दास्तान-ए-अश्क - 24

किसी ने मुझे एक बहुत अच्छी बात बताई!
"एक औरत  वो होती है ,जिसके किचन में खाना बनाने के लिए बहोत सारे व्यंजन- मसाले मौजूद होते हैं! उसके प्रयोग से वह दमदार खाना बना कर परिवार में वाहवाही की हकदार बनती है !
और एक औरत वह होती है जिसके पास किचन में मसालों की मात्रा कम है, फिर भी उसके खाने में एक अलग ही लज्जत होती है ! इसका कारण आप जानते हो क्योंकि वह अपना काम दिल से करती हैं!
थैंक यू सो मच उनकी इतनी अच्छी सोच के लिए..!
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दास्तान-ए-अश्क.. 

दास्तान के पिछले पार्ट में हमने देखा कि इस कहानी की नायिका का जेठ उसके साथ हम बिस्तर होने के लिए उसके पीछे पड़ जाता है क्या वह अपने बुरे इरादों में कामयाब हो पाता है या नहीं  पढ़िए इस भाग में..)

जब दीदी उसे डांट रही थी तब उसका जेठ दरवाजे के पीछे खड़ा होकर उनकी बातें सुन रहा था!  अपनी बहन की बातें सुनकर उसका हौसला और भी बढ़ गया! उसे लगा कि अब तो वह पक्का ही अपने मंसूबों में कामयाब हो जाएगा!
  पापा जी के जाने के बाद वो वैसे भी उस घर का कर्ताधर्ता बन बैठा था! अपने भाई को थोड़ा बहुत खर्चा  देकर वह उससे निजात पा लेता था! 
वो रात उस पर कयामत की रात बन कर आई ! घर के सारे कामों से निवृत होकर जैसे ही वो अपने कमरे में जाकर लेटी थकान की वजह से उसकी आंख लग गई !नन्ना आज जिद करके दादी के पास सो गया था!
  रात के बाद उसे ऐसा लगा  जैसे कोई बिच्छू उसके जिस्म पर रेंग रहा है !
वह एकदम हड़बड़ा कर उठी! 
आंखे खुलते ही सामने उसका जेठ नजर आया उसके चेहरे पर बहुत ही  कुटिल मुस्कान थी !
पूरी तरह बेशर्म बना हुआ वो अभी भी उसका बदन सहला रहा था !
'क्या कर रहे हो आप भैया..?  छोड़ो मुझे..! दूर हटो मुझसे ..!"
वो घबरा गई!
पर मानो  उसके शरीर पर शैतान सवार था! 
उसने पीछे से उसे कसकर पकड़ लिया था वो डरे हुए हिरण की तरह कांप रही थी!
  उनकी पकड़ से छूटने का भरचक प्रयास किया! 
पर आज वह दरिंदा जैसे अपनी हैवानियत पर उतरा आया था! 
आज तुझे मुझ से कोई बचा नहीं सकता..! आज तो मैं अपनी मनमानी कर के ही रहूंगा !"
वह चिल्लाने की कोशिश करती है लेकिन वह जबरन उसका मुंह बंद कर देता है ! एक पल के लिए वह बिल्कुल बेबस हो जाती है !
अचानक पास ही उसकी गुड़िया रोने लगती है ! बच्चे के रोने की आवाज से मानो उसके अंदर की मां जाग जाती है! वह पूरे बल से उसे धक्का  देती है ! और उसकी पकड़ से छूटकर जोर-जोर से चिल्लाना शुरु कर देती है !
उसकी इस हरकत से अचानक वो हड़बड़ा गया!  
फिर डर के मारे कमरे से बाहर भागा!  जब उसने अंदर से कुंडी लगा ली तब वो बुरी तरह कांप रही थी!
उसकी सांसे  काफी तेज हो गोई थी!  पसीने से तरबतर वह  रोए जा रही थी! न जाने विधाता ने क्या लिखा है उसकी किस्मत में ..!
सारी जिंदगी यूं ही मर-मर के डर-डर के उसे जीना था! 
आज उसका दिल उस की अंतरात्मा सब खून के आंसू बहा रहे थे ! लेकिन उसकी आंखें बिल्कुल सूखी थी!
उसने मन ही मन कुछ तय किया..! 
ईस सदमे से निजात पाने का आसान क
एक ही रास्ता नजर आया उसे! 
"नहीं चाहिए अब ऐसी जिंदगी ..! क्यों जिये .? किसके लिए जिये..? 
आज उसकी अंतरात्मा जैसे जवाब दे रहीं थी ! कोई भी तो नहीं था उसका अपना!
सारी जिंदगी वो मरती रही ! दूसरों की इच्छाओं की बलि चढ़ती रही ! पर कब तक..? आज  सब्र की इंतहा हो गई थी..! एक औरत अगर अपने घर की छत के नीचे ही सुरक्षित नहीं तो फिर भला व खुले आकाश के नीचे कैसे जिएगी..? अपने घर के मर्दों के सरंक्षण में एक औरत की ऐसी दुर्दशा होती है, तो बाहर के भेडियो से खुद को कैसे वो सुरक्षित करें..? सारी रात यही  सोचते हुए निकल गई!  
उसने मन ही मन कुछ कड़ा फैसला लिया! मन में सब कुछ ठान कर वह खड़ी हो गई! पास लेटी हुई गुड़िया के माथे पर एक चुंबन अंकित किया! और दरवाजा खोलकर तेजी से बाहर निकल गई !
एक भाव  विहीन चेहरा लेकर..!
कमरे से बाहर निकल कर वो चुपचाप बाथरूम की तरफ चल पडी! 
अंदर से दरवाजा बंद किया!
कुछ ऐसा करने जा रही थी वो जिसके लिए बहुत हौसला चाहिए होता है! हौसला तो उसमें बहुत था ! पर जब अपने ही दुश्मन बन जाए तो एक अबला नारी कर भी क्या सकती है ? सिवाय खुद को खत्म करने के? आज वो भी यही करने जा रही थी खुद को ईस नर्क भरी जिंदगी से पूरी तरह निजात दिलाने..! 
सामने पड़ी फिनाइल की बोतल देखकर एक पल के लिए उसका मन अपने बच्चों के लिए तड़प उठा..!
गुड़िया और नन्ना..! क्या होगा उनका..?  पर एक चरित्रहीन मां के बच्चे बनकर रहने से अच्छा है कि वह बिना मां के बच्चे बन कर रहे..!
और दुनिया की ठोकरें खाकर खुद संभले..! वो सब कुछ सह सकती थी लेकिन अपने चरित्र के साथ समझौता कभी नहीं..! आज उसकी आंखों में एक आंसू भी नहीं आ रहा था! मानो सारी दुनिया उसके लिए शुन्य  हो गई हो..!
सामने पड़ी फिनाइल की बोतल उठा कर आवेश मे गटागट उसे पी गई!  
सब खत्म...!
एक  शुन्य  की ओर जाने की तैयारी..! उसकी आंखें मूंदने लगती हैं..! एक अनंत गहराई की ओर..! जैसे कोई उसे खींच रहा है ..!
वह उस जहानमें जाने के लिए कूच करने को तैयार थी! जहां शायद उसे वो सब कुछ मिले जिसकी वो हकदार थी..!
अपनी सारी वेदना सारा दर्द इस जहान में छोड़ कर जा रही थी..!
बिना कसूर उसे इतनी सजा मिली
इस जहान में..! शायद यह भगवान का अन्याय ही था..!  आज उसका मन जैसे शांत हो गया..! आज वह अपने असली पिता से मिलने जा रही थी..!
और उनसे पूछना चाहती थी कि क्यों उसे बिना वजह इतने दुख मिले..?
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क्या यही अंत था दास्तान का...?
क्या उस मजबूर लड़की का चले जाना ही इस दास्तान का अंत भला हो सकती है..? वो बहादुर लड़की जिसने बहुत कुछ सहा..? उसके अपनों ने और उसकी खुद की भावनाओं ने उसे हरा दिया..!
उसके जज्बात ही उसके दुश्मन बन गए..!
दुख के दरिया को लांग कर क्या अपनी दास्तान की नायिका आजाद हो गई थी ? या फिर उसके हाथ की लकीरों में कुछ और ही लिख

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