बाली का बेटा (9)

9                                                      बाल   उपन्यास

                                              

                                                बाली का बेटा

 

                                                         राजनारायण बोहरे

 

 

दोस्ती

 

हनुमान ने आगे बढ़ कर सुग्रीव को राम और लक्ष्मण का परिचय दिया तथा अपने दल के लोगों का परिचय राम-लक्ष्मण से कराया। राम लक्ष्मण उन सबसे गले लग कर दोस्तों की तरह मिले, फिर सब लोग वहां रखे हुए पत्थर के टुकड़ों पर बैठ गये।

द्विविद, मयंद और नल-नील ने तुरंत ही सबके लिए ताजे फलों का इंतजाम कर अल्पाहार कराया । जामवंत ने पहाड़ पर चढ़ने की मेहनत से थक चुके राम और लक्ष्मण से कुछ देर आराम करने का अनुरोध किया।

राम ने उनका अनुरोध मान लिया वे गुफा के भीतर जाकर बिश्राम करने लगे, जबकि लक्ष्मण हाथ में धनुषबाण  लेकर बाहर पहरा देने लगे।

सूरज का गोला अस्त होने की तैयारी कर रहा था कि राम उठ कर बाहर आये। लक्ष्मण के साथ सबने उन्हे प्रणाम किया। सुग्रीव ने अपने सबसे ऊंचे आसन पर उन्हे बैठने का इशारा किया। राम बैठे तो बाकी सब भी बैठने लगे।

राम ने हंस कर सुग्रीव से पूछा, ‘‘ बताओ सुग्रीव, तुम इस सुनसान और असुविधा वाले पहाड़ पर अपने दोस्तों के साथ क्यों निवास कर रहे हो?’’

सुग्रीव रूआंसे हो उठे।  उनका गला भर आया। उन्होंने  दुःखी भाव से अपने भाई बाली का किस्सा बड़े विस्तार से राम - लक्ष्मण को सुनाया और अंत में निवेदन किया कि उनकी एक ही इच्छा है कि किसी तरह उनका खोया हुआ सम्मान मिल सके तथा वे बाली को उसके गलत व्यवहार का दण्ड दे सकें और पूरी इज्जत के साथ वापस पम्पापुर लौट जायें।

राम ने उन्हें पूरा भरोसा दिलाया कि उनकी इच्छा पूरी होगी। लक्ष्मण ने तो राम के मन में छुपे हुए भाव को खुल कर बताया ‘‘ हे सुग्रीव जी, अब आप निश्चिंत रहिए। हम लोग इस पहाड़ी क्षेत्र को बाली नाम के दुष्ट  आदमी के आतंक से छुटकारा दिला कर दम लेंगे। जल्दी ही आप अपने घर वापस पहुंच जायेंगे।’’

अचानक राम ने पूछा, ‘‘ हे सुग्रीवजी , आपकी तकलीफ तो हमने सुन ली । आप हमारा दुख भी सुन लीजिये।’’

राम ने विस्तार से बताया कि किस तरह पंचवटी नामक जगह पर रहने के दौरान उनकी ऐसे वक्त जब राम और लक्ष्मण शिकार करने गये थे, सूनी कुटिया से उनकी पत्नी सीता का किसी ने हरण कर लिया है। उन्हे शंका है कि अपनी ताकत के घमण्ड में मतवाले बाली ने तो ऐसा नहीं किया है!

जामबंत ने तुरंत ही कहा ‘‘ प्रभु यह सही है कि बाली को अपनी ताकत का बड़ा अभिमान है लेकिन आपकी पत्नी जानकी का हरण बाली ने नहीं किया होगा। क्योंकि मैं उनका पुराना साथी हूं। बाली को किसी को भी गालियां देने, बुरा भला कहने और बिना बात भिढ़ जाने की आदत तो है लेकिन किसी की पत्नी का अपमान करने या हरण करने का बुरा काम उन्होने आज तक नहीं किया है।’’

राम को अब भी आशंका थी, वे बोले ‘‘ लेकिन सुग्रीव जी कह रहे हैं कि बाली ने इनकी पत्नी और बेटे को इनसे छीन कर अपने महल में रख लिया है।’’

जामवंत पूरी गंभीर आवाज में बोले, ‘‘ मेरे जासूसों ने खबर दी है कि सुग्रीव जी की पत्नी को वहां पूरा सम्मान और सुविधा दी गई है। वे न तो महल के जेलखाने में बंदी हैं न ही उन्हे नौकरानी या दासी बनाया गया है।’’

लक्ष्मण ने सुना कि सुग्रीव बुदबुदा उठे हैं, ‘‘ मुझे तो आपके जासूसों पर विश्वास नहीं है, मेरा मन तो कहता है कि बाली ने रूमा को जबरदस्ती अपनी पत्नी बना लिया है।’’

‘‘ बाली की दोस्ती रावण जैसे नीच आदमी के साथ है, जो इसी बात के लिए बदनाम है कि जहां तहां से लड़कियों और औरतों को उठा लाता है और उनको बेच कर अपनी सोने की लंका में सोने का भण्डार बढ़ाता जाता है।’’ राम ने जामवंत से फिर पूछा।

‘‘ हे प्रभो, रावण से बाली की कभी दोस्ती नहीं रही। बाली ने तो रावण का घमण्ड तोड़ा है और उसे अपने महल में छह महीने तक बंदी बना कर रखा था। हां, आपका शक रावण की तरफ ठीक गया है, वह ऐसा ही दुष्ट  और कमीना है। और मुझे तो लगता है कि उस दिन अपने रथ में एक रोती हुई औरत को बैठा कर वही भागा जा रहा था...’’ जामवंत को सहसा कुछ याद आया और वे आगे बोलते इसके पहले ही राम ने उनकी बात काटी ‘‘ कब की बात है यह?’’

अब सुग्रीव बोले, ‘‘ हे रघुवंशी   रामजी, हम  सब एक दिन ऋष्यमूक पर्वत के निचले हिस्से में एक सुरक्षा चौकी देखने गये  थे कि हमने पाया कि एक काला कलूटा सा भैंसे जैसे तगड़ा आदमी अपने रथ में  एक बहुत संदर स्त्री को बैठाये भागा जा रहा था। उसने अपने बांये हाथ से रथ में जुते घोड़ों की डोर थाम रखी थी जबकि दांये हाथ से उसने रोती हुई स्त्री के बाल पकड़ रखे थे।  वह औरत देख कर जोर से चीखी और हमसे मदद की गुहार करने लगी । लेकिन हम लोग तो पहले से ही बाली से डरे हुए लोग हैं, सो हम जहां के तहां खड़े रहे और वह दुष्ट  हमारे सामने से निकल गया। उन भली महिला ने हमे देख कर अपने कुछ जेवर हमारी ओर फेंके थे कि शायद सोने के जेवरों के बदले हम उन्हें  मुक्त कराने का साहस करेंगे।  हालांकि उस दुष्ट   की यह हरकत देख कर महाबली हनुमान ने आगे बढ़ने की कोशिश की थी तो जामवंत जी ने उन्हे रोक कर कहा था कि जब तक दुश्मन की ताकत का अंदाजा न हो, तब तक उस पर हमला नही करना चाहिए।’’

राम ने जल्दबाजी में कहा, ‘‘ वे जेवर कहां है?’’

‘‘ जाओ द्विविद वे जेवर उठा लाओ।’’ सुग्रीव ने हुकुम दिया।

बानर द्विविद ने गुफा से लाकर महिलाओं द्वारा गले में पहने जाने वाले एक हार और कान का एक कुण्डल लाकर राम के हाथ में दिया तो राम तत्काल पहचान गये कि यह तो सीता के ही जेवर हैं। उन्होंने  लक्ष्मण से कहा, ‘‘ यह पक्का हो गया कि सीता को रथ में बैठा कर ले जाया गया था, लेकिन वो काला कलूटा आदमी कौन था, इसका पता लगना बाकी है।’’

जामवंत बोले, ‘‘ प्रभु आप सुग्रीव जी का कश्ट दूर कर दीजिये । हम सब आपके साथ हेैं । हम कंधे से कंधा भिढ़ा कर उस चोर को तलाश करेंगे और उसे इस भयानक अपराध के बदले में उचित सजा देने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देंगे। हम लोगों ने इस बीच एक वनवासी सेना बनाई है जिसका उपयोग हम पम्पापुर पर हमला करने के लिऐ करने वाले थे, अब यह सेना आपके काम के लिए काम में लाई जायगी।’’

राम भी अपनी बात पर अटल पर थे। वे बोले, ‘‘ मैं कल ही चल कर बाली को उसकी सजा देने का तैयार हूं।’’

जामबंत बोले, ‘‘ प्रभो, आपका कोई निजी बैर भी बाली से नही हैं फिर आप तो पिता की आज्ञा से वनबास में हैं, इन दिनों आप किसी नगर में जाते भी नही है । इसके अलावा यदि आप बिना बात ही इन दो भाइयों के बीच लड़ाई में कूदेंगे, तो हमारे साथ के बहुत से बानर और आदिवासी लोग आपसे नाराज हो जायेंगे। इसलिए इस लड़ाई से आप दूर दिखते हुए ऐसा कुछ तरीका खोजिये कि सुग्रीव जी के हाथों बाली को दण्ड दिलाया जाये।’’

लक्ष्मण ने देखा कि सुग्रीव ने यह सुना तो वे कंप गये। धीरज त्याग कर वे बोल उठे, ‘‘जामवंत जी, मेरे भाई इतने ज्यादा ताकतवर हैं कि मै सपने में भी नहीं सोच पाऊंगा कि उन्हे दण्ड दे सकूं।’’

‘‘ आप चिन्ता न करंे, मेरा छोटा भाई लक्ष्मण पम्पापुर जाकर बाली को पकड़ कर इसी पहाड़ पर घसीट लायेगा और आप यही उसको दण्ड देंगे।’’ राम ने सुग्रीव को निश्चिंत  किया।

जामबंत फिर अपनी बात पर आ गये,‘‘नही रघुवीर राम जी, आप दोनों भाइयों का इस तरह बाली से लड़ने से हमारे अगले संघर्ष  गलत असर पड़ेगा। हम पहाड़ी लोगों के झगड़े में आप मैदान के रहने वाले लोगों का बीच में आना कोई स्वीकार नहीं कर पायेगा।’’

‘‘तो आप क्या चाहते हैं?’’ राम ने जामवंत पर आखिरी निर्णय छोड़ा।

‘‘ कल मैं विचार करके कोई रास्ता सुझाने की कोशिश करूंगा।’’ जामवंत ने बेहिचक उत्तर दिया तो यह सभा समाप्त हो गई और सब लोग संध्या के भोजन और सोने की तैयारी करने लगे।

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padma sharma

padma sharma 1 year ago

वाह राज बोहरे जी! राम कथा का नया रूप। वही मर्यादा, वही मानवता, वही श्रध्दा!!

Vicky Vaswani

Vicky Vaswani 1 year ago

Sachin Rawal

Sachin Rawal 1 year ago