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देह की दहलीज पर - 9

साझा उपन्यास

देह की दहलीज पर

संपादक कविता वर्मा

लेखिकाएँ

कविता वर्मा

वंदना वाजपेयी

रीता गुप्ता

वंदना गुप्ता

मानसी वर्मा

कथाकड़ी 9

अब तक आपने पढ़ा :-मुकुल की उपेक्षा से कामिनी समझ नहीं पा रही थी कि वह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है ? उसने अपनी दोस्त नीलम से इसका जिक्र किया। कामिनी की परेशानी नीलम को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर उसके साथ क्या हो रहा है। वहीँ अरोरा अंकल आंटी हैं जो इस उम्र में भी एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं। रविवार के दिन राकेश सुबह से मूड में था और नीलम उससे बचने की कोशिश में। एक सितार के दो तार अलग अलग सुर में कब तक बंध सकते हैं। मुकुल अपनी अक्षमता पर खुद चिंतित है वह समझ नहीं पा रहा है कि उसके साथ ऐसा क्या हो रहा है ? कामिनी की सोसाइटी में रहने वाला सुयोग अपनी पत्नी प्रिया से दूर रहता है। ऑफिस से घर आनेके बाद अकेलापन उसे भर देता है। उसी सोसाइटी में रहने वाली शालिनी अपने प्रेमी अभय की मौत के बाद अकेले रहती है। वह अपने आप को पार्टी म्यूजिक से बहलाती है लेकिन अकेलापन उसे भी खाता है। वह अकेले उससे जूझती है।

अब आगे

वो एक लंबा थका देने वाला दिन रहा था, कामिनी अपना हैंड बैग उठा कार की तरफ जा ही रही थी कि उसकी नज़र सामने चल रहीं लड़कियों की झुंड में एक लड़की के हेयर स्टाइल पर अटक गई। गरदन से ऊँचा उठा कर बने उसके जूड़े के चलते वह सब से अलग दिख रही थी, कुछ लटें मानो आवारागर्दी करती हुईं हवाओं में बल खा रही थीं तो बाकी कस कर जूड़े में कैद। जूड़े को उसने ध्यान से देखा, उसमें तीन रोल्स थे और एक पतली सी चोटी जूड़े की जड़ो को घेर अलग सी खूबसूरती दे रही थी।

कार के दरवाजे के पास खड़ी कामिनी जाती हुई लड़की को तब तक देखती रही जब तक वह नजरो से ओझल न हो गई। आजकल बाल कौन बाँध कर रखता है भला, वह भी जूड़े में। फिर मन में आया लीक से हट कर थी वह तभी तो आकर्षित किया। अब कहीं जाना होगा तो ऐसा ही हेयर स्टाइल ट्राई करेगी। मन ही मन वह सोचने लगी कि कैसे वह इसे अपने लंबे बालों से बनाएगी। पर आज कल कहीं जाना कहाँ हो रहा जो इतना बन संवर कर जाए। कितने दिन हो गए होगें जो वह और मुकुल कहीं संग संग गए होगें। अकेले कहीं डिनर या काफ़ी पीने भी गए एक अरसा हो चला। अब ग्रोसरी शापिंग या डाक्टर के पास जाना कोई सजधज कर जाने की जगह तो नहीं ही है। पहले जहाँ वे दोनों मौके चुराने की फिराक में रहते थे वहीं आज नजरे चुराने लगे हैं। दिल में फिर एक हूक सी उठ गयी, बीती कई असंतृप्त रातें फन काढ़ तैयार हो गई उसके मानस संग द्वंद्व करने। काम की अधिकता कामिनी को कभी नहीं थकाती थी पर ये अतृप्त असंतुष्ट भावनाएं उसको मानसिक रूप से परास्त कर रही थी। थकी हारी कामिनी किसी तरह पाँव घसीटते हुए कार तक पहुँच बैठ गई।

कार स्टार्ट करते ही फोन बज उठा,

“अरे यार कहाँ हो, दोपहर से दो बार फोन कर चुका हूँ”, मुकुल का चिंतित स्वर कार के स्पीकर पर गूँज उठा।

“ओह, मैंने सुना नहीं था वरना फोन क्यों नहीं लेती” कामिनी ने बुझे स्वर में कहा, ये नहीं कहा कि जानबूझ कर इग्नोर कर रही थी ताकि उपेक्षा का दर्द वह भी समझे। “अभी तो कालेज़ से बस निकल ही रही हूँ”

“सुनो आज रात एक एनवर्सरी पार्टी है, हमें चलना है” मुकुल का पुलकित होता स्वर और प्रस्ताव दोनों ही आकर्षक था। नैराश्य से घिरे शांत नि:छल सुप्तप्राय मन पर एक तरंगित करता कंकड़ आ गिरा।

“किसकी एनवर्सरी, कहाँ है पार्टी, पहले क्यों नहीं कहा? अब आज शाम ही है और अब बता रहे हो?

कामिनी ने थोड़ा ठुनकते हुए कहा। मूड पर फ्रेशनर का छिड़काव हो गया था।

“अरे यार ! तुम ड्राइविंग पर फोकस करो। ऐसा न हो कि मुझसे बात करने में तुम कार कहीं ठोक दो। तुम्हें मेरे कालेज़ का दोस्त मनोज याद है, एलबम में उसकी कई तस्वीरें हैं। उसके बारात में भी मैं गया था। वह कुछ काम से यहाँ आया है और होटल रेडिसन ब्लू में ठहरा हुआ है अपनी पत्नी संग। वो तो कालेज़ के वाट्सेप ग्रुप में आज चैटिंग के दौरान पता चला कि वह शहर में है और संयोग से आज उसकी सिल्वर जुबली है तो मैंने, राजीव, संजीव, उमाशंकर और बाकी यहाँ वाली हमारी मंडली ने वहीं रेडिसन ब्लू में एक सरप्राइज पार्टी का आयोजन किया है। एक साथ पहुँच कर हम मनोज को आश्चर्य चकित कर देगें” मुकुल ने बताया तो कामिनी खुश हो गई कि एकरसता तो टूटेगी।

“देखो जान, अब हम ही होस्ट हैं तो देर करना ठीक नहीं होगा, सो प्लीज बच्चों और मम्मी का इंतजाम कर तुम जल्दी से तैयार हो जाना ताकि आठ बजे तक हम पहुँच जाए” मुकुल की इस बात पर कामिनी ने पूछा,

“पर तुम भी तो जल्दी पहुँचो, हर दिन की तरह कहीं……”

“वेट बेबी वेट, तुम्हारे लिए भी एक सरप्राइज़ होगा आज” इतना कह मुकुल ने तो फोन काट दिया।

मुकुल के ऐसे कहने पर कामिनी वाकई सोच में पड़ गई कि जाने क्या लाने वाला है मुकुल। उसकी थकान गायब हो चुकी थी और कुछ दिन महीनों से चली आ रही खटास नेपथ्य में गुम हो गई । वह घर पहुँच पार्किंग में कार लगा पार्टी और मुकुल की सरप्राइज़ के बारे सोचती गुनती घर पहुँच गई। चार सवा चार ही बजे थे, अभी वक्त है वह आराम से कपड़े इत्यादि तय कर लेगी। इस से पहले बच्चों के खाने के लिए कुक को बता दे। सासू माँ तो रात को दूध रोटी ही खाती हैं, क्यों न बच्चों की भी पिज्जा पार्टी कर दिया जाए। माँ की ममता होती ही ऐसी है।

“चलो फिर क्या पहनना है इस पर विचार किया जाए”

कामिनी अपनी चाय ले कर अपने रूम में ही चली गई और राकिंग चेयर पर झूलते हुए सोचने लगी। मन ही मन पार्टी में सबसे अलग दिखने की पहेली हल होते ही कामिनी ने एक छोटा पावर नैप भी ले लिया बैठे बैठे। अब तरोताजा हो वह अपनी अलमारी टटोल रही थी। बाकी लोग तो आज के फैशन के हिसाब गाउन, प्लाजो, लांग कुर्ती या शरारा में ही आएगीं। इसी चक्कर में उसने अपना वारड्रोब उलट पलट दिया।

वह कमरे में तैयार हो रही थी कि बाहर ड्राइंगरूम से कुछ शोर सी आवाजें आने लगी। बच्चे भी कुछ कह रहे थे और सासू माँ की भी खिलखिलाने की आवाजें आ रही थी। लगता है मुकुल आ चुका है ….

पर कामिनी अंदाज नहीं लगा पा रही थी कि बाहर क्या चल रहा है। निकलने वाली स्थिति में भी नहीं थी, ब्लाउज़ और पेटीकोट में और ब्लाउज भी कुछ ऐसा वैसा नहीं। उसने खोज कर एक चुस्त सा नारंगी डीप नेक का टी शर्ट पहना था जो लगभग बैकलेस ही था, गले के पास एक छोटे कालर का घेरा और कमर के पास एक लम्बे बेल्ट की गाँठ। अभी वह बिस्तर पर रखी हुई प्योर शिफौन की काली झिलमिल बार्डर वाली साड़ी उठाने ही वाली थी कि कमरे में मुकुल आ गया।

एक क्षण को दोनों ही एक दूसरे को देखते रह गये। महीनों बाद आया था वो पल जब दोनों ही एक दूसरे को मंत्र मुग्ध हो निहार रहे थे । कामिनी खुशी के अतिरेक में चिल्ला उठी, “वाह जनाब आज तो आपने गजब कर दिया, लग रहा है दस साल पहले के मुकुल को देख रही हूँ”बोलते हुए कामिनी ने झट से एक चुम्बन जड़ दिया मुकुल के गाल पर।

“मुझे पता था कि तुम खुश होगी इसलिए लौटते वक्त मैं पार्लर होते आया और बालों को कलर करवा सेट भी करा लिया”

मुकुल ने कामिनी की आँखों में आँखें डाल रुमानियत से कहते हुए अपने सद्य रंगें केशो में स्टाइल से उंगलियाँ फिराते हुए कहा। कामिनी को सहसा विश्वास नहीं हो रहा था कि अपने व्यक्तित्व के प्रति बिलकुल बेजार रहने वाला मुकुल उसकी बात मान अपने सर के अधपके बालों को यूँ संवार लेगा। उसका रोम रोम इस छोटी सी बात पर प्रसन्न हो रहा था।

“पर यार, तुमने तो आज गज़ब का हेयर स्टाइल बनाया है, बिलकुल रेयर। क्या ये नकली बाल हैं?”

मुकुल ने कामिनी के जूड़े को उंगली से हल्का दबाते हुए आश्चर्य से पूछा। फिर उसके कमर को अपने बाहों के घेरे में लेते हुए उसकी सुराही सी गरदन पर जिह्वा आस्वादन का सुख लेने लगा। उसकी साँसें बिलकुल कामिनी की उठती गिरती धड़कनों के साथ मानों लयबद्ध हो बेकाबू होने को मचल गई। हथेलियाँ कमर से नीचे सरकने को तत्पर होने लगी। कामिनी जाने कब से सूखा रेगिस्तान बन प्रेम की इन फुहारों के लिए प्रतिक्षारत थी। उसका अंग अंग मानों धरती बन उन प्रथम रस फुहारों से सुवासित होने लगा, वह सोंधापन नथुनों में एक विचित्र सी कामुक अनुभूति भरने लगी कि तभी भिड़के दरवाजे का भान हो आया। मुकुल को परे धकेलते हुए उसने कहा,

“अब बस कुछ रात के लिए भी रखो न” सहसा वो पुराने दिन याद आ गए जब मुकुल शाम को आता था और वह इसी तरह बेमन से धकेलती उसे हटाती थी। मानिनी का मान और मन रखने प्रेमातुर भँवरा कुछ घंटो के लिए उड़ जाता क्योंकि रात तो इन्हीं कमल की पंखुड़ियों में बंद हो रसास्वादन में गुजारनी है।

“चलो कपड़े बदलो और मुझे भी साड़ी पहनने दो। अब यहाँ फिर से मेकअप टचअप करना होगा”, कामिनी ने गरदन पर अपने हाथ फिराते हुए कहा।

“आज सारी सुन्दरता तुम्हारी गर्दन में आ बसी है, न ऊपर न नीचे सारा ध्यान वही खींच रही है”,

शर्ट बदलते हुए भी मुकुल कामिनी की गरदन के ही इर्दगिर्द क्षुधातुर नजरें टिकाए हुए रहा।

सहसा कामिनी को अपने लकी चार्म की याद हो आई, शाम को लौटते वक्त तो उसने अरोरा आँटी अँकल को तो देखा ही नहीं। मन किया अभी जा कर देख ले पर घड़ी के काँटे साढ़े सात दिखातीं होड़ लगा रहीं थी।

“अच्छा तैयार हो कर बालकनी से उन्हें झांकती हुई जाऊँगी” ऐसा सोचते वह कबर्ड से ब्लाउज से मैचिंग करता नारंगी रंग के कलच्र पर्स को निकालने लगी।

इस बीच खुद को आईने में देख आत्ममुग्ध हो मुकुल की तरफ देखा, आज मुकुल भी मानों पूरे मूड में था। उसने कामिनी की साड़ी से मैचिंग काली रंग की ही शर्ट पहना था और पाकेट में आरेंज रंग का रुमाल झांकते हुए उसके साथ तारतम्य बैठाने को आतुर सा। कामिनी को सहसा मन किया कि इस बहती गंगा में हाथ धो ही लिया जाए, भला मुकुल का ऐसा मूड फिर बने न बने।

“क्या मैडम खुद को ही निहारती रहोगी कि दूसरों को भी नैनसुख दोगी?”,

मुकुल ने उसकी ठोढ़ी पकड़ कर कहा और लगभग खींचते हुए पार्किंग की तरफ चल पड़ा। कार में उसने उसने अपनी पसंद का एक पुराना रोमांटिक गाना चला दिया। कुल मिला कर एक बड़ी रुमानी सी शाम मुद्दतों के बाद नसीब हुई थी, सहसा कामिनी को अरोरा दंपत्ति की याद आ गई जिन्हें तो देखा ही नहीं। एक संशय का बीज मन में निर्रथक अंकुरित होने को कुलबुलाने लगा।

रेडिसन ब्लू पहुँच कर सारी तैयारियों का जायजा लेने के बाद मुकुल और सारे दोस्तों ने मनोज के कमरे में जा कर उन्हें अचंभित कर दिया। उन्हें तैयार हो कर सेलेब्रेशन हाल में आने कह कर सारे मित्र पत्नियों संग वहाँ पहुँच कर सजावट और अन्य तैयारी देखने लगे। कामिनी ने नजर घुमा कर सभी महिलाओं को देखा तो उसके चेहरे पर एक स्मित सी हंसी तिर गई, सब वाकई गाउन या लांग कुर्ते में ही थी। कामिनी महसूस कर रही थी कई जोड़ी आँखें अपनी पीठ पर, उसे इस बात का पूरा एहसास था कि वह बहुत सारी निगाहों की जाल में है, उसने गरदन पर अठखेलियाँ करते लटों को एक स्टाइल से झटका और अपने जूड़े को एक हाथ से छूते हुए उसके सही होने की आश्वस्ती से मन ही मन खुश हुई। तभी मनोज और उसकी पत्नी ने हाल में प्रवेश किया, दोनों की ही चर्बी शरीर में गलत जगहों पर थी, पर राम मिलाई जोड़ी थी दोनों बिलकुल एक जैसे मानों भाई बहन हों।

केक कटने के बाद लाइट मध्यम हो चुकी थी, स्नैक्स और ड्रिंक्स के दौर चल रहें थें। मुकुल भी हाथ में गिलास लिए दोस्तों के बीच बैठ गया। कामिनी डांस फ्लोर पर थिरकते जोड़ों को देखने लगी। पार्श्व में बजते हलके संगीत की लय में कामिनी के मन में मुकुल के साथ के विचार थिरकने लगे। उसे महसूस हुआ मानों वह डांस फ्लोर पर मुकुल की बाँहों में है और मुकुल कह रहा है

“कामिनी आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो, मेरे सारे दोस्त तुम्हारी गरिमामयी व्यक्तित्व की मुझसे प्रशंसा कर चुके हैं। जलते हैं सारे”

“कामिनी इस जूड़े के चलते तुम्हारी पीठ की सुंदरता बढ़ गई है”

मुकुल लगातार उसकी प्रशंसा कर रहा था। पार्टी चलती रही……

कामिनी का मन भींगता रहा उस सुख से, जाने कितने दिनों के बाद ऐसी शाम मिली थी जब उसका पति उसे इन नजरों से देख रहा था। सिर्फ देख ही नहीं रहा था बल्कि सबके सामने अपने प्रेम को उन्मुक्त भाव से प्रकट भी कर रहा था। कभी गालों पर तो कभी गर्दन पर, उसके चुम्बन मानों रुक ही नहीं रहे थे।

“कामिनी तुमने जिस स्टाइल से साड़ी पहनी है वह तुम्हारे परफेक्ट फिगर को उभार दे रही है”,

कहते मुकुल ने उसके नितंबो को सहला, बिलकुल कस कर सटा लिया। कामिनी ने सत्तर के दशक की हीरोइनों की तरह साड़ी लपेटा था।

“अच्छा तो जनाब इतना ध्यान देते हैं और मैं समझती थी कि मेरे तरफ नज़र भर भी नहीं देखते हैं“, कामिनी बुदबुदाई। म्यूजिक बंद हो चुका था सभी जोड़े थम गए सब उन्हें घेर कर तालियाँ बजा रहें थे। तालियों की आवाज़ ने कामिनी को ख्यालों की दुनिया से बाहर निकाला मुकुल वहाँ नहीं था वह अकेली ही बैठी थी।

म्यूजिक दोबारा शुरू हुआ तो मुकुल कामिनी को साथ लेकर डांस फ्लोर पर चल दिया। वह उसकी कमर में हाथ ड।ल उसकी ताल से ताल मिलाने की कोशिश कर रहा था लेकिन थोड़ी देर पहले कामिनी जिस रूमानियत में थी वह वहाँ नहीं थी फिर भी उसने महसूस किया कि सभी की निगाहें उन पर लगी थीं।

डांस के बाद मुकुल उसके लिए खाने की प्लेट लगा लाया “यार तुम दोनों की बाडिंग तो गजब है, हम सब के भले पच्चीस छब्बीस वर्ष हो गये शादी को पर तुम दोनों तो बिलकुल कल के ब्याहे लगते हो।

“यार, कुछ टिप्स हमें भी दो इस उम्र में ऐसी एनर्जी और आकर्षण का”……….

मुकुल के सभी कालेज फ्रेंड उससे ऐसी ही बातें कह रहे थे।

“कामिनी तुम खुशकिस्मत हो जो तुम्हें मुकुल जैसा पति मिला”,

मनोज की पत्नी ने कहा तो कामिनी मुस्कुरा कर रह गई। पार्टी खतम हुई सबने मनोज और उसकी पत्नी को एक बार फिर शुभकामनाएँ दी और लौटने लगे। ऱास्ते में कार चलाते मुकुल के गले में बाहें डाल कामिनी ने जोर से, चुम्बन दे दिया। मुकुल थका थका लग रहा था, हूँ हाँ में सिर्फ जवाब देते देख कामिनी ने उसे कहा भी,

“आज इतना नाचने की क्या जरूरत थी, थक गए न?”

फिर गुनगुनाने लगी क्योंकि लौटते में मुकुल म्यूजिक सिस्टम औन करना भूल गया था।

“साकिया, आज मुझे नींद नहीं आएगी

सुना है तेरी महफिल में रत जगा है

आँखों आँखों में यूँ रात गुजर जाएगी

सुना है तेरी महफिल में रत जगा है”

हल्के मन से कामिनी गुनगुनाती रही जब तक कि घर न आ गया। डुप्लिकेट चाभी से दरवाजा खोल दोनो दबें पांव घर में घुसे। गृह शांति संकेत दे रही थी कि सब सो चुके हैं। बेडरूम में जाते हुए कामिनी ने बंद टीवी को राहत भरी नजरों से देखा। अब जूड़ा खोलना एक दुष्कर कार्य लग रहा था, साड़ी ब्लाउज खोल कर फेंक वह नाइटी पहन जूड़े से पिन निकालते हुए मुकुल से पार्टी की ही बातें करती जा रही थी। जूड़ा खोल मेकअप उतार जब तक वह बिस्तर पर पहुँची मुकुल खर्राटे भर रहा था। कामिनी ने उसे थोड़ा हिलाया जगाया पर वह सचमुच सो चुका था शायद। वैसे भी सोए हुए को ही जगाया जा सकता है, जागे को नहीं।

उसकी आँखों से आँसू निकल गये, शाम से क्या चल रहा था? आज की रात फिर वही उपेक्षा वही मनहूसियत लिए खड़ी हो गई थी पर आज दुख ज्यादा था, रोज ये छल साथ में नहीं आता जो था। वह उठ कर बालकनी में चली गई एक ग्लास ठंडा पानी ले कर, अरोरा अँकल आँटी जागे हुए थे। दोनों पारी पारी दूरबीन से आसमान में चाँद को देख रहें थे, उसे याद आया आज चाँद पृथ्वी के बहुत निकट होने वाला था। पर वह क्या करे इस मनहूस बालकनी से कभी चाँद नहीं दिखता था। चाँद आता ही नहीं उसके घर।

क्रमशः

रीता गुप्ता

कहानीकार, स्तंभकार और स्वतंत्र लेखन।

राँची झारखंड से।

छ लघुकथा सांझा संग्रह, तीन सांझा कहानी संग्रह और "इश्क़ के रंग हज़ार" नामक लोकप्रिय एकल कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

मातृभारती पर बाजूबंद, तोरा मन दर्पण कहलाए, काँटों से खींच कर ये आँचल और शुरू से शुरू करते हैं जैसी पापुलर कहानियाँ मौजूद।

koylavihar@gmail.com

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