Aakhir Kyo in Hindi Love Stories by Rajesh Bhatnagar books and stories PDF | आखिर क्यों

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आखिर क्यों

12 - आखिर क्यों

रवि के स्कूटर की आवाज़ दूर से ही काजल ने पहचान ली थी । पूरे घर में अकेली वही बची थी जो अब तक जागकर अपने पति का इन्तज़ार कर रही थी । सभी खाना खाकर अपने-अपने कमरेां में सोने चले गये थे । आज शनिवार था सो वह दो बजे वाली बस पकड़ कर चार बजे ही आ गई थी । आकर सिवाय रवि के इन्तज़ार के कुछ नहीं किया था । उसके स्कूल की छुट्टी के बाद से ही बूंदा-बांदी पूरे रास्ते भर होती रही । अब भी बंूदा-बांदी का दौर जारी था । मौसम में ठण्डक और बाहर सड़क पर अंधेरा पसरा पड़ा था ।

अनायास ही मेन गेट के खड़खड़ाने से उसका सारा शरीर रोमांचित हो उठा साथ ही रवि के देर से आने के कारण चेहरे पर नाराज़गी की षिकन आ गई । उसने देखा रवि बरसात में पूरा भीग चुका था । काजल के ख्याल से बेखबर रवि ने जैसे ही दरवाज़े के अन्दर कदम रखा काजल को देखकर उसकी बांछें खिल गई, “अरे यार ! आज तो शनिवार था और मुझे बिल्कुल भी ख्याल नहीं कि मेरी काजल आज....।” कहते-कहते उसने भीगे बदन ही काजल को अपनी बाहों मेें लेना चाहा मगर काजल ने उसे धकेलते हुये दूर कर दिया, “ओफ्फो.....! कपड़े तो बदल लो । देखो सारे भीग गये हो । वैसे तो ख्याल नहीं आता कि....।” वह कहते हुये अपने कमरे की ओर चल दी, पीछे-पीछे रवि भी । अन्दर जाकर काजल ने उसे नाईट सूट और तौलिया थमा दिया और जैसे ही स्वयं बाहर जाने को हुई रवि ने उसे अपनी ओर खींचकर अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लिया, “क्यों जा रही हो बाहर.....? अब भी इतनी शरम.....?” कहते हुये कपड़े बदलने शुरू कर दिये ।

“धत्त...! बेशर्म कहीं के....।” कहकर काजल ने अपना मुंह हथेलियों से छुपाकर आंखें बन्द कर लीं ।

कपड़े बदल कर रवि डाइनिंग टेबल पर बैठा था और काजल ने रसोई से खाना लाकर उसके सामने रख दिया था । बाहर मूसलाधार बारिष शुरू हो गई थी । दोनों का

ही मन शायद खाने में कम और एक-दूसरे को निहारने और निवाला देने में अधिक था । रात के ग्यारह बज चुके थे छत से गिरते नालियों के पानी की तेज़ आवाज़ के अलावा सर्वत्र शांति और अंधेरा फेला था ।

खाने के बाद अब दोनों बेडरूम थे । रवि के उतावलेपन की कोई हद ना थी । दरवाज़े की चटकनी चढ़ाते ही उसने काजल को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया था और काजल छटपटाकर उससे अपने आपको छुड़ाने का असफल प्रयास कर हार गई थी । रवि ने काजल को अपनी गोदी में उठाकर डबलबेड पर पटक दिया था और बत्ती बुझाकर नाईट लैम्प ऑन कर दिया था । दोनों पलंग पर एक-दूसरे की बाहों में गुथ गये थे । कुछ पल यूं ही लेटे रहने के बाद काजल ने रवि को एक ओर धकेल दिया, “चलो हटो मुझे आपसे बात नहीं करनी ।” कहते हुये दूसरी तरफ करवट ले ली ।

“क्यों क्या हुआ जॉनी ?”

“ये आप अपने आपसे पूछिये । जिसकी शादी को दो माह भी ना हुये हों, जिसकी पत्नी उससे डेढ सौ किलोमीटर दूर रह रही हो उसे उसके बस स्टैण्ड से लाने की तो बात दूर रही यह भी याद नहीं रहा कि आज वो आने वाली है...?”

“यार क्या करूं, साली नौकरी ही ऐसी है । गुड्स क्लर्क तो भगवान दुष्मन को भी ना बनाये और खास तौर से उसे जिसकी नई-नई शादी हुई हो और बीवी कहीं दूर गांव में टीचर हो ।” रवि ने काजल को अपनी मज़बूरी का बखान करना चाहा ।

“मगर नौकरी और भी करते होंगे जनाब ! रेलवे डिपार्टमेंट बन्द नहीं हो जायेगा आपके बिना । मगर जिसे अपनी बीवी से प्यार होता है वह सात समुन्दर पार से भी उससे....।”

“अरे जॉनी ! हम तुम्हारे लिये इंग्लिष चैनल पार करने को तैयार हैं । एक बार कहकर तो देखो ।” कहते हुये रवि ने काजल को कंधों से पकड़कर अपनी ओर करवट करवा ली ।

“सच् ? क्या आप भी वास्तव में मुझसे बहुत प्यार करते हैं ? ” काजल ने रवि के बालों में अंगुलियां फंसाते हुये कहा ।

“अरे एक बार इम्तहान लेकर तो देखो, फिर देखो ये बन्दा आपके लिये क्या-क्या कर सकता है ।” कहते हुये रवि ने काजल को अपनी बलिष्ट बाहों के घेरे में कस लिया ।

काजल की सांसें अब उखड़-उखड़कर हवा के आगोष में समाने लगीं थीं । कमरे में दोनों की धौंकनी-सी चलती सांसों और बाहर बारिष के बरसने और बादलों की गर्जन के अलावा और कोई ध्वनि नहीं थी । हां ! कभी-कभार बरसते मेघ का पानी पीने को व्याकुल कोई पपीहा ज़रूर पीह-पीह कर उठता था । कहते हैं पपीहा आसमान से गिरती पानी की बूंदों को ज़मीन पर गिरने से पहले ही पी जाता है । शायद रवि भी काजल के होठों से अपनी प्यास बुझाने का प्रयास कर रहा था और उसी प्रयास में उसने अपनी सारी ताकत झौंक दी थी ।

अब शायद बाहर बारिष थमने-सी लगी थी । उसी प्रकार रवि के अन्दर का तूफ़ान भी धीरे-धीरे शांत हो गया था । कमरे में ना जाने कहां से एक जुगनू घुस आया था जिसकी जलती-बुझती रौषनी को काजल एक ओर निढाल पड़ी निहार रही थी । उसे देखकर उसके मन में ना जाने कैसा भाव उभरा और वह अनायास ही अपने आपको जुगनू से जोड़ बैठी ।

थकी आंखों से जुगनू को एकटक देखती रही फिर मन ही मन सोचने लगी -क्या उसकी जिन्दगी भी एक जुगनू की भांति नहीं, जिसमें पल भर को रौषनी आकर बुझ जाती है । उसके बचपन से लेकर आज तक उसके भाग्य ने जुगनू की तरह ही आंख मिचोली ही तो खेली है । मगर आज उसने इतना बड़ा कदम उठाया है जिससे हो सकता है उसके जीवन की एक पल की रौषनी भी सदा के लिये बुझ जाये । मगर वह किसी कीमत पर भी अपनी आत्मा को नहीं मारेगी...। पल-पल मर कर अब और नहीं जियेगी । पुरूष प्रधान समाज में अपने अस्तित्व और महत्व को स्थापित करने के लिये वह सब कुछ बलिदान कर देगी । उसने रवि के सीने पर बाहें रख दीं, “सो गये क्या ?”

“ऊं...छेड़ो मत मुझे नींद आ रही है ।”

“आपसे एक ज़रूरी बात कहनी है ।” उसने रवि को फिर से हिला दिया ।

“यार सोने दो । वैसे ही बहुत थक गया था, जो कुछ भी कहना है अब सुबह कहना....।”

“मगर जो बात मुझे आपको बतानी है वह बहुत ज़रूरी है । आपको अभी सुननी होगी ।” काजल ने एक-एक शब्द पर इस बार ज़ोर दिया । रवि जो अभी तक करवट लेकर सोया था काजल की ओर मुडा़, “ऐसी भी क्या बात है जो नींद हराम कर रही हो ?”

“अरे ! अभी कुछ देर पहले तो आप मेरे लिये इंग्लिष चैनल पार करने की कह रहे थे और अब मतलब निकाल कर मेरी ज़रूरी बात भी ....।”

“अच्छा बाबा ! बोलो क्या बात है ?” रवि झंुझला उठा ।

“मैं अपना त्याग-पत्र प्रिंसीपल को सौंप आई हूं । मैंने नौकरी छोड़ दी है ।” काजल ने दृढ़ता से कह दिया ।

“क्या......?” कहकर रवि ने काजल को एक ज़ोर का धक्का दे मारा और हड़बड़ाकर उठ कर पलंग पर बैठ गया, “क्या बेवकूफों जैसी बातें कर रही हो ? सरकारी लगी-लगाई नौकरी छोड़ दी ? आखिर किससे पूछा तुमने ? ऐसा करने से पहले क्या यह नहीं सोचा कि मुझे सर्विस वाली बीवी चाहिये थी इसीलिये मैंने...।”

“इसीलिये तो आपने मुझसे शादी की । और अगर मैं नौकरी छोड़ दूंगी तो आप मुझे छोड़ देंगे ? यही आपका प्यार है ? अरे क्या आपने कभी सोचा कि जो बिना बाप की लड़की अपनी मां-बहन, भाई को छोड़कर आई है वह आपके बिना अकेली गांव में कैसे रहेगी ...। कितना काटेगा पूरा घर.......। गांव के अजनबी लोग, ताकती वहषी नज़रें...।”

“क्या तुम ही एक हूर की परी हो ? और औरतें नौकरी नहीं करतीं ?”

“वे शायद ज़रूरतमंद हैं । कई पुरूष की सताई हुई, कई ज़माने की ठुकराई हुई...और कई विधवा, बेसहारा...। आखिर कमी क्या है इस घर में ? जेठ-जिठानी दोनेां कमाते हैं । पापा की पेंषन आती है । अपना घर का मकान है । ना कोई जिम्मेदारी, ना कोई कर्ज......। फिर आप मुझसे नौकरी क्येां करवाना चाहते हैं ? आप रह सकते हैं मेरे बिना अकेले । आप मर्द हैं, मगर मैं एक औरत......। एक औरत का अकेला रहना कितना दूभर है इस समाज में आपको क्या पता...? जो मैंने फैेसला किया है वह अटल है । मैं बचपन से दुःख झेलती आई हूं.....। एक सपना अक्सर संजोया करती थी वह भी टूट गया । जब तनख्वाह हाथ में लेती हूं तो लगता है जैसे मैं दूसरों का हक मार रही हूं...।”

रवि की नींद जैसे कोसों दूर भाग गई थी । अभी कुछ देर पहले उमड़ा प्यार वासना पूर्ति होते ही जैसे उतर गया था । गुस्से में वह चीखा, “जानती है आज पैसे की कितनी कीमत है ? जिसके पास पैसा है वही इज्ज़त और चैन से जी सकता है । मंहगाई में जब बच्चे होंगे, उन्हें पढ़ाएगी-लिखाएगी तब तुझे अपनी ग़लती का अहसास होगा ।” कहते हुए रवि ने एक ओर धकेल दिया काजल को । काजल धक्का खाकर पलंग पर एक ओर गठरी-सी सिमटकर सिसक पड़ी, “मुझे पता था आपको पैसा प्यारा है । मेरा आपके लिए कोई मोल नहीं । ना जाने कौन-सा पर्दा चढ़ गया है आपकी आंखों पर....। क्या आपके पापा ने आप सबको अपनी छोटी-सी तनख्वाह में नहीं पढ़ाया-लिखाया ? अरे औरत की ज़िन्दगी ही मर्द की ठोकरें खाने के लिए लिखी है । पैदा होते ही बोझ लगने लगती है मां-बाप को । पहले षादी के दहेज के लिए कमाया, अब पति को खुष रखने के लिए कमाऊं ? मुझे नहीं चाहिये ऐषो-आराम और भौतिक सुख......। मुझे आत्मिक सुख चाहिये । आपके प्यार और सानिध्य से बढ़कर मेरे लिये और कोई सुख नहीं है । जवानी में कदम रखा था तो सोचती थी घर में पति के पास रहकर खूब सेवा करूंगी । भरा-पूरा परिवार होगा और हर पल पति का साथ । मगर......” कहती-कहती फूट पड़ी काजल और रवि के कन्धे पर सिर रख दिया, “आप कुछ भी समझो मगर मैं आपसे एक पल भी अलग नहीं रह सकती।”

रवि उसका रूदन सुनकर अन्दर तक पड़प कर रह गया । उसने तो कभी काजल के हृदय की व्यथा का अन्दाज़ा भी नहीं लगाया था । वह तो बस एक तारीख को काजल और स्वयं की तनख्वाह पाकर खुष हो जाया करता था । आंखों में अलग फ्लैट, सोफा, गाड़ी वैभव की सभी भौतिक वस्तुओं के सपने संजोये शनिवार को काजल के शरीर को भोगने की कामना लिये जी रहा था । आज काजल के साहस ने उसके अन्तर्मन को झकझोर डाला था ।

काजल सिसक-सिसक कर रवि के कदमों में ही सो गई थी और रवि अश्रुभरी आंखों से उसका मासूम कोमल चेहरा निहारता रह गया था । क्या वास्तव में काजल उससे इतना प्यार करती है.....? और वो......वो आज तक उसके दिल की गहराईयों में क्यों नहीं झांक पाया..? सोच-सोचकर हैरान था । रवि ने काजल के गाल को भावावेष में सहलाया । उसका हृदय काजल के प्रति दया और प्रेम से भर उठा । उसकी आत्मा काजल के तर्कों से घायल हो जाग उठी - ठीक ही तो कहती है काजल...। आज पति-पत्नी दोनेां के कमाने और आत्मिक सुख त्यागकर भौतिक सुख भोगने की होड़ में ही तो वह आज तक दौड़ता रहा । इस पैसा कमाने की होड़ में ही आज आदमी के दिलों की दूरियंा बढ़ती जा रहीं हैं.....अपने आपसे दूर हो गया है आदमी । जैसे उसने काजल को अपने से दूर कर दिया है । वह खुद ही पर्याप्त कमा लेता है जिससे वह सुख से जीवन बिता सकता है ......। शायद उसके पास काजल के आदर्ष सवालों और तर्कों का कोई जवाब नहीं था । उसकी आत्मा उससे बार-बार एक ही प्रष्न करने लगी , आखिर क्यों भौतिक सुखों के पीछे दुनिया भाग रही है और वह भी उसमें शामिल है ......? आखिर क्यों उसने अपनी पत्नी को नौकरी करवाने और अपने से दूर रखने का फैेसला किया......? आखिर क्यों काजल के नौकरी छोड़ देने पर उसे अपमानित कर उसकी आत्मा को दुखाया....? आखिर क्यों सब कुछ होते हुये भी काजल को चन्द नोटों की खातिर अपने से दूर रखा......आखिर क्यों....आखिर क्येां.....आखिर क्येां.....?

बाहर मौसम ठण्डा हो चला था । वैसी ही ठण्डक रवि के दिल को महसूस हो रही थी । वर्षा और तेज़ हवाओं के तूफान की तरह उसके क्रोधित मन का तूफान भी जैसे शंात हो चुका था । बहुत देर तक काजल के सवालों से लड़कर निरूत्तर रहा था वह और काजल के नौकरी छोड़ देने का कोई षिकवा उसके मन में नहीं रहा था बल्कि वह खुष हो उठा था काजल के आदर्ष चिन्तन और साहस से जिसने स्वयं उसकी आंखें खोल दीं थीं और लालच का पर्दा हटा दिया था । काजल जैसी पत्नी पाकर अपने आपको धन्य महसूस कर उसने सोती हुई काजल को अपने पास समेट लिया और भावावेष में अश्रुभरे नेत्रों से उसे निहारता स्वयं भी ना जाने कब निद्रा देवी के आगोष में समा गया ।

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