आखर चौरासी - 25

आखर चौरासी

पच्चीस

उस समय कविता कॉलेज जाने को तैयार हो रही थी जब माँ ने उससे कहा कि वह कॉलेज न जाए तो अच्छा है। सारे शहर में गड़बड़ हो रही है। वैसी स्थिति में उसका जाना ठीक नहीं होगा।

जो पहला बुरा ख्याल कविता के मन में आया, वह गुरनाम के ही संबंध में था और तभी से कविता परकटी चिड़िया की तरह छटपटा रही थी। वह जितना ही सोचती गुरनाम को लेकर उसकी फिक्र बढ़ती ही जा रही थी। ...वह ठीक तो होगा ? ...वह क्या कर रहा होगा ? ...उसे कोई खतरा तो नहीं ?

ऐसे ही ढेर सारे प्रश्न थे जो कविता की तकलीफ को बढ़ाते ही जा रहे थे। कभी वह कुर्सी पर बैठती तो कभी बिस्तर पर जा लेटती और कभी इस कमरे से उस कमरे तक बेचैनी से चहलकदमी करने लगती। वैसा होता भी क्यों न ! उनके बीच केवल जान-पहचान जैसी सीमित दोस्ती तो नहीं थी, दिलों के रिश्ते थे। दिलों के वो रिश्ते जो दिलों में न जाने कहाँ-कहाँ जुड़े रहते हैं ....कितने गहरे तक गयी होती हैं उनकी जड़ें । उसके जी में आ रहा था कि उसे पंख उग आयें और वह तेजी से उड़ कर गुरनाम के पास पहुँच जाती। उन पंखों में समेटे सबसे बचा कर वह उसे अपने घर ला छुपाती। उसकी वह बेचैनी उससे निकाल कर आस-पास चारों ओर बहने लगी थी। जब उसकी चहल-कदमी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई तो माँ ने उसे टोका।

‘‘आराम से कहीं बैठती क्यों नहीं ? जा कर अपनी पढ़ाई करो इम्तहान सर पर हैं।’’

‘‘मम्मी प्लीज, मुझे गुरनाम के हॉस्टल जाने दो न । पता नहीं वह कैसा होगा ?’’ उसने माँ को मनाने का प्रयास किया, ‘‘मैं जल्दी ही आ जाऊँगी। फिर मैंने कौन-सा पैदल जाना है !’’

‘‘इस लड़की का तो दिमाग खराब हो गया है। इस गड़बड़ में सभी अपने-अपने घरों में बैठे हैं और ये बाहर जाएगी ! कहीं नहीं जाना, चुपचाप घर में बैठो !’’ माँ ने उसे झिड़क दिया।

माँ का कड़ा उत्तर सुन कर उस समय तो कविता वहां से हट गई परन्तु थोड़ी ही देर में वह फिर माँ के पास जा पहुँची, ‘‘गुरनाम के बारे में सोच कर मेरा मन घबरा रहा है। मम्मी प्लीज, मुझे जाने दो न ! जाने वह किस हाल में होगा ?’’ उसने अपनी मनुहार दुहराते हुये कहा ।

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन उसके बारे में जानने के लिए हॉस्टल जाने का रिस्क लेने की क्या जरूरत है ? तुम गुरनाम के हॉस्टल फोन क्यों नहीं कर लेती ?’’

माँ की बात सुन कर कविता बुरी तरह चौंकी। फोन वाली बात अब तक उसे क्यों नहीं सूझी थी ? वह खुशी से झूम उठी। ‘‘ओ मम्मी, स्वीट मम्मी, थैंक यू !’’ कह कर वह तेजी से फोन की ओर लपकी।

हालाँकि हॉस्टल में गुरनाम से फोन करने की उसकी इच्छा पूरी नहीं हुई, परन्तु यह जान कर ही उसे बड़ी राहत मिली कि गुरनाम अपने अंकल के पास ‘जुलू पार्क’ चला गया है। गुरनाम वहाँ सुरक्षित होगा, ऐसा सोच कर कविता की बेचैनी बहुत हद तक कम हो चुकी थी।

...अब उसे गुरनाम से मिलने के लिए शहर का माहौल ठीक होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

***

उस वक़्त तक शाम पूरी तरह से गहराई न थी। ठण्ड के कारण लोगों ने घरों के खिड़कियाँ, दरवाजे बन्द कर रखे थे। सौ वाट का जलता बल्ब उस कमरे में पीली-सी रोशनी बिखेर रहा था। चारों ओर कमरे की दीवारों पर उन दिनों केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ दिवंगत तथा कुछ वर्तमान नेताओं के चित्र लटक रहे थे। कमरे के बीचो-बीच एक बड़ी सी टेबल के चारों तरफ छः-सात कुर्सियाँ लगी थीं। एक तरफ दीवार से सट कर दरी भी बिछाई गई थी।

दरअसल मुहल्ले के तथाकथित रंगदार जितेन्द्र द्वारा सरकारी जमीन को छेंक कर बनाये गये उस अवैध मकान का इतना ही इतिहास था कि जमीन पर कब्जा बरकरार रखने के लिए उस पार्टी की युवा शाखा का बोर्ड बाहर दीवार पर न जाने कब से लटक रहा था। जबकि वास्तविकता तो यह है कि जितेन्द्र और उसके लफंगे दोस्त उस मकान का इस्तेमाल अपने मनोरंजन और गलत-सलत कामों के लिए करते थे।

हॉस्टल में रहने वाला राजकिशोर भी उस समय वहाँ उनके साथ बैठा हुआ था। विभिन्न मौकों पर वह पहले भी कई बार वहाँ आ चुका है। चूँकि वह जितेन्द्र और उसके दोस्तों को खिलाने-पिलाने पर काफी खर्च किया करता था, इसलिए वहाँ उसकी अच्छी आवभगत होती थी। अन्य दिनों की तरह उस दिन भी वह आते हुए रास्ते से शराब की बोतलें और चखने में चिकन लेता आया था। राजकिशोर के अलावा वहाँ जितेन्द्र के दो और दोस्त बैठे थे। अब तक काफी शराब ग्लासों से होकर हलक के रास्ते उनके पेटों में समा चुकी थी। उन चारों पर नशा छा चुका था। कमरे में सिगरेटों का दमघोंटू धुँआ, बाहर निकलने का रास्ता ढूंढता, आवारा बादलों की शक्ल लिए यहाँ-वहाँ तैर रहा था।

‘‘यह तो वाकई गम्भीर मामला है।’’ जितेन्द्र ने एक ज़ोरदार कश खींचने के बाद सिगरेट की राख एशट्रे में झाड़ते हुए कहा।

‘‘हाँ, यह सच है। मैं पक्के तौर पर कह सकता हूँ कि गुरनाम का डाइरेक्ट लिंक पंजाब के उग्रवादियों से है।’’ राजकिशोर ने अपने स्वर को रहस्यात्मक बनाते हुए कहा, ‘‘अगर ऐसा नहीं है तो वह पहले से कैसे जानता कि इंदिरा गाँधी को मार दिया जाएगा ?’’

‘‘तुम एकदम ठीक बोलते हो, राजकिशोर ।’’ वहाँ बैठा टकला बोला। नशे से उसकी आँखें लाल हो रही थीं। उसका नाम तो कुछ और था। लेकिन अपने गंजे सर के कारण वह टकला के नाम से ही जाना जाता है। वह था भी बहुत खतरनाक। बात-बात पर चाकू निकाल लेना उसके लिए किसी खेल के समान था। उस बात का प्रमाण उसका चेहरा भी देता था, जिस पर वैसे ही कई मौकों पर उत्पन्न चाकुओं के आवारा निशान मौजूद थे। उसने अपना ग्लास उठा कर एक ही साँस में खाली किया और बोला, ‘‘गुरनाम स्साला गद्दार है ! खत्म कर दो उसे !’’

टकले की आवाज में भेड़िये की गुर्राहट-सी दहशत थी। उसकी आँखों से मानों खून टपकने लगा हो।

उसकी बात सुन कर राजकिशोर मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ। अपने षड़यंत्र की सफलता के प्रति वह आशान्वित होने लगा था। उसने सोचा, इतने दिनों तक उन लोगों को शराब पिलाना अब कहीं जा कर सार्थक होने को है।

जितेन्द्र ने टकला की बातों का समर्थन किया, ‘‘कह तो तुम ठीक रहे हो, स्साले गुरनाम का कुछ किया जाना चाहिए। लेकिन अभी तो वह हॉस्टल में होगा, वहाँ हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। पहले उसे किसी तरह हॉस्टल से बाहर लाना होगा ।’’

‘‘वह तुम लोग मुझ पर छोड़ दो, उसका प्रबंध मैं कर दूँगा।’’ राजकिशोर छूटते ही बोला, ‘‘मैं उसे किसी न किसी बहाने हॉस्टल से बाहर ले आऊँगा। बाकी काम तुम लोग संभाल लेना।’’

‘‘हाँ तब ठीक है। बाकी काम ये संभाल लेगा।’’ कह कर टकले ने अपनी जेब से चाकू निकाल कर झटके से उसका फल बाहर निकाला। बल्ब की रोशनी में चाकू का भयानक फल चमकने लग गया था।

थोड़ी ही देर में उनके बीच सब कुछ तय हो चुका था। बाकी की शराब खत्म कर वे चारों अपने अभियान पर निकल पड़े। एक मोटर सायकिल पर जितेन्द्र के साथ उसका एक साथी बैठा, दूसरी पर टकले के साथ राजकिशोर। अंधेरे में धड़धड़ाती दोनों मोटर सायकिलें हॉस्टल की ओर बढ़ने लगीं। राजकिशोर का मन बड़ा प्रसन्न हो रहा था। भले ही कारण कुछ और था परन्तु आज उसकी राह का एक काँटा सदा-सदा के लिए निकल जाने वाला था। रास्ते में उन्हें दो जगहों पर पुलिस की गश्ती जीपें मिली थीं, मगर न तो पुलिस ने उन्हें रोका, न ही वे कहीं रुके। हॉस्टल से कुछ पहले ही पेड़ों का एक झुरमुट पड़ता था, उन्होंने अपनी मोटर सायकिलें वहीं रोक दीं।

जितेन्द्र ने धीमे से कहा, ‘‘राजकिशोर, अब तुम जा कर गुरनाम को हॉस्टल से बाहर ले आओ। हम लोग तुम्हारा यहीं इंतजार करते हैं।’’

‘‘...और हाँ, ज्यादा देर मत लगाना। हम लोग जल्दी से जल्दी काम खत्म कर लौट जाना चाहते हैं।’’ टकला बोला।

‘‘मैं अभी गया और अभी आया।’’ कह कर राजकिशोर तेजी से हॉस्टल की ओर लपका। उसके सर पर भी ‘खून का बदला खून से लेंगे’ का नारा लगती भीड़ जैसा नशा सवार था ।

उसके जाते ही एक पल की ख़ामोशी के बाद टकला पूरा प्लान बनाने लगा, ‘‘गुरनाम के आते ही तुम दोनों उसके हाथ-पैर कस कर पकड़ लेना। पेट के पास का हिस्सा तुम्हारी पकड़ में बिल्कुल ना रहे। बस फिर मेरे चाकू का एक ही सधा वार उसकी सारी अंतड़ियाँ पेट से बाहर निकाल देगा।’’

‘‘हाँ, ऐसा ही ठीक रहेगा। काम खत्म कर तेजी से अपने-अपने घरों को निकल पड़ना होगा।’’ जितेन्द्र ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

एक भरे-पूरे जीवन को हमेशा के लिए खत्म करने का प्लान कुछ ही पलों में बन चुका था। अपने खतरनाक इरादों के साथ वे तीनों वहाँ खड़े सिगरेट फूँकते हुए राजकिशोर के साथ गुरनाम के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। उस रात की तीखी ठंढी हवाओं में अजीब-सी भयानक नीरवता फैली हुई थी।

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कमल

Kamal8tata@gmail.com

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