होने से न होने तक - 32

होने से न होने तक

32.

नये तंत्र के साथ वह पहला साल ऐसे ही बीत गया था। शुरू शुरू में इस तरह की बातें सुनते तो मन बेहद आहत महसूस करने लगता। धीरे धीरे मिसेज़ चौधरी के इस तरह के वक्तव्यों को सुनने की आदत हम सब को पड़ने लगी थी, प्रबंधतंत्र से दूरी की भी। विद्यालय से अजब सा रिश्ता हो गया था। कालेज की गतिविधियों से न तो हम लोग पूरी तरह से जुड़ा हुआ ही महसूस कर पाते न पूरी तरह से कट ही पा रहें थे। कालेज की हवाओं में एक बेगानापन रच बस गया था।

प्रदीप कालेज में मिलने आए थे। सीधे नीता के कमरे में गये थे। नीता ने मुझ को भी अपने कमरे में ही बुला लिया था। प्रदीप ने ही कहा था नीता से मुझ को बुला लेने के लिए। प्रदीप मीनाक्षी का छोटा भाई है। वह आर्मी में कैप्टन है और आजकल आया हुआ है...शायद मीनाक्षी के ही कारण। कुछ देर चुप बैठा रहा था। उसके चेहरे पर दुख और क्रोध है।

उसने नीता की तरफ देखा था,‘‘दीदी मॉ चाहती हैं कि आज कालेज के बाद शाम को आप’’ फिर उसने मेरी तरफ देखा था,‘‘अम्बिका दी’’ वह कुछ क्षण को रुका था, उसकी आवाज़ क्रोध से रुॅध गई थी,‘‘और वह मीनाक्षी की बैस्ट फ्रैन्ड केतकी शर्मा उधर हमारे घर आ जाऐं।’’ लगा था वह अपने गुस्से और हताशा को साध नहीं पा रहा है।

‘‘क्यो प्रदीप ?’’ नीता ने परेशान हो कर पूछा था।

‘‘मम्मी चाहती हैं,’’एक क्षण को वह फिर चुप हो गया था फिर उसका स्वर अटपटा गया था ‘‘बात करने के लिए उस उदय जोशी को भी बुलाया है।’’

‘‘उदय जोशी?’’ नीता को एक क्षण लगा था समझने में। प्रदीप ने बेहद हिकारत और असम्मानजनक ढंग से लिया था वह नाम।

‘‘पर प्रदीप हम लोग क्या करेंगे वहॉ आ कर। वह तुम्हारा फैमिली मैटर है। फिर हो सकता है डाक्टर उदय जोशी को हम लोगों का वहॉ होना अच्छा न लगे। हो सकता है मीनाक्षी को भी अच्छा न लगे।’’

प्रदीप ने जैसे गुस्से से दॉत किटकिटा लिए थे,‘‘टू हैल विद दैट बास्टर्ड। टु हैल विद मीनाक्षी आलसो। मम्मा चाहती हैं कि आप तीनों आऐं।’’ प्रदीप कुछ क्षण चुप रहा था,‘‘फिर यह फैमिली मैटर रहा कहॉ दीदी। मीनाक्षी दी ने तो घर की इज़्ज़त को चौराहे पर उछाल दिया। कहीं मुह दिखाने लायक भी नही रखा। उस उदय जोशी की पूरी फैमिली को जानते हैं हम लोग। उनकी वाइफ को भी। क्या कहें उनसे? आप ही बताईए?’’

उदय जोशी की पत्नी की बात सुन कर हम दोनों ही स्तब्ध रह गये थे पर दोनो ही चुप रहे थे। हम लोग प्रदीप के साथ कोई नया संवाद छेड़ना नही चाहते थे। पर हम दोनों ने परेशान हो कर एक बार एक दूसरे की तरफ देखा था। तभी उस ने जैसे हुॅकारी भरी थी,‘‘आप सब तो जानती ही रही होंगी कि क्यों जा रही हैं मीनाक्षी दिल्ली...’

नीता एकदम हड़बड़ा गयी थी, ‘‘प्रदीप हमें सच में नहीं पता था। जहॉ तक हम समझ पाते हैं मीनाक्षी कुछ प्लान बना कर तब वहॉ गयी भी नहीं थी। वह उसका एकदम इम्पलसिव एक्ट था। शायद उसने ख़ुद भी नही सोचा था वैसा।’’

‘‘सब नाटक है दीदी।’’ प्रदीप की आवाज़ मे अविश्वास है। वह जाने के लिए उठ कर खड़ा हो चुका था। वह चलते चलते एकदम रुक गया था और फिर से नीता के सामने की कुर्सी पर बैठ गया था,‘‘आप लोगों को पता होता तब क्या करते आप लोग? तब क्या आप हमें उसके शादी करने से पहले ख़बर करते ?’’

नीता कुछ क्षण को सकपकाई थीं फिर उसने बहुत ईमानदार निगाह से प्रदीप की तरफ देखा था,‘‘नहीं प्रदीप। शायद नहीं करते ख़बर।’’

प्रदीप व्यंग मे भरा सा सस्वर हॅसे थे,‘‘हो गयी न वही बात दीदी। मैं भी तो वही कह रहा था।’’

नीता कुछ क्षण चुप रही थी जैसे किसी गहरे सोच में हो। उसने प्रदीप की तरफ देखा था,‘‘पर हॉ शायद मीनाक्षी को समझाने की कोशिश ज़रूर करते।’’

‘‘ख़ैर उतना ही काफी है।’’ प्रदीप कुर्सी पर आगे को झुक गया था,‘‘एक काम करिए दीदी। आप लोग उससे रिश्ता तोड़ लीजिए। बायकॉट कर दीजिये उसका। बात करना बंद कर दीजिए उससे। कमर टूट जाएगी उसकी। चार दिन में अकल ठिकाने आ जाएगी और सीधे घर लौटती दिखेगी। अभी आप सब की शह मिली हुयी है न उसे।’’

मैं एकदम से हड़बड़ा गई थी पर नीता शॉत रही थी। उसी शॉत लहज़े मे उसंने जवाब दिया था,‘‘वह हम लोग नही कर पाऐंगे भैया। वह हम लोग नहीं करेंगे। फिर उससे फायदा?’’

प्रदीप फिर से व्यंग में भरा सा सस्वर हॅसे थे,‘‘हम लोग पहले ही जानते थे।’’

‘‘प्रदीप उससे कुछ फायदा नहीं। फिर उसने सही किया या ग़लत किया...उसे इस तरह से अकेला कैसे छोड़ा जा सकता है। मैं तो कहूंगी तुम लोग भी वैसा मत करो। डोन्ट डू दिस टू हर। वैसे भी भैया, जो होना था सो हो चुका। अब तुम कुछ भी अनडू नहीं कर सकते। फिर उससे होगा क्या। अब तुम भी अपना मन शॉत करो और अम्मा को भी शॉत करने की कोशिश करो। उनकी उम्र हुयी अब। वैसे भी ब्लड प्रैशर की मरीज़ हैं। चीज़े और उलझाने से कोई फायदा नही, साथ में ज़िदगियॉ भी उलझेंगी।’’

‘‘सो तो उलझ चुकीं दीदी, थैंक्स टॅू योर फ्रैन्ड। उस केतकी शर्मा के साथ रह कर ज़्यादा दिमाग ख़राब हो गया है इनका। मीनाक्षी क्या समझती हैं कि जो चाहे वह करेंगी और हम सब चुपचाप मान जाऐंगे।’’ प्रदीप के स्वर में धमकी है। प्रदीप उठ कर खड़े हो गये थे। वह कुछ देर तक चुपचाप खड़े रहे थे और फिर एक झटके से कमरे से बाहर चले गए थे। दुआ सलाम कुछ भी नहीं।

‘‘अब?’’ मैं ने पूछा था।

‘‘अब क्या?’’ नीता ने प्रश्न किया था।

‘‘अब हमें क्या करना है? उन्होने बुलाया है।’’

नीता मेज़ पर रखे ख़ाली प्यालों को उठा कर पीछे के साइड बोर्ड पर रखने लगी थी,‘‘चलना होगा अम्बिका। आण्टी ने बुलाया है। उन्हे कैसे इग्नोर कर सकते हैं।’’

‘‘चलने से फायदा?’’मैंने बचना चाहा था। मैं तो हमेशा की पलायनवादी रही हूं...समय आने पर शुर्तुमुर्ग की तरह ऑखें बन्द करके अपनी गर्दन अपने ही भीतर समेट लेने वाली।’’

‘‘नुकसान भी नहीं है। फिर हमें तो अपनी ड्यूटी पूरी करनी है।’’

‘‘कौन सी ड्यूटी ?’’

‘‘उस परिवार के दुख में शामिल होने की।’’

‘‘मतलब’’ मेरे मॅुह से अपनेआप निकला था।

‘‘आण्टी का दुख...मीनाक्षी का दुख।’’नीता ने जैसे अपने आप से कहा था।

मुझ को अजीब लगा था,‘‘मीनाक्षी का दुख ?’’ मैंने अचरज में भर कर पूछा था।

नीता ने कुछ कहने को मॅुह खोला ही था कि केतकी आ गयी थी। उसे प्रदीप के आने के बारे में बताया था। आण्टी ने हम तीनों को बुलाया है। यह भी बताया था कि उदय जी भी पहॅुच रहे हैं। कंधे से पर्स उतार कर रखती केतकी उसी मुद्रा में खड़ी रह गयी थी। कन्धे पर रखा हुआ हाथ वहीं ठहर गया था। उसकी आखों में तेज़ी आ गयी थी,‘‘क्यों बुलाया है हमें ? फिर उदय जी क्यों पहुंच रहे हैं वहॉ ? पूअर फैलो। क्या सोंच रहे हैं दामाद जी का टीका अर्चना करेंगे वे लोग? ख़ुख्वार हैं वे सब लोग।’’ वह काफी देर तक गर्दन हिला कर परेशान होती रही थी,‘‘वह नार्मल फैमिली नही है नीता।’’

नीता ने मेरी तरफ देखा था फिर केतकी की तरफ। उसने बहुत हिचकते हुए पूछा था,‘‘केतकी उदय जी पहले से मैरिड हैं क्या? उनकी वाइफ भी हैं?’’

नीता का वाक्य पूरा भी नही हो पाया था कि केतकी जैसे एकदम बिफर पड़ी थी,‘‘उसको मैरिड होना कहते हैं नीता। बीवी होना ही क्या असलियत में मैरिड होना होता है। पूअर फैलो। ही हैस नैवर लिव्ड विद हर...रादर शी हैस नैवर लिव्ड विद हिम।’’केतकी ने अपने विशिष्ट अॅदाज़ में अपनी दो उंगलियॉ अपने माथे से छुआईं थीं,‘‘बस उस औरत ने उनके माथे से मैरिड की चिप्पी चिपका दी है...बड़ी सी।’’ उसने अपनी पूरी हथेली को अपने पूरे आकार में फैला दिया था।

हम दोनों को ही लगा था,‘‘फिर भी’’ पर दोनो ही चुप रहे थे। अब उस सब पर बात करने से कोई लाभ भी नहीं। पर यह पूछने का मन ज़रूर किया था कि क्या केतकी जानती थी यह बात पहले से? पर उस विषय में भी दोनो चुप ही रहे थे। शायद उस विषय पर वाद विवाद संवाद सबका समय निकल चुका है अब, यह बात हम दोनों बहुत अच्छी तरह से समझ रहे हैं। किन्तु मीनाक्षी को लेकर मन की पीड़ा कई गुना अधिक हो गयी थी। पता नहीं क्यों केतकी पर झुंझलाहट भी।

कालेज मे जितनी भी बात केतकी से हुयी थी हम दोनो को लगा था कि वह मीनाक्षी के घर नही जाएगी। पर नीता अपनी गाड़ी बंद ही कर रही थी कि हम लोगों ने केतकी की गाड़ी मुड़ती देखी थी। हम दोनों वहीं खड़े होकर उसके पहुॅच जाने का इंतज़ार करते रहे थे। हम तीनों ने डरते डरते घर के अंदर कदम रखा था जैसे किसी ग़मी के घर में घुसा जाता है। धीमें से बिना आवाज़ के लॉन का फाटक खोला था। बाग की तरफ खुलने वाली ड्राईंगरूम की खिड़की से अलग अलग सोफों पर बैठे मीनाक्षी और उदय जी दिखे थे। उन दोनों की इधर पीठ है। बाकी पूरा कमरा ख़ाली है। हम लोगों को पता नही क्या हुआ था कि उधर की तरफ न जा कर पीछे की सर्विस लेन से अंदर घर की तरफ बढ़ लिए थे। बराम्दे में ही आण्टी चाचा और प्रदीप खड़े मिले थे...परेशान और चुप से। हम लोग अभिवादन करके वहीं खड़े हो गए थे। डाक्टर ए.के.जोशी और उनकी वाईफ को भी बुलाया है आण्टी ने बताया था।

कुछ क्षण की अचकचाहट के बाद हम लोग समझ पाए थे। ए.के.जोशी मतलब उदय जी के भाई भाभी। उनके पहुंचने का इंतज़ार किया जा रहा है। अभी तक मीनाक्षी और उदय जी से कोई बाहर जा कर नहीं मिला है। न वे लोग ही घर के भीतर आए हैं...मीनाक्षी तक नहीं।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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