कांट्रैक्टर - 2

कांट्रैक्टर

अर्पण कुमार

(2)

राकेश सोचने लगा। अच्छे फँसे। आज लगता है जैसे केबिन-केबिन का म्यूजिकल चेयर खेल रहा हूँ। कभी बिग बॉस के केबिन में जा रहा हूँ तो कभी एच.आर. हेड की केबिन में। लगता है कि आज का दिन इसी दौड़-धूप में बीत जाएगा। और फिर चाहे कितनी ही देर हो, अपनी सीट का काम तो ख़ैर पूरा करना ही है। मरता क्या न करता, वह हरिकिशन के केबिन में गया। इस बीच फोन करके हरिकिशन ने टीसीएस को भी बुला लिया। टीसीएस का घर, एन.आई.सी.एल. के बगल में ही था। एच.आर. और कार्यालय प्रशासन को अपनी हथेली पर लेकर चलना टीसीएस को अच्छी तरह आता था। उन्हें मालूम था कि जी.एम. का केबिन, अगर एन.आई.सी.एल. में घुसने का दरवाज़ा है तो एच.आर. और कार्यालय प्रशासन दो ऐसी खिड़कियाँ हैं, जिनसे वे अपने बिलों के बड़े-बड़े गुब्बारों को आसानी से बाहर निकाल सकते हैं।

हरिकिशन ने तीन कप कॉफी का आर्डर दिया। कभी किसी पर एक पैसा खर्च न करनेवाला हरिकिशन, टीसीएस के आने पर उसे कॉफ़ी ज़रूर पिलाता। टीसीएस के साथ बैठे होने के कारण कॉफी का एक प्याला बाइ-डिफॉल्ट उसे भी प्राप्त हुआ। सांस्कृतिक संध्या को लेकर बातचीत शुरू हुई। हरिकिशन ने कुछ नहीं किया। सीधे-सीधे अपनी ज़रूरतें टीसीएस को बतला दीं और उन्हें अपने बजट को लेकर भी आगाह कर दिया। आदतन, टीसीएस ने हाँ कह दिया। मगर राकेश को यह सब कुछ ठीक नहीं लग रहा था, अस्सी हजार रुपए बिना किसी डिटॆलिंग के एक झटके में किसी को दे देना उसे जँच नहीं रहा था। वह हरिकिशन के शुष्क स्वभाव से परिचित था। उसने सीधे टीसीएस से पूछा, "राव साहब, ज़रा स्टेप-बाई-स्टेप बतलाएँ, हम लोग किस-किस तरह से क्या-क्या इंतज़ाम करेंगे। क्यों न कुछ इस तरह व्यवस्था करें कि यह कार्यक्रम इस बार कुछ ख़ास बन जाए!" राकेश ने प्रोफेशनल अंदाज में अपनी बात रखी।

टीसीएस अंदर से बहुत अधिक विवरण में जाना नहीं चाह रहे थे, मगर राकेश की आँखों में दृढ़ता की चमक और कसावट देख वे कुछ सकते में आए। अनुभवी आँखें जान गई थीं कि यहाँ सिर्फ़ धुप्पलबाजी नहीं चलेगी। फिर भी आदत से मज़बूर उन्होंने राकेश को कुछ तौलते हुए और धीमे से मुस्कुराते हुए कहा, "आप बताइए, जैसा आप कहेंगे, वैसा कर देंगे।"

राकेश जान गया था कि वह कभी टीसीएस की तरह घाघ नहीं बन सकता है। उसने सहज भाव से कहा,"देखिए, अभी हमारी योजना है कि हम इस कैंपस में नीचे कार्यक्रम करेंगे। वहीं जहाँ रेडियो सिटी वालों ने अभी हाल ही में कार्यक्रम किया था। आप समझ रहे हैं न?"

सहज भाव से अपने दाएँ हाथ को उस तरफ़ करते हुए राकेश ने इशारा किया। टीसीएस को राकेश की तत्परता से कुछ लेना-देना न था। वह उसे स्थिर पलकों से देखता रहा। फिर उनकी निगाहें हरिकिशन की ओर गईं। आँखों ही आँखों में इशारा हुआ। सेकंड्स में टीसीएस ने अपने चेहरे पर भोलेपन का मुखौटा लगाते हुए जवाब दिया, "हरिकिशन सर तो यहीं अपने मेन गेट के पास ख़ाली पड़ी जगह पर कार्यक्रम करने के लिए कह रहे थे। अपने पास इसी फ्लोर पर कैंटीन भी है। लोगों को खाना सर्व करने में भी सुविधा हो जाएगी।"

किसी तरह की अंदरूनी राजनीति से अनजान मगर अपने होमवर्क में पक्के राकेश ने तत्काल पुरज़ोर ढंग से टीसीएस की बात काटी, "अरे नहीं राव साहब, वहाँ कार्यक्रम नहीं हो सकता। आवाज़ इको करती है। कोई एक कार्यक्रम पहले हुआ था। चारों तरफ़ से ढँका हुआ है। वहाँ ख़ूब गर्मी हो जाती है। कौन क्या बोल रहा है, कुछ पता ही नहीं चलता। और फिर वहाँ पर कार्यक्रम का कोई ग्रेस भी नहीं रह जाएगा।"

एक साँस में राकेश ने अपनी बात कह दी। टीसीएस ने हरिकिशन की ओर और हरिकिशन ने टीसीएस की ओर देखा। राकेश हरिकिशन की ओर मुख़ातिब होकर कहा, "क्यों सर, आप क्या कहते हैं?"

हरिकिशन थोड़ा झल्लाते हुए बोले, "अरे भाई, आप सब कुछ जब ख़ुद ही तय किए जा रहे हैं, तो मुझसे क्यों पूछते हैं?"

"मैंने तो सोनाक्षी मैडम से बात की थी। उन्होंने एक बार यहाँ ग्राहकों का सम्मेलन कराया था। उनका अनुभव ठीक नहीं रहा।"

ऑफिस टेबल पर पड़े पिन-स्टैंड से एक पिन निकाललर अपने दो दाँतों के बीच इधर उधर फँसे खाने के अवशेष को निश्शंक भाव से हटाते हुए और उसे बेझिझक अपने बाएँ हाथ की बीच वाली उँगली पर रखकर अपने अँगूठे से पीसते हुए हरिकिशन कुछ चिढ़कर बोले, "अरे राकेश जी, आपको कोई अनुभव तो है नहीं। चले हैं प्रोग्राम कराने। हुँह!"

किसी खिसीयाने बिल्ले सा चेहरा बनाए राकेश चुप रहा। टीसीएस को मन ही मन ख़ूब मज़ा आ रहा था। वे मन ही मन इस आपसी खींचतान का ख़ूब आनंद लेते रहे। हरिकिशन की बात अभी पूरी नहीं हुई थी। अपने स्टाइल में कुछ झूमते हुए उन्होंने कहा, "डियर राकेश, क्या आपको यह बताने की ज़रूरत पड़ेगी कि कस्टमर और स्टॉफ के प्रोग्राम में अंतर होता है। दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। फिर ऐसी बेकार की तुलना आप क्यों करते हैं?"

राकेश अबतक हरिकिशन का लिहाज़ कर रहा था, मगर उसे लगा कि अब चुप रहना, जान-बूझकर अपनी तौहीन कराना है। वैसे भी, राकेश, हरिकिशन से एक पोस्ट ही नीचे था। कुछ तुनकता हुआ बोला, "सर, मैं जानता हूँ, ग्राहक और स्टॉफ के कार्यक्रम में अंतर होता है। मैंने ख़ुद जबलपुर जैसे बड़े और पुराने शहर के कई संभ्रांत कस्टमर्स के बीच कई बड़े-बड़े कार्यक्रम किए हैं। आपको शायद पता नहीं हो, इस लिए अर्ज़ कर रहा हूँ।"

अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को और बड़ा करते हुए और उच्चरित एक-एक शब्द को अपने दाँतों से पीसते हुए राकेश ने अपनी बात जारी रखी, "और सुनिए हरिकिशन महतो सर, कार्यक्रम चाहे ग्राहकों के लिए हो या स्टॉफ मेम्बर्स के लिए, दोनों के कंफर्ट का ध्यान रखा जाना ज़रूरी है। आख़िरकार जो बोल रहा है और जो सुन रहा है, दोनों के बीच कोई तारतम्य ही नहीं हो, तो ऐसे प्रोग्राम का क्या मतलब! क्राउड क्राउड होता है। आप तो ऐसी बात कर रहे हैं कि हमारे अपने स्टॉफ सदस्य कीड़े--मकोड़े हैं, जिन्हें कहीं भी बैठने और कुछ भी खाने-पीने का हुक्म दिया जा सकता है। सर, ज़रा सोचिए, सभी के परिवार के सदस्य आएँगे। पसीना चुहचुहाते वे लोग हमारी इस ग्लोरियस संस्था के लिए क्या सोचेंगे! हमारी ब्रांडिंग और इमेज़ का क्या होगा। क्या पसीना पोंछते लोग हमारी रही-सही इज़्ज़त को भी पोंछ नहीं डालेंगे!"

टीसीएस और हरिकिशन दोनों को यह अंदाज़ा नहीं था कि राकेश इस सशक्त ढंग से अपना विरोध दर्ज़ करेगा। कुछ देर के लिए हरिकिशन हक्का-बक्का रह गए। जिस हरिकिशन के माध्यम से टीसीएस उछल-कूद कर रहे थे, उन्हीं की पतलून अपने एक जूनियर के आगे ढीली होते देख टीसीएस को तत्काल वहाँ से खिसक जाने में ही अपनी भलाई दिखी। जाते-जाते अपने सफ़ेद कुर्ते की बाँह को मोड़ते हुए हरिकिशन और राकेश दोनों की ओर देखते हुए टीसीएस ने कहा, "ठीक है, आप दोनों फ़ैसला ले लीजिए। मुझे बता दीजिएगा।"

"नहीं, आप कुछ देर रुकिए, मैं जी.एम. सर से पूछ कर आता हूँ। मुझे समझ में नहीं आता कि हमलोग ऐनुअल प्रोग्राम के आयोजन को भी एक रूटीन ऑफिस वर्क की तरह सिर्फ़ निपटाने की मुद्रा में क्यों लिए रहते हैं! इससे तो अच्छा है कि ऐसा कोई कल्चरल प्रोग्राम हो ही नहीं।" भनभनता और तुनकता हुआ राकेश कुर्सी से उठा और रजिंदर मित्तल के केबिन की ओर बढ़ चला।

इधर टीसीएस और हरिकिशन दोनों कानाफूसी में लग गए। पता नहीं क्या होगा! यह अंधा और जोशीला तूफ़ान जाने क्या कर डाले! टीसीएस तो एक ठेकेदार था। उसे इस ऑफिस की ब्यूरोक्रेसी से कोई लेना-देना नहीं था। उसे तो बस इस लालफीताशाही का इस्तेमाल अपने फ़ायदे में जारी रखने से मतलब था। उन्होने कई सारे निजी कार्य रजिंदर के लिए आगे बढ़कर किए थे। हर तरह के फ़रमाइशी कार्यक्रम उन्हें उपलब्ध कराए थे। अतः टीसीएस कहीं न कहें महाप्रबंधक की ओर से निश्चिंत थे। मगर वे इतना जानते थे कि इन दोनों के झगड़े की आँच उनतक भी ज़रूर पहुँचेगी। साथ ही उन्हें यह भी मालूम था कि बड़े अधिकारी कांट्रैक्टर के होते हैं और न ही अपने स्टॉफ सदस्यों के। वे सिर्फ़ अपने बारे में सोचते हैं। उन्हें हरेक से मेल-मिलाप करना आता है और हरेक के बीच अपरिचय या राज़ की दीवार खड़ी करनी भी बख़ूबी आती है। इन्हें तो अपने ऑफिस के व्यवसाय से भी ऑफिशयली कमीशन मिलता है। अनऑफिशीयली सेवा-पानी देने के लिए तो हमारे जैसे कॉंट्रैक्टर तो ख़ैर हैं ही। गहरे साँवले रंग के मालिक टीसीएस अपने झक्क सफ़ेद कपड़ों में कुर्सी पर बैठे यही सब सोचते और तरह तरह के ख़यालों में डूबते-उतराते रहे । तभी उधर से कुछ तेज़ी में राकेश आया और मुस्कुराता हुआ पहले हरिकिशन और बाद में टीसीएस की ओर मुख़ातिब होता हुआ बोला, " सर से मेरी बात हो गई है। कार्यक्रम नीचे ही होगा।"

हरिकिशन का चेहरा उतर गया और इधर विजेता भाव से राकेश ने प्लास्टिक के फोल्डर से एक कागज़ निकाला और हरिकिशन को दिखाता हुआ बोला, "इसमें मैंने मिनट-टू-मिनट प्रोग्राम बना दिया है। कब क्या होगा, यहाँ हर आइटम दे रखा है। मंच की सजावट कैसी होगी, कौन कौन सी खेल-प्रतियोगिताएँ होंगी, किस किस श्रेणी में कैसे-कैसे पुरस्कार होंगे, गायन और नृत्य कार्यक्रम का क्या सिक्वेंस होगा, फीलर में किस प्रकार के आइटम होंगे आदि-आदि… इन सब की एक चेक-लिस्ट तैयार कर दी है। अभी सभी स्टॉफ सदस्यों के लिए मैं मेसेंजर को भेजकर नोटिस भी घूमवा देता हूँ। रही बात स्नैक्स / डीनर की तो यह आप दोनों तय कर लीजिए। सर ने यही कहा है।"

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