दस दरवाज़े - 14

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर - चौदह)

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पाँचवा दरवाज़ा (कड़ी -2)

ओनो : मुझे भूलकर दिखा

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

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ये दिन मेरे लिए बोरियत भरे हैं। काम मेरे पास कोई है नहीं। इंडिया जाना चाहता हूँ ताकि विवाह करवा लूँ, पर मैंने ब्रिटिश नागरिकता के लिए आवेदन कर रखा है जिसके कारण मेरा पासपोर्ट होम-ऑफिस में पड़ा है। पूछताछ करने पर पता चलता है कि अभी कुछ महीने और लग जाएँगे। इतने समय के लिए मुझे ओनो जैसी लड़की का साथ ज़रूरी है।

मेरी प्रतीक्षा को फल लगता है। एक दिन वह फिर हाई-स्ट्रीट पर मुझे दिखाई दे जाती है। मैं हॉर्न बजाकर उसका ध्यान अपनी ओर खींचता हूँ। वह मेरी तरफ देखती है। मैं इशारा करके बुला लेता हूँ और कार का दरवाज़ा खोल देता हूँ। वह कार में बैठती हुई कहती है -

“तू मेरा पीछा करने से नहीं हटा न !”

“नहीं ओनो, आज भी अपना मिलना एक इत्तेफाक ही है।”

“झूठ बोल रहा है, मैंने तुझे कितनी बार यहाँ घूमते देखा है।”

“ओनो, बिल्कुल मैं तेरी तलाश में चारों तरफ घूमता फिरता हूँ। अब तू ही समझ ले कि मैं तुझे कितना चाहता हूँ।”

“तुझे बताया है न कि मैं ऐसे किसी चक्कर में नहीं पड़ सकती।”

“पर क्यों ?”

“क्योंकि मेरी ज़िन्दगी का ऐम किसी मर्द के साथ संबंध बनाकर वक्त खराब करना नहीं है।”

“क्या ऐम है तेरा? कोई बड़ा व्यापार करना चाहती है या कोई बड़ी नौकरी? क्या एक दिन विवाह करके सैटल होना उद्देश्य नहीं तेरा, बाकी सारी दुनिया के लड़के-लड़कियों की तरह?”

“बिल्कुल यही ऐम है मेरा, पर मैं किसी तरह के अस्थायी संबंधों में नहीं फंसना चाहती। जब तुम किसी के करीब जाते हो तो भावुक तौर पर जुड़ जाते हो और जब दूर होना पड़ता है तो तुम्हारे अन्दर जो टूट-फूट होती है, वह सारी उम्र तुम्हारा पीछा करती रहती है। सो, मैं पहले ही किसी चक्कर में क्यों फंसूँ। जब किसी के साथ रिश्ता जोड़ूँगी तो विवाह करवाने के मकसद से ही जोड़ूँगी।“

उसकी बात साफ़ है कि यदि मुझे विवाह करवाना है तभी वह कदम आगे बढ़ाएगी। मेरे लिए यह असंभव है। मुझे तो विवाह अपनी रंग-जाति में करवाना है, पर यह बात मैं यदि उसे बताऊँगा तो वह मुझे नस्लवादी कहेगी। शायद यह भी कह दे कि दूसरे व्यक्ति पर नस्लवादी होने की उंगली उठानी कितनी आसान होती है। मैं उससे कहता हूँ-

“मुझे अपना फोन नंबर दे, कभी बात करने को मन हो तो व्यक्ति कर सकता है। मैं तेरे बारे में और जानना चाहता हूँ।”

“ऐसा कर कि तू अपना नंबर मुझे लिखवा दे। कभी वक्त हुआ तो मैं ही फोन कर लूँगी।”

मेरा फोन नंबर लेकर वह कार से उतर जाती है। मैं सोच रहा हूँ कि यह तो बहुत ही टेढ़ी खीर है।

तीसरे दिन उसका फोन आ जाता है।

“ये किस इलाके का फोन नंबर है? तू कहाँ रहता है?”

“ग्रीनफोर्ड।”

“ये तो यहाँ से काफी दूर है।”

“अब समझ में आया कि मैं तेरे लिए कितनी दूरी तय करके पहुँचता हूँ, पर तू मेरे से दूर भाग रही है।”

“नहीं जॉय, यह बात नहीं। मैं तेरे से दूर नहीं भाग रही, मैंने तुझे बताया था कि मेरा ऐम क्या है।”

“मैं समझता हूँ, पर हम साधारण दोस्त तो बन ही सकते हैं। कभी खुला समय लेकर मिल तो सही, बातें करें, एक-दूजे को जानें। क्या मालूम कोई लम्बा रिश्ता ही बन जाए।... किसी दिन मेरे घर आ जा।”

“तू किराये पर रहता है? ”

“नहीं, यह मेरा घर है, कभी आ तो सही।”

“तू किस दिन खाली है?”

“मैं तो खाली ही हूँ, बता तुझे किस दिन तेरे घर से उठा लूँ, कहीं घूमने चलेंगे।”

“ठीक है, परसो सही।” कहते हुए वह मुझे अपना पता लिखवा देती है।

ओनो सिंगापुर की रहने वाली है। करीब दो वर्ष से इंग्लैंड में है। वह नर्सिंग का कोर्स करने आई थी। कोर्स तो उसने पूरा कर लिया, पर यहाँ वह स्थायी नहीं हो सकी। उसके पास अभी कुछ महीने और रहने का वीज़ा है। वह अगले दो साल का और वीज़ा लेने की कोशिश करती है, पर नहीं मिलता। जितने समय का वीज़ा उसके पास शेष है, उसमें वह अधिक से अधिक पैसे कमाना चाहती है ताकि लौटते समय तक कुछ जेब खर्च जमा कर सके। फिर अपने देश जाकर नर्स की नौकरी करना चाहती है या फिर नर्स के तौर पर अमेरिका में जा बसने का इरादा है उसका। हम रीजैंट पॉर्क घूमने जाते हैं। बहुत सारी बातें करते हैं। वह मेरे विषय में पूछती है और अपने बारे में बहुत कुछ बताती है। मैं करीब दो बार उसका हाथ पकड़ने की कोशिश करता हूँ, पर वह टाल जाती है। जब हम वापस लौटने लगते हैं तो मैं कहता हूँ -

“ओनो, चल मेरे घर, रात वहीं रह लेना।”

“नहीं जॉय, मैंने बताया था न कि मैं किसी के साथ जज़्बाती तौर पर उलझना नहीं चाहती।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे अभी विवाह करवाना है।”

“ओनो, यह विवाह ऐसी चीज़ तो है नहीं कि कोई प्लेट में परोस कर तुम्हारे सामने रख देगा। किसी के संग ज़रा खुलोगी तभी तो बात आगे बढ़ेगी।”

“जॉय, क्या बात करता है, चीनी हों या इंदियन, पर हैं तो हम ऐशियन ही। हमारे विवाह तो माँ-बाप ही तय कर देते हैं।”

“ओनो, अब वे बातें नहीं रहीं। अब विवाह माता-पिता की इच्छा से नहीं, बच्चों की मर्ज़ी से होते हैं।”

वह सोच में पड़ जाती है और फिर कहती है -

“तू कैसी लड़की से विवाह करवाना चाहेगा?”

“तेरे जैसी के साथ, पर अब तू सड़क पर खड़े होकर मुझसे ऐसे सवाल न पूछ !”

“तेरे साथ जाने के लिए मैं तो कोई चीज़ भी नहीं लाई।”

“तूने किसी जंगल में तो नहीं जाना, मेरे घर ही जाना है, वहाँ सबकुछ है।” मैं कहता हूँ।

वह झिझकती हुई मेरे संग चल पड़ती है।

मेरे घर में आकर वह बहुत खुश है। हमारे बीच की दूरियाँ अब खत्म हो जाती हैं। मैं उसके लिए चाय बनाने लगता हूँ तो वह कहती है -

“चाय मैं बनाऊँगी। मैं भी इंदियन तरीके से चाय पीती हूँ। सिंगापुर हमारी गली में बहुत से इंदियन ही रहते हैं। सबके साथ हमारा करीबी रिश्ता है। मेरे डैडी के भी बहुत सारे दोस्त इंदियन ही हैं। उसे इंदियन लोग बहुत पसंद हैं।”

“फिर तुमने मुझे पसंद करने में इतनी देर क्यों लगा दी?”

“मेरी माँ जब कोई बर्तन खरीदती है तो बजा कर देखती है कि यह तिड़का तो नहीं।”

“तो तू मुझे बर्तन समझती है।”

“नहीं, यह रिश्ता चीनी के बर्तन की तरह होता है, इसके तिड़क जाने का खतरा बना रहता है।”

वह बिस्तर में जाते ही कहने लगती है -

“जॉय, तू बहुत भोला है। मुझे लगता है, तेरी वाइफ़ भी तुझे धोखा दे गई है। वह अपनी बीमारी के बारे में तेरे से झूठ बोलती रही है।”

“वह कैसे?”

“सबसे पहले तो मैं दिखाऊँगी कि ब्रेस्त में बोन नहीं होती।”

मैं हँसने लगता हूँ। वह समझती हुई मुझे मुक्के मारने लगती है।

अब हम निरंतर मिलने लगते हैं। उसका कमरा किराये का होने के कारण मैं तो उसके पास नहीं जा सकता, पर वह मेरे घर आ जाती है। मसाज वाली किट उसके पास होती है। वह मुझे मसाज देने लगती है। मसाज करते हुए वह एक एक अंग के मसाज के तरीके और इसके महत्व के बारे में भी बताती चलती है। कई बार मेरे घर आकर वह मुझे चाइनीज़ भोजन बनाकर भी खिलाती है। मछली-चावल उसकी खासियत है। कुछेक भारतीय खाने भी बना लेती है, पर उनका स्वाद बिल्कुल भिन्न होता है। उसकी आदतें भारतीय स्त्रियों वाली हैं। मुझे अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो झट से उठकर मुझे पकड़ा देगी। मुझे बैठे हुए को खाना परोसेगी। सवेरे उठकर चाय बिस्तर में लाकर देगी। मैं रसोई के किसी काम में हाथ लगाऊँ तो लड़ पड़ेगी। सोने से पहले पूरी रसोई की सफ़ाई करेगी। समूचे तौर पर उसका प्यार करने का ढंग ही अलग है। यह अनुभव मेरे लिए खूबसूरत और नया है। कभी कभी मैं सोचने लगता हूँ कि जितना समय वह वापस सिंगापुर नहीं जाती, उसको अपने साथ ही रख लूँ, पर फिर मुझे अपने भाई और बहन से डर लगने लगता है।

एक दिन वह कहती है -

“मेरे पिता के पास इतनी जायदाद है कि वह मुझे यहाँ घर खरीदकर दे सकता है। इसके लिए वह तैयार है।”

“फिर तूने क्यों नहीं लिया? ”

“अगर मुझे यहाँ स्ते मिल जाती तो अब तक ले लिया होता। लेकिन अब भी बुरा नहीं, सिंगापुर जाकर कोई काम शुरू करूँगी या जैसा कि तुझे बताया है कि अमेरिका चली जाऊँगी। वहाँ नर्सों की बहुत ज़रूरत है।”

फिर वह अपने भविष्य की योजनाओं को लेकर बताने लगती है। मैं उसकी बात का उत्तर दिए बग़ैर सुनता रहता हूँ। वह अचानक पूछती है -

“क्या सोच रहा है?”

“कुछ भी नहीं, मैं तो तुझे सुन रहा हूँ।”

“मेरे साथ विवाह के बारे में सोच रहा है कि नहीं?”

“मैंने अभी कुछ भी नहीं सोचा।“

“देख जॉय, मुझे जल्दी कोई जवाब दे। मुझे आगे अपने माँ-बाप को भी मनाना होगा। मैं जानती हूँ कि यह विवाह इतना आसानी से नहीं होने वाला।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरे माँ-बाप किसी दूसरी नस्ल के आदमी के साथ विवाह की इतनी जल्दी अनुमति नहीं देंगे।”

वह गंभीरता से कह रही है। मैं उसकी ओर देखता जा रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि क्या कहूँ। कह दूँ कि मैं तो स्वयं तेरे साथ विवाह नहीं करवाना चाहता। मेरी हालत उस साँप जैसी है जिसके मुँह में छिपकली है। अगर छोड़े तो भोजन जाता है और यदि खाए तो कोढ़ी होने का डर है। मैं उसको रख भी नहीं सकता और छोड़ना भी नहीं चाहता। मुझे चुप देखकर वह विवाह वाले सवाल पर ज़ोर डालते हुए कहती है -

“जॉय, मुझे साफ़ उत्तर दे कि मेरे साथ विवाह करवाएगा या नहीं। मुझे अगला कदम उसी हिसाब से उठाना है।”

“ओनो, इतनी भी जल्दी न कर, हम अभी एक-दूजे को और जान लें।”

मैं उसको टरकाने के लिए कहता हूँ। वह चुप-सा हो जाती है।

उसके बाद ओनो का कोई फोन नहीं आता, जब कि पिछले दिनों वह हर रोज़ ही फोन किया करती थी। दो सप्ताह गुज़र जाते हैं। मुझे कुछ-कुछ तो समझ में आता है कि उसका फोन क्यों नहीं आया। उसको मिलने के लिए मेरा मन उतावला होने लगता है। मैं उसके घर जाता हूँ। मकान मालकिन दरवाज़ा खोलती है और उसको बुला देती है। वह बाहर आकर पूछती है -

“क्या करने आया यहाँ?”

मैं उसकी बात सुने बगै़र उसको बांह से पकड़कर कार में बिठा लेता हूँ। वह बिना किसी विरोध के बैठ जाती है। मैं कार आगे बढ़ाते हुए पूछता हूँ -

“क्या समस्या है तेरी? ”

“समस्या मेरी नहीं, तेरी है। तू विवाह वाली बात से भाग रहा है। मैंने तुझे बताया था कि यदि विवाह नहीं करवाना तो मैं कोई वास्ता भी नहीं रखूँगी। मैं तेरे साथ जुड़कर सारी उम्र तेरी याद में तड़फना नहीं चाहती, समझे !”

मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि इस बात का क्या जवाब दूँ। मुझे शांत देखकर वह बोलती है-

“जॉय, तू औरत के मन को नहीं जानता। वह अपना मन जोड़ तो सहज ही लेती है, पर तोड़ नहीं पाती। इसलिए मन जुड़ने से पहले पहले ही मैं दूर हो जाना चाहती थी, इसीलिए तुझसे मिलना नहीं चाहा।”

“ओनो, मैंने तुझे कभी विवाह से इन्कार भी तो नहीं किया।”

“पर इतने समय में तो हाँ हो जानी चाहिए थी अगर होनी होती। मैंने सब कुछ सोचकर तेरे साथ रिश्ता बनाया था, सो मैंने अपने आप को इतने समय की ही इजाज़त दी थी।”

“तू तो बहुत खराब औरत है ओनो !”

“खराब नहीं, सच के नज़दीक रहने की कोशिश करती हूँ।”

वह कहती है। मैं कार तेज़ कर लेता हूँ। वह पूछती है -

“किधर ले चला है मुझे?”

“अपने घर।”

“अगर हमेशा के लिए लेकर जाना है तो ठीक है, नहीं तो मुझे वापस छोड़ आ।”

मैं उसकी बात का जवाब दिए बगै़र कार चलाता रहता हूँ। कुछ देर बाद वह सहज होकर सिंगापुर अपने माँ-बाप के साथ हुई बातचीत बताने लगती है -

“मेरी माँ कहती है कि ये इंदियन लोग बहुत चालाक होते हैं। हमारी भोली-भाली लड़कियों को फंसा लेते हैं, पर विवाह नहीं करवाते।”

परंतु, मैं उसकी बात सुने बिना सोचता जा रहा हूँ कि यह औरत किसी भी कीमत पर छोड़ी नहीं जानी चाहिए। घर पहुँचकर वह पूछती है -

“जॉय, मेरा बहुत सीधा-सा सवाल है, विवाह के लिए ‘हाँ’ या ‘ना’।”

“ओनो, विवाह के लिए हाँ कहने से पहले मेरी एक समस्या है, जिसका मुझे हल नहीं मिल रहा।”

“कैसी समस्या?”

“तुझे मैंने एकबार ऐनिया के बारे में थोड़ा-सा बताया था।”

“मुझे तूने बताया था कि वह तेरी गर्ल-फ्रेंद रही है, पर वह तो अब बीते दिनों की बात है।”

“बात बीते दिनों की अवश्य है, पर मैं उससे अभी पीछा नहीं छुड़वा सका हूँ। मुझे कुछ समय दे।”

“ठीक है, समय दिया, पर विवाह के लिए हाँ कर। मुझे पता है कि तू वायदे का बुरा नहीं, मैं तुझे अच्छी तरह जान गई हूँ।”

“अच्छा ! क्या क्या जान गई है मेरे बारे में? ”

“एक यह कि शराब पीकर तू बहुत बकवास करता है।”

“शराब बनी ही बकवास को बाहर निकालने के लिए है।”

“पर शराब के बिना भी तू कोई अक्ल की बात नहीं करता।”

“थैंक्यू वैरी मच ! इसीलिए तू मेरे साथ विवाह करवाने के लिए उतावली है।”

मैं हँसने लगता हूँ। मुझे अपने बारे में ऐसे बेबाक शब्द सुनने अच्छे लगते हैं। वह कहती है -

“इसीलिए तो तू मुझे अच्छा लगता है। मुझे अक्लमंद पति नहीं चाहिए। पति वो जो थोड़ी-सी सेवा से खुश हो जाए।”

“पर जब मैं इस सेवा का आदी हो गया तो?”

“मेरे पास सेवा की इतनी वैराइती है कि मैं तुझे आदी नहीं होने दूँगी।”

मुझे उसकी बातें इतनी प्यारी लग रही हैं कि एकबार तो दिल करता है कि अभी ऐलान कर दूँ कि मैं इसी लड़की के साथ विवाह करवाऊँगा। ओनो मुझे इतनी खुशी दे रही है कि शायद ही कोई अन्य लड़की दे सके।

उसका जन्मदिन आ रहा है। मैं उससे कहता हूँ -

“मैं चाहता हूँ कि तू उस दिन चीनी ड्रैस में आए और हम किसी इंडियन रेस्तरां में चलें।”

“नहीं जॉय, तू शायद नहीं जानता, गोरे ही नहीं अपने लोग भी बहुत नस्लवादी हैं। तुझे तेरे लोग किसी चाइनी लड़की के साथ देखकर खुश नहीं होंगे और मेरी नस्ल के लोग मुझे तेरे साथ देखकर माथे पर त्योरियाँ चढ़ा लेंगे। हो सकता है, मारपीट तक भी पहुँच जाएँ।”

यह नस्लवाद एकबार फिर मेरे ऊपर हावी होने लगता है। मैं सोचता हूँ कि इसबार मुझे जीतना चाहिए, नस्लवाद को नहीं। हर बार का हारना मैं नहीं झेल सकता। इतनी हारें मेरे लिए ठीक नहीं। मैं उससे कहता हूँ -

“मुझे किसी की परवाह नहीं। कोई कहकर तो देखे, उसका मुँह न तोड़ दूँ मैं।”

“पर हम हालात यहाँ तक आने ही क्यों दें ! बड़े आराम से यह दिन मनाएँगे, सिर्फ़ तू और मैं।”

“नहीं, हम बाहर चलेंगे, बेशक कुछ देर के लिए ही सही।”

(जारी…)

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