अस्वत्थामा ( हो सकता है ) 15

 ऑफिस मे जिग्नेश सर और सुगंधा के बिच मे कुछ देर तक औपचारीक बाते होती रही। आखिर जिग्नेश सर ने जिस काम के लिए सुगंधा को बुलाया था वो मुदा छेड़ा । उन्होने सुगंधा से पूछा की तुम्हारे पिताजी की मृत्यु किस हालात मे हु़ई थी वो तुम जानती हो ? अपने पिता की मृत्यु के बारे मे सुनके सुगंधा ऑफिस की खिडकी से बाहर की ऒर ताकती हुई बोली। हा मै जानती हूँ। मेरी माँ ने मुजे सब कुछ बताया है। मुजे ये भी मालूम है की मेरे पिताजी पे उसीके दोस्त की जान लेने का इलजाम लगाया गया था। हालाँकि वो अभी तक साबित नहीं हो पाया है। बदनामी के डर से ही माँ और दादी मेरे जन्म से पहेले ही यहा जूनागढ़ आके बस गए थे। और गुमनामी की जिंदगी जीने लगे है। सुगंधा की बात सुनके जिग्नेश सर बोले सच मे तुम्हारी माँ और दादी ने बहोत कुछ सहा है। फिर वो सुगंधा को पूछते हुए बोले पर क्या सुगंधा, तुम्हे कभी भी अपने पापा की मौत और उनपे लगे इल्जाम के बारे मे सच जानने की इच्छा नहीं हुई ? ये बात सुनके सुगंधा गंभीर हो के बोली । आप सच नहीं मानेगे सर, पर ये सारे रहस्य की वजह से ही मे आज हिस्ट्री की प्रोफेसर बनी हूँ और यहा आप के सामने बैठी हूँ । जब से समज शक्ति आइ है तब से मे इसी गुत्थी के पीछे लगी हूँ। और ईस काम मे मुजे पापा के दोस्त प्रताप अंकल का बहोत सहयोग मिला है। सुगंधा की ये बात सुनके जिग्नेश सर कुछ चौक कर और ज्यादा अहोभाव से सुगंधा की ओर देखते हुए बोले, तो क्या तुमने अपने पापा के मौत की सारी गुत्थी सुल्जा ली ?  ये सवाल सुनके सुगंधा बोली नहि अभी तक तो नहीं । पर मे इतना तो यकीन से कहे सकती हूँ की ईश्वर अंकल की मौत के पीछे मेरे पापा जिम्मेदार नहीं है । सुगंधा की बात सून के जिग्नेश सर बोले  तुम्हारा यकीन सही है । तुम्हारे पापा की मृत्यु हुई उससे पहेले उनकी आखरी मुलाकात मुजसे ही हुई थी । मै तुम्हारे पापा के बारे मे और उनके साथ जूडे हुए लोगो के मृत्यु के बारे मे अब तक जो भी जान और समज पाया हूँ वो तुम्हे बताने के लिए ही आज यहा बुलाया है । तो सुनो.....

              ये सारी कहानी की शुरुआत किशनसिंह चावडा से हुई। वो एक होनहार और विलक्षण आर्कियोलोजिस्ट थे । और साथ मे ही ईश्वर मे परम आस्था रखने वाले एक सच्चे भक्त भी थे। क्यूँकि वो बचपन मे ही अपने दादा दादी के पास से रामायण और महाभारत की कहानिया सुनते थे। फिर जैसे जैसे वो खुद पढना लिखना सिख गए वैसे वैसे शूरुआत मे भक्ति भाव से ये सारे प्राचीन ग्रंथों का अपनी मातृभाषा मे अध्ययन करने लगे। इस तरह प्राचीन ग्रंथों का अभ्यास करते वक्त भगवान श्री कृष्ण के व्यक्तित्व की अमिट छाप उनके मन पर पडी । और बाल्यकाल मे ही वो पूर्ण रूप से कृष्ण भक्त बन गए । और पढ़ाई का शोख होने के कारण भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक लीलाओ के बारे मे शास्त्रों को पूज्य भाव से पढ़ते रहेते थे। फिर धिरे धिरे उम्र के साथ अक्ल (समज) भी परिपक्व हुई। और अब तक जिन पौराणिक शाश्त्रो को वो सिर्फ श्रद्धा और पूज्यभाव से पढ रहे थे । उनके प्रति मन मे अनेक प्रकार के मनो तरंग प्रगट होने लगे। पुराणों मे उल्लेखित कई सारी अलौकिक बातें और भगवान की असाधारण लिलाओ को पढकर पहेले वो उन ग्रंथों के सामने अहोभाव से नतमस्तक हो जाते थे । बजाए उसके अब वही सारी बातें उसके दिमाग मे बुद्धि के तराजुओ मे आधुनिक विग्नान की तुलाओ से तुलने लगती थी । तरुणाअवस्था के शुरुआती दौर मे किशन के दिमाग मे धर्म और विग्नान के बिच कई दिनों तक दंगल चलता रहा. एक और जन्म से ही विरासत मे मिली धर्म और ईश्वर के प्रति अटल श्रद्धा थी तो दूसरी और प्रोयोगो और परिक्षणो पे खरा उतरकर सिद्ध साबित होने वाला विग्नान था। और विग्नान की बाते रोजबरोज के जिवन मे भी सिद्ध साबित होती थी। जब दूसरी ओर पुराणो मे उल्लेखित अलौकिक बाते पढने और सुनने मे तो अच्छी लगती थी पर उन बातो को सच्ची साबित करना असंभव सा लगता था। जैसे जैसे किशनसिंह की बुद्धि परिपक्व होती गई वैसे  वैसे वो विग्नान की ओर ढलते गए। इस वजह से धर्म और धार्मिक कर्मकांडो पे उनकी श्रद्धा कमजोर पडने लगी। धीरे धीरे स्कूल के आधुनिक शिक्षण ने उनके जीवन को एक नई दिशा मे मोड दिया । जिससे बचपन मे दादा दादी और पास पडोस के लोगो से सुनी सुनाई कई सारी कहानिया और बातों पे डस्टर लग गया था । जिसमे परिओ और राजकुमारो की काल्पनिक कहानिया थी,  तो दूसरी और देवो और दानवो की ढेर सारी लोक कथाए थी।  जिसमे हम जिनके जन्मदिन आज भी बडी धूम धाम से मनाते है एसे भगवान राम और कृष्ण की अलौकिक लीलाए भी सामील थी। मानो इतना कम पडता हो एसे इसमे भूत पिसाच भी सामील हो गए थे। और कई बाते तो एसी भी थी जिसे याद करके भी किशनसिंह को अब हंसी आने लगती थी। क्यू की उसकी गली मे रहेने वाली एक बूढ़ी औरत को पूरे महोल्ले ने डायन मान लिया था। हालाकी कोई उस बूढ़ी औरत के मुह पे उसे कुछ नहीं कहेता था पर सब उससे दूरी बनाकर रखने मे ही अपनी भलाई समजता था । किशनसिंहजी के बचपन मे उनका दिमाग एसी कई सारी बातों से भर गया था जो  आम तौर पर उस समय मे लगभग हरेक बालक के दिमाग मे भर जाती थी। फिर जैसे जैसे बच्चे बड़े होकर स्कूल जाना शुरू करते थे वैसे वैसे उनके दिमाग से ये सारी बातो को आधुनिक शिक्षण का डस्टर लग जाता था और उनकी जगह परिपक्व और वास्तविक बाते लेने लगती थी। जिसमे भाषा, विग्नान , गणित ,  समाज, राज्य और देश की बाते सामील थी ।   

         अब किशनसिंह बडे होकर कोलेज मे आ चुके थे। यहा हि उसे अपने जीवनकाल मे महत्वपूर्ण दोस्त प्राप्त हुए थे। जिनमे ईश्वर पटेल, जगदीश उपाध्याय और प्रताप चौहाण भी सामिल थे। वैसे तो ये सभी लोग मुख्यतह अलग अलग विषयो के साथ अलग अलग फेकल्टी मे पढ रहे थे । पर इन सब के  बिच मे एक विषय कोमन था। और वो था संस्कृत। उस वक्त आर्ट्स हो कॉमर्स हो या सायंस हो किसी भी प्रवाह मे भाषा के एक विषय को पढना अनिवार्य था। जिसमे विध्यार्थिओ को कई सारी भाषाओ मे से किसी एक को विषय के रूप मे पसंद करने का विकल्प उपलब्ध रहेता था । जिनमे से ज्यादातर विद्यार्थी संस्कृत ही पसंद करते थे। इसका मतलब ये कतई नहीं था की संस्कृत सबका पसंदीदा विषय था। नहि बिलकुल नहि। १२ वि कक्षा तक संस्कृत को पढ के सब विध्यार्थि  जान चुके थे की संस्कृत एक बोरिंग सबजेक्ट है । इसके बावजूद भी संस्कृत पसंद करने वालो की तादात ज्यादा रहेति थी क्यूकि संस्कृत बोरिंग होने के बावजूद भी स्कोरिंग सब्जेक्ट था। और संस्कृत एक लौता ऐसा विषय था जो स्वयम एक भाषा होते हुए भी उसका पेपर संस्कृत और मातृभाषा गुजराती मे छपता था। और जवाब की भाषा पूर्णतह गुजराती रहेती थी । किशन ने भी इसीलिए ही संस्कृत को पसंद किया था ताकि उसमे आसानी से पासिंग मार्कस ला सके। और अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त अपने मुख्य विषय हिस्ट्री (इतिहास) की पढाई मे लगा सके। पर विषय पसंदगी के वक्त उसे कहा पता था की उसका ये ओप्शनल सबजेक्ट ही उसकी जिंदगी के मुख्य भाग को पलटने वाला साबित होगा।                

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