कांट्रैक्टर - 3

कांट्रैक्टर

अर्पण कुमार

(3)

हरिकिशन की साँस में साँस आई। वे एक नवयुवक अधिकारी के आगे अपनी महत्ता पूरी तरह गँवाने से बच गए थे। कम से कम खाने के मेनू का अधिकार उनके पास था। उनके चेहरे पर तसल्ली के भाव स्पष्ट दिख रहे थे।

इस बीच राकेश के मोबाइल पर एक फोन आ गया। उसपर वह ज़रा व्यस्त हो गया। इधर टीसीएस उठकर जानेवाले थे, मगर इशारे ही इशारे में राकेश ने उन्हें कुछ देर बैठने के लिए कहा। वे कसमसा कर रह गए मगर मरता क्या न करता, चुपचाप बैठे रहे। अबतक बाहर हॉल में हरिकिशन को ही भाव देनेवाले टीसीएस को लगा कि सत्ता की चाटुकारिता के लिए कुछ नए चरण-पादुका भी शायद आ जमे हैं। यद्यपि राकेश साहू के समक्ष अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से पूरा करने के लक्ष्य के अलावा और कुछ न था मगर टीसीएस की निगाह में वह भी एक सत्ता-केंद्र के रूप में उभरता हुआ दिख रहा था। फोन को बीच में ही काटकर राकेश ने टीसीएस की ओर रुख किया और अपने हाथ में पड़े एक कागज़ को दिखाते हुए कहना शुरू किया, "सुनिए राव साहब, अभी सर से बात हुई है। ये पेपर देखिए। इसमें कुछ प्रोपर्टी हैं। ये आपको वहाँ निश्चय ही रखने हैं।"

"प्रोपर्टी?" टीसीएस ने कुछ चौंकते हुए पूछा।

"ओह, क्या आपने कभी नाटक नहीं देखा है? वहाँ मंच पर जो कुछ भी सामान रखे जाते हैं, उन्हें प्रोपर्टी कहते हैं। समझे?" इधर से राकेश ने समझाने की गरज से कुछ झल्लाते हुए कहा।

राकेश ने गौर किया, टीसीएस के अतिरिक्त इस बार हरिकिशन ने भी अपनी गर्दन हिलायी।

"मगर यहाँ तो कई सारे सामान हैं। इतने कम पैसे में यह सब कुछ कैसे होगा?" कागज़ पर बारीकी से ध्यान देते हुए टीसीएस ने अगला सवाल दागा।

"देखिए, सामान तो ये सभी रहेंगे। अगर आप नहीं करेंगे तो हमें किसी और से यह काम करवाना पड़ेगा। और हाँ, अस्सी हजार रुपए इतने भी कम नहीं होते।"

इतना सुनते ही टीसीएस अपना आपा खो बैठे। अबतक किसी तरह शांत से दिख रहे टीसीएस का मुखौटा उनके मुँह से उतर चुका था या यह कि औपचारिक और विनम्र वेश-भूषा का उनका ऊपरी रंग एकदम से उतर बैठा । या फिर कुछ देर के लिए उनके अंदर का अरबपति जाग गया और जिस चमचागिरी से वे आज अरबपति बने हुए थे, कुछ देर के लिए उनका वह अपना चोला उन्हें असह्य लगने लगा। वे कुर्सी से उठते हुए बोले, "ठीक है, साहू जी, आप यह काम किसी और से करा लीजिए। मुझे भी अपने घर से पैसा लगाकर इस कंपनी के लिए कुछ करने का शौक नहीं है। मैं किसी प्रोफिट में चल रही कंपनी के कल्चरल प्रोग्राम को आयोजित करने के लिए अपना घर क्यों फूँकूँ? ख़ुद क्यों लॉस सहूँ!"

राकेश भी कुछ तैश में आ गया, "राव साहब, यह कंपनी आपके लिए कितना कुछ करती है, ज़रा यह सोचिए। माना कि यह छोटा कल्चरल प्रोग्राम है, मगर जब हम बड़े काम आपको देते हैं, तो छोटा काम किसको देने जाएँगे?"

राकेश की बात टीसीएस को चुभी। वे बौखला गए, "देखिए हुजूर, मैं साइकिल के टायरों की पंक्चर बनाते हुए यहाँ तक पहुँचा हूँ। अपनी मेहनत के बल पर। जितना काम करता हूँ, उसके ऐवज़ में मेहनताना लाता हूँ।" उनकी आवाज़ में गुस्से और झेंप का मिश्रित टोन था।

"तो क्या हमारी एन.आई.सी.एल. की मेहरबानी के भरोसे आपका यह साम्राज्य नहीं चल रहा!" राकेश को भी ध्यान नहीं रहा मगर अचानक उसके मुख से यह पंक्ति निकल पड़ी। वह भी अपने स्वभाव के विपरीत ज़रा आक्रामक हो उठा था। राकेश को अंदाज नहीं रहा जबकि यह एक तरह से उसकी ओर से ब्रहास्त्र था, जिसका प्रयोग अबतक इस विष-बुझे ढंग से टीसीएस पर किसी ने नहीं किया था। ख़ासकर किसी मध्यम श्रेणी के अधिकारी को उन्होंने यह स्पेस तो बिल्कुल ही नहीं दिया था।

टीसीएस कुछ धरती पर आए मगर प्रकटतः वे हार नहीं मान सकते थे। कल होकर कोई और मंझोला अफसर भी उनपर यूँ रौब ग़ालिब कर सकता था। सो हर तरह के साम-दाम-डंड भेद में माहिर टीसीएस आख़िरकार पूछ ही बैठे, "चलिए, आपने जब इतना बोल ही दिया है तो आज बता ही दीजिए राकेश जी कि यह एन.आई.सी.एल. आख़िरकार कैसे मेरा और मेरे बच्चों का पेट पालती है?"

राकेश को लगा कि वह टीसीएस को बता दे कि कैसे एक-एक करके उन्होंने एन.आई.सी.एल. के कई काम अपने जिम्मे करा लिए। पहले साफ-सफाई का टेंडर, फिर ऑफिस की चार-चार गाड़ियों का टेंडर, फिर पूरे राज्य में फैले डेढ़ सौ से अधिक छोटे-बड़े कार्यालयों में जेनरेटर, ऐसी और कई जगहों पर फर्नीचर लगाने का टेंडर, जब-तब होनेवाली मीटिंग-मील के आयोजन का काम और इधर इन दिनों सभी के सिस्टम और उसकी वायरिंग का काम और ऐसे ही छोटे-बड़े कई दर्जनों काम। आख़िर यह कैसे होता है कि ये सभी टेंडर उनके ही फर्म के नाम निकलते हैं! एक छोटे से फर्म से अपना काम शुरू करनेवाला टीसीएस इन पंद्रह-अठारह सालों में अंतत: कैसे पाँच-छह फर्मों का मालिक बन गया!राकेश के मन में यह सबकुछ चल रहा था मगर वह चुप रहा। बस टीसीएस के सवाल पर अपने कुछ सख्त दिखते चेहरे पर टँकी बड़ी-बड़ी आँखों से उनकी ओर अविचल देखता रहा। हरिकिशन को बात के बतंगड़ होने का अबतक आभास हो चुका था। तत्काल मामले को सँभालना उन्हें आवश्यक लगा।किसी अर्जेट फाइल को डील करने जैसा। अचानक से हरिकिशन के केबिन का तापमान किसी तपते रेगिस्तान के तापमान की भाँति उबलने लगा था। उन्होंने अपने फॉल्स सीलिंग की ओर देखा। ऊपर से लटक रहे ए.सी. की बत्ती हरी थी। फिर ए.सी. के रिमोट की ओर देखा। वहाँ 23 डिग्री का तापमान डिस्पले हो रहा था। मामले की नज़ाकत को सँभालने की गरज़ से हरिकिशन बोले, "टेंपरेचर कुछ और कम कर देता हूँ। कूलिंग कम हो रही है। ए.सी. की सर्विसिंग भी ड्यू हो गई है। ऑफिस के काम से ही फुर्सत नहीं मिलती। इन चीज़ों की ओर किसका ध्यान जाए!"

टीसीएस और राकेश दोनों की ही ओर से दमघोंटू चुप्पी का माहौल था। टीसीएस के लिए वहाँ और रुकना संभव नहीं था। गंभीरता ओढ़े हुए वे बोले, "मैं यह कागज़ रख लेता हूँ। और ज़रा जीएम सर से मैं भी मिल लेता हूँ। फिर आगे देखते हैं, क्या होता है!" टीसीएस की आवाज़ में एक अप्रत्यक्ष धमकी थी, जिसकी गर्माहट की आँच राकेश तक पहुँची। मगर उसने स्वयं को इससे अप्रभावित ही रखा। प्रकटतः बोला, "ठीक है, मैं ज़रा इसका एक स्नैप ले लूँ, ताकि मुझे भी इसके अनुरूप तैयारी करवाने में सुविधा हो।" और तब राकेश ने उस कागज़ का एक फोटो अपने मोबाइल के कैमरे से उतार लिया। टीसीएस उस कागज़ को अपने हाथ में झुलाते हुए रजिंदर मित्तल के केबिन की ओर कुछ बेपरवाह से ढंग में बढ़ गए। हरिकिशन ने डेस्कटॉप पर अपनी नज़रें गड़ा लीं। राकेश अपनी सीट पर जाकर अपने रूटीन वर्क को पूरा करने में लग गया।

….….

इस कार्यालय में अधिकांश स्टॉफ राकेश से उम्र में बड़े थे। वे लोग भी जो उससे पद में कमतर थे। राकेश का मिलनसार और व्यावहारिक स्वभाव जानता था कि किसने किस कारण से पदोन्नति नहीं ली है और कौन एक या दो पदोन्नति लेकर अब आगे नहीं लेना चाहता है। राकेश का मानना था कि पोस्ट वगैरह अपनी जगह है और आदमी का मिज़ाज और उसकी विशेषता अपनी जगह। वह पद के महत्व को समझता था और अपने से वरिष्ठ अधिकारी का सम्मान भी करता था, मगर वह अपने से कनिष्ठ पदधारकों के साथ भी उतना ही मिलनसार था। इसलिए ऑफिस के सभी लोग उसे पसंद करते थे। मगर कुछ लोग उसकी लोकप्रियता से जलते भी थे। कुछ लोगों को उसकी साफ़गोई भी पसंद नहीं आती थी। ख़ैर, राकेश धीरे-धीरे इन मिलीजुली स्थितियों और प्रतिक्रियाओं का अभ्यस्त हो चुका था और उसे इन सबसे निबटना कमोबेश अब आने लगा था। राकेश भी क्रमशः इन सबसे अप्रभावित रहने की कोशिश करता, मगर इसमें सफल होना कहीं से आसान नहीं था। ख़ासकर, राकेश जैसे एक संवेदनशील व्यक्तित्व के लिए, जिसके पास अभी भी कई मूल्य और भावनाएँ शेष थीं। वह चमकते टाइल्स पर चलते हुए और शीशे के पार्टीशन वाले छोटे-छोटे क्यूबिकल में काम करते हुए भी एकदम से चिकना नहीं हो गया था। उसके भीतर से खुरदुरापन अभी गया नहीं था। धूप-छाँव, सर्दी-गर्मी का अनुभव उसे होता था और अपने साथियों के सुख-दुःख से वह ख़ुश तो कभी दुखी हुआ करता था।

ऑफिस में राकेश ने इस कार्यक्रम में भागीदारी के लिए लोगों से नाम माँगने का काम शुरू किया। रायपुर एक ऐसा शहर है, जहाँ एक साथ कई प्रांतों के लोग रहते हैं और वहाँ मिश्रित संस्कृति देखने को मिलती है। एन.आई.सी.एल. के इस प्रशासनिक कार्यालय में भी एक साथ छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर-प्रदेश, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों के लोग यहाँ काम कर रहे थे। राकेश ने अपने मिलनसार स्वभाव की बदौलत सभी के बीच अपनी एक ख़ास पहचान बना ली थी। कुछ तो इसके पीछे उसकी अपनी गर्मजोशी थी और कुछ किसी कार्य या कार्यक्रम को जी-जान से लगकर पूरा कर देने की उसकी ज़िद। एक दिन किसी काम से राकेश कुछ देर तक जीएम. रजिंदर मित्तल के पीए बिकास चटर्जी से बात करता रहा। कुछ देर कार्यालय से संबंधित बातें होती रहीं। तभी बिकास ने अचानक से राकेश की प्रशंसा करनी शुरू कर दी। राकेश ज़रा झेंपने लगा। मगर बिकास चटर्जी, अपनी बारीक मूँछ में हँसते हुए अपनी बात कहते रहे। हर बात को बड़ी गंभीरता और कोमलता से और बांग्ला प्रभाव के साथ कहनेवाले बिकास चटर्जी बोल ही रहे कि तभी वहाँ पर लेखा अनुरक्षण अनुभाग के चरणजीत यादव आ गए। चरणजीत भी कुछ हँसते हुए बिकास की बात सुनने लगे। बिकास चटर्जी ने चरणजीत साहू को भी इस संवाद में जोड़ते हुए कहा, " देखिए, चरणजीत जी, इस पूरे प्रशासनिक में ऐसे एक आदमी का नाम बताइए जो अपना कोई भी काम इतनी सफाई से और फोर्सफूली कर लेता हो। मैं तो सुबह से लेकर रात तक यहाँ बैठे सैंकड़ों फोन अटेंड करता हूँ। अपने कितने कलीग को जीएम साहब से रोज़ मिलते हुए और उनमें से कइयों को डाँट खाता हुआ देखता हूँ। मगर जिस तरह राकेश जी, सर से बात कर लेते हैं और अपना कोई भी काम करा लेते हैं, वह एक बड़ी बात है। क्यों साहू जी, क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?"

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