आखर चौरासी - 29

आखर चौरासी

उन्तीस

वह लगभग दोपहर का समय रहा होगा जब महादेव अपने रात वाले दोस्त के साथ उनके घर आया।

‘‘अंकल जी, बाज़ार से किसी चीज की आवश्यकता हो तो बता दीजिए। मैं ला दूँगा।’’ महादेव ने बैठते हुए कहा।

उसकी आवाज़ सुन कर अन्दर से आ कर सतनाम और सुरजीत कौर भी उनके पास बैठ गए। डिम्पल अभी भी अपनी नानी की गोद में ही थी।

हरनाम सिंह बोले, ‘‘नहीं बेटा, अभी हमें किसी चीज की जरुरत नहीं है।’’

सुरजीत कौर उन दोनों के लिए पानी ले आई। पानी पीते हुए महादेव ने महसूस किया कि बी’जी का चेहरा कुछ अधिक ही बुझा-बुझा है। वह उन्हें टोके बिना न रहा, ‘‘क्या बात है आंटी, आप बहुत परेशान लग रही हैं ?’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है। तुम लोगों के रहते हमें क्या फिक्र। बस ज़रा गुरनाम का सोच कर चिन्ता हो रही है। हम लोग तो यहाँ जैसे भी हैं, पूरा परिवार एक साथ है। मगर वह वहाँ अकेला है। पता नहीं वह कैसा होगा ?’’ कहते-कहते सुरजीत कौर की आँखें डबडबा गईं।

महादेव ने सुरजीत कौर को सान्त्वना देते हुए कहा, ‘‘आंटी जी, आप अपना मन क्यों खराब कर रही है। गुरनाम हॉस्टल में ठीक से ही होगा। आप उसकी फिक्र मत कीजिए।’’ कहने को तो वह कह गया था, मगर अन्दर ही अन्दर उसे सुरजीत कौर की आशंका निर्मूल भी नहीं लगी।

कुछ सोच कर वह पुनः बोला, ‘‘आज तो स्थिति बहुत हद तक संभल चुकी है। आशा है कल से गाड़ियाँ भी चलने लग जाएँगी। मैं कल ही हॉस्टल जाकर गुरनाम की कुशलता का समाचार ले आऊँगा। वैसे भी मुझे अपने गाँव जाना ही है। मेरे गाँव से शहर में गुरनाम का हॉस्टल दो-तीन किलोमीटर ही दूर है। आप बिल्कुल फिक्र न करें।’’

महादेव की बात सुन कर सुरजीत कौर के साथ-साथ अन्य सब को भी बड़ी राहत महसूस हुई।

मगर ना जाने क्यों गुरनाम का ज़िक्र आने से हरनाम सिंह एकाएक ही खामोश हो गए थे। महादेव अपने दोस्त के साथ वहीं बैठा सतनाम के साथ बातें करता रहा। थोड़ी देर बाद जब उन दोनों ने जाने की इजाजत माँगी तो हरनाम सिंह ने महादेव को टोकते हुए कहा, ‘‘सुनो बेटा, जब तुम हॉस्टल जाओ तो गुरनाम से कहना अपने केश कटवा ले।’’

उनका वह अप्रत्याशित वाक्य वहाँ किसी बम की तरह फटा था। सबने चौंक कर उनकी तरफ देखा। उनके उतरे हुये चेहरे पर निराशा का घना अंधेरा छाया हुआ था। वहाँ उपस्थित हर किसी ने महसूस किया, जैसे उस एक वाक्य को बोलने में हरनाम सिंह की मानों सारी ऊर्जा चुक गई थी। कुछ देर पहले तक सामान्य ढंग से बातें करते सारे लोग ठीक वेसे ही यकायक खामोश हो गये थे, जैसे थोड़ी देर पहले हरनाम सिंह हो गये थे।

सबसे पहले महादेव ने ही मौन भंग किया, ‘‘अंकल, ये आप क्या कह रहे हैं ?’’

‘‘हाँ बेटा, मैं ठीक कह रहा हूँ। उसे बाहर रह कर पढ़ना है। पता नहीं सिक्खों के साथ वहाँ क्या हो जाए ? केश कटवा लेगा तो यह पता तो नहीं चलेगा कि वह सिक्ख है। उसका केश कटवा लेना जरुरी है। उस से कहना मैंने कहा है।’’ बोलते-बोलते हरनाम सिंह का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंसुओं के कई कतरे उनकी आँखों में तैरने लगे।

सुरजीत कौर ने दुपट्टे का पल्लू अपने मुँह में ठूँस लिया, ताकि उनकी रुलाई बाहर न फूट पड़े। जब वह उसमें असफल होने लगी तो उठ कर तेजी से भीतर चली गई। कमरे का माहौल बेहद भारी हो गया था। सभी चाह रहे थे कि गुरनाम के केश नहीं कटवाये जाने चाहिए। मगर उन हालातों में वहाँ मौजूद उस परिवार ने जो दर्द झेला था, उसके बाद कहने-सुनने को उनके पास कुछ भी न बचा था।

महादेव भी बड़ी कठिनाई से ही बोल पाया, ‘‘ठीक है अंकल जी, मैं स्वयं गुरनाम को ले जा कर उसके केश कटवा दूँगा। आप चिन्ता न करें। मैं कल सुबह ही यहाँ से निकलूँगा।’’

अभिवादन कर महादेव और उसका दोस्त दोनों चले गये। हरनाम सिंह को लगा जैसे उनके दिलो-दिमाग पर गहरा अंधेरा छाता जा रहा है। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ कर अपने सीने पर रखे और आँखें बन्द कर वहीं लेट गए।

***

दिन भर गुरनाम अपने कमरे में बन्द अनमना-सा पड़ा रहा था। उसने कई बार अपनी कोर्स की किताबों में मन लगाने का प्रयास किया, परन्तु विफल रहा। वे किताबें, वे पाठ, वे अक्षर जो हमेशा से उसके जाने-पहचाने रहे थे, आज उसे बड़े बेगाने-से लग रहे थे। सारे अक्षर उन पन्नों पर अपनी मौलिक शक्लें खो, अजीब-अजीब भयानक शक्लें बनाए उसे घूरने लगते। उन दो-आयामी पन्नों पर ढेर सारे खुरदरे सवाल तीसरा आयाम बन कर उभर आए थे। उन पन्नों की जानी पहचानी समतल सतहों पर सर्र...सर्र दौड़ने की अभ्यस्त उसकी दृष्टि बार-बार तीसरा आयाम बना आये उन ऊबड़-खाबड़ सवालों से टकराती और लहूलुहान हो छटपटाने लगती।

रोज कमरा बन्द कर एकाग्रता से पढ़ने का आदी गुरनाम, उस दिन कमरा बन्द होने और किसी के भी अन्दर न आ पाने की निश्चिंतता के बावजूद पढ़ाई में तन्मय नहीं हो पा रहा था। उसका ध्यान बार-बार भटक जाता। किताब के पन्ने टी.वी. स्क्रीन बन जाते, जिस पर कभी उस पर होटल से गुरनाम का पीछा करते कल वाले लड़के उभर आते, तो कभी जगदीश द्वारा बताए गए सिक्खों के लहूलुहान शरीर ....! फिर गुरनाम किताब छोड़ कर उठ जाता। बन्द कमरे में देर तक इस कोने से उस कोने तक बेचैन हो डोलता रहता। वह जब-जब किताब खोल कर पढ़ना चाहता उसके साथ उसी घटनाक्रम की पुनरावृत्ति होती ....।

जब भी उसके दरवाजे के पास से गुजरते लड़कों की आवाज़ें उभरतीं, गुरनाम जल्दी से कान सटा कर उन आवाज़ों को सुनने की कोशिश करता। कहीं कोई तो बात उसके काम की निकले ! कमरे के अन्दर का वक्त उसके लिए नदी में पड़ा पत्थर बन ठहर गया था। लेकिन बाहर वही वक्त नदी के पानी–सा अपनी पूरी गति से दौड़ता जा रहा था।

आकाश पर चमकता सूर्य सारा दिन अपनी रोशनी बिखेरने के बाद, शेष रोशनी और थकान के साथ विश्राम करने चला गया। गहराती शाम के साथ सर्दी भी बढ़ने लगी। तेज बहती ठंढी हवाएँ बिच्छू की तरह शरीर के नंगे हिस्सों पर डंक मारने लगी थीं। हॉस्टल के सभी कमरों के दरवाजे बाहर से बंद थे। लगभग सभी लड़के रात का खाना खाने मेस में जा चुके थे। मेन हॉस्टल के ‘किंग्स ब्लॉक’ का कॉरीडोर बिल्कुल सुनसान पड़ा था।

रात के उस सन्नाटे में जगदीश दबे पाँव बढ़ा जा रहा था। ताला खोल कर उसने गुरनाम के दरवाजे पर विशेष दस्तक दी और दीवार से चिपक कर खड़ा हो गया।

दस्तक पहचान कर गुरनाम दरवाजे के पास आ गया। उसने धीमी आवाज़ में पूछा, ‘‘कौन है ?’’

‘‘लोकल गार्जियन !’’ बाहर से जगदीश का फुसफुसाता स्वर उभरा।

पूरी तरह निश्चिंत होकर गुरनाम ने जल्दी से दरवाजा खोला और एक तरफ हो गया। जगदीश ने भीतर आ कर दरवाजा बन्द किया। अपने साथ लाए खाने के पैकेट और ताला-चाबी को उसने टेबल पर रख दिया।

खाने का पैकेट तो ठीक था, लेकिन टेबल पर पड़े ताला-चाबी को देख कर उसने सवालिया नज़रों से जगदीश की ओर देखा। उन दोनों के प्लान के अनुसार तो ताला दरवाजे पर लगाने के बाद ही जगदीश को भीतर आना चाहिए था।

जगदीश भी गुरनाम की सवालिया नज़रों को पढ़ चुका था। उसने मुस्कराते हुए गुरनाम की जिज्ञासा शान्त की, ‘‘हालत पर काबू करने को सेना बुला ली गई है। कल ही पूरे शहर में कर्फ़्यू लग गया था। सेना ने स्थिति पूरी तरह संभाल ली है। आज दिन भर शहर शान्त रहा था। कुल मिला कर कहा जाए तो अब चिन्ता की कोई बात नहीं है। सबसे बड़ी बात कि हॉस्टल सुपरिन्टेन्डेन्ट सिन्हा सर भी लौट आए हैं। आते ही उन्होंने तुम्हारे बारे में पूछा था। इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि अब तुम्हें जुलू पार्क से वापस हॉस्टल लौट आना चाहिए।’’

उसकी बातों ने गुरनाम को बड़ा सुकून पहुंचाया। वह तो अपने ही कमरे में कैदी बन कर रह गया था। कैद से मुक्ति का समय आ गया है जान कर उसे बड़ा हल्कापन महसूस हुआ। कुछ देर बातों के बाद जगदीश उठते हुए बोला, ‘‘अच्छा अब मैं चलता हूँ। बड़े ज़ोरों की नींद आ रही है, आज जा कर मैंने खूब सोना है।’’

उसके जाने के बाद गुरनाम ने दरवाजा बन्द किया और बिस्तर पर आ लेटा। अब दरवाजे पर बाहर से ताला नहीं था। अब वह सुरक्षित है ....स्वतंत्र है। स्वयं के बारे में आये निश्चिंतता के ख्याल के साथ ही उसे अपने घर वालों की याद आने लगी। कैसे होंगे, सब लोग घर पर....? बड़ी देर तक वह चिन्तामग्न बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। फिर धीरे-धीरे उसकी सोच शान्त होने लगी। अब तो सब कुछ सामान्य हो चुका है ....सब कुछ सामान्य....।

उस रात जगदीश ही नहीं गुरनाम को भी अच्छी नींद आई।

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कमल

Kamal8tata@gmail.com

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