विदा रात - 1 in Hindi Social Stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | विदा रात - 1

विदा रात - 1

सर्दियों के मौसम की एक बेहद ठंडी रात।
रात केे बारह बज चुके थे। बरखा के सास  श्वसुर और   ननद कब के  अपने अपने कमरों  में सो चुके थे।बरखा भी इस समय तक रोज़ सो जाती थी।लेकिन आज उसकी आँखों मे नींद नहीी   थी।
         बरखा ने शेखर से  सबंध विचछेद का  निरणय कर लिया था।अपने निरणय की सूचना वह उसे देना चाहती थी।वह अभी घर नहीं लौौटा था।इसलिए वह जगकर उसका इन्तजार कर रही थी।
        बरखा की शादी शेेेखर से दो साल पहले  हुई थी।शादी के बाद काफी दिनों तक  बरखा का ध्यान पति की उस  कमी ली तरफ नही गया था।एक दिन अचानक उसका ध्यान गया।फिर  भो नारी सुलभ लज्जा, संकोच और झिझक से वह पति से कुछ कह न सकी।पर कब तक?
एक रात शेखर अंतरंग क्षणों के बीच मझधार में छोड़कर उससे अलग हो गया तब उसके मुंह से अनायास निकल गया,"क्या हुआ?"
"कुछ नही।"शेखर संछिप्त उत्तर देकर मुँह फेरकर चुपचाप लेट गया।वह प्यासी मछली की तरह बिस्तर में पड़ी  छटपटाती रही।उस रात की छटपटाहट ने उसे सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
शेखर उसे क्यो नही मंज़िल तक पहुंचा पाता?उसे बीच मझधार में छोड़कर क्यो अलग हो जाता है?उसकी कामाग्नि जगाकर शांत क्यो नही कर पाता?उसके शरीर की भूख क्यो नही मिटा पाता?
बरखा न अनपढ़ थी।न सेक्स के मामले में अनजान।वह पढ़ती थी।तभी औरतों से सम्बंधित पत्रिकाए पढ़ने लगी थी।उन पत्रिकाओं में स्त्री पुरुष सम्बन्ध और सेक्स के बारे में भी बहुत कुछ होता था।अपनी शादी से पहले उसने रतिकिर्या और कामकला की भी कुछ पुस्तके पढ़ डाली थी।किताबो से अर्जित ज्ञान के द्वारा उसने अपने मन मे उठे प्रश्नो का उत्तर तलाशना चाहा।इस तलाश के दौरान ही उसके दिल मे अचानक विचार आया।कंही शेखर ना मर्द तो नही?
छि  छि। उसने अपने आप को धिक्कारा।पति के बारे में उसे ऐसा नही सोचना चाहिए था।अपनी सोच पर उसे मन मे दुख हुआ।उसने मन मे आये विचार को झटक कर दिल से अलग कर देना चाहा।लेकिन विचार था कि गीले कपड़े की तरह उससे लिपटता चला गया।
उसे शादी के  बाद पति के साथ गुज़ारी राते याद आने लगी।हर रात एक सी ही कहानी  दोराही गई थी।हर रात पति ने उसके तन की प्यास जगा तो दी थी।लेकिन बुझाया नही था।उसे प्यासा ही तड़पता हुआ छोड़ दिया था।हर रात का अधूरा मिलन, मन मे आये विचार को बल प्रदान करता प्रतीत होता था।।
      लेकिन मन मे आये विचार को उसने झटक दिया था।हो सकता है,यह सच न होकर मात्र उसका भरम हो।कोई अन्य कारण हो जिसकी वजह से पति उसका साथ न दे पाता हो।
वास्विकता क्या है?यह जानने के लिए पति की गतिविधियों पर नज़र रखने लगी।
शेखर बिस्तर में आते ही उसके शरीर से छेड़छाड़ करके उसकी काम वासना  को जाग्रत कर तो देता।लेकिन पूरी न कर पाता।मंज़िल तक पहुचाने से पहले ही उससे अलग हो जाता।उसके अलग होने पर वह पूछे बिना न रहती,"क्या हुआ?"
पत्नी के प्रश्न का उत्तर उसके पास न होता।
शेखर चाहे शर्म,झिझक की वजह से बरखा को न बताता हो लेकिन उसे खुद को अपनी कमी का पता चल चुका था।
अपनी शारीरिक कमी को दूर करने के लिए उसने शराब का सहारा लिया।वह रोज़ शराब पीकर घर आने लगा।लेकिन शराब उसकी कोई मदद नही कर सकी।शराब पीने के बावजूद वही कहानी दोहराई जाने लगी।तब बरखा को विश्वास हो गया कि शेखर नामर्द है।वह उसकी शारीरिक ज़रूरत को पूरी नही कर सकता।


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