Hone se n hone tak - 28 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories PDF | होने से न होने तक - 28

होने से न होने तक - 28

होने से न होने तक

28.

राम सहाय जी दीपा दी की तरफ देख कर हॅसे थे,‘‘नहीं अब यहॉ मेरा काम ख़तम हुआ। चाची ने तो मुझसे कुछ महीनों के लिए काम संभालने की बात की थी। पता ही नही चला,मुझे तो यहॉ तीन साल हो चुके हैं। फाइनैन्स बुक्स एकदम ठीक हो चुकी हैं। आप सब ठीक से समझ गयी हैं। अब मैं यहॉ के लिए एकदम निश्चिंत हूं।’’उन्होने चपरासी को बुलाया था, जेब से रुपये निकाले थे और उससे सबके लिए चाय लाने के लिए कहा था,‘‘इस कालेज की फाउण्डर मेरी चाची हैं। चाची तब कालेज को लेकर बहुत परेशान थीं। मैं रिटायर हो कर लखनऊ आ रहा था। उन्हीं का आदेश मिला था कि मैं थोड़े समय के लिए...सब कुछ ठीक होने तक यहॉ का काम संभाल लूं।

मैं उनकी बात टाल नहीं सकता था। वैसे भी जिस कालेज को उन्होंने बनाया था और जिस संस्था पर अपना इतना पैसा, अपनी इतनी मेहनत ख़र्च की थी उसको बिगड़ते हुए देखकर हम सभी को तकलीफ थी।’’

‘‘बिगड़ते देख कर’’ शब्द शायद हम सब को चुभे थे। लगा था कौशल्या दी असहज होने लगी थीं। उन्होने कुछ कहने को मुह खोला था जैसे उनकी बात काटना चाह रही हों, पर चुप रही थीं। उनके चेहरे पर नकार पसरा रहा था। राम सहाय जी उनकी तरफ देख कर मुस्कुराए थे,‘‘पुराने मैनेजर के लिए आप सब का साफ्ट कार्नर पता है हम लोगों को...बट’’

दीपा दी बहुत धीरे से बोलीं थीं,‘‘सर वे स्टाफ के लिए फादर फिगर थे।’’ वे कुछ क्षण के लिए मौन हो गयी थीं जैसे शब्द ढूंड रही हों,‘‘शायद फाइनैन्स मे उन की तरफ से लापरवाहियॉ हुयी हैं पर उन्होने विद्यालय को बहुत बनाया और सॅवारा भी था। कालेज को प्रायमरी से डिग्री और फिर पोस्ट ग्रैजुएशन तक उन्होने ही पहुंचाया था।’’

‘‘बनाया और संवारा था सिर्फ इसलिए उन्हें मनमाने ढंग से फन्ड्स को इस्तेमाल करने की छूट नही दी जा सकती थी। यह तो वही बात हो गयी कि जैसे हमारे देश के नेता कहते हैं कि उन्होने सड़कें बनवायीं...बॉध बंधे...अस्पताल बनवाये। देखिये यह सब तो समय के साथ वैसे ही बनना था और अगर उन्होने ही बनवाए तो इसका मतलब यह तो नही हुआ कि तुम देश को नोच कर खा जाओ...डिस्गस्टिंग।’’उनका मुह बुरा सा बन गया था।

‘‘शायद आप ठीक कह रहे हैं। पर’’

‘‘मिस वर्मा कोई किन्तु परन्तु नहीं। आप को एक मित्र की तरह, एक वैलविशर की तरह राय दे रहा हूं कि इस कुर्सी पर बैठ कर यू शुड बी वेरी केयर फुल। आगे कभी भी ऐसी स्थिति आए तो या तो...या तो सही के लिये अड़ जाईए या कुर्सी छोड़ दीजिए। नहीं तो बहुत परेशानी में फॅस सकती हैं आप। इस बार तो...’’ उन्होंने अनायास अपना वाक्य आधा छोड़ दिया था।

‘‘जी। मैं जानती हूं।’’ दीपा दी ने धीमे से कहा था। वह अचानक सुस्त लगने लगी थीं, ‘‘आप ठीक कह रहे हैं।’’

तभी चाय आ गयी थी। राम सहाय जी ने प्याला उन की तरफ बढ़ाया था,‘‘चाची का आदेश था कि सारी बातें अन्दर ही अन्दर निबट जानी चाहिए। वे नहीं चाहती थीं कि किसी भी मुद्दे पर कालेज की या कालेज से जुड़े किसी व्याक्ति की बदनामी हो। वह यह भी चाहती थीं कि शशिकान्त भटनागर किसी तरह की परेशानी में न फॅसे। उनसे ज़्यादा पूछतॅाछ भी नही की जाए।’’ वे व्यंग भरा हॅसे थे, ’’वे चाहती थीं कि उनकी इज़्ज़त का पूरा ख़्याल रखा जाए।’’ उन्होने प्याले से निगाह उठा कर दीपा वर्मा की तरफ देखा था,‘‘यह उनका आदेश था...अदरवाइस’’ कुछ क्षण के मौन के बाद उन्होने जैसे हताशा में सिर को हिलाया था,‘‘वैसे तो...। वैसे तो दैट मैन शुड हैव बीन थ्रोन बिहान्ड द बार्स।’’

हम सब सन्न रह गये थे। हम में से कोई भी कुछ भी नहीं बोला था। कमरे में जैसे सन्नाटा छा गया था...जैसे उनके वे सख्त शब्द देर तक हवा में तैरते रहे थे।

राम सहाय जी के कमरे से लौट कर आए तो मानसी जी बीच में से सीधे क्लास लेने चली गयी थीं। मैं और कौशल्या दी आ कर ख़ाली पड़े स्टाफ रूम में बैठ गये थे और वहीं की बातें करते रहे थे।

‘‘आज शशि भाई की बहुत याद आयी। अजब सा लगा सोच कर कि जो कुर्सी शशि भाई की थी उस पर बैठ कर आज कोई दूसरा इंसान उनके लिए कुछ भी कह रहा है और हम चुपचाप सुन रहे हैं।....पर शशि भाई भी तो...।’’ वे सिर को अजब तरह से हिला कर चुप हो गयी थीं।

‘‘मैं अभी वही बात सोच रही थी। दीदी जब राम सहाय जी को शशि अंकल के लिए हम सब का साफ्ट कार्नर पता है तो उन्हें हम सब के सामने ऐसी बात करनी ही नही चाहिए थी।’’

‘‘वह इतना कुछ ग़लत भी नही कहते अम्बिका। शशि भाई भी तो।.’’जैसे फुसफुसा कर दीदी ने कहा था।

‘‘फिर भी दीदी। मुझे तो लगा था कि आप रिएक्ट करेंगी शायद।’’

मैने कहा तो दीदी काफी लंबे क्षणो तक मेरी तरफ देखती रही थीं जैसे कही और हों,जैसे किसी गहरी सोंच में हों, ‘‘मैं?’’ दीदी ने अजब तरह से पूछा था पर वह सवाल नहीं था सिर्फ एक बात थी,‘‘मैं क्या कह सकती थी अम्बिका,’’ दीदी बहुत देर तक चुप रही थीं। कुछ कहने के लिए मुह खोला तो लगा था कि क्षण भर के लिए हिचकिचाई हैं वह,‘‘कालेज में फन्ड्स की गड़बड़ी के बारे में चन्द्रा जी को मैंने जा कर बताया था अम्बिका।’’ दीदी की घुटी हुयी सी आवाज़ जैसे मन पर कोई बहुत बड़ा बोझा हो। जैसे उस बोझ को वे अकेले संभाल न पा रही हों।

दीदी की उस बात से मैं स्तब्ध रह गयी थी,‘‘आपने जा कर बताया था? मतलब?’’

‘‘हॉ अम्बिका।’’दीदी का उदास स्वर, ‘‘मैंने जा कर बताया था। शशि भाई जागीरदारों के ख़ानदान से थे। बाकी भाई अच्छे निकल गये। सबसे बड़े भाई हूस्टन में हार्ट सर्जन, दूसरे भाई सीनियर ब्यूरोक्रैट, बहनोई बार एट लॉ। वैसे भी बहुत पैसे वाले लोग थे वे। शशि भाई सब से छोटे थे। कुछ बिगड़ी आदतें और कुछ किस्मत। कभी कुछ ख़ास कर ही नहीं पाए। पर शौक और ख़र्चे रईसों वाले। कालेज के लिए किया भी बहुत...दौड़ भाग कर के ग्रान्ट्स लाना,इधर उधर से डोनेशन जमा करना। पर दूसरी तरफ पैसे का गड़बड़ भी ख़ूब किया। इधर कुछ समय से तो शशि भाई की ज़रूरतें और हिम्मत दोनो ही बहुत बढ़ गए थे। कितनी मदों की पूरी पूरी ग्रान्ट्स उन्होने घपले में डाल दी थी। कुछ ऐसी ग्रान्ट्स आई थीं जिनका युटिलाइज़ेशन सिर्फ पेपर्स पर हुआ था। दीपा बेहद डरी हुयी रहने लगी थीं। कई बार नौकरी छोड़ने के लिए सोचती पर वह भी तो इतना आसान नही था। आने वाली नयी प्रिंसिपल एक एक चीज़ का गिन कर हिसाब लेती। उस स्थिति में वह क्या करती। असल में शुरू में दीपा ने उन्हें गार्जियन फिगर माना। जैसा वे चाहते वह वैसा ही कर देती। जहॉ कहते वहीं पर दस्तख़त कर देती। नया नया कालेज बना था। वैसे भी वे मिसेज़ चद्रा सहाय के सिर चढ़े भाई थे। दीपा को ही क्या हम सभी को लगता जैसे वे यहॉ के मालिक हों...किंग...लॉ मेकर...अबव द रूल्स आफ द लैंण्ड। उनके परे नियम कानून सोचने समझने की ज़रूरत ही नहीं लगी उसे। धीरे धीरे समझ आई तो देर हो चुकी थी। वैसे भी वे किसी की सुनने वालों में थे भी नहीं।

दीपा यह भी जानती थीं कि यदि उसने कालेज छोड़ना भी चाहा तो...’’ कौशल्या दी अपना वाक्य अधूरा छोड़ कर खिसियाया हुआ सा हॅसी थीं जैसे किसी बात की सफाई दे रही हों,‘‘इन अ वे दीपा वास वेटिंग हर डूम। तब एक ही रास्ता समझ में आया था कि मैं फाउन्डर मिसेज़ सहाय को सब साफ बता दूं। मैं उन्हे बचपन से जानती थी। मैं उन्हे मौसी कह कर पुकारती थी। वे मौसी की दोस्त थीं। दीपा उन्हे इतना नहीं जानती थीं। हम दोनो को उन पर इतना भरोसा था कि वह यह बात किसी को नही बताऐंगी और यह भी कि वे शशि भाई को किसी मुसीबत में नही फंसने देंगी। आख़िर वे उनके सगे छोटे भाई हैं और वे उन्हे बहुत प्यार करती हैं।’’ कुछ क्षण चुप रहने के बाद कौशल्या दी बोलीं तो लगा जैसे वे सफाई दे रही हों...जैसे वे माफी मॉग रही हों...पता नही किससे, ‘‘शायद दीपा के पास कोई और रास्ता बचा भी नही था। मैने इसीलिए दीपा की मदद की थी। वैसे भी शशि भाई जिस तरह से बेधड़क हो कर पावर का मिस यूस कर रहे थे उसके लिए मेरे मन मे उनके ऊपर बहुत गुस्सा था। मुझे लगता कि अब कालेज को उनके हाथो से बचाया जाना ज़रूरी है इसलिए,’’ कौशल्या दी काफी लंबे क्षणों के लिए चुप हो गयी थीं, ‘‘जो कुछ हुआ’’ वह कुछ क्षणों के लिए अटपटायी थीं जैसे अपनी बात कहने में तकलीफ हो रही हो,‘‘मतलब मैंने जो कुछ भी किया...वह शायद दीपा ही नहीं शशि भाई के लिए भी वही बेहतर हुआ कि चद्रा जी की ज़िदगी मे ही सब सुलझ गया नही तो यह सब इन दोनों को,’’ उन्होने अपनी बात फिर से आधी छोड़ दी थी। वे कुछ क्षणों के लिए मौन हो गयी थीं। वे फिर बेहद फीका सा मुस्कुरायी थीं ‘‘तब भी अम्बिका शशि भाई के लिए बहुत बुरा लगता है। बेहद गिल्टी फीलिंग होती है। शशि भाई ने एक बार नहीं कई बार मुझे मुसीबतों से उबारा था। बीसीयों साल पुरानी बात हो गयी। चन्दर जी ने सीमैंण्ट का बिसनैस किया था। हमारे एरिया में वाटर लागिंग हुयी थी...सुना था कि घर तक पानी आ सकता है,’’ दीदी खिसियाया सा हॅसी थीं, ‘‘शाम हो चुकी थी। कितनी अजीब बात है अम्बिका कि उस क्षण मुझे सारी दुनिया के बीच शशि भाई ही याद आए थे,’’ दीदी की आवाज़ पसीजने लगी थी ‘‘मिनटों के अन्दर न जाने कहॉ कहॉ से मदद जुटा कर वे पहुंच गए थे और पूरी रात हमारे घर बैठे रहे थे और नीचे के गोदाम ख़ाली करा कर ऊपर छत पर सामान पहुंचवा दिया था।’’ वे कुछ क्षण चुप रही थीं, ‘‘एक बार इसी बिसनैस को लेकर सेल्स टैक्स की कुछ प्राब्लम्स आयी थीं तब भी मैं शशि भाई के पास ही मदद के लिए दौड़ी हुयी गयी थी और उन्होने ही सुलझवाया था सारा झंझट। चन्दर जी बिसनैस संभाल ही कहॉ पाए। सब बंद ही हो गया था तब भी शशि भाई ने ही अपनी तरफ से मुझे नौकरी का आफर भेजा था। वे दूर बैठे ही मेरी ज़िदगी की प्राब्लम्स समझ गये थे।’’ कौशल्या दी की ऑखों में पानी भरने लगा था,‘‘उनसे मैं नौकरी मॉगती उस से पहले ही उन्होने मुझे नौकरी के लिए मॉग लिया था। ही वास सिम्पली ग्रेट अम्बिका। कभी कभी सोच कर बहुत ज़्यादा तकलीफ होती है कि मैंने उन्हें यहॉ से हटवाया।’’ उन्होने मेरी तरफ देखा था,‘‘दिस कालेज वास हिस लाइफ...हिस प्राइड अम्बिका। कालेज के अलावा उन की ज़िदगी में करने के लिए और था ही क्या। परिवार में,दोस्तों के बीच, शहर में कालेज ही उनकी पहचान था...एण्ड आइ न्यू दिस थिंग...तब भी। तब भी आई डिड दिस टू हिम।‘‘

मैं चुपचाप बैठी रही थी। समझ ही नही आया था कि मैं क्या बोलूं। मैंने इतने सालों में पहली बार उनको इस तरह किसी बात पर यूं व्यथित होते देखा है। नहीं तो सही ग़लत पर हमेशा ही उनका बहुत व्यवहारिक रवैया होता है...एकदम साफ सीधा और द्विविधाविहीन। कौशल्या दी फींका सा हॅसी थीं,‘‘जब मन शशि भाई को ले कर बहुत बेचैन होता है तब हमेशा ही मैं अपने को यही समझाती हूं कि शायद सब सही ही हुआ...शायद दीपा, कालेज और शशि भाई तीनों के लिए ही भला हुआ यह। चंद्रा जी के बाद उन दोनो को ही कोई भी बचा नही पाता। यह पूरा मैनेजमैण्ट उन दोनो को नोच कर खा जाता। सुना न तुमने क्या कह रहे थे राम सहाय जी...दैट मैन शुड हैव बीन थ्रोन बिहान्ड द बार्स।’’वह जैसे धीरे से फुसफुसायी थीं,‘‘आज राम सहाय जी की बात सुन कर और ज़्यादा लगा कि शायद सही ही हुआ सब कुछ...फिर भी’’ वे एकदम से चुप हो गयी थीं और फिर काफी देर चुप ही रही थीं।

मैं भी चुप बैठी हूं। किसी के गहरे राज को जानने का बोझ मन पर महसूस होने लगा था,एक अपराध की तरह। कभी कौशल्या दी को यह अफसोस न लगे कि किसी कमज़ोर क्षण में उन्होने मुझे यह सब क्यों बता दिया।

‘‘कई बार मन में आता है अम्बिका कि किसी दिन यदि यह बात शशि भाई को पता चल गयी तो कितनी तकलीफ होगी उन्हें। पर क्या कर सकती हूं मैं?’’ उन्होंने हताशा भरी निगाह से मेरी तरफ देखा था। कुछ क्षण तक जैसे सोचती रही थीं और वैसे ही ठहरी हुयी निगाह से मुझे देखती रही थीं। फिर मजबूर सा मुस्कुरायी थीं, ‘‘हालॉकि मुझे उतना भी भरोसा है उन पर कि यदि वैसा हुआ भी किसी दिन तब भी वे मेरी मजबूरी समझेंगे।’’

मुझे लगा था कि कितने अद्भुत व्यक्ति हैं शशि अंकल जिन पर इतनी बड़ी बात के बाद भी कौशल्या दी भरोसा कर पा रही हैं। मैं यह भी जानती हूं कि वह भरोसा ग़लत भी नहीं है।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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कहानी अधूरी है

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करता यह कहानी अधूरी है