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हसरतें

हसरतें

पूरे घर में कोलाहल था. घर की नई आमद को चारों ओर से घेरे सारा परिवार इकठ्ठा था. शीशम की फिनिश और वेलवेट के गद्दों वाले आठ कुर्सियों के डायनिंग टेबल ने इतने बड़े हॉल को भी सिकोड़ कर छोटा सा बना दिया. बीचों बीच काँच के गुलदस्ते में कार्नेशन की डंडियां सजाईं गईं. चारों ओर नए टेबल मैट बिछाए गए. बड़ी बहू ने चौंसठ पीस वाला डिनर सेट निकाला, नई बहू शादी में मिली चमचमाती कटलरी का डब्बा खोल लाईं. बेटे पैकिंग का सारा सामना जल्दी-जल्दी रास्ते से हटा रहे थे तो उनके पिता सामान पहुँचाने वालों को बख्शीश दे विदा कर रहे थे। इतनी सारी सरगर्मी के बीच हस्बे मामूल माँ किचन में घुसी थीं. नए डायनिंग टेबल का उद्घाटन भी तो सलीके से होना था. बच्चे भी ना, बिना किसी प्लानिंग के काम करते है. लंच के वक्त तो चर्चा ही शुरू हुई और शाम तक इतना महंगा टेबल घर पहुंच भी गया. जल्दी-जल्दी में किसी तरह मूंग दाल का हलवा बन पाया बस. पनीर के पकौड़ों का घोल तैयार करती माँ डिनर का मेन्यू सोच ही रही थीं कि बहुएँ हाथ पकड़कर उन्हें बाहर खींच लाईं.

“नाश्ते लिए लिए कचौड़ी और जलेबी बाज़ार से आ चुकी हैं. डिनर मोती महल से आएगा, आप बस पापा की बगल की कुर्सी पर बैठकर डायनिंग टेबल का उद्घाटन करिए.“

माँ एक सेकेंड को सकपका गईं, “मुझे परोस लेने दो, तुम सब साथ में यहां बैठकर गर्मागर्म हलवा खाओ इसमें मुझे सबसे ज़्यादा खुशी मिलेगी.”

“ना-ना, अब हम कुछ नहीं सुनेंगे, हम सब साथ ही खाएंगे बस. मर्दों, औरतों को अलग-अलग ही खाना था तो इतनी सारी कुर्सियों का काम ही क्या?” नई बहू की मनुहार थी.

“और आज से आपका किचन में घुसे रहना भी बंद. हमने बात कर ली है, एक तारीख से कुक आया करेगी, आप उसे बस मेन्यू समझा दिया करें, बाकी का सारा काम उसका. हमारे पास वक्त नहीं होता तो, आपको भी लगे रहने की कोई ज़रूरत नहीं.” साल भर में ही बड़ी बहू की आवाज़ में अधिकार आ गया था.

“हाँ माँ, जब देखो तुम हमेशा सबको खिलाने में लगी रहती हो, अब से ये सब बंद, साथ खाएंगे, साथ गाएंगे.” छोटा अभी तक गर्दन पकड़कर लाड़ लड़ा लेता था.

माँ ने निरस्त्र होकर पिता को देखा, उनकी आंखों में भी मुस्कान थी. वो हथियार डाल कर उनके बगल में बैठ गईं. बेसन का घोल किचन में इंतज़ार करता रह गया. बहु ने ससुर से साथ सास की प्लेट भी लगा दी तो उनकी आंखें डबडबा गईं.

खाने की मेज़ पर भी चर्चा माँ से शुरू होकर उसकी बहुओं और स्त्री विमर्श तक पहुंच गईं. बेटों की आवाज़ में उल्लास था. घर में बस लड़के हों तो ये बारीक बातें छूट ही जाया करती हैं. माँ को ऐसे ही देखते रहने की सबको आदत जो हो गई थी बचपन से. दो कमरों के किराए के घर में फोल्डिंग डायनिंग टेबल के इर्द-गिर्द प्लास्टिक की कुर्सियों पर डटे चारों बाप बेटों ने उंगलियाँ चाट-चाटकर खाने और कभी-कभार भावातिरेक में माँ के आंचल से हाथ पोंछ लेने के अलावा कुछ भी नहीं किया था. सबको खिलाने के बाद माँ ने क्या खाया, कब खाया किसी को कहाँ सुध रही. वो तो घर में नौकरीपेशा बहुएं आईं तो नज़र आया सबको.

“अब बस बहुत हो गया माँ, अब तुम्हें किसी के लिए खटने की ज़रूरत नहीं, अब किस बात की कमी है घर में. सारे बेटे कमाते हैं तुम्हारे, आज से तुम अपनी ज़िंदगी जिओगी. सारा वक्त तुम्हारा, जो मन में आए करो. अपने अधूरे शौक पूरे करो, अपने हिसाब से जिओ. जी भर के शॉपिंग करो, सहेलियों से मिलो.”

“यस मॉम, वैसे भी अब घर में विमेन मेजॉरिटी होती जा रही है, ज़माना भी विमेन्स लिब का है, जो हसरत हो आपकी पूरी कर लीजिए,” छोटा मार्केटिंग में है, हर वक्त रौ में रहता है.

विमेंस लिब की गर्मा-गर्म चर्चा डायनिंग टेबल से उठकर लिविंग रूम तक चली आई थी. आत्ममुग्धता के इस शोर-शराबे में सबसे कम ध्यान माँ के चेहरे पर ही दिया जा रहा था. इधर माँ की आखें, यादों की कई-कई परतों के पीछे धुंधली हो रही थीं. रसोई माँ की सबसे बड़ी कमज़ोरी रही थी. मंद मुस्कुराहट के बीच धीमे-धीमे गुनगुनाती माँ के लिए कितने भी लोगों का, कितना भी लंबा-चौड़ा मेन्यू असाध्य नहीं था. न्यौते निभाने और ज़रूरी खरीदारी के अलावा उन्हें घर से बाहर निकलने का ना कभी वक्त रहा ना चाव. नाश्ते, खाने से छुट्टी मिलती तो अचार, मुरब्बे, बड़ियों में लग जातीं. जैम और सॉस भी कभी बाज़ार से नहीं आए. मैगज़ीनों से दावत विशेषांक की कतरनें पाक शैली के मुताबिक करीने से रसोई में रखी रहतीं. बाद में कुकरी शो देखकर नोट्स बनाए जाने लगे, आजकल तो माँ मोबाइल से ही रेसिपी पढ़ लेतीं हैं. बच्चों के बदलते टेस्ट के मुताबिक माँ की पाककला भी कलेवर बदलती रही, मुगलई, चायनीज़, इटालियन कुछ भी तो नहीं छूटा.

इस खाने की बदौलत माँ ने जाने कितने रिश्ते बनाए थे. शहर बदले, घर बदले, किसी भी नई जगह पहुंचते ही माँ की खीर, दही बड़े और कढ़ी पकौड़ों की कटोरियां पड़ोस के बंद दरवाज़ों के पीछे पहचान की दरकार लिए पहुंचती और भाभी, चाची, बहु जैसे असंख्य रिश्ते बटोर लातीं. उनकी शामें रेसिपी सीखने घर आई सहेलियों से गुलज़ार रहतीं. बच्चों के दोस्त उनकी अनुपस्थिति में भी फर्माइशों की लिस्ट लिए बेखटके कॉल बेल बजाते और तृप्त होकर वापस जाते. दोस्तों के बीच माँ की भक्ति इतनी ही रही कि बच्चे कहीं भी रहें हों, उनके दोस्त फोन की एक घंटी पर हमेशा माँ के लिए हाज़िर रहे. माँ ने बाहर की दुनिया भले ना देखी हो, अंदर का संसार उनका अपना था, एक-एक बूंद सिरजा हुआ.

जब संयुक्त परिवार में ब्याह कर आईं तो इसी हुनर ने माँ को चार बहुओं वाले खानदान में सहजता से जगह बना लेने दिया. बच्चों की दादी कहा करतीं, उनके समान ना कोई पंचमेल सब्ज़ी बना सकता था ना कढ़ी-पकौड़े. आखिरी वक्त पर जब दादी कुछ नहीं खा पातीं, माँ उनसे पूछ-पूछ कर पसंद की चीजें बनातीं, मिन्नतें करके उन्हें खिलातीं. जभी तो जाते-जाते दादी अपनी आखिरी निशानी, ढाई तोले वाले कान्हा जी का पेडेंट, चेन समेत माँ के गले में डाल गईं.

जाने कितनी कहानियाँ थीं जो एक-एक कर माँ को इस समय याद आ रही थीं.

“बताओ ना माँ, क्या प्लान है तुम्हारा?” घूम फिरकर काफी समय बाद मुद्दा आखिरकार माँ तक पहुंचा.

बहुत ज़ोर पड़ा तो माँ ने हलक साफ किया, “शुरू से हमें छोटे-बड़े खर्चों के लिए तुम्हारे पापा के सामने हाथ फैलाने में बड़ी झिझक होती रही. जब घर में पैसों की ज़रूरत थी उस ज़माने में चलन ही नहीं था, खराब मानते थे. लेकिन अब तो बड़ा कॉमन है ये सब. इन बच्चियों का कॉन्फिडेंस देखती हूं तो बड़ा दिल करता है, मैं भी घर में अपनी कमाई ला पाती, अपने पैसे तुम्हारे पापा के हाथ में रख पाती, तुम सब के लिए कुछ खरीद पाती, बस यही एक हसरत बाकी रही. और तो कभी कुछ सीखा नहीं मैंने, रसोई में ही मेरी ज़िंदगी है. चौक के दूसरी ओर कॉलेज के बच्चों के लिए इतने सारे कोचिंग सेंटर है खुले हैं, दफ्तरों में कुंआरे लड़के-लड़की काम करते हैं, पीजी में रहते हैं, छोटे का दोस्त तो उस दिन कह भी रहा था, दो टाइम के खाने का एक बंदा तीन-चार हज़ार महीना तो आराम से देता है. हाथों के हुनर से परिवार से दूर रह रहे तुम्हारी उम्र के बच्चों के चेहरे पर तृप्ति ला सकूं बस यही मन है. बात केवल पैसे की नहीं हमारे आत्मविश्वास और चाहत की है. अब तो तुम लोगों ने कुक भी देख ली है, उसके साथ लगकर कर बीस-पच्चीस टिफिन तो तैयार कर ही लूंगी आराम से.”

अगले ही पल कमरे में सूई टपक सन्नाटा था. बड़े बेटे ने बाएं पैर को दाएं के उपर से हटाकर बगल में कर लिया और सीधा होकर बैठ रहा. मंझले ने गले का बटन खोलकर ज़ोर की सांस ली. छोटा अबतक बेफिक्र सा सोफे के हत्थे पर बैठा था, उतर कर भाई के बगल में आ गया. पिता ने ज़ोर से खखार कर गला साफ किया.

ये क्या उलटबांसी हुई, पति और तीन कमाऊ बेटों के रहते माँ डब्बे वाली बनेगी? लोग क्या कहेंगे? कहाँ तो काबिल बेटों ने माँ को हर तरह के ऐशोआराम देने की पेशकश की थी, माँ बाहर निकले, रिश्तेदारी में घूमे-फिरे, पार्टी-बाज़ार करे, कहां ये अपनी चारदीवारी से निकलना ही नहीं चाह रहीं. ये कौन सा तरीका हुआ भई आज़ादी का?

माँ की हसरत भरी नज़रें एक चेहरे से दूसरे पर फिसलतीं रहीं.

सर्वसम्मति से माँ का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया. बहुएँ नज़र चुरा रही थीं, बेटे उठकर तीन दिशाओं में निकल लिए. दाएं-बाएं देखकर पिता ने भी पुराना अखबार खोल लिया. बस डायनिंग टेबल की ओर पीठ किए माँ दुपट्टे के छोर से उंगलियां लपेटती रह गईं.