Hone se n hone tak - 24 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories PDF | होने से न होने तक - 24

होने से न होने तक - 24

होने से न होने तक

24.

कौशल्या दी ने दीपा दी से फोन पर मिलने आने की बात पहले से तय कर ली थी इसलिए वे प्रतीक्षा करती हुयी ही मिली थीं। वे सुस्त थीं पर...पर व्यथित नहीं लगी थीं। शायद सारे आरोपों के निबटारे का सुकून था चेहरे पर। सच तो यह है कि ग्रान्ट्स के मिसएप्रोप्रिएशन को लेकर शशि अंकल और वे दोनो ही किसी सीमा तक फॅस सकते थे। शायद इसीलिए वे थोड़ी दुखी लगी थीं पर साथ ही थोड़ी शॉत और शायद चेहरे पर भयमुक्त हो जाने का एक निश्चिन्त भाव भी। जैसे किसी असाध्य रोगी की महीनो बरसों सेवा करते अनायास उस रोगी का गुज़र जाना। एक प्रिय साथ के छूट जाने की पीड़ा के बीच ही लंबी थकान से मुक्त हो पाने की शॉति और ऑखो में आराम का भाव भी लगा था मुझे। हम सब लोग बहुत देर बैठे थे। बातचीत शशिकान्त अंकल, नए प्रबंधतंत्र और इस पूरे प्रकरण के इर्द गिर्द ही होती रही थी। सरला महेश्वरी की भी बात हुयी थी,‘‘उसके लिए तो शशि भाई भगवान बन गए’’ दीपा दी ने कहा था।

‘‘बल्कि भगवान ने तो उसकी ज़िदगी में बहुत कुछ बिगाड़ा, शशि भाई ने तो सिर्फ भला किया। जितना भला कर सकते थे उतना किया। पर शशि भाई भी,’’ कौशल्या दी ने असहमति में अपने सिर को झटका दिया था ‘‘शशि भाई ने तो न किसी का कुछ सुना ही न कुछ देखा ही। तुम ही क्या दीपा न जाने कितनी बार मैंने कहा था उनसे शशि भाई कुछ देख कर, कुछ डर कर चलिए। पर उन्होने किसी की सुनना तो सीखा ही नहीं था।’’

दीपा दी लगा था क्षण भर के लिए अचकचा गयी थीं। स्टाफ में हम सभी को मानती हैं वे। लगभग सभी से अंतरंग हैं पर फिर भी एक तरह की दूरी उनसे हमेशा ही रही है। उनके और हमारे बीच में हमेशा ही विद्यालय की मर्यादा लक्ष्मण रेखा जैसी खिंची रही है जिसको लांघने का प्रयास हममें से किसी ने नही किया और न ही जिसको उन्होंने कभी भंग होने दिया।

दीपा दी का शॉत चेहरा उदास है। काफी देर तक जैसे कुछ सोचती रही थीं फिर धीरे से हॅसी थीं,‘‘कभी कभी सही ग़लत का कोई एकदम साफ आईना नहीं होता कौशल्या कि किसी इंसान, किसी एक्शन या किसी एपिसोड को उसके ऊपर खड़ा करके तौला जा सके सही या ग़लत इतना सही या इतना ग़लत। शायद शशि भाई जैसे लोगो को तो बिल्कुल भी नहीं। कहने वाले कह सकते हैं कि वह बहुत बहुत ग़लत थे,’’ वे क्षण भर के लिए चुप हो गयी थीं‘‘अब सरला महेश्वरी वाले एपिसोड को ही ले लो।कानूनी तौर से तो बहुत ग़लत किया उन्होंने। पर...पर हम लोग ग़लत कहॉ कह पाते हैं उन्हे। पर’’ फिर जैसे धीरे से बुदबुदायी थीं ‘‘शायद अपने बहुत से एक्शन्स में वे थे भी ग़लत...एकदम सही नही थे। पर अपनी सारी कमियों के बावजूद ही वास सिम्पली ग्रेट।’’ उनके स्वर में पीड़ा है।

काफी देर बैठने के बाद हम सब लोग उठ कर खड़े हो गये थे। दीपा दी हम लोगों को बाहर तक छोड़ने आयी थीं। चलने लगे थे तो एक बार फिर वे उन्ही की बात करने लगी थीं ‘‘बड़ी अजीब बात है ख़ुद ग़लत सही जो भी किया पर वे ईमानदार लोगो की कदर करते थे। ईमानदार और मेहनती स्टाफ की। तुम सब के पीछे भी तुम लोगो की तारीफ करते थे। हमेशा कहते थे आय अम प्राउड आफ माय टीचर्स। कहते थे कि मेरे कालेज की रीयल बिल्डर्स तो मेरी यही टीचर्स हैं।’’ वे फिर से भावुक होने लग गयी थीं,‘‘आप सबने बहुत अच्छा किया जो आप सब उनसे मिल आईं। इट वास वेरी थॉटफुल।’’शुभा दी ने हम सब की तरफ देखा था और उनकी निगाहैं मानसी जी पर ठहर गयी थीं,‘‘मानसी तुम ने बहुत साल उनके अन्डर काम किया है।’’

‘‘जी दीदी।’’ मानसी जी फीका सा मुस्कुरायी थीं,‘‘पूरे सोलह साल। यहॉ के जूनियर सैक्शन से नौकरी शुरू की थी। तब सिर्फ बी.ए. ही तो किया था। काम करते करते एम.ए. पी.एच.डी. कर लिया। क्वालिफिकेशन बढ़ती गयी और शशि अंकल हमे सीनियर सैक्शन में जगह देते गये। उनके जाते तक उन्होने हमे यहॉ तक पहॅुचा दिया।’’ मानसी बड़ी भावुकता से मुस्कुरायी थीं,‘‘पी.जी. कालेज। आज एम.ए. को सोश्योलॉजी पढ़ा रहे हैं। इस जैसा कालेज और यहॉ जैसा एडमिस्ट्रेशन न होता तो कहॉ तो इतना पढ़ पाते और कैसे इतना बढ़ पाते। जूनियर से पी.जी.कालेज।’’

अचानक मैंने मन में हिसाब लगाया था। सोच कर अजीब लगा था कि पॉच साल से ज़्यादा तो मुझे भी यहॉ काम करते हो ही गया हैं।

नए सैशन के लिए कालेज खुला था। लगा था कालेज के काम काज और रंग ढंग मे कोई भी अंतर नही आया था सिवाय अब गाहे बगाहे आने वाले शशि अंकल के दर्शन नही होते। टीचर्स के अटैन्डैन्स रजिस्टर पर हर वर्ष की तरह शशि अंकल की तरफ से नए सत्र की शुभ कामनाऐं भी नहीं लगी हैं। प्रबंधक के कमरे के आगे की नेम प्लेट बदल गयी है। नयी तख़्ती लग गयी है जिस पर ‘राम सहाय’ नाम लिखा है। पर इन छोटी छोटी बातों से रोज़ की ज़िदगी में कोई अन्तर नही पड़ा था। वैसे भी अधिकांश टीचर्स के लिए तो कोई फरक पड़ना भी नही था। पहले भी उनका प्रबंधक से कोई लेना देना नही था।

सुना था नए प्रबंधक संस्थापिका श्रीमती चन्द्रा सहाय के देवर के बेटे हैं। पर्दे के पीछे से यदा कदा एक लंबे गोरे और स्वस्थ व्यक्ति की झलक मिल जाती है। उन्होंने स्टाफ से कभी मुलाकात करने का कोई प्रयास नहीं किया था। स्टाफ के लिए उनका और उनके लिए स्टाफ का जैसे कोई वजूद नही था। सुना था फाइनैन्स की उलझने सुलझाने में लगे रहते हैं। यह भी सुना था कि रिटायर होने से पहले फायनैन्स सर्विस में थे। रिटायर्मैट के बाद लखनऊ आ गए हैं। इसी बीच हमारे कालेज का हिसाब किताब साफ करने मे लगे हैं। हर दिन सुबह ग्यारह बजे आते और दोपहर डेढ़ बजे चले जाते हैं। विद्यालय की व्यवस्था पूरी तरह से दीपा दीदी चला रही थीं। उसमें नए प्रबंधक की तरफ से किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नही था। कुल जमा सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था और दीपा दी काफी प्रसन्न और निशि्ंचत सी दिखने लगी थीं जैसे सब कुछ उनके नियंत्रण में आ गया हो। हालांकि एक आदत की तरह शशि कॉत भटनागर को वे यदा कदा छोटे बड़े न जाने कितने प्रसंगों पर याद करती रहतीं। हम सब भी उन्हें याद करते।

मीनाक्षी बहुत ख़ुश थी। उदय जी की जिस किताब का अनुवाद वह कर रही थी वह छप कर आ गयी है। मेज़ पर रखी हुयी उस मोटी सी किताब का कवर उसने पलट दिया था। पहले पृष्ठ पर लेखक और अनुवादक का नाम। मीनाक्षी ने अपनी हथेली को फैला कर दोनो नामो को एक साथ अपने हाथों तले ठक लिया था। उसके हाथों की मैनीक्योर की हुयी बहुत सुन्दर उंगलियॉ,बीच की उंगली में हीरे की छोटी सी अंगूठी जिसके बीच में एक चौकोर रूबी लगी है। कुछ क्षणों तक वह अपलक पलट कर रखे अपने हाथ को निहारती रही थी,‘‘उदय जी के साथ अपना नाम छपा देख कर बहुत अच्छा लग रहा है।’’उसके चेहरे पर दीवानापन है,‘‘किसी सपने के सच होने की तरह। कुछ साल पहले तक तो मैं ऐसी कल्पना भी नही कर सकती थी।’’वह धीरे से बुदबुदाई थी।

केतकी ने मीनाक्षी की तरफ देखा था और उदय जी को लेकर कोई हल्का फुल्का सा मज़ाक किया था। उसके चेहरे पर बड़ा मधुर सा भाव है।

मैंने और नीता ने पूरे संवाद को ही अनसुना कर दिया था,‘‘मीनाक्षी लगभग दो साल से तुम लगी थीं इस किताब के काम में। अब तो तुम्हे एक साथ ही बहुत हल्का और बहुत ख़ाली लग रहा होगा,’’ नीता ने कहा था।

मीनाक्षी ने अपने सामने रखी किताब के ऊपर अपनी पूरी हथेली घुमायी थी जैसे पुस्तक के उस पृष्ठ को सहला रही हो,‘‘नही नीता दी मैं अब ख़ाली नही बैठ सकती। मैने उनकी दूसरी किताब पर काम शुरू कर दिया है।’’

केतकी खिलखिला कर हॅसती रही थी ‘‘नीता, अब मीनाक्षी बिना उदय जी के नहीं रह सकती। इन सम ऑर द अदर वे शी हैस टू बी विद हिम।’’

नीता के चेहरे पर झुंझलाहट है पर वह चुप रही थी। हम दोनो ही जानते हैं कि केतकी से उस विषय पर कुछ भी कहने का मतलब उस विषय पर संवाद और विवाद को आमंत्रित करना है इसलिए हम दोनो ही ऐसे किसी भी प्रसंग को अनसुना कर देते हैं। पर केतकी के मन में जो आ जाता है उसे बिना पूरा कहे वह चुप नही हो सकती। केतकी ने नीता की तरफ देखा था ‘‘मैं मीनाक्षी से कह रही थी कि जब तुम उन्हे इतना प्यार करती हो तो यू मस्ट टैल हिम दैट यू लव हिम।’’उसके चेहरे पर कुछ ऐसा भाव है जैसे बड़े ज्ञान की बात कही हो।

नीता एकदम घबड़ा गयी थी,‘‘क्या बेवकूफी की बात कर रही हो केतकी। उससे फायदा?’’

काफी देर दोनो की बहस होती रही थी। वैसे हम दोनो ही यह बात जान गये हैं कि केतकी को समझाया नही जा सकता। अब शायद मीनाक्षी को भी नहीं।

कुछ दिन बाद मीनाक्षी ने ही हॅसते हुए बताया था कि उदय जी उसका प्रणय निवेदन सुन कर स्तब्ध रह गए थे,‘‘मीनाक्षी जी अगर मैं हैप्पिली मैरिड होता तो आपसे बड़ी उम्र की बेटी होती मेरी।‘‘

नीता ने तसल्ली की सॉस ली थी। मीनाक्षी के क्लास में चले जाने के बाद वह धीमें से फुसफुसाई थी,‘‘चलो कम से कम वे तो सैन्सिबिल इंसान हैं।’’

किन्तु नीता की तसल्ली व्यर्थ ही थी। मीनाक्षी ने एक बार मुह क्या खोला कि वह वाचाल हो गयी थी। जब विश्वामित्र जैसे ऋषियों की तपस्याए अप्सराओं ने भंग कर दी थीं तो फिर उदय जी बेचारे तो एक साधरण से दुनियावी इंसान ही तो थे। थोड़े दिन बाद देखा था कि उदय जी और मीनाक्षी के नियमित पत्राचार चलने लगे हैं। वे लखनऊ भी बार बार आने लगे हैं। शहर में होते तो वे दोनों काफी समय घर से बाहर घूम टहल कर बिताते...होटल,पिक्चर कभी कभी शहीद स्मारक में गोमती किनारे भी। नीता और मैंने उस मामले में उसके बाद एकदम ही मौन धारण कर लिया था। शायद अब कुछ भी समझाने बुझाने का समय निकल चुका था। वैसे भी मीनाक्षी कोई बच्ची नही है। फिर किसी की ज़िदगी में एक सीमा तक ही तो हस्तक्षेप किया जा सकता है, वह भी इतने निजी और अंतरंग रिश्तों में।

मीनाक्षी ने किताब के अनुवाद का काम पूरा कर लिया था। वह उसे अन्तिम रूप देने के सिलसिले में पंद्रह दिन के लिए दिल्ली गई थी। लौट कर आई थी तो बेहद ख़ुश दिख रही थी। ऊॅचा सा जूड़ा बनाए अपने कोट की दोनों जेबों में हाथ डाले वह हॅसते हुए सामने आ कर खड़ी हो गई थी,‘‘यू नो आई एम अ मैरिड वुमन नाउ।’’उस ने मेरे और नीता के सामने झुक कर मद्धिम स्वर में घोषणा की थी।

हम दोनों स्तब्ध रह गये थे। यह कैसी शादी ? कमरे में गेंदे की मालाऐं बदल लेने को वह शादी का नाम दे रही है। वह खिलखिलाती रही थी। उसी ने बताया था कि उस दिन शाम को वे दोनों टहलने गए थे। उदय जी ने उसके लिए गजरा ख़रीदा था और अचानक मीनाक्षी ने फूलों की दो लंबी सी मालाएॅ ख़रीद ली थीं,‘‘घर आ कर एक माला मैंने पकड़ ली थी और एक उन्हें पकड़ा दी थी...बेचारे...कनफ्यूस्ड,’’ वह खिलखिला कर बताती रही थी,‘‘दैन वी वर मैरिड।’’

अचानक मीनाक्षी ने नीता के हाथ पकड़ लिए थे,‘‘नीता दी मैं उनके बच्चे की मॉ बनना चाहती हूं।’’

केतकी मीनाक्षी के साथ चहकती रही थी। पर नीता और मैं? ख़ुशी दिखाने की कोशिश में बड़ी कठिनाई से ओंठ खिंच कर टेढ़े भर हो पा रहे थे।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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