badalte pratiman in Hindi Short Stories by कल्पना मनोरमा books and stories PDF | बदलते प्रतिमान

Featured Books
  • Bayaan - Part 1

    March 2025 कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसी चीज़ें दे देती है, जो हम...

  • ज़ख्मों की शादी - 22

    पर कहानी यहीं शांत नहीं हुई। अतीत कभी-कभी दरवाज़ा खटखटाकर नह...

  • जुआरी का पतन

    ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या- “जाया तप्यते कितवस्य हीना” भ...

  • भानगढ़: रात 11:47

    मैं आज तक नहीं मानता था कि जगहें याद रखती हैं। पत्थर सिर्फ प...

  • गाठें

         उमा को आज अचानक ही अनिल मिल गया। ये उसके साथ कालेज में...

Categories
Share

बदलते प्रतिमान


सुबह जागने के लिए और रात सोने के लिए न बनायी जाती, तो कितना अच्छा होता न किसी को जगाने के लिए आवाज़ देनी पड़ती, और न ही सोने के लिए कहना और मनाना पड़ता |

कामना पौधों को पानी देती और खिड़की से झाँक-झाँक कर मन ही मन बुदबुदाती जा रही थी |
“जी तो ऐसा करता है कि इसी हज़ारा के पानी से उसका मुँह भी छिड़क दूँ जाकर |”

वह बेटे को आवाज देते-देते उसके पलंग तक जा पहुँची |
“अरे रे रे रे! ये क्या कर रही हैं आप ?” चादर मुँह पर खींचते हुए बेटे ने माँ से कहा |

“अरे रे रे रे, रे क्या ? अब तो जाग जा | सूरज खिडकियों से उचक-उचक कान खींचने लगा है |”
कहते हुए कामना ने ज़ोर से चादर खींच, सच में हजारे का मुँह, उसकी ओर घुमा दिया |

“छोड़ दीजिये माँ ! मुझे पता है, कब मुझे उठना है और कब सोना । आप जाइए और अपने गुलाबों को ही नहलाइए |” मुँह को चादर से पोंछते हुए उसने झुंझलाकर कहा |
“ ले, तू तो बुरा मान गया। सच्ची में तो मेरा गुलाब तू ही है, इसीलिए तो कहती हूँ , जब तू समय पर अपने काम करेगा तब ही दूर-दूर तक तेरी खुशबू फैलेगी |

पता नहीं मेरी इस मंशा को तू डांट क्यों समझ लेता है |”
“माता जी डांट को डांट नहीं समझूँ तो क्या ही समझूँ ? बचपन से देखता आ रहा हूँ, कभी पढ़ाई के लिए तो कभी जीवन-मूल्य सिखाने के लिए आपने बस मुझे ही अपने निशाने पर रखा है |”

“अब बेटा तू है तो भला भी तेरा ही तो चाहूँगी । तेरी दादी माँ के बेटे से तो कुछ करवाने से रही | और उम्मीद भी कोई चीज़ होती है न बेटा ! यदि ऐसा न होता तो मैं कभी इस पचड़े में न पड़ती |”

कामना ने खुद को संयत करते हुए कहा था ।

“ ये किसने कहा आपसे कि बच्चों को डाँटने-मारने ,चीखने -चिल्लाने से उनकी सोई हुई किस्मत जाग उठती है |”

“तूने अभी देखा ही क्या है | अब तो बच्चे बहुत मनमानी करने लगे हैं | मेरे बचपन में तो हर बच्चा बिना कुसूर के अपने माँ-बाप से डांट-मार खाता और खुश-खुश रहा करता था |”

“इस बात को मैं सही नहीं मानता, और आपकी इन्हीं सब बातों के कारण, आपके पास बैठने का भी मेरा जी नहीं करता|”

“तू कुछ भी कह, हमारे यहाँ की तो यही रीति है | यहाँ इसी प्रकार से बच्चों का लालन-पालन किया जाता है और जो माँ-बाप अपना तन-मन -धन लुटा कर बच्चे का जीवन सँवारते हैं उन्हें क्या डाँटने और मारने का भी हक़ नहीं है ।"
कामना ने अपनी भौंहें खींचते हुए बेटे की तरफ झुकते हुए कहा ।

“सही कहा माँ, इसीलिए तो सबसे ज्यादा भीड़ हमारे यहाँ के ही बृद्धा-आश्रमों में बढ़ती जा रही है |”
कमरे का तापमान अचानक इतना बढ़ गया कि कामना को कानों में अब सांय-सांय के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था |



कल्पना मनोरमा
05.05.2020