होने से न होने तक - 17 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories Free | होने से न होने तक - 17

होने से न होने तक - 17

होने से न होने तक

17.

मानसी जी कभी भी, किसी भी समय मेरे घर आ जातीं है और घंटों हम दोनो की बातें होती रहतीं हैं। कुछ अजब तरीके से उन्हांने मुझे अपने संरक्षण के साए में समेट लिया है। वे मेरा ख़्याल करतीं और छोटी बड़ी बातों में मुझे सुझाव ही नहीं निदेश और आदेश भी देती रहतीं हैं। मैंने भी उनका बड़प्पन सहज ही स्वीकार कर लिया था। मीनाक्षी और केतकी उनकी इस बात पर देर तक बड़बड़ाती रहतीं। पर फिर भी अन्जाने ही मानसी जी भी हमारी अंतरग मंडली में शामिल होने लग गयी थीं। संभवतः मेरे निकट होने के कारण से। कभी वे स्वयं ही शामिल हो जाती और कभी कभी वे निमंत्रित भी कर ली जातीं। मानसी जी के कारण बाकी लोग भी हम चारों के निकट आने लगे थे...विशेषतः मेरे। स्टाफ के आपसी संबधों में हिन्दी और अंग्रेज़ी वालों के दायरे जैसे टूटने लग गये थे और और इन दो विरोधी शिविरों की दूरियॉ सिमटने लग गयी थीं।

लगता है न जाने कब से हूं यहॉ...न जाने कब से इस कालेज की छत तले सुकून से जी रही हूं जैसे न जाने कितना अंतरंग और पुराना रिश्ता है सब से...नीता,केतकी,मीनाक्षी कौशल्या दी और मानसी चतुर्वेदी से, डाक्टर दीपा वर्मा तक से। आते जाते न जाने कितनी बार वे अपने पास बिठा लेती हैं और दुनिया भर की बातें करती रहती हैं...कुछ व्यक्तिगत सवाल, कुछ कालेज की बातें, कुछ पूछना कुछ बताना, पूरा माहौल बेहद सगा सा। न जाने क्या है उनके व्यतित्व में कि उन पर एक भरोसा लगता है जैसे अपने दुख सुख में उन पर निर्भर किया जा सकता है, जैसे मित्रवत् इनसे बहुत कुछ मन का बॉटा जा सकता है। वैल्हम में बरसों रहे है, फिर एल.एस.आर. और उसके बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में। इन सब जगह तो हास्ॅटल में भी रहे हैं। पर इस तरह का अपनापन तो किसी संस्था, किसी की भी छत और दीवारो के लिए महसूस नहीं किया था। तब सब कुछ इतना बेगाना क्यों लगता था या अब सब इतना अपना क्यों लग रहा है यह मुझे पता नहीं। वैसे भी ज़िदगी में सब कुछ सीधे सीधे समझ आ ही जाता है क्या। कितना कुछ ऐसा है जिसे इंसान समझ नही पाता।

यूं तो बीस पच्चीस दिन से एनुअल फंक्शन की तैयारी चल रही है पर दो तीन दिन से तो टीचिंग लगभग ठप्प ही पड़ी हैं। प्रोग्राम की तैयारी तो एक ओर चल ही रही है दूसरी तरफ वार्षिक उत्सव से पहले की वार्षिक प्रतियोगिताऐं भी चल रही हैं। कार्यक्रम के संचालन के लिए कमेटियॉ बना दी गयी हैं-स्वागत के लिए-मंच संचालन के लिए-ग्रीन रूम की व्यवस्था के लिए अलग अलग समीतियॉ। विज्ञान और कामर्स फैकल्टी के भवन मेन बिल्डिंग से दूर पर बने हैं। वहॉ का स्टाफ अपने ही बिल्डिंग में बैठता है किन्तु आजकल सबका मुख्य स्टाफ रूम मे आना जाना बना हुआ है। नीता सांस्कृतिक कमेटी की अध्यक्ष है अतः सब काम उस से पूछ कर किए जा रहे हैं इसलिए सभी टीचर्स नीता के पास आती रहती है। भागने दौड़ने के अधिकांश काम मानसी जी बहुत दक्षता से संभाल रही हैं। मुझ को कभी कभी उनकी इनर्जी देख कर आश्चर्य होने लगता है। अभी अमीनाबाद से कलाकारों के लिए किराए के गहने और कपड़े का प्रबंध करके लौटी ही थीं कि किसी और को एकदम वहीं के आस पास का काम याद आ गया था। वे झल्लाते और बड़बड़ाते हुए तुरंत ही दुबारा दौड़ गयी थीं। मुझ को बहुत बुरा लगता है...औरों पर गुस्सा भी आता है कि वे बेचारी अकेले ही दौड़ रही हैं। मै नीता के साथ लगी हूं इसलिए कालेज में ही अनेको काम मुझे निबटाना हैं। फिर भी मैंने मानसी जी से कहा था आप रुकिए मैं चलती हॅू आपके साथ। वे प्यार से मेरी पीठ थपथपा कर चली गयी थीं,‘‘अरे यार क्यों परेशान हो रहे हो। तुम चलोगे साथ तब भी चलना तो हमे अपने पैरों से ही पड़ेगा, तुम यूॅ ही थकोगी। हमें हर साल इसकी आदत है। यहॉ सब अपने आप को बहुत काबिल समझते हैं पर किसी काम का कोई सिस्टम नहीं होता। एक ही जगह की दौड़ कई कई बार हो जाती है। यहॉ सब भारत सरकार हैं-पहले सड़क बनाऐंगे, फिर बिजली के खंबे गाढ़ने के लिए सड़क खोदेंगे, फिर दुबारा सड़क बनाऐंगे। दो विभागों के बीच कोई कोआर्डिनेशन ही नही होता है।’’

उनके जाने के बाद केतकी ने मुझे डॉटा था,‘‘अरे बेकार ही परेशान हो रही हो। उन्हे झोला लटकाए दौड़ना भागना अच्छा लगता है।’’

मुझ को उसकी बात अच्छी नहीं लगी थी पर मैं चुप ही रही थी। मैं जानती हूं कि बेकार की बहस से कोई फायदा नही है। यह लोग मानसी जी के प्रति और वे इन लोगो के प्रति पूरी तरह संवेदनशील नही हो सकते।

करीब दो बजे मानसी चतुर्वेदी लौटी थीं और आते ही उन्होने अपना टिफिन बाक्स निकाल लिया था। वे हर दिन ही अपने साथ खाने का सामान ले कर आती हैं और मेरे अतिरिक्त प्रायः किसी भी और को अपने साथ खाने का निमंत्रण नहीं देतीं। हमेशा ही अकेले खाती हैं। उन्होने मुझे पुकारा था,‘‘अम्बिका आओ आज तुम्हारे पसंद की सब्जी ले कर आए हैं।’’

मेज़ के दूसरी तरफ से किसी ने चुटकी ली थी,‘‘अम्बिका के साथ यह ख़ास फेवर क्यों मानसी?’’

मानसी ने बड़ी लापरवाही से उधर देखा था। वे हॅसती रही थीं और धीरे धीरे अपनी गर्दन हिलाती रही थीं जैसे किसी स्थिति का मज़ा ले रही हों,‘‘हमारे पराठे और हमारा मन।’’वे ऑखे मटका कर हॅसी थीं।

‘‘भई हम सब भी तो बैठे हैं यहॉ।’’

मानसी ने उन सब की तरफ सीधी निगाहों से देखा था,‘‘हम कोई गधे हैं कि सब के लिए पराठे बना कर लाएॅ।’’

‘‘अरे’’ नीता के मुह से अनायास निकला था। कुछ और लोग धीमें से बुदबुदाए थे। मानसी अपने में मगन टिफिन बाक्स में से निकाल कर पराठे और सब्जी दो प्लेटों मे लगाती रही थीं साथ ही बड़बड़ाती भी रही थीं,‘‘हमे समझ ही नहीं आता कि सुबह से निकलते हो तुम सब लोग...बिना खाने के। अरे भई दो पराठे और थोड़ी सी सब्जी धरो और किसी भी डब्बे में मोड़ कर रख लो।’’

मेरे एकदम बगल में बैठी हुयी केतकी धीमें से बुदबुदायी थी,‘‘इनकी तरह से फूहड़पन से मोड़ कर नहीं न धर सकते इसीलिए तो नहीं ला पाते हैं।’’और उसने हॅसते हुए मुझे तेज़ आावाज़ में डॉंटा था,‘‘खाने के लिए कुछ लेकर क्यो नहीं आती हो। ख़ाली हाथ हिलाते हुए चली आती हो।’’

मानसी जी केतकी का इंगित समझ कर भी हॅसती रही थीं और उन्होने दुबारा मुझे पुकारा था। मैं धर्मसंकट में फॅस गयी थी। मुझे अकेले जा कर उनके साथ खाने के लिए बैठ जाना भी अजीब लग रहा था और मानसी जी के आग्रह को अनसुना कर पाना भी आसान नही था। तभी कौशल्या दी आया के हाथ में बड़े से टिफिन कैरियर के साथ स्टाफ रूम मे घुसी थीं,‘‘बेचू के हाथ का गरम गरम खाना मंगवाया है तुम सब के लिए। हम जानते थे कि बाकी सब तो जा चुके होंगे,तुम काम करने वाले बच्चे भूखे प्यासे बैठे होगे।’’

स्टाफ में ख़ुशी की लहर फैल गयी थी। हल्का सा हुल्लड़ भी। आया अल्मारी में से प्लेटें निकालने लगी थी। मुझे लगा था कि कौशल्या दी ने मुझे द्विविधा से उबार लिया हो जैसे। दीदी बड़े यत्न से खाना निकाल कर मेज पर सजाने लगी थीं।

तभी हिन्दी डिपार्टमैण्ट की रेनू सक्सेना अन्दर आयी थीं। आज कहानी कविता प्रतियोगिता थी इसलिए वे सुबह से उसी में व्यस्त हैं। वे बिना किसी से कुछ बोले चुपचाप एक किनारे बैठ गयी थीं।

‘‘बड़े आराम से आ कर बैठ गयी हो आज तुम्हें घर भागने की जल्दी नहीं हो रही।’’मानसी जी ने पूछा था।

‘‘नहीं’’बड़ें सुस्त स्वर में रेनू ने छोटा सा उत्तर दिया था।

‘‘क्या हो गया रेनू ’’मिसेज़ दीक्षित के इतना पूछते ही उनकी ऑखों में ऑसू तैरने लगे थे,‘‘मैं थक गयी हूं शैल दी’’उन्होने मिसेज़ दीक्षित की तरफ देखा था,‘‘एक जन हो तो उसे झेल लो, यहॉ तो मॉ बेटे मिल कर ग्यारह हो जाते हैं। कलह तो जैसे इन दोनों की ख़ुराक है।’’

‘‘हुआ क्या ?’’मिसेज़ दीक्षित ने फिर पूछा था।

रेनू के स्वर में क्रोध तैरने लगा था, ‘‘कल मेरे सिर में माईग्रेन का दर्द हो गया तो सासू जी ने कोहराम मचा दिया कि मैके से ही बीमार आई है जब देखो सिर में दर्द होता रहता है। हमें भी गुस्सा आ गया, सो कह दिया कि चाहे तकलीफ हो या कुछ भी हो आपको तो अपने हाथ से पका कर खिला ही देते हैं। सो इस पर इतना शोर। पति देव ने तब से अनबोला कर रखा है।’’

मानसी जी ने अपना निर्णय सुना दिया था,‘‘छोड़ दो। हम तो तुमसे कब से कह रहे हैं।’’

कौशल्या दी ने वर्जना में अपने सीधे हाथ को फहराया था,‘‘ नहीं रेनू। ऐसा कुछ इतना बुरा भी नही हुआ है। औरतों के साथ कितना कितना बुरा होता है। कितना कितना वे ’’

मानसी जी ने उनकी बात आधे में ही काट दी थी, ‘‘यह क्या बात हुयी औरो के साथ और ज़्यादा बुरा होता है सिर्फ इसलिए अपने दुख की तरफ से ऑखें मूॅद ली जाऐं। उसका क्या मतलब? वे लोग कभी नहीं सुधरेंगे दीदी। ऐसे साथ जीने का कोई मतलब है भला ?रोज़ रोज़ की कलह। रोज़ का रोना धोना। हस्बैंड से ज़्यादा कमा रही है। थैंकफुल होना तो दूर हर समय की शिकायतें।’’मानसी जैसे कोई निर्णय दे रही हों।

‘‘नहीं बेटा औरत को बहुत कुछ सोचना पड़ता है...बच्चों का हित अहित...उनके लिए घर की छत का सिर के ऊपर से हट जाना कोई छोटी तकलीफ है क्या। बच्चे हो जाने के बाद अपने बारे में नहीं उनके बारे में सोचा जाता है।’’

मानसी जी ने उनकी बात पूरी तरह से काट दी थी,‘‘यह सब अब पुरानी बातें हो गयी दीदी। रेनू अच्छा भला कमाती है। कोई बच्चों को लेकर सड़क पर तो निकल नहीं जाएगी जो सर के ऊपर से छत चली जाएगी। उन्हे घर, खाना,कपड़ा सब कुछ मिलेगा। शायद यहॉ से बेहतर तरीके से ही रखेगी वह। यहॉ सास के सामने क्या कुछ चलती है उसकी।’’

रेनू ने बारी बारी से मानसी की तरफ और फिर दीदी की तरफ देखा था,‘‘बच्चे मेरे रहे ही कहॉ। मॉ बेटे ऐसे घेरे रहते हैं उनको कि मेरे पास आते ही कहॉ हैं।’’

‘‘तुम बच्चों के बिना रह लोगी रेनू ?’’दीदी ने पूछा था। रेनू सक्सेना की आखों से झर झर ऑसू गिरने लगे थे।

कौशल्या दीदी ने बहुत प्यार से उनकी तरफ देखा था,‘‘नहीं न ?नहीं रह सकोगी न? यह तो और भी बड़ा कारण है कि अपने मन को शॉत कर लो। पापा और दादी के बिना बच्चे भी तो नहीं रह पाऐंगे। फिर वह सब सोचने से फायदा?यह तो कुछ समय की प्राब्लम है, बच्चो के बड़े होते ही सब ठीक हो जाएगा।देखना अपने पापा और दादी से तुम्हारे अधिकार की लड़ाई बच्चे लड़ेंगे।’’वे चुप हो गयी थीं।कुछ देर चुप ही रही थीं। मुझे बुआ की बात याद आती है‘‘जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तब घर पूरी तरह से औरत का हो पाता है।’’

कौशल्या दी ने बारी बारी से सब की तरफ देखा था,‘‘सब कुछ हर किसी को कहॉ मिलता है रेनू। जितना कुछ मिले उसी में ज़िदगी का हिसाब किताब फिट करना पड़ता है। फिर हम लोग टीचर्स हैं। टीचिंग सिर्फ नौकरी ही नही होती। टीचर स्टूडैन्ट की रोल माडॅल होती है। इसलिए भी उसे सब काम सोच समझ कर करने होते हैं। नहीं तो एक जन और एक परिवार ही नही भटकता...बहुत से और बच्चे भी भटकते हैं।’’ उनका स्वर एकदम से निर्णायक हो गया था,‘‘वी हैव जैनरेशन्स टु लुक आफ्टर।’’

हम सब की ज़िदगियों को विद्यार्थियों से जोड़ कर यह वाक्य वह न जाने कितनी बार कितने लोगों से,कितने संर्दभों में कहतीं। कुछ लोग उनकी इन बातों से चिढ जाते हैं,कुछ लोग उनकी इन आदर्शवादी बातों का मज़ाक भी उड़ाते हैं पर वे हमारी नौकरी को हमारे मन पर पहरेदार बना कर खड़ा़. कर देतीं हैं।

कौशल्या दी ने ममत्व भरी निगाहों से रेनू की तरफ देखा था और उनके कन्धे पर हाथ रख कर धीरे से फुसफुसायी थीं,‘‘मन पर काबू न करो रेनू तो इधर उधर भागता है। अपने बच्चों का मुह देखो और अपने आप को शॉत कर लो।’’

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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