वसुंधरा गाँव - 3

अगली सुबह इन्द्र अपने घर पर लेटा हुआ था, वो अपने साथ घट रही अजीब घटनाओं के चलते इतना परेशान था कि लाख कोशिश पर भी उसको नींद नही आ रही थी, वो बेचैनी से रात भर करवटें बदलता रहा, और जब भी उसकी आंख लगती तो किसी भयंकर स्वप्न के कारण वो जाग जाता।
इसी प्रकार की पीड़ा को भोगते भोगते कब सुबह हो गई, इन्द्र को पता ही नही चला, वो अपनी लाल सुर्ख आँखो से अपनी छत को घूरते हुए किनी खयालों में खोया होता है, तभी उसके फ़ोन की तेज़ बेल बजने लगी, और उसके शरीर मे डर की सरसरी सी दौड़ा गई।
खुद की तेज धड़कनों को थोड़ा सामान्य कर वो फोन उठा कर देखता है। 
तो उसकी पत्नी सीता का फ़ोन था, पिछली बार सीता ने किसी बात से नाराज़ होकर इन्द्र का फ़ोन काट दिया था। और सीता की नाराज़गी का इन्द्र को दूर दूर तक कोई ज्ञान ना था।

इन्द्र ये ठान कर फोन पिक करता है, कि पिछली बात का कोई जिक्र नही करेगा नही तो वो फिर से नाराज़ हो जाएगी।

इन्द्र " हेलो स्वीटी... पता है अभी सपने में भी मैं तुम्हें ही देख रहा था।

" तुम्हारा सपना गया भाड़ में, पहले अपने सपूत को सुधारों।
सीता बड़े ही आवेश में बोल रही थी फिर उसके बाद अपने बेटे को फोन ज़बरदस्ती पकड़ा कर बोली " ले बात कर अपने बाप से अब यही बताएंगे तुझें।
बच्चा इन्द्र के गुस्से के भय से फोन लेने में आनाकानी करता है, पर सीता चण्डी माता का क्रोधित अवतार दिखा कर बालक को वो फोन पकड़ा ही देती है।

" हेलो..डे..डैडी....
वो जो मेरे क्लास में गुंडा विक्रम है ना सारी गलती उसकी है, उसने ही शुरुवात की थी।

इस बालक की आवाज़ इन्द्र को अजनबी सी लगी... तो इन्द्र ने अपनी शंका को दूर करने के लिए प्रति उत्तर में उस बालक का नाम दोहराते हुए कहा 

" अमित..? बेटा अमित तुम बोल रहे हो क्या...

" डैडी अमित नही मैं सुमित बोल रहा हुँ।

बालक इससे आगे और कुछ बोलता की इन्द्र किसी बात से भयभीत हो कर फोन कट कर देता है।
थोड़ी देर बाद सीता का फिर से कॉल आता है पर इन्द्र इतना डर गया कि वो फोन उठाने का साहस भी ना कर पाया, और फोन बार बार बजता रहा।

एकाएक इन्द्र के मन में विचारों का प्रहार होने लगा, और वो मन ही मन सोचने लगा।

अब तक उसके साथ घट रही अजीब घटनाएं क्या कम थी जो ये एक नई मुसीबत सामने आ गई,
इन्द्र को अछे से याद है, उसका केवल एक ही बेटा है अमित लेकिन ये सुमित नाम का बालक जिसे उसकी बीवी और वो बालक भी खुद को उसका बेटा कह रहे है।
उसका इन्द्र को कोई ज्ञान नही है इन्द्र इन सब को कोई बुरा सपना समझ कर भूलना चाहता है, और अपनी पत्नी के आते कॉल को अनदेखा कर पुलिस स्टेशन पहुँच गया,

पुलिस चौकी में इन्द्र के भीतरी उतपात और संग्राम का किसी को पता न चले इसलिए वो पूरी तरह से खुद को सामान्य रूप में ढाल कर ही चौकी में प्रवेश करता है। 

अपने भीतरी मनोभावों को बेहद कुशलता के साथ दबा कर जब वो पुलिस चौकी में अंदर घुसा तो उसको अपने सामने भानु नज़र आया,

" कल कहा थे यार पता है कल मुझे अकेले ही उन वहशी माता पिता से पूछताछ करने जाना पड़ा जिन्होंने अपने ही सुपुत्र की हत्या कर दी थी।
ये सब बोलते समय भानु इन्द्र को नाराज़गी के भाव दर्शा रहा था, अचानक वो उत्सुकता के भाव दर्शाने लगा और आगे बोला " पता है दोनों पती पत्नी साइको थे कमीने, पत्नी का तो मानसिक संतुलन फिर भी थोड़ा ठीक था, मगर वो साला पति पूरा पागल है साले ने अपनी पूछताछ के दौरान ही मुझ पर हमला कर दिया,

भानु की इस बात को सुन इन्द्र बड़े ही मुरझे हुए अंदाज से बोला 
" अच्छा...

भानु को इन्द्र का ये बेरुखा व्यवहार अजीब लगा, और उसने तुरंत अपनी बात को अधूरा छोड़ कर इन्द्र से उसके स्वास्थ्य वगैहरा के बारे में कुशल मंगल पूछा क्योकि भानु को वो सामान्य रूप के विपरीत बुझा बुझा सा लगा।

इस पर इन्द्र थोड़े जोशीले अंदाज़ में बोला " अबे कुछ नही हुआ, क्या होता मुझे।

भानु " फिर खोए खोए से क्यों लग रहे हो आज।

" अर्रे कुछ नही कुछ अजीब से केस देख कर दो दिन से सो नही पाया हूँ। इसलिए सुस्ती आ रही थी।

भानु " कौनसा अजीब केस पल्ले पड़ गया तुम्हारे।

 अब इन्द्र भानु को टालने के लिए और असली बात छुपाने के लिए उस बुढ़िया और उसके बेटे के बारे में बताता है, साथ मे ये भी बता देता है कि बुढ़िया का बेटा कोई और नही बल्की वही है जिसने इन्द्र को मकान दिखाया था और इसी बात से परेशान है कि जो व्यक्ति कुछ समय पहले मर गया उसका इन्द्र से मिलना असंभव है। और भानु को इन्द्र की बातों पर विश्वास हो जाता है कि इन्द्र सच्च बोल रहा है। 
पर भानु इस बात से अनजान था कि इन्द्र की स्थिति इससे भी भयंकर रूप में बदल गई है। भानु को जो इन्द्र ने बात बताई थी वो अधूरा सच था।
भानु इन्द्र को एक सलाह देते हुए बोला " देखो यार तुम मेरे बहुत ही गहरे दोस्त बन गए हो, हालांकि हमें मिले हुए अभी कुछ ही हफ्ते हुए है। पर इतने कम समय में भी तुमने मेरे साथ एक मजबूत रिश्ता कायम कर लिया है, और मैं ये भी जानता हूँ तुम्हारे लिए भी मेरा उतना ही महत्व है। जितना मेरे लिए तुम्हारा, इसलिए मेरी बात मानो और एक अच्छे से मनोवैज्ञानिक के पास जाओ, भले ही मेरे पास तुम्हारे सवालों का तर्कपूर्ण उत्तर ना हो, मगर मुझे विश्वास है एक डॉक्टर के पास अवश्य होगा,  मेरा एक खास मित्र है जो जाना माना मनोवैज्ञानिक है ये लो उसका कार्ड।
ये बोलकर भानु अपने पर्स में से एक विज़िटिंग कार्ड निकाल कर इन्द्र को पकड़ता है इन्द्र भी भानु की बातों में आ कर अगले दिन उस डॉक्टर से मिलने का बोल, कार्ड अपने पास राखलेता है। 
मगर अब भी इन्द्र संतुष्ट नही था उसको देख के साफ पता चल रहा था कि वो अपने साथ होती घटनाओं को किसी भी प्रकार का भ्रम नही मानता।

ये देख कर भानु इन्द्र से कुछ और बोलने वाला होता है, तभी इन्द्र के फ़ोन पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आता है।

इन्द्र " हेलो कौन बोल रहा है।

 " कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, कहा से बोल रहा है, ये जानना इतना ज्यादा जरूरी नही होता।
जितना ये जानना जरूरी होता है कि सामने वाला क्या बोलता है।

इन्द्र " मतलब ...?


" सीधा सा मतलब है जो मैं बोलूंगा वो तुम्हारी जिंदगी बदल कर रख देगा।

इन्द्र " सस्पेन्स छोड़ो और मुद्दे पर आओ क्योंकि बेटा मुझे नही लगता कि तुमने सही नंबर लगाया है, नही तो एक पुलिस अफसर से कैसे बात करते है ये सब को पता है।


" हा.... हा.. हा... आपको क्या लगा मैं आपको जानता नही ऑफिसर.....
नाम.... इन्द्र
पत्नी का नाम....सीता
बच्चों का नाम.... सुमित और अमित....
नही...नही... रुको कानूनी और कागज़ी तोर से आपके दो बच्चे है, पर आपको लगता है। आपका एक ही बेटा है।
और तो और आजकल खुद के साथ हो रही अजीब घटनाओं में बुरी तरह घिरे पड़े हो, इतना बताना काफी है या और कुछ भी बताना पड़ेगा ऑफिसर।

इन्द्र के माथे से पसीना बहने लगा, उसको कुछ समझ नही आ रहा था ये हो क्या रहा है।
और सबसे बड़ी हैरानी इन्द्र के लिए ये थी कि अपने बेटे वाली जो बात उसने कभी अपने मन से बाहर ही नही निकाली वो इसको कैसे पता...?
इसलिए एक पुलिस अधिकारी होने के बाद भी इन्द्र की आवाज़ में अब वो रोब वो अकड़ नही रही जो एक पुलिस कर्मी में होती है। उसकी आवाज़ किसी लाचार व्यक्ति की गुहार जैसे सुर में परिवर्तित हो गई।

इन्द्र " तुम.. तुम हो कौन...?

" फिर से वही सवाल.. अब मेरी बात ध्यान से सुनो, अगर तुम्हें अपनी जिंदगी की पेचीदगी को सुलझाना है तो एक पता बता रहा हु उसको लिखो।
इतना बोल कर वो अज्ञात व्यक्ति इन्द्र को एक पता बताता है, साथ ही उसको अकेले आने की चेतावनी भी देता है।
इन्द्र फोन को काट कर कुछ देर अपनी परिस्थितियों पर गौर करने लगता है, अभीतक भानु भी वही था और भानु इन्द्र की प्रत्येक प्रतिक्रिया को अपनी अनुभवी आँखो से भाप कर समझ जाता है कि जरूर कोई बड़ी बात है, इस पर भानु इन्द्र से खुल कर बात करने को बोलता है।
पर इन्द्र उसको अभी कुछ ना बता कर बाद में बताने का बोल कर अपने साथ चलने को बोलता है। इस बात पर भानु उसके साथ चलने के लिए राजी हो गया, पर पहले वॉशरूम से होकर आता हूं उसके बाद चलेंगे, ऐसा बोल कर भानु वॉशरूम में जाता है।
वॉशरूम में भानु अपना फोन निकाल कर किसी को कॉल करता है जिस को भानु कॉल करता है उसका नंबर भानु ने save नही कर रखा था बल्कि याद कर रखा था, भानु फ़ोन पर अपने सामने हुई इन्द्र की बातों के बारे में बताता है, भानु ने केवल एक तरफा बात सुनी थी इसलिए वो सामने वाले को पूरी जानकारी नही दे पाता और भानु की बात पूरी होते ही दूसरी ओर वाला व्यक्ति भारी आवाज़ में बोला 
" ठीक है तुम होशियारी से इन्द्र का साथ बनाए रखना, इसके बाद तुम जानते हो तुमको क्या करना है।

भानु इतनी बात सुन कर अपने फोन को रिसेट कर, इन्द्र के साथ निकल गया।

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