मुख़बिर - 24

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(24)

तोमर

तब रात के तीन बजे होंगे जब रघुवंशी की धीमी सी आवाज सुनी मैने । शायद सिन्हा ने उन दिनों की कोई बात छेड़ दी थी सो रघुवंशी धीरे धीरे कुछ सुना रहा था-‘‘ उन दिनों मै उसी थाने का इंचार्ज था और वहीं तोमर डकैती उन्मूलन टीम का इंचार्ज था । उसका डेरा उन दिनों मेरे थाने में ही था । मुझे तो पूरी घटना पता है । हुआ ये कि ‘‘…… इसके साथ रघुवंशी ने उन दिनों का वाकया सुनाना शुरू कर दिया।

तोमर जिला मुकाम से लौटा तो बेहद परेशान था उस दिन ।

डकैती उन्मूलन की बैठक में उस दिन उसको कुछ ज्यादा ही डांट पड़ गई थी । इलाके में डाकुओं की हरकतें हद से ज्यादा बढ़ गईं थीं उन दिनों, और जनता आये दिन आन्दोलन करने लगी थी, सो डकैती-उन्मूलन यानी कि एडी की व्यवस्था देखने आई0 जी 0साहब खुद उस जिले में आये थे । बैठक में पेश किये गये रिकॉर्ड में उनने देखा कि इंसपेक्टर तोमर पिछले छै महीने में डकैत तो दूर रहे, डकैतों को मदद करने वाले किसी आदमी तक को नहीं पकड़ पाया है ! तो उनने तोमर को लम्बी डांट पिला दी । उसे डाकुओं से मिला हुआ गद्दार अफसर कहा, यहां तक कि उसे डरपोक और हिजड़ा तक कहा गया ।

पुलिस की नौकरी में इस तरह की घटनायें अकेले में तो चाहे जब घटती रहती थीं लेकिन भरी सभा में ऐसी बेइज्जती असह्य थी । तोमर बड़ा खुद्दार इंसपेक्टर था, उसे अपना अपमान बहुत बुरा लगा । वह थाने में लौटा तो पूरी रात तनावग्रस्त रहा ।

सुबह मैंने उसके तनाव का कारण पूछा तो वह फट पड़ा-‘‘ यार, ये नहीं समझ पाता मैं कि सारा पुलिस विभाग हम इंसपेक्टरों पर ही क्यों चड्डी गांठता है ? जो देखो हमारे ही सिर पर सवार होने को फिरता है ! इलाके की शांति व्यवस्था बनाए रखना अकेले हम लोगों की जवाबदारी है क्या ? क्या इन बड़े अफसरों का का कोई उत्तरदायित्व नही है ! अब अगर पूरी कोशिश के बाद भी मुझे डाकू नही मिले तो मै क्या कर डालूं !‘‘

मैंने पूछा तो उसने डकैती उन्मूलन की बैठक का सारा किस्सा सुनाया ।

मैंने उसे समझाया कि अफसरों की बात का क्या बुरा मानना, पुलिस की नौकरी तो है ही चाकरी । कहावत है कि ‘ उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान ‘तो वह नहीं माना । बात भीतर तक बैठ गई थी उसके ।

अगले दिन से वह अकेला गश्त पर निकलने लगा । दिन भर इलाके में घूमता मुख़बिरों से बतियाता और नये मुख़बिर तलाश करने मंे भिढ़ा रहता । मैं यह समझने में असमर्थ था कि क्या करने जा रहा है वो ! सात दिन में उसने वो सारा बजट खर्च कर डाला था जो पिछले छै महीने से मुखबिरों पर खर्च करने के लिये आया था और अब तक जिसमें से एक पाई भी खर्च नहीं की थी तोमर ने ।

फिर वो खतरनाक रात आई, जिस दिन वह मुझसे यह कह कर गया था कि जब भी मैसेज करूं फोर्स लेकर सीधे बीहड़ में आ जाना । मैं अचंभे में था कि अकेला किस घपले में जान फंसा रहा है यह ? मेरे पूछने पर मुस्करा के बोला था, खतरे की कोई बात नहीं, हमेशा की तरह मुखबिर ही पुलिस का काम कर देगा । मुझे तो नशे में गाफिल निहत्था डाकू मिल जायेगा, जिसे अपने कब्जे में लेते ही मै तुमको खबर कर दूंगा । अपने को तो बस उसे जिन्दा गिरफ्तार भर करना है ।

मैंने सिपाहियों को तैयार रहने का हुकुम दिया और तोमर के संदेश का इंतजार करने लगा ।

रात एक बजे तोमर के वाकी-टॉकी से संदेश आया कि मुझे तुरंत ही शेरसिंह के पुरा के पास पहुंचना है । मैंने फटाफट जीप तैयार करवाई और सिपाहियों को लाद के वहां के लिए चल पड़ा ।

घाटी की मेनरोड पर अपनी मोटर साइकिल लिये तोमर खड़ा था । हम लोग पहुंचे तो वह बड़ा खुश दिखा मुझे । हम लोग जीप वहीं छोड़कर भीतर डांग में उतर गये । एक किलोमीटर के करीब चले होंगे कि तोमर ने इशारा किया । एक पेड़ के पास उल्टा पड़ा एक आदमी चांदनी रात में दूर से ही दिखाई दे रहा था । हम लोग रूके । तोमर के चेहरे पर इस वक्त दु‘ख झलक रहा था-‘‘यार, एक गलती हो गयी । डाकू शराब में मिले जहर की वजह से पहले ही मर गया !‘‘

‘‘ अब ? ‘‘ मैं उससे अगली स्ट्रेटजी जानना चाहता था ।।

‘‘ चलो, मुठभेड़ बता देते हैं ।‘‘ कहते हुये उसके चेहरे पर दर्द स्पष्ट दिखाई दे रहा था । फिर हमने बैठ कर कहानी की सिचुयेसन बनाई और उस लाश को पेड़ से टिकाकर गोलीबारी शुरू कर दी ।

जैसा कि मुखबिर ने कहा था हमने सबको यही बताया कि मारा गया आदमी डाकू श्यामबाबू घोसी है ।

श्यामबाबू घोसी ! चम्बल का दुर्दान्त डाकू !! जिसने सुना वह चकित रह गया ।

उन दिनों चम्बल में सिर्फ श्यामबाबू का ही नाम गूंज रहा था सो हरेक के मुंह से इतनी बड़ी उपलब्धि के लिए एक ही शब्द निकला-वाह !

अगले कई दिन तोमर के नाम थे । जाने कहां-कहां की टीवी चेनल और अखबारों के संवाददाता उससे इंटरव्यू लेने आते रहे थे । तमाम अफसर और नेता फोन करके सीधे बधाई दे रहे थे उसे । यह देख देख कर हम मन ही मन हंसते रहते थे ।

बाद में श्यामबाबू गिरोह को फिरौती देकर किसन और बिशन नाम के दो लड़के लौटे तो मीडिया को पता लगा था कि जिस आदमी को हम सब श्यामबाबू बता रहे थे वह तो कोई दूसरा आदमी था, असली श्यामबाबू तो अब भी अपने गिरोह के साथ बीहड़ में स्वस्थ और सुरक्षित घूम रहा है । तोमर को पता लगा तो वह सीधा उस मुखबिर को खोजने निकल पड़ा जिसने हमे श्यामबाबू की लाश सोंपी थी, ताज्जुब कि वह आदमी गांव छोड़कर जाने कहां चला गया था । वह क्या चला गया, तोमर से उसकी किस्मत रूठ गयी थी । उसकी तरक्की छिनी, बदनामी हुई और झूठ तथा मक्कारी के लिये उसका नाम पुलिस में एक मुहाविरा बन कर रह गया था । बेचारा त्यागपत्र देकर नौकरी छोड़ गया ।

सिन्हा चौंका-‘‘ तो क्या उस आदमी को तोमर साहब ने नही, मुखबिर ने मारा था ?‘‘

‘‘ हां !‘‘ मुस्कराते रघुवंशी साहब कह रहे थे और सिन्हा आंखे फाड़ें उन्हे बिस्मय से देर तक ताकता रह गया था ।

मुखबिर की कारगुजारीयों में एक यह काम भी शामिल है, यह तथ्य मुझे चौका भी रहा था और मैं सोने का बहाना किये उन दोनों की आगे की बात सुनना चाहता था, लेकिन बाद में उन दोनों में आपस में कोई बात नही हुई ।

शायद सो गये थे वे दोनों ।

फिर तो मुझे भी पूरी रात नींद नहीं आई, आंखों ही आंखों में रात कटी मेरी ।

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