पूर्ण-विराम से पहले....!!! - 8

पूर्ण-विराम से पहले....!!!

8.

न जाने कितनी देर तक मैं प्रीति के कमरे के बाहर खड़ा रहा| उस समय डॉक्टर द्वारा बताया हुआ मृत्यु का अनिश्चित समय मुझे अंदर ही अंदर कंपन दे रहा था| जीवन के किसी भी पल में हम अपने प्रिय को खो सकते हैं यह डर कितना भयावह हो सकता है मैंने उसका अनुभव किया|

जब मेरे अर्दली ने मुझे कमरे में आकर बैठने को कहा तब मैं अंदर घुसा| अर्दली ने मुझे पानी पिलाया और थोड़ा आराम करने को कहा|

कमरे में पहुंचकर जैसे ही मैंने प्रीति पर अपनी दृष्टि डाली उसकी निगाहों में मुझे एक नहीं कई प्रश्न नज़र आए शिखा| अपने पूरे कार्य-काल में किसी भी बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ या अफसर के प्रश्नों के आगे मैं हमेशा अटल रहा पर प्रीति की निगाहों ने मुझे चुपके से बरसने पर मजबूर कर दिया|

कमरे में पहुँच कर मैं सीधे वॉशरूम में गया| खुद को थोड़ा संयत करके जब बाहर निकला तो प्रीति से कहा....

"कल हमें हॉस्पिटल से डिस्चार्ज लेकर कानपुर के लिए निकलना है। अगर तुम ठीक महसूस करोगी तभी हम निकलेंगे| नहीं तो एक दिन यही लखनऊ में किसी होटल में रुक कर अगले दिन कानपुर के लिए निकल पड़ेंगें।" प्रीति ने फिर से मेरी तरफ देखकर पूछा

"क्या बताया डॉक्टर ने पहले मुझे वह बताओ ।

"डॉक्टर ने सभी रिपोर्ट्स को देख कर तुम्हारी मेडिसिन लिखी है। ताकि तुम उनको कंटिन्यू कर सको| पहले डॉक्टर्स उन दवाइयों के इफेक्ट देखना चाहते हैं ताकि अगर कुछ दवाइयों को बदलना भी पड़े तो वह बदल सके|”

"तब प्रीति ने मुझसे पूछा मेरे ट्रीटमेंट में कीमोथेरेपी या रेडियोथैरेपी नहीं चलेगी क्या?

मैंने उसको जवाब दिया....

"तुम्हारा कैंसर काफी एडवांस स्टेज में पहुंच चुका है अब उसमें रेडियोथैरेपी या कीमोथेरेपी का कोई असर नहीं आएगा वह सिर्फ हारमोंस देकर तुम्हारे कैंसर को मैनेज करने की कोशिश करेंगे।"

प्रीति बहुत पढ़ी-लिखी समझदार थी| उसको मेरे सही-सही जवाब चाहिए थे। मेरा इतना बोलने पर प्रीति ने मुझसे वापस वही प्रश्न फिर से किया..जो कि मुझे बहुत तोड़ रहा था|

"कितना समय है मेरे पास प्रखर| मुझे यह नही बताया तुमने"...

शिखा जीवन में मैंने कभी भी प्रीति से झूठ नहीं बोला था.....पर उस दिन मेरे मुंह से पहला और आखिरी झूठ निकला| मैंने प्रीति से कहा.....

"डॉक्टर्स बोल रहे हैं हार्मोन का अच्छा असर आएगा और तुम काफी ठीक हो जाओगी| डॉक्टर से इस तरह की कोई बात नहीं हुई|"

न जाने क्यों उस दिन मुझे ऐसा महसूस हुआ कि प्रीति ने मेरा झूठ पकड़ लिया है....वो मेरी तरफ एकटक ही देखती रही....मैं उससे असल सच बोलूँ| तभी मैंने बात को बदलते हुए उससे कहा मैं अभी थोड़ी देर में वापस आता हूं। कुछ दवाइयां यही कि मेडिकल पर मिलेंगी पहले उनको खरीद लेता हूं ताकि तुम्हारे साथ आराम से बैठ कर चाय पी सकूं। अपनी बात को बोलकर मैं कमरे से बाहर चला गया और उसके पास अपने एक अर्दली को बैठने को बोल गया।

जब तक प्रीति हॉस्पिटल में रही मेरे दो अर्दली हमेशा साथ ही रहते थे। जब भी मैं डॉक्टर से मिलने या दवाइयां लेने के लिए निकलता....मेरा अर्दली उसके पास बैठकर उसका ख्याल रखता......मेरे मां-बाप इस दुनिया में नहीं थे| इसी शहर में बहुत सारे रिश्तेदार मदद के लिय थे पर मैंने प्रीति की बीमारी के बारे में किसी को भी नहीं बताया था क्यों कि रिश्तेदारी निभाने से मरीज उपेक्षित होता है....और मैं किसी भी कीमत में प्रीति की उपेक्षा नहीं करना चाहता था| उसकी हर जरूरत में साथ रहना चाहता था|

प्रीति की सब दवाइयां चल ही रही थी। अगले ही दिन हॉस्पिटल से हमने डिस्चार्ज ले लिया और मैंने प्रीति से पूछा....

“वह कानपुर के लिए आज निकलने में समर्थ है या नहीं|”... उस दिन मैंने सोचा हुआ था अगर प्रीति जरा भी तकलीफ़ में होगी तो हम एक-दो दिन बाद निकलेंगे|

प्रीति ने बहुत शांत मन से कहा था...उसके दर्द में काफी आराम है.. तो आज ही निकल सकते हैं| वैसे भी अस्पताल में इतने दिन रुकने के बाद वो होमसिक महसूस करने लगी थी| उसने मुझे कहा भी अब जल्दी घर पहुँच जाए तो अच्छा हैं|

उस समय प्रीति ने ही मुझे याद दिलाया था कि मैं प्रणय फोन जरूर कर दूँ कि वो सीधे कानपुर ही पहुंचे| कहीं ऐसा नहीं हो कि वो अपनी ट्रेन या कार से लखनऊ आने के लिए बुकिंग करवा ले। यहाँ पहुँच कर वो नाहक ही परेशान होगा|

जानते हो समीर उस समय प्रीति ने मुझे इस बात को याद दिलाकर बहुत अच्छा किया था क्यों कि मुझे प्रीति से जुड़ी चिंताए कुछ और सोचने ही नहीं दे रही थी| कभी-कभी तो लगता था दिमाग में कुछ आ-जा ही नहीं रहा|

मैंने उसी समय प्रणय को फोन किया और उसको सीधे कानपुर ही आना को बोला| उस समय भी प्रणय ने मुझसे पूछा था..

“पापा क्या माँ के सभी टेस्ट हो गए और ट्रीट्मन्ट शुरू हो गया है| अब वापस लखनऊ आने की जरूरत कब होगी?’

तब मैंने उसको कहा..

“मैं और तुम्हारी मां लखनऊ से कानपुर के लिए वापस लौट रहे हैं बेटा क्योंकि तुम्हारी मां के सभी टेस्ट हो चुके हैं और डॉक्टर ने ट्रीटमेंट भी शुरू कर दिया है| प्रीति मेरे साथ ही है| जब तुम घर आओगे तब तुमको सभी डीटेल बताऊँगा| समीर प्रणय बहुत अच्छे से समझ गया था कि मैं प्रीति के सामने ज़्यादा बात नहीं करना चाह रहा हूँ|

तब प्रणय ने बीच में ही मुझे पुकार कर कहा..

“पापा! क्या मैं मम्मा से बात कर सकता हूं..” मैंने हाँ बोलकर अपने हाथ से फोन प्रीति को पकड़ा दिया और प्रीति से कहा..

‘प्रणय तुमसे बात करना चाहता है प्रीति|’

प्रणय का फोन हाथ में लेते ही.. प्रीति ने ज्यों ही हेलो कहा उसकी आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई| उस रोज प्रीति की अपने बेटे से चार-पाँच दिन बाद बात हुई थी| प्रणय ने कभी भी अपनी मां को इस तरह कमजोर होते नहीं देखा था| सो वह भी खुद पर कंट्रोल नहीं कर पाया और रोने लगा| अपने बच्चे को इस तरह फूट-फूट कर रोते हुए सुनकर प्रीति ने खुद को मजबूत करते हुए प्रणय से कहा था..

“चुप हो जाओ बेटा परेशान मत हो। अब मैं ठीक हूं| जब घर आओगे हम ढेर सारी बातें करेंगे। अगर तुम इस तरह से परेशान होगे तो तुम्हारे पापा का कौन ख्याल रखेगा। आगे भविष्य में सब कुछ मिलकर ही करना है। अपना ख्याल रखो| अब मैं फोन तुम्हारे पापा को देती हूं| खूब अच्छे से घर पहुंचों और हां अपने खाने का भी बता देना कि तुम क्या खाओगे? मैं काका से कहकर बनवा दूंगी|”....

प्रीति ने प्रणय को बोलकर मुझे फ़ोन पकड़ा दिया था। गाड़ी में आगे बैठा-बैठा में दोनों की बातें सुन रहा था| पर जानती हो शिखा मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं पलटकर प्रीति को सांत्वना दूँ| मैं अपनी वजह से प्रीति को रुलाना नहीं चाहता था| तब मैंने भी प्रणय से सिर्फ यह बोलकर फोन काट दिया कि तुम अच्छे से घर पहुंचों बेटा फिर बात करेंगे|

प्रीति ने कार की पिछली सीट पर लेटे-लेटे ही यात्रा की| मैंने ड्राइवर को गाड़ी तेज चलाने के लिए मना कर दिया था ताकि प्रीति को कम से कम झटके लगे| उस रोज जो सफर ढाई से तीन घंटे में पूरा होना था वह पाँच घंटे में पूरा हुआ।

जब हम वापस कानपुर पहुंचे तो काका ने हमारे आने के सभी इंतजाम कर रखे थे। मैंने काका को फोन पर ही सारी स्थितियां बता दी थी।

घर पहुंच कर मैंने कार का गेट खोलकर प्रीति को सहारा देकर गाड़ी से नीचे उतारा और उसको घर के अंदर लेकर गया। प्रीति को हमारे कमरे में पहुंचा कर मैंने उसको पानी पिलाया और बिस्तर पर लिटाकर आराम करने को कहा।

मैं भी इस यात्रा से काफी थक गया था। प्रीति के साथ सुखद लगने वाली यात्राएं पहली बार मुझे बहुत थका गई थी| मैने प्रीति से कहा..

“मैं स्नान करके आता हूं फिर तुम्हारे साथ बैठकर बातें करूंगा| साथ में चाय भी पीयेंगे|” मैंने काका को दस मिनट बाद चाय बनाने को बोल दिया था|

प्रीति ने सहमति से अपना सिर हिला कर मुझे जाने को कहा। साथ ही बोली...

"स्नान करने के बाद प्रखर तुम आराम कर लेना। तुम्हारा भी इन दिनों में काफी एक्सर्शन हो गया है। काफी थक गए होंगे। अगर तुमको ऑफिस जाना हो तो चले जाओ| कोई भी काम होगा तो काका या काकी को बुला लूंगी।“

प्रीति की बात को सुनकर मैं स्नान को जाते-जाते उसके पास ही रुक गया था और प्रीति से बोला....

"आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगा| तुम्हारे साथ ही समय गुजारना चाहूँगा| ताकि तुम भी अस्पताल की थकन निकाल सको। मुझे भी अच्छा लगेगा|"

सच कहूं शिखा जब से प्रीति की बीमारी का मुझे पता चला था....मैं अंदर ही अंदर बहुत डर गया था। लखनऊ में गुज़रे हुए पूरे सात-आठ दिन में मैंने प्रीति से जुड़े निर्वात को बहुत करीब से महसूस कर लिया था। प्रीति को कभी भी खो देने का एक डर मेरे अंदर ठहर गया था|

मेरी बातों को सुनकर प्रीति की आंखों में नमी तैर गई थी। जो मुझे भी बहुत अच्छे से नज़र आ गई थी। उसके चेहरे को देख कर महसूस हो रहा था कहीं न कहीं वो भी मेरी तरह खुद को कमज़ोर महसूस कर रही थी। इतने लंबे समर्पण के बाद हम एक-दूसरे को जीने लगते हैं......हैं न समीर| समीर ने भी सहमति में सिर हिलाया|

प्रखर का बात-बात में समीर या शिखा का नाम लेकर बातें बताना बहुत अपनापन महसूस करवा रहा था| समीर और शिखा उसकी बातों में इतना खो गए थे कि तीनों में से किसी को भूख ने नहीं सताया| समीर और शिखा को लग रहा था कि आज प्रखर अपने अतीत साझा कर हल्का हो जाए|

क्रमश..

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Pragya

Pragya 8 months ago

Well written

Namrata Rai

Namrata Rai 8 months ago

Pragati Gupta

Pragati Gupta Verified User 8 months ago

Archana R Gupta

Archana R Gupta 9 months ago

verry well written 👌👌

sangita

sangita 9 months ago