Hone se n hone tak - 46 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories PDF | होने से न होने तक - 46

होने से न होने तक - 46

होने से न होने तक

46.

मैं आण्टी के पीछे पीछे सीढ़ियॉ उतर कर नीचे आ गयी थी। हम दोनों को आता देख कर ड्राइवर रामसिंह बाहर निकल आया था। अपने माथे से हाथ छुआ कर उसने मुझे अभिवादन किया था और आण्टी के लिये दरवाज़ा खोल कर खड़ा हो गया था। न जाने क्यों मैं उससे निगाह नही मिला पायी थी। न जाने कितनी बार यश की कार में वह मुझे छोड़ने या लेने आ चुका है। तब वह ऑखों मे स्वागत और सम्मान का भाव लिये बिल्कुल इसी तरह से मेरे लिये यश की कार का दरवाज़ा खोल कर खड़ा रहता और मैं साधिकार अंदर जा कर बैठ जाती थी। आज अनायास सब कुछ कितना सुदूर और अनाधिकार जैसा लग रहा है। यश की गाड़ी में आख़िरी बार कब बैठी थी यह तो याद ही नही आ रहा।

आण्टी चली गयी थीं। मैं ऊपर आ कर बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही थी। बार बार मन में आता रहा था कि गौरी को अपने घर ले जाने से पहले यश मेरी चिट्ठियों की फाईल का क्या करेंगे ?फाड़ देंगे क्या उन पत्रों को या जला देंगे। कुछ भी करें मुझे क्या करना है। अचानक लगा था अच्छा हुआ कि यश काफी साल पहले मुझसे और मेरे शहर से दूर जा चुके हैं, नही तो उनके यहॉ रहते उनका यूं अपनी ज़िदगी से दूर चले जाना और भी अधिक तकलीफ देता मुझे।

कालेज में आजकल सालाना इम्तहान चल रहे हैं। स्टाफ रूम में सन्नाटा पड़ा है। जिन टीचर्स की इन्विजिलेशन ड्यूटी रही होगी वह सुबह आ कर जा चुकी हैं। जिनकी ड्यूटी दुपहर की शिफ्ट में लगी होगी वे ढाई बजे तक आऐंगी। मेरी ड्यूटी आज नही है। लाइब्रेरी में किताबें वापिस करनी हैं सो इस लिए आई हूं और लाइब्रैरियन के आने का इंतज़ार कर रही हूं। वैसे भी घर में बैठ कर भला क्या करती। वैसे तो आजकल कहीं भी कैसे भी मन नही लग रहा है। समझ नही आता कि अपने आप को सहज सामान्य रखने की भला कितनी कोशिश की जा सकती है और कैसे। मेरे यह भी समझ नहीं आता कि यश की शादी की बात तो मुझे इतने समय पहले से पता थी। अब ऐसा नया क्या हो गया कि कल आण्टी के आने के बाद से मन इतना बेचैन है। मुझे तो वैसे भी नही पता कि मैं यश से क्या चाहती थी। अचानक मन में आया था कि और कुछ नही तो क्या यश एक जीवन बिना विवाह के नही काट सकते थे? मैं तो उस स्थिति में बहुत ख़ुश थी। अकेले बैठे दिमाग न जाने कहॉ कहॉ भटकता रहा था। अनायास ही बहुत ज़ोर की नींद लगने लगी थी जैसे आखों को खोले रखना कठिन लगने लगा था। मैंने कुर्सी की पीठ से सिर टिका कर अपनी ऑखें बंद कर ली थीं। कैसा तो होता है जब सारी दुनिया उसी जगह ठहरी हुयी हो जहॉ वह पहले से थी पर फिर भी अपने को लगता रहे कि सब कुछ बदल गया है-अपनी जगह से उखड़ा हुआ। बंद पलको के नीचे आखें भरने लगी थीं। तभी किसी ने मेरे कंधे पर धीरे से हाथ रखा था। ऑखे खोली थीं तो सामने कौशल्या दी खड़ी थीं।

वे ठीक मेरे सामने बैठ गयी थीं,‘‘क्या हुआ अम्बिका?’’ उनके स्वर में चिन्ता है।

मैं सीधी हो कर बैठ गयी थी,‘‘कुछ नही दीदी ऐसे ही नींद लगने लगी। कल रात देर तक पढ़ते रह गए और सुबह जल्दी जग गए थे।’’ मैं मुस्कुरायी थी।

कौशल्या दीदी रिटायर हो चुकी हैं फिर भी उन से मिलना होता रहता है। वे जब तब आती रहती हैं और हम लोग भी उन के पास जाते ही रहते हैं। इतने दिनो में कौशल्या दी ने मुझमें क्या देखा या मेरे बारे में क्या समझा या मुझे लेकर कौन से अनुमान लगाए मुझे पता नहीं। कुछ क्षण तक वे मुझे ठहरी हुयी निगाहों से देखती रही थीं, ‘‘सुनो बेटा अगर मन में कोई तकलीफ है तो अपने दुखों की गठरी भगवत् अर्पण कर दो। जो भी पीड़ा है वह उसकी झोली में डाल दो। वही संभालेगा सब कुछ।’’

मैं चुप रही थी। वैसे भी उनकी बात के जवाब में भला क्या कह सकती थी मैं। फिर वह बात किसी उत्तर की प्रत्याशा में कही भी नही गयी थी। दी की अपनेपन से भरी वह आवाज़ सुन कर अपने आप को सभाले रखना कठिन लगने लगा था। कौशल्या दी के मुख से आज तक यह वाक्य न जाने कितनी बार कितने संदर्भो में, कितने ही लोगों को कहते हुए मैं सुनती रही हूं। मैं कुछ क्षण उनकी तरफ देखती रही थी। मैं जानती थी दीदी ने ऐसा ही तो किया था।

राम प्रसाद ने बढ़ कर कार का दरवाज़ा खोल दिया था और उसे एक तरफ को पकड़ कर खड़ा रहा था। दीपा दी अन्दर को बैठने से पहले ठिठक कर रुक गयी थीं और अजब सी ख़ाली निगाहों से कालेज के गेट, उसके पीछे बनी बिल्डिंग को उदास नज़रों से देखती रही थीं। दूर बने ग्राउॅड में जूनियर सैक्शन के बच्चे दौड़ भाग कर खेल रहे हैं। कुछ क्षण के लिए उनकी नज़रे एक कोने से दूसरे कोने तक भटकती रही थीं। हम सब उन्हे देखते हुए चुपचाप खड़े रहे थे। सबको लगा था अभी उनकी ऑखों में ऑसू भरेगा। पर शायद उन्होने अपने आप को संभाल लिया था। एक बार मुस्कुरा कर रामप्रसाद और उसके साथ खड़े पॉच छॅ और लोगो की तरफ देखा था,‘‘अच्छा’’कह कर वे मुस्कुरायी थीं और गाड़ी के अन्दर बैठ गयी थीं। राम चन्दर बाबू ने झुक कर उनके घुटनो पर प्रणाम की मुद्रा में हाथ लगाया था। कार का फाटक बंद करने से पहले राम प्रसाद ने उनके पैर छुए थे और हाथ बॉध कर खड़ा हो गया था और उसकी आवाज़ रुॅधने लगी थी,‘‘दीदी आप मेरे लिए भगवान थीं।’’और उसकी ऑखों से ऑसू बहने लगे थे, ‘‘मुझे पता है दीदी मेरे कारण मैनेजमैंण्ट आपका दुष्मन बन गया। मेरे कारण आपका इतना बड़ा नुकसान हो गया और मेरे कारण आज आप यहॉ से जा रही हैं।’’ आस पास में खड़े कुछ और लोग भी अपनी ऑखें पोंछने लगे थे। खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर उन्होने उसका कंधा धीमें से थपथपाया था, बाकी सब की तरफ मुस्कुरा कर देखा था, एक बार फिर कनखियों से विद्यालय की तरफ देखा था। कुछ क्षणों के लिए उनकी निगाहें कालेज के बड़े से बोर्ड पर ठहर गयी थीं। उस पर मोटे अक्षरों मे लिखा हुआ,‘‘चन्द्रा सहाय पी.जी.कालेज’’। उन्होंने धीरे से मुस्कुरा कर हाथ उठाया था, ‘‘बाई’’ वे बुदबुदायी थीं और कार स्टार्ट कर दी थी। जाती हुयी कार को सब लोग देर तक खड़े देखते रहे थे। गीली मिट्टी पर टायर के निशान। ज़्यादा या कम देर में मिट ही जाऐंगे। पर जितने आहत हो कर दीपा दी इस विद्यालय से गयी हैं वे क्या कभी भूल पाऐंगी उस चोट को।

गेट के पास खड़े सभी लोग सड़क की तरफ देख रहे हैं। यह कैसी विदाई है? कोई फूल नही,मालाऐं नहीं। आसपास खड़े कुछ गिनती के लोग। दीपा दी की गाड़ी न जाने कब की आंखो से ओझल हो चुकी है तब भी सब की निगाहें उधर ही ठहरी हुयी हैं। सबसे पहले पूनम गेट की तरफ पलटी थी,‘‘कितनी अच्छी थीं दीदी।’’ उसने कहा था और मन ने जैसे अचानक ही उनका अतीत हो जाना महसूस किया था। दीपा दीदी-इस स्टाफ के लिए मदर फिगर-सबके सुख दुख, उनकी सुविधा असुविधा का ध्यान रखने वाली-यह स्टाफ अचानक उनसे इतना बेगाना कैसे हो गया। सौ से अधिक के स्टाफ में उन्हे दरवाज़े तक छोड़ने वाले बीस लोग भी नहीं दिख रहे। कितने तो ‘‘अरे दीपा दी चली गयीं पता ही नही चला का नाटक करके दुख भी ज़ाहिर कर देंगे। मुझ को लगा था शायद कुछ को सचमुच ही पता नहीं चला होगा। वे तो चुपचाप, निशब्द ही विदा हो गयीं। हालॉकि न पता चल पाने का नाटक कर के कही किसी कोने में दुबके हुए बैठे लोगों की सॅख्या भी कम नहीं होगी-चोरों की तरह-इन्ही में से कुछ ऐसे ज़रूर हैं जो शाम को उनके घर फूल और मिठाई और आंखों में ऑसू लेकर पहुंचेंगे। कैम्पस में नयी प्राचार्या और प्रतिशोधी प्रबंधप्रत्र के बीच शायद दीपा वर्मा के निकट निजपन से खड़े हो पाने का मनोबल इन सब के पास नही था। मुझे लगता है चलो उतना ही काफी है। साहस न भी सही पर संवेदनाऐं तो बची हैं। पर बहुत से ऐसे भी हैं जो बाद में भी मिलने जाने की साधारण सी कर्टसी निभाने की और उतना कष्ट उठाने की ज़रुरत भी नहीं समझेंगे। दीपा वर्मा के बारे में कुछ सोचन की ज़रूरत भी महसूस नही करेंगे। आख़िर दीपा वर्मा वर्तमान नहीं अतीत हैं। कुछ दिन पहले तक इन्ही दीपा वर्मा के चारों तरफ मंडराते थे। शायद ठीक कहती हैं नीता कि जब राजा पापी होता है तो प्रजा पथ भ्रष्ट हो जाती है। मन मे आता है कि इन सहमें, डरे हुए लोगो से क्या नाराज़ होना। ये सब तो रास्ते से भटके बेचारे निरीह और आधे अधूरे इंसान ही तो हैं।

हम लोग बहुत दिनों तक दीपा दी की बात करते रहे थे। जिस तरह से सारी पीड़ा और अपमान अकेले झेलती रही थीं और विद्यालय से बिना किसी आवाज़ के चुपचाप अकेली ही चली गईं जैसे कोई आहट तक नहीं। उन के बारे में सोच कर ही अजीब तकलीफ होती है।जैसे किसी को कोई फर्क नही पड़ा था, सब कुछ वैसे ही चलता रहा। मुखर तो क्या किसी की तरफ से मौन विरोध तक नहीं। विद्यालय में उनका कोइ ज़िकर ही नहीं।

उनके जाने के दो दिन बाद मैनेजमैंट ने पूरे स्टाफ की मीटिंग की थी। उसके बाद चाय नाश्ते का भव्य आयोजन। शशिकान्त भटनागर अंकल हर वर्ष संस्थापक दिवस पर इस तरह का गैट टुगैदर करते थे। किन्तु इस नए तंत्र को सत्ता में आए तीन साल हो चुके पहली बार ऐसा आत्मीय आयोजन रखा गया है। शायद विरोध के स्वरों को दबाने का जश्न है यह और उनके आगे पीछे यह स्टाफ। कुछ टीचर्स तो लग रहा है कि अपने चढ़ावे की साड़ियॉ और गहने ही पहन कर आ गई हैं। दमयन्ती अरोरा को तो चहकना ही था-पर बाकी सब? सबसे ज़्यादा आश्चर्य तो सुरभि पर हो रहा है। डिग्री सैक्शन में एन.सी.सी. का काम देखती है। दीपा दी बहुत प्यार और सम्मान देती थीं। आज इतनी प्रसन्न दिख रही थीं जैसे मन में कोई द्विविधा,कोई क्लेश नहीं। मैम्बरान के सामने पेश पेश-सबसे आगे-सबसे अधिक मुखर और वाचाल। सत्ता के परिवर्तन के साथ ही किसी की पूरी सोच और उसका पूरा व्यक्तित्व ऐसे कैसे बदल सकता है। पूरा ऑवॉ का आवॉ एक सा है। पूरे इंसान बने ही नहीं, बेपेंदी के लोटे। कल तक दीपा दी के आगे पीछे करते थे। स्थितियॉ बदलते ही उनकी मौजूदगी में ही पारी बदल दी थी। यह लोग तो आज ही क्या,दीपा दी के होते हुए ही उन से कतराने लगे थे और मैनेजमैंट और दमयन्ती के चारों तरफ मंडराने लगे थे।

मन करता है कि सब कुछ छोड़ छाड़ कहीं और चले जाऐ। पर कहॉ? फिर कैसे? सब कुछ इतना आसान तो नहीं होता न? आसान? पहले कैसे था सब कुछ इतना सरल,इतना अपने हाथों में। कितने प्रसंग याद आते हैं जब घर के बड़ों की तरह शशि अकंल से भिड़े थे और उनसे अपना मन चाहा निर्णय कराया था। तब तो इस विद्यालय में नए ही आए थे। अब तो इतने सालों की नौकरी पर पानी फेर दिया इन लोगों ने।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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