लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 3

लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम

[ साझा उपन्यास ]

कथानक रूपरेखा व संयोजन

नीलम कुलश्रेष्ठ

एपीसोड - 3

दामिनी ने मीशा को अपने पास बुला तो लिया था किन्तु उसका दिल भी काँप रहा था, कैसे ये आजकल के बच्चे इतनी जल्दी डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं ! उसके ज़माने में बेशक चार सहेलियाँ होती थीं पर किसी कीकुछ भी बात क्यों न हो, एक-दूसरे से कभी छिपी कहाँ रहती थी ?

जब मीशा के नाना जी के साथ उसका प्रेमविवाह हुआ तब वह अकेली ही पड़ जाती अगर उसकी सहेलियाँ और दादी उसके साथ न होतीं ! दामिनी की दादी बेशक बहुत शिक्षित महिला नहीं थीं पर शायद घर भर में सबसे समझदार व बोल्ड वो ही थीं, " बेटा ! एक तो वीरेन दूसरी जात का है, दूसरे अभी जमा भी नहीं है, पढ़ ही तो रहा है, तीसरी और बहुत ही ज़रूरी यह भी तो है कि वह अकेला है, कि उसके घर-परिवार में कोई तो हो ---"

"दादी, वैसे तो चाचा हैं ही, पर उसका सब कुछ तो खा गए हैं -- मुझे नहीं लगता, उनसे कुछ उम्मीद रखनी चाहिए ---"

"बिलकुल ठीक कह रही है बड़की ---पर तेरे पापा का क्या करूँ जो पढ़-लिखकर भी अनपढ़ों की सी ज़िद पाले बैठा है |"दादी अपनी प्यारी पोती दामिनी के लिए दुखी थीं |

"और तो और तेरा ये पढ़ा-लिखा -पिता भी तेरी बात नहीं समझता, अब कैसे करूँ ? थोड़ी -बहुत तेरी माँ कुछ कहना भी चाहती है तो ये दोनों उसे बोलने ही नहीं देते ---"

वीरेन एक अनाथ लड़का! जिसके आगे-पीछे कोई नहीं, सैल्फ़-मेड ! गाँव में हैज़ा फैला था बस उसमें बालपन में ही माता-पिता चल बसे, चाचा के पास रहना उसकी मज़बूरी थी | कहने को तो कई आम के बागों का मालिक था वीरेन लेकिन ये कोई नई बात तो है नहीं, रिश्तेदारों की आँखें फिरते कितनी देर लगती है ?

दामिनी ने एक चुप्पी साधी तो थी लेकिन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, आगे बढ़ने के लिए | उस ज़माने में उस पर पत्रकारिता का भूत चढ़ा था जिसके लिए परिवार का कोई भी सदस्य उसके साथ नहीं था | रिश्तेदार समझाते, `` अरे ! लड़की की जात है, ग्रेजुएशन करो, ठीक-ठाक सा कोई घर ढूँढ ही देंगे घरवाले और जाओ अपनी गृहस्थी संभालो !पति ससुराल वाले चाहेंगे तो कहीं पर टीचरी कर ही लेगी | ``

दुःख होता उसे, माँ, पिता जी दोनों शिक्षित थे शिक्षा से जुड़े हुए थे फिर भी उनकी सोच ! क्या दिन थे मानसिक प्रताड़ना के ! दामिनी को अब याद आती है तो झुरझुरी सी हो आती है | तरस आता था उसे ऎसी सोच पर ! दादी, उसे खूब अच्छी तरह याद हैं जब उसके कमरे में आकर वे उसे अपनी गोदी में लिटा लेतीं और कहतीं ; "समय की बात है बिटिया, देखना एक दिन बादल छँट जाएंगे --"

एवॉर्ड फ़क्शन के दूसरे दिन भी मीशा उसके सामने थी, अपने मानसिक उत्पीड़न से जूझती हुई माताओं, बहनों वाले सीरियल के सामने, रिमोट थामे उसकी ऊँगलियाँ रिमोट को नचा रहीं थीं, ध्यान तो उसका कहाँ था सीरियल में ! दामिनी का मन भर आया, क्या फूल सी बच्ची है ! अचानक मीशा के हाथ से रिमोट गिरा, वह चौंकी ;

"सॉरी, बड़की नानी ---"

"अरे ! काहे का सॉरी ---ये तो गिरते -पड़ते रहते हैं, यहाँ कोई रिमोट गिराने वाला तो दिखाई दिया इतने दिनों बाद --" दामिनी के चेहरे पर कोमलता घिर आई, एक स्नेहसिक्त मुस्कान !

"अकेलेपन से जूझना भी कभी-कभी अखरने लगता है | " दामिनी ने अपने वर्तमान में आकर मीशा का सिर अपने वक्षस्थल में छिपा लिया |

बिंदो इस घर की बरसों पुरानी सेविका थी, अपने अधिकार से कुछ भी कहती, करती | मीशा के बड़के नानू की अस्वस्थता में रात-दिन चौकन्नी रहने वाली बिंदो ने आने-जाने वालों के साथ पूरे घर को संभाल लिया था | अचानक वह सिटिंग-रूम में प्रगट हुई ;

"आज तो बाहर कचरा ही खाकर आई हैं नानी-धेवती, अब ये दूध पी लीजिए दोनों ---" उसने ट्रे में रखे गिलास दोनों के आगे कर दिए |

"क्या --बिंदो काकी, मैं नहीं पीऊँगी, इतना टेस्टी पीज़ा खिलाकर लाईं हैं बड़की नानी --"बिंदो को छोटे-बड़े सभी बिंदो काकी बुलाते थे, वीरेन के गाँव की थी वह, वीरेन और दामिनी जब अहमदाबाद आए तब उसे साथ ले आए थे, उसकी शादी करवाई पर कुछ ही दिनों में उसके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई, बच्चा कोई था नहीं | वीरेन व दामिनी ने दुबारा शादी करवाने की बहुत चेष्टा की पर वो तैयार ही नहीं हुई ;

"सुख मिलना होता तो उसी से न मिल जाता ---साहब --"और वह इसी परिवार का हिस्सा होकर रह गई | ठाठ से रहती थी, पूरे घर का कंट्रोल उसके हाथ में था, मज़ाल है जो एक चीज़ या पैसा इधर-उधर हो जाए | दामिनी अपनी पत्रकारिता के सिलसिले में उसी के बल पर काम करती रहती थी |

"कचरा तो तब ही निकलेगा जब दूध पीओगी, याद नहीं है अपने हिटलर नाना जी का फ़रमान --रात को जब तक सब दूध न पी लें वो एक-एक कमरे में जाकर पूछताछ करते रहते थे ---तू तो काफ़ी छोटी थी --"

"याद तो है मुझे, पर नानी अभी मूड नहीं है ---" मीशा ने छुटकारा पाने की कोशिश की |वह छोटे बच्चे की तरह मुँह बना रही थी |

"नहीं भई ! इस घर में तो नानू की हुकूमत चलती थीअभी तक ---अब ये बिंदो उनकी भी गुरु है|"

दामिनी को मीशा में एक छोटा बच्चा दिखाई दिया, बहुत अच्छा लगा उसे | जब तक अंदर का बच्चा ज़िंदा रहता है किसी भी परिस्थिति से जूझा जा सकता है |

मीशा ने बेमन से दूध का गिलास ले लिया जैसे कड़वे घूँट निगल रही हो, वह दूध मुँह में धकेलने लगी, दामिनी उसका चेहरा देखकर खिलखिला उठी |

"बिटिया ! किसी भी चीज़ को जब तक मन से स्वीकार नहीं करोगे, वो लगेगी नहीं ---"बिंदो काकी अपने व्यख्यान को कभी पैंडिंग नहीं रखती थीं |

अचानक मीशा ने दामिनी के सामने एक प्रश्न उगल दिया, शायद वह बहुत देर से पूछना चाहती थी |

"बड़की नानी, एक बात बताइए---आप इतनी स्ट्रॉंग हैं हमारी फ़ेमिली की मेंबर हैं निशि मौसी, फिर भी उन्होंने ऐसा कैसे किया ?" दामिनी बिलकुल नहीं चाहती थी कि मीशा कोई नेगेटिव बात उससे डिस्कस करे किन्तु मस्तिष्क ही तो है जिसमें एक पल में न जाने कितने विचार हिलोरें भरते हैं |

"देख बेटा ! जो हो चुका, उसको देखने या सोचने की जगह जो अपने सामने है, उसे देखना चाहिए –इसी को कहते हैं वर्तमान में जीना |" दामिनी मुस्कुराई, वैसे मन से वह भी भारी हो रही थी | सच है, अतीत की परछाईयाँ आदमी के साथ-साथ चलती हैं |इतना आसान होता सब कुछ भूल -भुलाकर वर्तमान में रहना तो बात ही क्या थी ! संसार में कोई पीड़ा ही न होती |

"आप जो प्रोग्राम में बातें कर रही थीं क्या सच में ही आपको अपने प्रोफ़ेशनल पैशन के लिए इतने पापड़ बेलने पड़े थे ?"

" प्रोफ़ेशनल पैशन में तो बेलने ही पड़े पर शादी भी तो एक चुनौती ही थी मेरे और तेरे बड़के नानू के लिए |"

"हाँ, मम्मा, बताती तो थीं आपकी शादी के बारे में --"मीशा ने लंबी साँस भरी, फिर से उसके चेहरे पर एक उदासी घिर आई |

"मेरी दादी और मेरी सहेलियाँ मेरा सहारा थीं जिन्होंने मेरे आत्मविश्वास को टूटने नहीं दिया और सब परेशानियों के बावज़ूद तेरे नानू ने एक सफ़ल वकील बनकर मेरे परिवार का मन जीत लिया --बाद में तो पिता जी गर्व से सिऱ ऊंचा करके तेरे नानू का परिचय सबसे करवाते थे, कोई सहारा न होने के बावज़ूद तेरे नानू ट्यूशन करके अपना खर्च चलाते थे |"

मीशा बहुत ध्यान से दामिनी की बात सुन रही थी अचानक न जाने उसे क्या सूझा ;"बड़की नानी, ईमानदारी से दिल पर हाथ रखकर बताइये, अगर बड़के नानू आपको डिच करते तो भी आप इतनी ही स्ट्रॉंग बनी रहतीं ?"

``तू भी क्या बात ले बैठी ?हमारे ज़माने में बिरले ही प्यार का इज़हार कर पाते थे। यदि कर देते तो उस निबाहने की पूरी कोशिश करते थे। आज की तरह तरह `यूज़ एन्ड थ्रो `जैसा ज़माना नहीं था। लेकिन हमने शादी के बाद प्यार कम किया, काम अधिक किया। " दामिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी |

"पर --नानी, मम्मा बताती थीं कि बड़के नानू के चाचा ने उनकी सारी प्रॉपर्टी हथिया ली थी फिर नानू ने इतना कुछ कैसे बना लिया ---और हाँ, आप अपने शहर से अहमदाबाद कैसे आ गईं ?" मीशा के मन में न जाने कितने सवालों की पोटली भरी पड़ी थी जिनमें से वह एक-एक सवाल धीरे -धीरे निकालती जा रही थी |

और दामिनी के चेहरे पर एक सुकून की परछाईं सी झलकने लगी थी | कोई भी एकदम नहीं खुलता, मीशा का धीरे-धीरे खुलना दामिनी के मन में मीशा के प्रति आशा का संचार कर रहा था |

"ये भी बड़ी लंबी कहानी है बच्चा, मैंने बस एक बात का अनुभव अपने जीवन में किया है कि जो भी परिस्थिति हो, उसका सामना बड़े धैर्य और विवेक से करने में ही समझदारी है --वरना बात बिगड़ सकती है |ये कहानी फिर बताऊँगी। "

जीवन के पड़ाव कितने पेचीदे होते हैं उसका अपना जीवन कितना बदल गया है।

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डॉ प्रणव भारती

ई -मेल---pranavabharati@gmail.com

परिचय ------एम.ए (अंग्रेज़ी, हिंदी)पीएच. डी, आठ- उपन्यास, एक -कहानी संग्रह, दो-कविता-संग्रह, 'अब झाबुआ जाग उठा' --सीरियल लेखन (शीर्षक गीत व 68 एपीसोड्स )अन्य-कुछ नृत्य-नाटिकाएँ (भोपाल दूरदर्शन के लिए).कई वर्षों तक दैनिक पत्र 'गुजरात वैभव' के रविवारीय परिशिष्ट में 'उजाले की ओर' लेख का प्रकाशन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी-कविता लेखन.

जुड़ाव --एन.आई.डी, इसरो, आई.आई.एम, एजुकेशन इनिशिएटिव्ज़ में (भाषा-विशेषज्ञ)सिटी पल्स फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट (गांधी नगर में विज़िटिंग फ़ैकल्टी ), आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में कविता, कहानी, नाटक से जुड़ाव, मंच व मीडिया में संचालन (एंकरिंग ).

अनुवाद --कई पुस्तकें, एज्युकेशन इनिश्येटिव्ज़ के लिए लगभग 80 बाल-कविताओं का हिंदी-अनुवाद (जिन पर बच्चों के लिए संस्था द्वारा फ़िल्म बनाईं गईं )

सम्मान, पुरूस्कार --विभिन्न संस्थाओं द्वारा साहित्यिक सम्मान, 'अंन्तोगत्वा' उपन्यास को हिंदी साहित्य अकादमी का प्रथम पुरूस्कार, 'गवाक्ष' उपन्यास को 2018 में श्री आदित्यनाथ योगी जी द्वारा 'प्रेमचंद नामित पुरूस्कार', रांची से 'स्पेनिन पुरुस्कार'

'राही रैंकिंग' में कई वर्षों से 100 लेखकों में नाम दर्ज़, इस वर्ष नं-- 60.

सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन

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