंगी लड़की उस की निगाहों के सामने थी। होना ये चाहिए था कि मुख़तार के अंदर शहवानी हैजान बरपा हो जाता, मगर वो बड़े ठंडे इन्हिमाक से उसे देख रहा था, जैसे किसी मुसव्विर की तस्वीर देख रहा है।

लड़की के निचले होंट के इख़ततामी कोने पर बड़ा सा तिल था...... बेहद मतीन, बेहद संजीदा, जैसे वो अपने वजूद से बेख़बर है, लेकिन दूसरे इस के वजूद से आगाह हैं, सिर्फ़ इस हद तक कि उसे वहीं होना चाहिए था जहां कि वो था।

बाँहों पर सुनहरे रोएँ पानी की बूंदों के साथ लिपटे हुए चमक रहे थे उस के सर के बाल सुनहरे नहीं, भोसले थे जिन्हों ने शायद सुनहरे होने से इनकार कर दिया जिस्म सुडौल और गदराया हुआ था लेकिन उस को देखने से इश्तिआल पैदा नहीं होता था। मुख़तार देर तक झरने के साथ आँखें जमाए रहा।

लड़की ने बदन पर साबुन मला। मुख़तार तक उस की ख़ुश्बू पहुंची। सलोने, ताँबे जैसे रंग वाले बदन पर सफ़ैद सफ़ैद झाग बड़े सुहाने मालूम होते थे। फिर जब ये झाग पानी के बहाओ से फ़िस्ले तो मुख़तार ने महसूस किया जैसे उस लड़की ने अपना बुलबुलों का लिबास बड़े इत्मिनान से उतार कर एक तरफ़ रख दिया है।

ग़ुसल से फ़ारिग़ हो कर लड़की ने तोलीए से अपना बदन पोंछा। बड़े सुकून और इत्मिनान से आहिस्ता आहिस्ता कपड़े पहने। खिड़की के डंडे पर दोनों हाथ रखे और सामने देखा। एक दम उस की आँखें शर्माहट की झीलों में ग़र्क़ होगईं इस ने खिड़की बंद करदी। मुख़तार बेइख़्तयार हंस पड़ा।

लड़की ने फ़ौरन खिड़की के पट खोले और बड़े ग़ुस्से में झरने की तरफ़ देखा। मुख़तार ने कहा “मैं क़सूरवार बिलकुल नहीं...... आप क्यों खिड़की खोल कर नहा रही थीं।”

लड़की ने कुछ न कहा। ग़ैज़ आलूद निगाहों से झरने को देखा और खिड़की बंद करली।

चौथे दिन रूप कोर आई। उस के साथ यही लड़की थी। मुख़तार की माँ और बहन दोनों सिलाई और करोशीए के काम की माहिर थीं, गली की अक्सर लड़कीयां उन से ये काम सीखने के लिए आया करती थीं। रूप कौर भी उस लड़की को इसी ग़रज़ से लाई थी क्योंकि उस को करोशीए के काम का बहुत शौक़ था। मुख़तार अपने कमरे से निकल कर सहन में आया तो उस ने रूप कौर को परिणाम किया। लड़की पर उस की निगाह पड़ी तो वो सिमट सी गई। मुख़तार मुस्कुरा कर वहां से चला गया।

लड़की रोज़ाना आने लगी। मुख़तार को देखती तो सिमट जाती। आहिस्ता आहिस्ता उस का ये रद्द-ए-अमल दूर हुआ और इस के दिमाग़ से ये ख़्याल किसी क़दर महव हुआ कि मुख़तार ने उसे नहाते देखा था।

मुख़तार को मालूम हुआ कि इस का नाम शारदा है। रूप कौर के चचा की लड़की है यतीम है। चीचो की मल्लियां में एक ग़रीब रिश्तेदार के साथ रहती थी। रूप कौर ने उस को अपने पास बलालया। ऐंटरैंस पास है। बड़ी ज़हीन है, क्योंकि इस ने करोशीए का मुश्किल से मुश्किल काम यूं चुटकियों में सीख लिया था।

दिन गुज़रते थे। इस दौरान में मुख़तार ने महसूस किया कि वो शारदा की मोहब्बत में गिरफ़्तार होगया है। ये सब कुछ धीरे धीरे हुआ। जब मुख़तार ने उस को पहली बार झरने में से देखा था तो उस वक़्त उस के सामने एक नज़ारा था बड़ा फ़र्हत नाक नज़ारा। लेकिन अब शारदा आहिस्ता आहिस्ता इस के दिल में बैठ गई थी, मुख़तार ने कई दफ़ा सोचा था कि ये मोहब्बत का मुआमला बिलकुल ग़लत है, इस लिए कि शारदा हिंदू है। मुस्लमान कैसे एक हिंदू लड़की से मोहब्बत करने की जुर्रत कर सकता है। मुख़तार ने अपने आप को बहुत समझाया लेकिन वो अपने मोहब्बत के जज़्बे को मिटा न सका।

शारदा अब उस से बातें करने लगी थी मगर खुल के नहीं, उस के दिमाग़ में मुख़तार को देखते ही ये एहसास बेदार हो जाता था कि वो नंगी नहा रही थी और मुख़तार झरने में से उसे देख रहा था।

एक रोज़ घर में कोई नहीं था। मुख़तार की माँ और बहन दोनों किसी अज़ीज़ के चालीसवीं पर गई हुई थीं। शारदा हसब-ए-मामूल अपना थैला उठाए सुबह दस बजे आई। मुख़तार सहन में चारपाई पर लेटा अख़बार पढ़ रहा था। शारदा ने उस से पूछा। “बहन जी कहाँ हैं।”

मुख़तार के हाथ काँपने लगे। “वो...... वो कहीं बाहर गई है।”

शारदा ने पूछा। “माता जी?”

मुख़तार उठ कर बैठ गया। “वो...... वो भी उस के साथ ही गई हैं।”

“अच्छा!” ये कह कर शारदा ने किसी क़दर घबराई हुई निगाहों से मुख़तार को देखा और नमस्ते करके चलने लगी। मुख़तार ने उस को रोका “ठहरो शारदा!”

शारदा को जैसे बिजली के करंट ने छू लिया। चौंक कर रुक गई। “जी?”

मुख़तार चारपाई पर से उठा “बैठ जाओ...... वो लोग अभी आजाऐंगे!”

“जी नहीं...... मैं जाती हूँ” ये कह कर भी शारदा खड़ी रही।

मुख़तार ने बड़ी जुरअत से काम लिया। आगे बढ़ा। उस की एक कलाई पकड़ी और खींच कर उस के होंटों को चूम लिया। ये सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मुख़तार और शादरा दोनों को एक लख़ते के लिए बिलकुल पता न चला कि क्या हुआ है...... इस के बाद दोनों लरज़ने लगे। मुख़तार ने सिर्फ़ इतना कहा। “मुझे माफ़ करदेना!”

शारदा ख़ामोश खड़ी रही। उस का ताँबे जैसा रंग सुर्ख़ी माइल होगया। होंटों में ख़फ़ीफ़ सी कपकपाहट थी जैसे वो छेड़े जाने पर शिकायत कररहे हैं। मुख़तार अपनी हरकत और इस के नताइज भूल गया। उस ने एक बार फिर शारदा को अपनी तरफ़ खींचा और सीने के साथ भींच लिया...... शारदा ने मुज़ाहमत ना की। वो सिर्फ़ मुजस्समा हैरत बनी हुई थी। वो एक सवाल बिन गई थी...... एक ऐसा सवाल जो अपने आप से किया गया हो। वो शायद ख़ुद से पूछी रही थी ये क्या हुआ है। ये क्या हो रहा है?... क्या उसे होना चाहिए था... क्या ऐसा किसी और से भी हुआ है?

मुख़तार ने उसे चारपाई पर बिठा लिया और पूछा “तुम बोलती क्यों नहीं हो शादरा?”

शादरा के दोपट्टे के पीछे उस का सीना धड़क रहा था। उस ने कोई जवाब न दिया। मुख़तार को उस का ये सुकूत बहुत परेशानकुन महसूस हुआ। “बोलो शारदा...... अगर तुम्हें मेरी ये हरकत बुरी लगी है तो कह दो...... ख़ुदा की क़सम मैं माफ़ी मांग लूंगा... तुम्हारी तरफ़ निगाह उठा कर नहीं देखूंगा मैंने कभी ऐसी जुरअत न की होती, लेकिन जाने मुझे क्या होगया है...... दरअसल...... दरअसल मुझे तुम से मोहब्बत है।”

शारदा के होंट हिले जैसे उन्हों ने लफ़्ज़-ए-मोहब्बत अदा करने की कोशिश की है। मुख़तार ने बड़ी गर्मजोशी से कहना शुरू किया। “मुझे मालूम नहीं तुम मोहब्बत का मतलब समझती हो कि नहीं...... मैं ख़ुद इस के मुतअल्लिक़ ज़्यादा वाक़फ़ीयत नहीं रखता, सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि तुम्हें चाहता हूँ...... तुम्हारी सारी हस्ती को अपनी इस मुट्ठी में ले लेना चाहता हूँ। अगर तुम चाहो तो मैं अपनी सारी ज़िंदगी तुम्हारे हवाले कर दूँगा, शारदा तुम बोलती क्यों नहीं हो?”

शारदा की आँखें ख़्वाबगो होगईं। मुख़तार ने फिर बोलना शुरू कर दिया। “मैंने उस रोज़ झरने में से तुम्हें देखा... नहीं। तुम मुझे ख़ुद दिखाई दीं... वो एक ऐसा नज़ारा था जो मैं ता क़ियामत नहीं भूल सकता...... तुम शरमाती क्यों हो...... मेरी निगाहों ने तुम्हारी ख़ूबसूरती चुराई तो नहीं... मेरी आँखों में सिर्फ़ उस नज़ारे की तस्वीर है... तुम उसे ज़िंदा कर दो तो मैं तुम्हारे पांव चूम लूंगा।” ये कह कर मुख़तार ने शादरा का एक पांव चूम लिया।

वो काँप गई। चारपाई पर से एक दम उठ कर उस ने लर्ज़ां आवाज़ में कहा। “ये आप क्या कर रहे हैं?... हमारे धर्म में... ”

मुख़तार ख़ुशी से उछल पड़ा। “धर्म वर्म को छोड़े... प्रेम के धर्म में सब ठीक है।” ये कह कर इस ने शारदा को चूमना चाहा। मगर वो तड़प कर एक तरफ़ हटी और बड़े शर्मीले अंदाज़ में मुस्कुराती भाग गई। मुख़तार ने चाहा कि वो उड़ कर ममटी पर पहुंच जाये। वहां से नीचे सहन में कूदे और नाचना शुरू करदे।

मुख़तार की वालिदा और बहन आगईं तो शारदा आई। मुख़तार को देख कर उस ने फ़ौरन निगाहें नीची करलीं। मुख़तार वहां से खिसक गया कि राज़ इफ़शा न हो।

दूसरे रोज़ ऊपर कोठे पर चड़ा। झरने में से झांका तो देखा कि शारदा खिड़की के पास खड़ी बालों में कंघी कररही है। मुख़तार ने उस को आवाज़ दी। “शारदा।”

शादरा चोंकि। कंघी इस के हाथ से छूटा कर नीचे गली में जागरी। मुख़तार हंसा। शारदा के होंटों पर भी मुस्कुराहट पैदा हुई। मुख़तार ने उस से कहा “कितनी डरपोक हो तुम...... हौले से आवाज़ दी और तुम्हारी कंघी छूट गई।”

शारद ने कहा। “अब ला के दीजीए नई कंघी मुझे...... ये तो मोरी में जागरी है।”

मुख़तार ने जवाब दिया। “अभी लाऊं।”

शारद ने फ़ौरन कहा। “नहीं नहीं... मैंने तो मज़ाक़ किया है।”

मैंने भी मज़ाक़ किया था। “तुम्हें छोड़कर मैं मैं कंघी लेने जाता?...... कभी नहीं!”

शारद मुस्कुराई। “मैं बाल कैसे बनाऊं।”

मुख़तार ने झरने के सूराखों में अपनी उंगलियां डालीं। “ये मेरी उंगलियां ले लो!”

शारद हंसी... मुख़तार का जी चाहा कि वो अपनी सारी उम्र उस हंसी की छाओं में गुज़ार दे। “शारदा, ख़ुदा की क़सम, तुम हंसी हो, मेरा रवां रवां शादमां होगया है... तुम क्यों इतनी प्यारी हो?...... क्या दुनिया में कोई और लड़की भी तुम जितनी प्यारी होगी...... ये कमबख़्त झरने...... ये मिट्टी के ज़लील पर्दे। जी चाहता है उन को तोड़ फोड़ दूं।”

शारदा फिर हंसी। मुख़तार ने कहा। “ये हंसी कोई और ना देखे, कोई और न सुने। शारदा सिर्फ़ मेरे सामने हंसना...... और अगर कभी हंसना हो तो मुझे बला लिया करो। मैं इस के इर्दगिर्द अपने होंटों की दीवारें खड़ी कर दूँगा।

शारद ने कहा। “आप बातें बड़ी अच्छी करते हैं।”

“तो मुझे इनाम दो... मोहब्बत की एक हल्की सी निगाह उन झरनों से मेरी तरफ़ फेंक दो...... मैं उसे अपनी पलकों से उठा कर अपनी आँखों में छिपा लूंगा। मुख़तार ने शारदा के अक़ब में दूर एक साया सा देखा और फ़ौरन झरने से हट गया। थोड़ी देर बाद वापस आया तो खिड़की ख़ाली था। शारद जा चुकी थी।

आहिस्ता आहिस्ता मुख़तार और शारद दोनों शेर-ओ-शुक्र हो गए। तन्हाई का मौक़ा मिलता तो देर तक प्यार मोहब्बत की बातें करते रहते...... एक दिन रूप कौर और इस का ख़ाविंद लाला कालू मिल कहीं बाहर गए हुए थे। मुख़तार गली में से गुज़र रहा था कि उस को एक कंकर लगा। उस ने ऊपर देखा शारदा थी। उस ने हाथ के इशारे से उसे बुलाया।

मुख़तार इस के पास पहुंच गया। पूरा तख़लिया था। ख़ूब घुल मिल के बातें हुईं।

मुख़तार ने इस से कहा। “उस रोज़ मुझ से गुस्ताख़ी हुई थी और मैंने माफ़ी मांग ली थी। आज फिर गुस्ताख़ी करने का इरादा रखता हूँ, लेकिन माफ़ी नहीं मांगूंगा” और अपने होंट शारद के कपकपाते हुए होंटों पर रख दिए।

शारद ने शर्मीली शरारत से कहा। “अब माफ़ी माँगिए।”

“जी नहीं...... अब ये होंट आप के नहीं...... मेरे हैं...... क्या में झूट कहता हूँ।”

शारदा ने निगाहें नीची करके कहा। “ये होंट किया। मैं ही आप की हूँ।”

मुख़तार एक दम संजीदा होगया। “देखो शारदा। हम इस वक़्त एक आतिश फ़िशां पहाड़ पर खड़े हैं तुम सोच लो, समझ लो...... मैं तुम्हें यक़ीन दिलाता हूँ। ख़ुदा की क़सम खा कर कहता कि तुम्हारे सिवा मेरी ज़िंदगी में और कोई औरत नहीं आएगी...... मैं क़सम खाता हूँ कि ज़िंदगी भर मैं तुम्हारा रहूँगा। मेरी मोहब्बत साबित क़दम रहेगी ... क्या तुम भी इस का अह्द करती हो!”

शारद ने अपनी निगाहें उठा कर मुख़तार की तरफ़ देखा। “मेरा प्रेम सच्चा है।”

मुख़तार ने उस को सीने के साथ भींच लिया और कहा। “ज़िंदा रहो... सिर्फ़ मेरे लिए, मेरी मोहब्बत के लिए वक़्फ़ रहो...ख़ुदा की क़सम शारदा। अगर तुम्हारा इलतिफ़ात मुझे न मिलता तो मैं यक़ीनन ख़ुदकुशी कर लेता... तुम मेरी आग़ोश में हो। मुझे ऐसा महसूस होता है कि सारी दुनिया की ख़ुशीयों से मेरी झोली भरी हुई है। मैं बहुत ख़ुशनसीब हूँ।”

शारदा ने अपना सर मुख़तार के कंधे पर गिरा दिया। “आप बातें करना जानते हैं... मुझ से अपने दिल की बात नहीं कही जाती।”

देर तक दोनों एक दूसरे में मुदग़म रहे। जब मुख़तार वहां से गया तो उस की रूह एक नई और सुहानी लज़्ज़त से मामूर थी। सारी रात वो सोचता रहा दूसरे दिन कलकत्ते चला गया जहां उस का बाप कारोबार करता था। आठ दिन के बाद वापिस आया। शारदा हसब-ए-मामूल करोशीए का काम सीखने मुक़र्ररा वक़्त पर आई। उस की निगाहों ने इस से कई बातें कीं। कहाँ ग़ायब रहे इतने दिन?... मुझ से कुछ न कहा और कलकत्ते चले गए?... मोहब्बत के बड़े दावे करते थे?... मैं नहीं बोलूंगी तुम से... मेरी तरफ़ क्या देखते हो, क्या कहना चाहते हो मुझ से?

मुख़तार बहुत कुछ कहना चाहता था मगर तन्हाई नहीं थी। वो काफ़ी तवील गुफ़्तगु उस से करना चाहता था। दो दिन गुज़र गए, मौक़ा न मिला। निगाहों ही निगाहों में गूंगी बातें होती रहीं। आख़िर तीसरे रोज़ शारदा ने उसे बुलाया। मुख़तार बहुत ख़ुश हुआ। रूप कौर और इस का ख़ाविंद लाला काला मिल घर में नहीं थे।

शारदा सीढ़ीयों में मिली। मुख़तार ने वहीं उस को अपने सीने के साथ लगाना चाहा, वो तड़प कर ऊपर चली गई। नाराज़ थी। मुख़तार ने इस से कहा। “देख मेरी जान, मेरे पास बैठो, मैं तुम से बहुत ज़रूरी बातें करना चाहता हूँ। ऐसी बातें जिन का हमारी ज़िंदगी से बड़ा गहिरा तअल्लुक़ है।”

शारदा इस के पास पलंग पर बैठ गई। “तुम बात टालो नहीं...... बताओ मुझे बताए बग़ैर कलकत्ते क्यों गए...... सच्च में बहुत रोई।”

मुख़तार ने बढ़ कर उस की आँखें चूमीं। “उस रोज़ मैं जब से गया तो सारी रात सोचता रहा...... जो कुछ उस रोज़ हुआ उस के बाद ये सोच बिचार लाज़िमी थी। हमारी हैसियत मियां बीवी की थी। मैंने ग़लती की। तुम ने कुछ न सोचा। हम ने एक ही जस्त में कई मंज़िलें तय करलीं और ये ग़ौर ही ना किया कि हमें जाना किस तरफ़ है...... समझ रही होना शारद।”

शारदा ने आँखें झुका लें। “जी हाँ।”

मैं कलकत्ते इस लिए गया था कि अब्बा जी से मश्वरा करूं। तुम्हें सुन कर ख़ुशी होगी मैंने उन को राज़ी कर लिया है। मुख़तार की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। शारदा के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर इस ने कहा। “मेरे दिल का सारा बोझ हल्का होगया है...... मैं अब तुम से शादी कर सकता हूँ।”

शारदा ने हौले से कहा। “शादी।”

“हाँ शादी।”

शारद ने पूछा। “कैसे हो सकती है हमारी शादी?”

मुख़तार मुस्कुराया। “इस में मुश्किल ही किया है...... तुम मुस्लमान हो जाना!”

शारद एक दम चोंकि। “मुस्लमान।”

मुख़तार ने बड़े इत्मिनान से कहा। “हाँ हाँ...... इस के इलावा और होही क्या सकता है...... मुझे मालूम है कि तुम्हारे घर वाले बड़ा हंगामा मचाएंगे लेकिन मैंने इस का इंतिज़ाम कर लिया है। हम दोनों यहां से ग़ायब हो जाएंगे सीधे कलकत्ते चलेंगे। बाक़ी काम अब्बा जी के सपुर्द है जिस रोज़ वहां पहुंचेंगे उसी रोज़ मौलवी बुला कर तुम्हें मुस्लमान बना देंगे। शादी भी उसी वक़्त हो जाएगी।”

शारदा के होंट जैसे किसी ने सी दिए। मुख़तार ने उस की तरफ़ देखा। “ख़ामोश क्यों होगईं।”

शारदा ना बोली। मुख़तार को बड़ी उलझन हुई। “बताओ शारदा क्या बात है?”

शारदा ने बमुशकिल इतना कहा। “तुम हिंदू हो जाओ।”

“मैं हिंदू हो जाऊं?” मुख़तार के लहजे में हैरत थी। वो हंसा “मैं हिंदू कैसे हो सकता हूँ।”

“मैं कैसे मुस्लमान हो सकती हूँ।” शारदा की आवाज़ मद्धम थी।

“तुम क्यों मुस्लमान नहीं हो सकतीं...... मेरा मतलब है कि...तुम मुझ से मोहब्बत करती हो। इस के इलावा इस्लाम सब से अच्छा मज़हब है...... हिंदू मज़हब भी कोई मज़हब है। गाय का पेशाब पीते हैं। बुत पूजते हैं... मेरा मतलब है कि ठीक है अपनी जगह ये मज़हब भी। मगर इस्लाम का मुक़ाबला नहीं कर सकता।” मुख़तार के ख़्यालात परेशान थे। “तुम मुस्लमान हो जाओगी तो बस...... मेरा मतलब है कि सब ठीक हो जाएगा।”

शारद के चेहरे का ताँबे जैसा ज़र्द रंग ज़र्द पड़ गया। “आप हिंदू नहीं होंगे?”

मुख़तार हंसा। “पागल हो तुम?”

शारदा का रंग और ज़र्द पड़ गया। “आप जाईए...... वो लोग आने वाले हैं।” ये कह कर वो पलंग पर से उठी।

मुख़तार मुतहय्यर होगया। “लेकिन शारदा...... ”

“नहीं नहीं जाईए आप...... जल्दी जाईए...... वो आजाऐंगे।” शारदा के लहजे में बेएतिनाई की सर्दी थी।

मुख़तार ने अपने ख़ुश्क हलक़ से बमुशकिल ये अलफ़ाज़ निकाले हम दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करते हैं। “शारदा तुम नाराज़ क्यों होगईं?”

“जाओ...... चले जाओ...... हमारा हिंदू मज़हब बहुत बुरा है......तुम मुस्लमान बहुत अच्छे हो।” शारदा के लहजे में नफ़रत थी। वो दूसरे कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। मुख़तार अपना इस्लाम सीने में दबाये वहां से चला गया।

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