Hone se n hone tak - 19 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories PDF | होने से न होने तक - 19

होने से न होने तक - 19

होने से न होने तक

19.

घर के सामान में काफी चीज़े ख़तम हो गयी हैं। कुछ मैचिंग रूबिया भी लेने हैं सो शापिंग के लिए हज़रतगंज चली गई थी। काम जल्दी ही निबट गया था। बगल से निकलते रिक्शे को मैंने रोका था,‘‘यूनिवर्सिटी की तरफ राय बिहारी लाल रोड जाना है।’’ बताने पर रिक्शे वाले नें फिर से पैडल पर पैर रख लिए थे,‘‘नहीं जी हम तो सदर की तरफ जा रहे हैं।’’ उसने हाथ से सामने की तरफ इशारा किया था। सदर की बात सुनकर अनायास ही मैंने वहॉ से कौशल्या दी के पास जाने का मन बना लिया था। सदर बाज़ार से थोड़ी दूर पोलो ग्राउॅण्ड के पास ही तो रहती हैं वे।

बराम्दे की तीन सीड़ियॉ चढ़ गयी तो दीदी के घर का माहौल काफी बदला सा लगा था। कुछ अधिक ही साफ सुथरा और सजा हुआ सा। सामने दिखता हुआ दीदी के घर का काफी बड़ा सा ड्राइंगरूम, बीच की गोल मेज़ पर ताज़ा फूलों का गुलदस्ता,मेज़ के नीचे कालीन। बराम्दे के बाएॅ हाथ पर खाने का कमरा है। बेचू मेज़ पर बर्तन लगा रहे हैं,बगल मे खड़ी दीदी भी मदद कर रही हैं। मैं उधर ही बढ़ ली थी। नमस्कार के बाद मैं जा कर दीदी के बगल में ही खड़ी हो गयी थी,‘‘कोई आ रहा है क्या? लगता है ग़लत समय आ गए दीदी।’’ मैंने प्रश्न भरी निगाहों से दीदी की तरफ देखा था।

‘‘अपनो के आने के लिए भी कभी कोई समय ग़लत होता है अम्बिका।’’ हमेशा की तरह उनके स्वर में अपनापन है।

‘‘कोई आने वाला है क्या दीदी?’’ मैंने फिर पूछा था।

‘‘नही तो’’ दीदी ने उलझा सा जवाब दिया था,‘‘असल में राय साहब आए हुए हैं।’’

‘‘राय साहब ?’’ मैंने दोहराया था।

‘‘हॉ पापा जी। चंदर जी के फादर।’’ दीदी ने बात साफ की थी। वे अपने ससुर जी को उनके पीछे राय साहब ही पुकारती हैं और उनके सामने पापा जी।

मैं ने मेज़ की तरफ देखा था। बोन चाईना की बेहतरीन क्राकरी,चॉदी के दोंगे,चॉदी का पेस्ट्री स्टैन्ड और चॉदी के ही चम्मच,छुरी और कॉटे। हमेशा उत्तेजित हो कर बहुत ज़ोर से बात करने वाली और सस्वर हो, हो कर के हॅसने वाली दीदी इस समय मद्धिम शालीन स्वर में हॅस बोल रही हैं।

आमंत्रित किए जाने पर पापा जी मेज़ पर आए थे। उनके पीछे पीछे चन्दर भाई। कई सालों से इस घर मे आती रही हूं पर उनसे मिलने का यह पहला मौका है। करीब छॅ फीट लंबे,बहुत गोरा रंग,तेजस्वी व्यक्तित्व। कुछ भी ऐसा नही है जो चंदर भाई से मिलता हो। कौशल्या दी ने मेरा उनसे परिचय कराया था। उन्होने धीमे से मुस्करा कर मेरे अभिवादन को स्वीकारा था। मुझसे एक दो प्रश्न किये थे। मैं पाॅलटिकल सॉईस पढ़ाती हूं यह बताए जाने पर मौजूदा पालिटिक्स पर बातें होने लगती हैं। चंदर भाई हमेशा की तरह प्रायः चुप ही रहे थे। मुझे पूरा माहौल ही बेहद औपचारिक और ग़ैर पारिवारिक लगा था। कहीं एक ही मेज़ पर, एक ही परिवार के लोग इस तरह बैठते हैं-एकदम परायों की तरह से ख़ातिर करते हुए और ख़ातिर कराते हुए।

चलने के लिए बाहर निकली तो मेरे मना करने के बावजूद दीदी मुझे रिक्शा कराने के लिए घर के बाहर लेन के मोड़ तक आयी थीं। चलते चलते दीदी ने मुझे सरला माहेश्वरी के बारे में बताया था। मुझे लगा था वही बताने के लिए ही वे इतनी दूर तक आयी हैं। सरला जी कामर्स की सब से सीनियर टीचर हैं। इस कालेज में ग्यारह साल से ज़्यादा हो चुका है। उससे पहले किसी और कालेज में करीब छॅ साल पढ़ा चुकी हैं। अपने घर में सीढ़ियॉ उतर रही थीं कि अचानक पैर मुड़ गया। केवल दो सीढ़ी नीचे गिरी थीं पर स्पाइनलकॉड इन्जरी हो गयी है। पूरी तरह से पैरालाइज़्ड हैं। पी.जी.आई. में एडमिटेड हैं। शशि अंकल डाक्टरों से मिले थे। डाक्टर्स रिकवरी कठिन ही बता रहे हैं। शशि भाई चाहते हैं कि जल्दी ही हम लोग उसके इलाज के लिए कुछ रुपया जमा कर लें। मॉ विडो हैं। शायद किसी प्रायमरी स्कूल में पढ़ा रही हैं और भाई इन्जीनीयरिंग में पढ़ रहा है। हम कुछ लोग मिल कर जितना कुछ जमा कर सकें अच्छा है।’’

दीदी अंकल स्टाफ में एक अपील क्यों नही निकाल देते।’’मैंने कहा था।

दीदी ने नकार में सिर हिलाया था,‘‘नहीं अंबिका। शशि भाई नही चाहते कि यह बात ज़्यादा लोगों को पता चले। पर कुछ लोगों को तो बताना ही होगा न। वैसे तो यह बात कैसे छिपेगी भला? फिर कब तक? पर फिर भी शशि भाई-ही इज़ ट्राईंग अगेंस्ट होप। असल में दोनो जगह की नौकरी मिला कर भी सरला की नौकरी को बीस साल पूरे होने में करीब तीन साल बाकी हैं। बीस साल से पहले नौकरी चली गयी तो पैंशन भी नही मिलेगी बेचारी को।’’

‘‘तब ?’’मैंने पूछा था।

‘‘तब ऽ ऽ’’ दीदी धीरे से मुस्कुरायी थीं,‘‘तब तक शशि भाई किसी तरह से उसकी नौकरी को चलाऐंगे...बीस साल पूरा होने तक। इसीलिये वह नहीं चाहते कि यह बात ज़्यादा लोगों को पता चले।’’

‘‘ऐसे कैसे चला पाऐंगे अगर वे आ पाने की हालत में ही नहीं होंगी?’’

‘‘पता नहीं।’’ दीदी ने अपने कंधे उचकाए थे। फिर उन्होने मेरी तरफ पूरे संवाद को जैसे समेटते हुए देखा था,‘‘लैट अस नाट डिस्कस इट।’’

दीदी ने पास से निकलते हुए रिक्शे को रोक लिया था। मैं उस पर बैठ गयी थी। दीदी ने धीरे से मेरे घुटने पर अपना हाथ रखा था,‘‘देखना अम्बिका कि हम लोग कैसे और कितना पैसा जमा कर सकते हैं।’’

‘‘जी दीदी।’’ मैंने आश्वासन देती निगाह से उनकी तरफ देखा था। सोचा था कि शाम को यश आऐंगे तो उनसे इस बारे में राय करूॅगी।

यश आते ही रहते हैं। लगभग हर दिन ही आते हैं। पहले की तरह हम दोनों यदा कदा पिक्चर और क्वालिटी और रायल कैफे भी जाते ही हैं। हालॅाकि अब पहले की अपेक्षा बाहर जाना और घूमना कम हो गया है क्योकि शायद भेंट करने के लिए अपने घर के होते बाहर जाने की कोई ख़ास इच्छा भी नहीं होती है। वैसे भी मुझे यश का अपने घर में आना बहुत ख़ुशी देता है और यश को अपने हाथों से कुछ बना कर खिलाना अच्छा लगता है और यश की गाड़ी में उसके साथ बैठ कर अपने घर पहुचना बहुत बहुत अच्छा लगता है।

उस दिन यश काफी देर से ही आए थे। आफिस में कोई मीटिंग थी जो देर तक चली थी। थोड़ी सी ही देर बैठ कर यश उठ कर खड़े हो गए थे,‘‘अब चलूं देर हो गयी है।’’

मैंने मेज़ पर से ब्रीफकेस उठा कर हाथों मे दबा लिया था ‘‘अभी नहीं।’’ न जाने कैसे यश को सामने पा कर कभी कभी मन पर अजब सा बचपना हावी हो जाता है और यश को अपने पास रोक कर रखने की एक मजबूर सी बेचैनी भी।

यश हॅसे थे,‘‘ऐसा करें अम्बि हम तुम पास पास घर बनवा लें...जिसकी दीवार एक हो।’’ उनकी ऑखों मे एक अपनापन घिर आया था।

‘‘बीच की दीवार में एक बड़ी सी खिड़की लगवा लेंगे ताकि तुम दिखायी देते रहो।’’मैंने सुझाव दिया था।

‘‘न’’ यश नाक सिकोड़ते हैं,‘‘बीच की दीवार हम कॉच की बनवाएगे ताकि सारे समय हम एक दूसरे को देख सकें।’’ यश बच्चों जैसी निश्छल हॅसी हॅसे थे। मैं भी हॅसी थी।

कालेज खुलने पर स्टाफ के साथ मैनेजर और प्रिंसिपल की मीटिंग रखी गयी थी। नए वर्ष में स्टाफ का स्वागत करने के बाद शशि अंकल ने तहे दिल से अपनी टीचर्स की लगन निष्ठा और योग्यता की तारीफ की थी। संस्था का इतिहास भी बताया था कि किस तरह से गिनती के कुछ कमरों में प्रायमरी स्कूल से शुरू होकर अब डिग्री कालेज है और शहर के अच्छे कालेजों में इसकी गिनती होती है। उन्होने यह भी कहा था कि वह केवल इतने से ही संतुष्ट नही रहना चाहते,‘‘इस संस्था के साथ हम सबके सपने जुड़े हुए हैं। हम चाहते हैं पी.जी. कालेज बने। किसी दिन इसमें स्पेशलाईज़्ड स्टडीज़ हों। ख़ैर वह तो आगे की बात है फिलहाल हमारी पहली कोशिश पोस्ट ग्रैजुएट कालेज है।’’

विद्यालय को लेकर उनकी उत्तेजना स्टाफ में व्यापने लगी थी। आपस में बातचीत के साथ कमरे में मिली जुली आवाज़ो का शोर फैलने लगा था। डाक्टर दीपा वर्मा ने हाथ के इशारे से मौन हो जाने के लिए कहा था।

‘‘कालेज में पी.जी.खुले उसके लिए आप लोगो को भी मेहनत करनी होगी। आप लोग जर्नल्स में कन्ट्रीब्यूट करिए,अपना बायोडेटा बेहतर बनाईए। अपने विद्यालय में सेमिनार्स वर्कशाप्स आयोजित करिए। उसके लिए आप लोगो को प्रोजेक्ट्स तैयार करने होंगे। इस सब के लिए ग्रान्ट्स लाने में थोड़ी बहुत मदद मैं कर सकता।

हॅू।’’उन्होने चारों तरफ देखा था ।

‘‘मैं एक दो सालों में ही कम से कम दो सब्जैक्ट्स में एम.ए.चाहता हॅू।’’ शशि कान्त अंकल के इस अतिंम वाक्य से जैसे बम फटा था। टीचर्स में अंसतोष दिखने लग गया था। पूरे माहौल में एक अव्यवस्था एक सुगबुगाहट फैल गयी थी।

मानसी चतुर्वेदी ने एक झटके से कुछ कहने के लिए हाथ उठा दिया था। बोलने के लिए कहे जाने से पहले ही वे अपनी बात कहने के लिए खड़ी हो चुकी हैं, ‘‘हम पी.जी. खोले जाने की इस योजना का विरोध करते हैं।’’

‘‘क्यों ?’’ शशि अंकल के स्वर में नाराज़गी है।

मानसी जी ने अपनी बात शुरू की थी,‘‘आज तक हमारा कामप्लैक्स यूनिवर्सिटी वालों के सामने है। वे अपने आप को हमसे बेहतर और हमें कम समझते हैं क्योंकि वे हायर क्लासेस पढ़ाते हैं।’’

‘‘हैं भी’’ मानसी जी की बात को बीच में काटते हुए किसी ने ज़ोर से कहा था।

मानसी चतुर्वेदी ने नकार में अपना हाथ हवा में फहराया था। मानसी के कुछ बोलने से पहले ही अंजलि सक्सेना बोली थीं,‘‘नहीं हैं...हमेशा ऐसा नही है। हमारे पास भी टापर्स हैं...पी.एच.डी. और डी.लिट हैं और वहॉ के टीचर्स से भी हम पढ़े हैं। वहॉ की भी काफी असलियत हमें पता है। वहॉ के कुछ टीचर्स तो पचास मिनट की क्लास को दस मिनट भी सही ढंग से नहीं खींच पाते।’’

‘‘कुछ की बात मत करिए। यह सच ही है कि वे हमसे बेहतर हैं क्योंकि उनका हमसे बेहतर एक्सपोज़र है।’’

प्रबंधक महोदय ने बारी बारी से दोनो तरफ देखा था ‘‘उनका एक्सपोज़र इसीलिए बेहतर है कि वे ऊॅची क्लासेज़ पढ़ा रहे हैं...और ’’

मानसी ने अपना हाथ फिर उठा दिया था,‘‘अंकल मेरी बात अभी पूरी नही हुयी है। मैं भी यही कह रही हूॅ कि बड़ी कक्षाऐं पढ़ाने के कारण वे हमसे सुपिरियर हैं और अपने आप को वैसा समझते हैं। बिल्कुल सही हैं वे। मेरा केवल इतना ही कहना है कि अभी मुद्दा यूनिवर्सिटी वर्सेस कालेज है फिर एक ही कालेज में डिपार्टमैंन्ट वर्सेस डिपार्टमैंट होगा। एक जन अपने को बेहतर समझेगा क्योंकि वह पी.जी. पढ़ा रहा है और किसी बात में भी कम न हो कर दूसरा कम मान लिया जाएगा क्योंकि वह पी.जी. नही पढ़ा रहा है।’’

मानसी के समर्थन में कई आवाज़े उभरी थीं।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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