कर्म पथ पर - 66



                         कर्म पथ पर
                       Chapter 66


वृंदा लता के घर आई थी। वह एक बार फिर उसके माता पिता को इस बात के लिए मनाने का प्रयास करना चाहती थी कि वह उसे अन्य लड़कियों के साथ सिलाई कढ़ाई सीखने भेजा करें। उसकी मुलाकात लता के पिता बृजकिशोर से हो गई। उसने उन्हें समझाया कि वहाँ केवल लड़की ही आती हैं, वह भी सिलाई कढ़ाई सीखने। तो फिर उन्हें ऐतराज़ किस बात का है। 
बृजकिशोर ने वृंदा को जवाब देते हुए कहा,
"सिलाई कढ़ाई भी घर गृहस्ती के काम आने वाली चीज़ है। लता सीखकर क्या करेगी ? उसकी तो गृहस्ती शुरू हुई नहीं थी। अब हो भी नहीं सकती है। उसे तो बस अब विधवा की तरह जीवन बिताना है। कुछ भी सीखने करने की उसे आवश्यकता नहीं है।‌" 
यह सुनकर वृंदा ने समझाने का प्रयास किया। वह बोली,
"लता तो अभी बच्ची है।‌ बड़ी लंबी ज़िंदगी काटनी है उसे। जीने के लिए कोई मकसद तो चाहिए होगा। कुछ हुनर सीख लेगी तो आवश्यकता पड़ने पर काम आएगा।"
"कैसी आवश्यकता ?"
"कल यदि उसे अपने दम पर जीवन का निर्वाह करना पड़े तो कम से कम अपने हुनर के ज़रिए अपना जीवन बिता सकेगी।"
बृजकिशोर कुछ देर वृंदा को देखते रहे। उनके चेहरे से साफ झलक रहा था कि उन्हें उसकी बात अच्छी नहीं लगी। वह तल्ख स्वर में बोले,
"पेट भरने लायक अन्न की कमी उसे इस घर में कभी नहीं रहेगी। हमारे जाने के बाद भी उसके भाई इस हैसियत में तो रहेंगे ही कि उसे दो मुट्ठी अनाज दे सकें। यह भी नहीं हुआ तो किसी तीर्थ में पेट भरने लायक मिल ही जाएगा।"
वह उठे और वृंदा को हाथ जोड़कर नमस्ते कर दिया। वृंदा इशारा समझ गई। वह चुपचाप उठकर चली आई। जब वह निकल रही थी तो उसकी नज़र लता पर पड़ी। वह दरवाज़े के पीछे नज़रें झुकाए खड़ी थी।
बृजकिशोर ने जो बात कही थी वह बहुत तकलीफ़ देने वाली थी। दिन भर बृजकिशोर के शब्द उसके दिल में चुभते रहे। जब वह नवल किशोर के आंगन में लड़कियों की कक्षा लेने गई तो उसका मन बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। कुछ ही देर में उसने यह कह कर लड़कियों को घर भेज दिया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। 
अपनी उसी अनमनी स्थिति में वह जय से मिलने गई थी। जब से जय लखनऊ से लौट कर आया था वह यही सोच रहा था कि किस तरह वह वृंदा से अपने प्रेम का इजहार करे। परसों जब वह उससे मिला था तब कुछ कह नहीं पाया था। उस दिन दोनों की मुलाकात भी अधिक देर नहीं चली थी।
आज वह इस बात का निश्चय करके आया था कि कुछ भी हो आज अपनी बात कह कर ही रहेगा। पर जब वह वृंदा आई तो उसे देखकर लग रहा था कि वह किसी परेशानी में है। जय यह भी जानता था कि वह अपनी परेशानी को इतना महत्व नहीं देती है।‌ आजकल उसकी फिक्र का कारण लता ही होती है। 
वृंदा आकर उसके पास बैठ गई। जय ने कहा,
"क्या हुआ ? फिर लता को लेकर परेशान हो ?"
वृंदा ने उसकी तरफ देखकर कहा,
"तुम्हें कैसे पता ?"
"इतना तो समझने लगा हूँ तुम्हें। उस बच्ची लता में तुम अपनी झलक देखती हो। उसके घुट घुट कर जीने से तुम्हें भी घुटन महसूस होती है।"
जय की बात सुनकर वृंदा चौंक गई। जय सचमुच उसे समझता था। उसने जो कहा सही था। पहली बार जब उसने लता को खिड़की से कक्षा के भीतर झांकते हुए देखा था तभी वह उसे बहुत अपनी सी लगी थी। जब उसने लता के भीतर सीखने की चाह देखी तो उसके दिल ने कहा कि इसकी इच्छा पूरी करना तुम्हारा कर्तव्य है। पर उसकी कोशिशें बेकार गईं। इसलिए वह अधिक परेशान थी।
वृंदा ने जय से कहा,
"सही कहा तुमने। लता में मैं खुद को ही देखती हूँ। इसलिए आज उसके पिता ने जो कहा उसे सुनकर मेरा मन विचलित हो गया।"
"ऐसा क्या कह दिया उसके पिता ने ?"
वृंदा ने जय को सारी बात बताई। सब बताने के बाद वह बोली,
"तबसे मैं सोच रही हूँ कि क्या विधवा हो जाने से एक औरत का जीवन केवल इतना ही रह जाता है कि वह दो मुठ्ठी अनाज से अपना पेट भरकर चुपचाप पड़ी रहे। इसके अलावा उसे किसी चीज़ की चाह नहीं होनी चाहिए। खुशियां तो छोड़ो वह जिसके सहारे अपना जीवन काट सके ऐसे किसी उद्देश्य की चाह भी उसे नहीं रखनी चाहिए। यह कैसा न्याय है ?"
"यह न्याय नहीं है। सरासर अन्याय है। लेकिन दुनिया में सारे लोग एक जैसे तो नहीं हैं। कुछ तुम्हारे पिता और ताऊ की तरह भी हैं।"
"हाँ.... कभी कभी मैं सोचती हूँ कि मेरे ताऊ ना होते तो मैं भी अपने विधवा होने को अपने भाग्य का दोष मानकर जी रही होती। लेकिन लता के पास ऐसा कोई नहीं है। उसे कौन न्याय दिलाएगा ?"
जय ने वृंदा की तरफ देखकर कहा,
"तुम हो ना.... तुम दिलाओगी उसे न्याय। याद है एक बार मैंने कहा था कि सिर्फ अंग्रेज़ी हुकूमत से आज़ाद हो जाने भर से ही हमारी लड़ाई खत्म नहीं होगी। उसके बाद तो असली लड़ाई शुरू होगी। किसी विदेशी से नहीं। अपने ही लोगों से। लता की लड़ाई उसी का हिस्सा है।"
जय की बात पर वृंदा ने कहा,
"मैं लड़ पाऊँगी यह लड़ाई। कभी कभी बहुत अकेलापन महसूस करती हूँ। किसी के सहारे की आवश्यकता महसूस होती है। मुझे लग रहा है कि मैं कमज़ोर पड़ रही हूँ।"
"सहारे की आवश्यकता महसूस करना कमज़ोर पड़ना नहीं है। किसी का सहारा मिलना हमें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। हर किसी को सहारे की जरूरत पड़ती है।"
जय ने वृंदा का हाथ अपने हाथ में ले लिया। इतने दिनों में पहली बार उसने ऐसा किया था। वृंदा को अजीब जरूर लगा। पर उसने अपना हाथ नहीं खींचा। ना ही किसी तरह का गुस्सा दिखाया। जय ने वृंदा की आँखों में झांकते हुए कहा,
"सहारे की आवश्यकता मुझे भी है। आज हम एक ही कर्म पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। क्या हम एक दूसरे का सहारा बन सकते हैं ?"
वृंदा हतप्रभ सी उसकी बात सुन रही थी। जय अपनी बात कह रहा था,
"मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। पहली बार जब तुम मेरी मोटर टिक कर खड़ी थी और मैंने तुम्हें ऐ लड़की कह कर झिड़का था। तब जिस तरह तुमने मुझे देखा था। तुम्हारे चेहरे पर जो आत्मविश्वास और आत्माभिमान था उसने मेरे दिल में हलचल मचा दी थी। उसके बाद जब तुम हमारा नाटक रुकवाने विलास रंगशाला आई थी। जि‌स तरह से तुम इंद्र से बहस कर रही थी। उसने तुम्हारे लिए मेरे मन में आदर की भावना पैदा की थी। समय के साथ वही प्यार में बदल गई। तुमने ही मुझे प्रेरणा दी कि मैं अपने पापा के नाम और रुतबे की छाया से निकल कर कुछ करूँ। तभी मैं अपने पापा के घर का ऐशो आराम छोड़कर इस कर्म पथ पर चलने लगा।"
जय आज बिना किसी संकोच के अपने मन की सारी भावनाएं वृंदा के सामने व्यक्त कर देना चाहता था। वह वृंदा की आँखों में झांकते हुए वह कहता रहा,
"क्या हम एक दूसरे का हमसफर बन सकते हैं। यकीन मानो तुम जो अकेलापन महसूस करती हो मैं उससे निकलने में तुम्हारी सहायता करूँगा। जब भी तुम्हारी राह में कोई मुश्किल आएगी तब उसे दूर करने में तुम मुझे अपने साथ पाओगी।"
पश्चिम दिशा में सूरज डूब रहा था। पर वृंदा के दिल में एक नई उजास फैल रही थी। जय वह कह रहा था जो वह सुनना चाहती थी। उसकी आँखें नम हो गई थीं। एक आंसू उसकी हाँ बनकर लुढ़क गया।
जय ने उसकी पलकों को चूम लिया। उसे अपने सीने में छुपा लिया। उसके सीने पर सर रखकर वृंदा आंसुओं के ज़रिए अपने मन के दर्द को बहा कर खत्म कर देना चाहती थी।
दोनों अलिंगन में बंधे एक दूसरे के प्यार को महसूस कर रहे थे।
इंस्पेक्टर जेम्स वॉकर सिसेंदी गांव आ गया था।


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