Diksha in Hindi Motivational Stories by महेश रौतेला books and stories PDF | दीक्षा

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दीक्षा

हम सात लोग एक दिन पहले ही एक्जीक्यूटिव आवास पहुंच गये थे। शाम को एक कमरे में बैठे थे। सब अपनी अपनी बातें कह रहे थे। धीरे-धीरे साधारण वार्तालाप बहस में बदल गयी। उड़ीसा से आया एक अधिकारी अंग्रेजों की प्रशंसा कर रहा था। बहस पक्ष और विपक्ष के कारण गरम होने लगी थी। मैंने वातावरण को मधुर बनाने के लिए अपनी तीन छोटी-छोटी रचनाएं सुनायी।
"आँधियां हमने भी बनायी 
एक बार नहीं, कई-कई बार,
तूफान हमने भी रचे 
एक बार नहीं, कई-कई बार।"

"प्यार को नमस्कार करने गया 
एक बार नहीं, कई-कई बार,
कदम-कदम चला 
एक बार नहीं, कई-कई बार।"

"प्यार हमने भी किया 
एक बार नहीं, कई-कई बार,
दुनिया हमने भी देखी 
एक बार नहीं, कई-कई बार।"

वातावरण सहज हो गया था। कोच्चि(केरल) से आयी दीक्षा मुझे गौर से देख रही थी। मैंने उससे पूछा," कैसी लगी?" उसने केवल सिर हिलाया और हल्के से मुस्करायी। दूसरे दिन सभी बीस अधिकारी आ गये थे। प्रशिक्षण आरम्भ हो गया था। देहरादून का मौसम बहुत सुहावना हो रहा था। दिन में एक बजे खाना खाने जाते थे। प्रशिक्षण व्यवस्था करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक दिन कहा," कुछ भी कहो, जिन्दगी जीने योग्य होती है।" उनका यह वाक्य मुझे याद रह गया है। सुबह योग की कक्षायें होती थीं। हफ्ते में तीन दिन मनोविज्ञान की कक्षायें भी होती थीं। मनोविज्ञान के प्रोफेसर की बातें काल्पनिक और रोगी लगती थीं,तब। प्रशिक्षण छ महीने का था। बीच-बीच में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते थे।
हमारे कमरे आमने-सामने थे। एक दिन वह मेरे कमरे में आयी और कुर्सी के सामने पड़ी मेरी डायरी पढ़ने लगी। फिर बोली," अच्छा लिखते हो।" मैंने पूछा क्या पढ़ा। वह पढ़ने लगी-
"जीवन में कम से कम एक बार प्यार कीजिए,
ठंड हो या न हो, उजाला हो या न हो,
अनुभूतियां शिखर तक जाएं या नहीं,
रास्ता उबड़-खाबड़ हो या सरल,
हवायें सुल्टी बहें या उल्टी बहें,
पगडण्डियां पथरीली हों या कटीली,
कम से कम एकबार दिल को खोल दीजिए।

तुम्हारी बातें कोई सुने या न सुने,
तुम कहते रहो ," मैं प्यार करता हूँ।"
तुम बार-बार आओ और गुनगुना जाओ।
तुम कम से कम एक बार सोचो,
एक शाश्वत ध्वनि के बारे में जो कभी मरी नहीं,
एक अद्भुत लौ के बारे में जो कभी बुझी नहीं,
उस शान्ति के बारे में.जो कभी रोयी नहीं,
कम से कम एकबार प्यार को जी लीजिए।

यदि आप प्यार कर रहे हैं तो अनन्त हो रहे होते हैं,
कम से कम एक बार मन को फैलाओ डैनों की तरह,
बैठ जाओ प्यार की आँखों में चुपचाप,
सजा लो अपने को यादगार बनने के लिए,
सांसों को खुला छोड़ दो शान्त होने के लिए।
एकबार जंगली शेर की तरह दहाड़ लो केवल प्यार के लिए,
लिख दो किसी को पत्र,पत्रऔर पत्र,
नहीं भूलना लिखना पत्र पर पता और अन्दर प्रिय तुम्हारा,
लम्बी यात्राओं पर एकबार निकल लो केवल प्यार के लिए।"

फिर बोली," बहुत अच्छी है।" मैंने उससे पूछा," घर में कौन-कौन है?" वह बोली एक भाई है और माँ है। मैं बोला खतरा तो है। वह मुस्कराई और बोली छोटा है। मैंने गहरी सांस ली। उसने मुझसे कुछ नहीं पूछा। हम साथ-साथ नाश्ता करने मेस में गये। वह मेरे सामने बैठी थी। और एकटक मुझे देख रही थी। मैं उसकी ओर बीच-बीच में देख रहा था। मेरा हृदय तेज चल रहा था। ऐसा लग रहा था कि कहीं प्यार न हो जाय। वह देखे जा रही थी,मैं बार-बार उसे नजर मिला कर नजर झुका रहा था।
उस दिन समूह फोटोग्राफी होनी थी।वह मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी। एक सप्ताह बाद फोटो आयी। फोटो देखकर वह बोली," आपकी फोटो सबसे सुन्दर आयी है।" मैं बोला तुम्हारी भी बहुत अच्छी आयी है। उसने मेरे हाथ में मूंगफली रखी।और हम खाते-खाते हाँस्टल की ओर चल पड़े। 
दो माह बाद नैनीताल घूमने का कार्यक्रम बना। सभी लोग बच्चे बन गये थे। बस में खूब उधम मचाया गया। सभी ने अपनी- अपनी एक्टिंग का जौहर दिखाया। मैंने दीक्षा से कहा," मैं नैनीताल में पढा़ हूँ।" नैनीताल पहुंच कर वह बोली," यह तो बहुत ही सुन्दर जगह है।" मैंने कहा पहले बहुत सी फिल्मों की शूटिंग यहाँ होती थी।  सब लोग एक ही होटल में रूके थे। नैनीताल में ठंडा था। वह मेरे सामने अपने बाल बनाती थी।उसके बाल बहुत लम्बे थे। मैं उससे उनकी प्रशंसा करता था।वह मुस्करा देती थी। नैनी झील  भविष्य में हमसे क्या कहने वाली है, मेरे द्वारा लिखा वह पत्र मैंने उसे सुनाया-
" प्रिय,
      मैं तुम्हारी याद में सूखे जा रही हूँ।कहते हैं कभी सती माँ की आँखें यहाँ गिरी थीं।नैना देवी का मंदिर इसका साक्षी है। कभी मैं भरी पूरी रहती थी।तुम नाव में कभी अकेले कभी अपने साथियों के साथ नौकायन करते थे।नाव में बैठकर जब तुम मेरे जल को छूते थे तो मैं आनन्द में सिहर उठती थी।मछलियां मेरे सुख और आनन्द की सहभागी होती थीं।बत्तखों का झुंड सबको आकर्षित करता था।" वक्त" फिल्म का गाना" दिन हैं बहार के...।" तुम्हें अब भी रोमांचित करता होगा। प्रिय, अब मैं तुम्हारे कार्य कलापों से दुखी हूँ।तुमने गर्जों,गुफाओं में बड़े-बड़े होटल और कंक्रीट की सड़कें बना दी हैं।मेरे जल भरण क्षेत्रों को नष्ट कर दिया है।गंदगी से आसपास के क्षेत्रों को मलिन कर दिया है। यही गंदगी बह कर मुझमें समा जाती है।प्रिय, यह सब दुखद है।मेरे मरने का समय नहीं हुआ है लेकिन तुम मुझे आत्महत्या को विवश कर रहे हो। मैं मर जाऊँगी तो तुम्हारी भावनाएं, प्यार अपने आप समाप्त हो जाएंगे और तुम संकट में आ जाओगे।जो प्यार मेरे कारण विविध रंगी होता है, वह विलुप्त हो जायेगा।प्रिय, मेरे बारे में सोचो।अभी मैं पहले की तरह जीवंत हो सकती हूँ, यदि भीड़ , गंदगी और अनियंत्रित निर्माण को समाप्त कर दो।तुम मेरे सूखे किनारों से भयभीत नहीं हो क्या? मैंने बहुत सुन्दर कहानियां अतीत में कही हैं और बहुत सी शेष हैं जो समय के साथ जन्म लेंगी।मैं जीना चाहती हूँ , यदि तुम साथः दो।
तुम्हारी 
प्यारी नैनी झील,नैनीताल"
 वह उत्सुकता से सब सुनती रही, झील उसके सामने जगमगा रही थी। नैनीताल का पूरा प्रकाश संध्याकाल में परावर्तित होकर अभूतपूर्व दृश्य उत्पन्न कर रहा था।उसने कहा पर्यावरण को अभी से हमें बचाने के लिए सार्थक कदम उठाने चाहिए। हम होटल से निकल कर नैना देवी के मन्दिर की ओर जा रहे थे। तभी साथियों ने नौकाविहार का मन बनाया। नाव में चढ़ते समय अशोक ने दीक्षा का हाथ पकड़ा उसे नाव में बैठाने के लिए,नाव डगमगा रही थी और वह डर रही थी कि कहीं गिर न जाय। मेरे मन में अव्यक्त एक जलन हो रही थी, यह सब देखकर। वह मेरे पास आकर बैठ गयी और मेरा मन शान्त हो गया। मैंने उसे बताया फिल्म वक्त के एक गाने की शूटिंग इसी झील में हुई थी। मौसम साफ था। एक अपूर्व आनन्द की सृष्टि हो रही थी। लग रहा था प्रकृति जब खुश होती है तो दिल खोलकर नाचती है अपने मनुष्यों, वृक्षों,पक्षियों, पहाड़ों, रास्तों, आकाश, धरती आदि सबके साथ। तल्लीताल आते ही नाव से उतरते समय उसने मेरा हाथ जोर से पकड़ा और मेरी जलन मानो कहीं खो गयी थी। दो दिन नैनीताल घूमने के बाद हम वापिस देहरादून लौट आये। छ माह कब बीत गये पता ही नहीं चला। अन्तिम दिन सबके पते की एक छोटी सी डायरी बना कर सबको वितरित की गयी। जाने के दिन वह बोली," अच्छा चलती हूँ। बहुत अच्छा समय बीता। मैं प्रतीक्षा करूँगी।" मैंने कहा," बहुत बुरा लग रहा है। पता नहीं फिर कब मिलेंगे।"  मैंने आगे कहा," शादी का विचार तो नहीं है?" वह मुस्करा कर चल दी।

सालों बाद मैंने उसे फेसबुक पर देखा।उसने पृष्ठभूमि में देहरादून की अपनी फोटो डाली हुई थी, उसके आधार पर मैं उसे पहिचान गया। और परिचय में अविवाहित लिखा था। मैंने दोस्ती का निवेदन भेजा। एक महिने बाद उसने उसे स्वीकार किया और पूछा," कहाँ हो आजकल? आपने याद किया,अच्छा लगा। अगले साल रिटायर हो रही हूँ।"  मैंने लिखा," सेवानिवृत्त हो चुका हूँ। अल्मोड़ा में हूँ। कभी आना।"
मैंने फोन पर पूछा,"  कैसी हो?शादी नहीं की क्या?" वह बोली," ठीक हूँ। इंतजार कर रही हूँ।" मैंने कहा," अब कर लीजिए।" वह जोर से हँस दी। ऐसा लगा जैसे ठंडी हवा का एक झोंका मुझको स्पर्श करता दूर निकल गया है।

** महेश रौतेला