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अनामिका

अनामिका ने शशांक का फोन कट करके मोबाईल बेड के सिरहाने तिपाई पर रख दिया और अपनी देह को बिस्तर पर ढीला छोड़ कर उसने अपनी आँखें मूँद ली।

शशांक की अपन्तव से लबरेज बातो ने अनामिका के बिखरते हौंसले को सम्भाल लिया था। शशांक से बात करके अनामिका को लग रहा था जेसे उसे नये पंख मिल गये हो और वो उन्मुक्त होकर आकाश मे अपनी मंजिल को हासिल करने के लिये परवाज करने को फ़िर से तैयार हो उठी हो।

'अना मैं कल इलाहाबाद आ रहा हूँ, तुमसे मिलने। देखो प्लीज मना मत करना।' आज जब शशांक ने अनामिका से कहा तो ना जाने क्यों वो हर बार की तरह उसे मना नहीं कर पाई थी। उसके मौन में स्वीकृति थी जिसे शशांक ने मोबाईल पर उसकी साँसों के उतार चढ़ाव को सुनकर जान लिया था।

शशांक उससे मिलने को आ रहा है - इस एहसास ने अनामिका के चेहरे पर बचे हुए तनाव को भी ख़त्म कर दिया था। सिरहाने से एक तकिया उठाकर अपने गुदाज सीने पर रखकर उसे अपने मृणाल बांहो में कसते हुए बेख्याली में अनामिका के गुलाबी अधरों से जब 'शशांक...' निकला तो लाज की एक परत ने उसके सुन्दर कमसिन चेहरे को हल्का सा गुलाबी बना दिया और वो अवश होकर बीते दिनों में खो गई।

शशांक कोई बीते एक साल से अनामिका का दोस्त था। ऐसा दोस्त जिस से दोस्ती होने के बाद के कुछ दिनों में ही अनामिका उसके साथ अपनी बहुत से बातें शेयर करने लगी थी। अपनी व्यक्तिगत जिंदगी के कई टुकड़े अनामिका ने खुद ब खुद शशांक के सामने रख दिए थे और शशांक ने इन टुकड़ो को रेशमी पैरहन का साया दिया था। बातों के एक मोड़ पर शशांक अनामिका को अना कह कर बुलाने लगा था। शशांक के मुंह से अपने लिए 'अना' का सम्बोधन अनामिका को बड़ा भला लगा था।

अनामिका की दोस्ती जब शशांक से हुई तब वो इलाहबाद यूनिवर्सिटी से रसायन विज्ञान में M Sc कर रही थी। अनामिका का लक्ष्य सिविल सर्विस ज्वाइन करके देश की सेवा करना था। अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उस पर जूनून सवार रहता और उसका पूरा ध्यान हमेशा अपनी स्टडी पर होता। इसी वजह से अनामिका के दोस्त न के बराबर थे और कोई लड़का तो उसका दोस्त हरगिज नहीं था। पर ना जाने शशांक में कैसा आकर्षण था, कैसा मोहपाश उसकी आंखों मे था कि जब उसने अनामिका से कहा वो उससे दोस्ती करना चाहता हे तो वो मना न कर सकी । हांलकि अनामिका अपने उद्देश्य को प्राप्त किये बिना किसी लड़के से दोस्ती न करने का ख्याल रखती थी।

ऐसा भी नही था कि अनामिका का शशांक से पहले कोई लड़का दोस्त रहा ही नही था।

इलाहाबाद में एम एस सी की पढ़ाई करने के लिये आने से पहले अनामिका की दोस्ती विजय से हुई थी, तब वो अपने होमटाऊन में रहती थी। विजय उसी के कालेज मे था, एक साल सीनियर, हालाँकि उसका टाउन दूसरा था। जल्द ही विजय और अनामिका अच्छे दोस्त हो गए थे। कालेज में अधिकांश लोगो को उनकी इस दोस्ती की खबर भी हो चली थी।

अनामिका की सहेली थी गुंजन जो उसी टाउन में रहते थी जहाँ विजय रहता था। गुंजन को भी अनामिका और विजय की दोस्ती की खबर थी। गुंजन ने एक दो बार अनामिका को इसलिए भाभी कह कर छेड़ा था क्योंकि वो और विजय एक ही कसबे से थे। जब भी कभी गुंजन ने अनामिका को भाभी कहकर मजा ली तब जवाब में अनामिका ने हँसते हुए इतना ही विरोध किया - 'कि वो ऐसा कुछ न कहे क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं है।' हालाँकि गुंजन द्वारा खुद को भाभी कहे जाने से अनामिका ने मना किया था लेकिन उसका विरोध प्रखर नहीं था इसलिए गुंजन को लगभग यकीन हो गया कि अनामिका विजय के प्रेम में है। गुंजन ने इस बात का तजकरा अपनी कुछ खास सहेलियों से किया और उन लड़कियों ने यहीं बातें अपनी कुछ खास सहेलियों से की। उन लड़कियों में एक लड़की का अफेयर था। उसने ये बात अपने महबूब से कही और उसके महबूब ने जो कि विजय का दोस्त था उसने उसे ये खुशखबरी दी।

यक़ीनन ये विजय के लिए खुशखबरी ही थी। कालेज की सबसे सुन्दर लड़की जिसकी दोस्ती उसे नसीब थी - वो उसे प्यार करती है - ये जानकर उस तमाम रात विजय की नींद रूठी रही और वो ख्वाबों ख्यालों में अनामिका को अपने आलिंगन में कसे उसकी देह में डूबा रहा।

विजय के लिए ये ख़ुशख़बरी उस समय दोगुनी हो गई थी। गुंजन की बड़ी बहन की शादी थी जिसमे अनामिका भी इनवाईट थी। अनामिका पहली बार विजय के कसबे आ रही थी और विजय का इरादा था कि वो अनामिका से वही शादी के माहौल में उससे प्रेम का इकरार सुनेगा।

अनामिका उस रात दुल्हन से भी हजार गुना सुन्दर लग रही थी। उसकी देह के रोम - रोम से खूबसूरती किसी झरने के मानिंद बह रही थी। उसे जो भी देखता उसे अपना बनाने की तमन्ना करता। सबसे जुदा हालत विजय की थी। उसकी प्रेमिका स्वार्गिक सुंदरता के साथ उसके सामने थी और वो उसका सामीप्य हासिल नहीं कर पा रहा था। उसके गुलाबी लबो से अपने लिए तीन जादुई शब्द सुन नहीं पा रहा था।

आखिर वो समय भी आया जब अनामिका की निकटता विजय को हासिल हुई।

लघुशंका के निवारण के लिए अनामिका गुंजन के घर के सबसे ऊपर के हिस्से में गई जहाँ खुली छत थी। आज जब शाम गुंजन ने उसे घर के सबसे एकांत में बने इस वाशरूम को दिखाया था। गुंजन और बाकी सहेलियां शादी के कार्यक्रम में व्यस्त थी इसलिए अनामिका अकेले ही छत पर चली आयी थी।

विजय जो की दीवानावार अनामिका के सामीप्य को लालायित था उसने अनामिका को छत पर जाते हुए देख लिया था। शायद उसकी गर्लफ्रेंड भी उससे तन्हाई में मिलना चाहती है - ये ख्याल दिल में लिए वो ख़ुशी से धाड़ - धाड़ बजते दिल के साथ सबकी नजरों से बचता हुआ छत पर जा पहुंचा।

अनामिका जब वाशरूम से बाहर निकली तो विजय उसके सामने खड़ा मुस्करा रहा था।

यद्यपि विजय अनामिका का दोस्त था फिर भी यूँ एकांत में रात के इस टुकड़े की चाल पर जब वो वाशरूम यूज़ करने आई थी तब अपने सामने विजय को यूँ देख अनामिका तनिक अचकचा गई थी। वो विजय से कुछ कह पाती उससे पहले ही विजय कह उठा था - 'अनामिका आज सारी दुनिया तुम से और मुझ से ईर्ष्या कर रही होगी।'

'शादी वाली रात तो सभी दुल्हन और दूल्हे से ईर्ष्या करते हैं।' कह कर अनामिका वहां से जाने लगी तो विजय उसके सामने आते हुए बोला - अनामिका तुम्हारी सुंदरता के आगे दुनिया की सभी दुल्हनों की सुंदरता फींकी है। सारे जमाने को तुम्हारी इस सुंदरता पर ईर्ष्या होती होगी।'

अनामिका ने विजय की बात सुनी। आज उसे विजय की बातों में दोस्ती से इतर कुछ ओर नजर आ रहा था इसलिए वो अपने होठों को गोल करके छोटा सा उत्तर - 'थैंक्स' कहकर विजय के बगल से आगे बढ़ी।

विजय फिर लपक कर उसके सामने आते हुए बोला 'अनामिका ये तो जान लिया सारी दुनिया आज तुमसे क्यों ईर्ष्या कर रही होगी पर क्या ये न पूछोगी कि ये दुनिया ये दुनिया वाले मुझसे क्यों जल रहे होंगे ?'

अनामिका ज्यादा देर वहां रुकना नहीं चाहती थी। गुंजन और बाकि सहेलियां भी उसे नीचे ढूंढ रही होंगी इसलिए उसने वहां से जल्दी निकलने की गरज से विजय से कहा 'तुम इस कसबे के सबसे होनहार लड़के हो तो लाजिमी हे ये दुनिया और दुनिया वाले तुमसे ईर्ष्या करें।

'अनामिका ये बात तो है ही पर आज ये सारी कायनात मुझसे इसलिए जल रही होगी क्योंकि तुमसी हसीं लड़की मेरी महबूबा है।'

विजय की बात सुनकर अनामिका के जेहन को झटका लगा था। वो तो विजय को केवल दोस्त मानती आयी थी। उसने कभी भी विजय को यूँ नहीं देखा था जैसे लड़कियां अपने महबूब को देखती हैं।

एक पल विजय के चेहरे को आकाश में बिखरे तारों की नीमरोशनी में देखने के बाद अनामिका वहां से जाते हुए बोली 'शायद तुम्हे कोई गलफहमी हुई है।'

'कैसी ग़लतफ़हमी अनामिका ?' बगल से संदली नाजुक बदन अनामिका को जाते देख विजय ने उसका हाथ पकड के उसे रुकने पर मजबूर कर दिया था।

'मैं केवल तुम्हारी दोस्त हूँ विजय कोई महबूबा नहीं।' अनामिका ने अपनी कलाई विजय के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा।

अपनी ताकत से अनामिका की कलाई छुड़ाने की कोशिश को नाकाम करते हुए विजय बोला 'तुम लड़कियों की यही अदा तो जानलेवा होती है डियर अनामिका सारे जमाने से लवर की बातें करोगी और लवर के सामने आते ही कुछ न कहोगी। बस चेहरे पर शर्माने की अदा आ जाएगी।'

'विजय तुम्हे सच में ग़लतफ़हमी हो गई है मैंने तुम्हे कभी प्यार की नजर से नहीं देखा। वी आर फ्रेंड्स ओनली। अब मेरा हाथ छोड़ो मुझे नीचे जाना है।' अनामिका ने विजय के हाथ से अपने हाथ को छुड़ाने की कोशिश रोक दी थी। उसे उम्मीद थी विजय उसकी बात समझ गया होगा और अब उसका हाथ छोड़ देगा।

विजय एक पल अनामिका के चेहरे पर नजरे गड़ाये रहा और फिर अनामिका की उम्मीद के विपरीत उसने उसके कलाई को झटका देकर अपने सीने से लगते हुए बोला 'अनामिका ग़लतफ़हमी तो तुम्हे हो रही है जो मुझ जैसे मेधावी लड़के से यूँ मजाक कर रही हो जबकि सारे कालेज में हमारे प्रेम फ़साने के चर्चे हैं।'

'विजय लीव मी, मैं नहीं जानती कि कालेज में हमारे बारे में क्या कहा सुना जाता है। मैं तो तुम्हे बस दोस्त मानती आयी हूँ। प्लीज मुझे जाने दो विजय।'

विजय ने अनामिका की आँखों में लम्हे भर देखा और फिर हँसते हुए बोला 'अनामिका मैं कौन सा तुम्हे यहाँ पूरी रात रुकने को कह रहा हूँ। बस अपने इन होठों को एक बार चूम लेने दो, फिर चली जाना।'

विजय ने वासना से भीगे अपने होठं जब अनामिका के कुंवारें होठों के जानिब बढ़ाये तो अनामिका ने अपनी सारी ताकत समेटी और विजय को सफलतापूर्वक अपने से परे धकेलने में कामयाब रही।

उसके बाद अनामिका वहां एक पल भी न ठहरी थी।

रात के उस हिस्से ने अनामिका के जेहन को कसेला बना दिया था। उसने निश्चय कर लिया कि न केवल वो विजय से दोस्ती खत्म कर लेगी बल्कि तब तक किसी लड़के को अपनी ज़िंदगी में न आने देगी जब तक वो अपना ख्वाब पूरा न कर लेगी।

अनामिका का ख्वाब था सिविल सर्विस ज्वाइन करना।

B Sc कम्प्लीट होते ही अनामिका इलाहाबाद आ गई थी। यूनिवर्सिटी में M Sc में दाखिला लिया और एक शांत एरिया मे रूम लेकर सिविल सर्विस का एग्जाम क्रेक करने मे दीवानावर जुट गई।

पहले अटेम्ट में अनामिका ने प्राथमिक परीक्षा में भी सफलता न मिली किन्तु जब उसने दूसरे साल प्रिलिम्स एग्जाम बीट कर लिया तो उसके हौसले बुलंद हो गए। मुख्य परीक्षा में उसने रसायन विज्ञानं को ऑप्शनल सब्जेक्ट के रूप में लिया। किन्तु कठिन परिश्रम के बाद भी अनामिका मुख्य परीक्षा में कामयाब न हो सकी। ख़ैर उसने नए साल में नए उत्साह से तैयारी शुरू की और यही वो दौर था जब एक शाम वो शंशाक की एक जादुई कहानी में खो गई।

पढ़ाई से बचे हुए समय का उपयोग अनामिका सोसल साईट पर करती और यकीन मानो उसे सोशल साईट रिफ्रेश होने में बहुत मदद करती। अनामिका को किशोरावस्था से हिंदी कहानियां पढ़ने का बढ़ा चाव था और वह फेसबुक पर साहित्यिक ग्रुप में कहानियां पढ़कर अपने इस शौक को पूरा करती।

ऐसे ही एक दिन उसने एक कहानी पढ़ी - 'स्वीट सिक्सटीन' और वह कहानी के तथा कहानीकार दोनों की मुरीद बन गई। शशांक को इतनी अच्छी कहानी लिखने के लिए अनामिका ने जो उसे मैसेज किया तो बातचीत का ये सिलसिला उनकी दोस्ती पर जाकर अटका। अनामिका जो विजय की उदंडता के बाद किसी भी लड़के से दोस्ती न करने का दम भरती थी वो शशांक की जादुई कहानियों और चैट के लहजे से प्रभावित होकर न केवल उसकी दोस्त बनी बल्कि अपनी हर छोटी बड़ी बात उससे बेझिझक शेयर करने लगी।

शशांक एक नवोदित लेखक था जो कहानियां लिखने के अतरिक्त अपनी जीविका के लिए कानपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था। शशांक अपनी लिखी गई कोई भी कहानी पढ़ने के लिए सबसे पहले अनामिका को देता और अनामिका कहानी के जादुई तिलिस्म में उलझकर उसकी तब तक तारीफ़ करती रहती जब तक शशांक दूसरी कहानी लिखकर उसे पढ़ने को न दे देता।

अनामिका ने शशांक की कहानी पढ़ी जिसमे नायिका का नाम 'अना' था तो उसने शशांक को मैसेज कर के पूछा -'ये ऐसा नाम है अना ?'

'नाम तो अनामिका रखना चाहता था पर इसलिए नहीं रखा की कहीं आपको गुमान न हो जाये।'

'कैसा गुमान ?' अनामिका ने मैसेज किया।

'यही कि आपसी सुन्दर लड़की के वश में होकर लेखक कहानियां लिखते हैं।'

'ओह हो तो आप पर हमारी सुंदरता बेअसर है।'

'हाँ।'

'तो आप लेखक होने के साथ साथ ऋषि भी हैं।'

'ऋषि क्यों ?'

'क्योंकि ऋषियों - मुनियों पर सुंदरता असर नहीं कर पाती।'

'अरे अना मेरे कहने का मतलब ये है कि जो मैं ऋषि - मुनि होता तो कबका तुम्हारी खूबसरती का असीर हो चुका होता। मैं साधारण इंसान हूँ इसलिए तुम्हारी सुंदरता के फंदे से बचा हुआ हूँ।'

अनामिका ने शशांक का मैसेज पढ़कर रिप्लाई में लिखा - शशांक क्या आप को सच में लगता है हमें अपनी सुंदरता पर गुमान है ?'

जब अनामिका ने ये मैसेज किया तब शशांक वाशरूम गया था इसलिए वो तुरंत मैसेज का जवाब न दे पाया। अनामिका की आँखें लेपटाप के स्क्रीन पर शशांक के जवाब के इंतज़ार में लगी थी। गुजरते वक्त के साथ अनामिका की बेकरारी बढ़ने लगी और इसी बेकरारी के आलम उसने तड़प कर शशांक को फोन कर दिया।

फोन उठाते ही दूसरी ओर से 'हैल्लो शशांक...' की आवाज़ सुनकर शंशांक बोला था 'अना बहुत प्यारी है तुम्हारी आवाज़।'

सुनकर अनामिका को अच्छा लगा और उसने तुरंत ही शशांक से वही सवाल का जवाब माँगा जो उसने मैसेज में पूछा था।

अनामिका के इस मासुम सवाल पर हंस पड़ा था शशांक। सच कितनी प्यारी कितनी मदिर कितनी निर्मल थी शशांक की हंसी। सुनकर अनामिका को ऐसा लगा जैसे उसके कानो में कृष्ण की बांसुरी रस राग बजा रही हो ।

फ़ोन का स्पीकर कानो से लगाये अनामिका खोई रही शशांक के लबो से झरती हंसी मे और शशांक ना जाने कितने लम्हे हँसता रहा था । निश्छल हंसी...। अनामिका ने रोका नहीं था शशांक को। शशांक कुछ देर बाद अपनी हंसी सयंत करते हुए खुद ही बोला था 'जानती हो अना जो तुम केवल सुन्दर होती तो तुम्हारी सुंदरता जरूर मुझ पर असर करती और मैं भी तुम्हारी खूबसूरती का असीर होकर वैसा ही ऋषि मुनि कहलाता जैसे मेनका के रूप लावण्य में बंधकर विश्वामित्र कहलाये।'

सांस लेने के लिए शशांक एक पल रुका तो उसकी सांसो की तरंग ने सदैव संदल की महक बिखेरने वाली अनामिका की देह को सिहरा दिया था। उसके बदन के रेशमी सुनहरे रोम न जाने किस भावना के वशीभूत होकर स्तंभित हो गए थे। पिण्डलिया थरथरा रही थी और गुदाज रोमविहीन जांघो में कम्पन हो रहा था। शशांक की एक लम्बी स्वांस मानो अनामिका के ऊपर इंद्रधनुष सी गिरी थी और उसका जिस्म धनक के सातों रंगो से सराबोर हो उठा था।

इधर अनामिका अपनी देह अपने जेहन को संभाल रही थी उधर उसकी इस मनोदशा से बेखबर शशांक कह रहा था – ‘अना एक तो मै दुनिया का साधारण इंसान दूसरे तुम सुन्दर नहीं...।'

सुनकर अनामिका के जेहन को झटका लगा था। उसकी सुंदरता जिसकी एक झलक न जाने कितने को आहें भरने को विवश कर चुकी थी, और शशांक कह रहा था - वो सुन्दर नहीं।

अनामिका थी तो लड़की ही। कन्यासुलभ गुणों का उसके भीतर होना लाजिमी था। अपनी सुंदरता की तौहीन उसे यूँ कतई अच्छी नहीं लगी थी। वो भी शशांक के द्वारा। उसका जी किया वो फोन डिस्कनेक्ट कर दे। वो ऐसा कर पाती तभी दूसरी और से शशांक की आवाज़ वापस यूँ गुंजी जैसे कथा पंडाल में शंख बजते हैं।

'अना तुम केवल सुन्दर कहाँ, तुम तो संसार की सर्वाधिक सुन्दर लड़की हो। अब संसार की सबसे सुन्दर लड़की की सुंदरता किसी साधारण व्यक्ति पर इतना असर डाल सकती है कि वो उसकी पूजा करने लगे। इससे अधिक यदि उसने कोई अभिलाषा की तो ये उसके लिये अक्षम्य अपराध होगा।'

उस दिन शशांक के कहे एक - एक शब्द ने अनामिका को उसके नजदीक ला दिया। लेकिन उनके बीच की ये नजदीकी की दूरी भी दो सौ किलोमीटर की थी

हालाँकि कई बार अनामिका का दिल किया वो शशांक से रूबरू मिले, कई बार शशांक ने उससे मिलने की इच्छा जताई। पर अब तक वे दोनों कभी भी फेस टू फेस नहीं मिले थे जबकि दोनों ने फेसबुक पर बेमियाद बातें की थीं।

आज अनामिका निराश थी। लगातार तीसरी बार वो यू पी एस सी की मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण कर पाने में असफल रही थी। उसकी ऍम एस सी की अंतिम वर्ष की परीक्षाएं भी पूर्ण हो गई थी। उसे इलाहाबद में रहते हुए तीन साल हो चुके थे। अब घर वाले उस पर दबाव बना रहे थे कि वो सिविल सर्विस की जगह की अन्य जाब्स पर ध्यान दे। पर अनामिका का तो एक ही लक्ष्य था, सिविल सर्विस ज्वाइन करना।

आज शाम अनामिका ने शशांक को फोन किया तो उसकी आवाज़ निराशा में डूबी हुई थी। अनामिका को यूँ निराश - हताश देखकर शशांक विचलित हो उठा था। पिछले एक साल से जब से शशांक और अनामिका सोसल साईट्स पर दोस्त बने थे तब से ही अनामिका अपनी हर बात शशांक को साधिकार बताती रही थी। जब कभी वो निराश होती तो शशांक उसे ढांढ़स बंधाता और इलाहाबद आने की बात करता पर अनामिका उसे आने से रोक देती। शशांक उसकी बात तुरंत मान भी लेता। आज जब अनामिका ने अपनी असफलता को लेकर नैराश्य से भरी बाते की तो शशांक उसका हौंसला बढ़ाते हुए बोला 'अना मैं कल इलाहाबद आ रहा हूँ।'

न जाने कौन सी कशिश थी आज शशांक की बात में जो अनामिका हर बार की तरह उसे मना न कर सकी। मौन बनी रही। शायद अनामिका को लगा होगा शशांक उससे इस बार इलाहाबद आने के बारे में पूँछ नहीं रहा है, बल्कि फैंसला सुना रहा है।

इधर अनामिका का खामोश कबूलनामा पाकर कानपुर में शशांक इलाहाबद जाने की तैयारी करने लगा उधर इलाहाबद में अनामिका शशांक के आने की खबर से रोमांच से भर गई। 'न जाने कैसा होगा हो पल जब - भावनाओ का चितेरा, सैकड़ों प्रेममयी कहानियां लिखने वाला शख्श उसके सामने होगा ? अनामिका सारी रात शशांक से मिलने के रोमांच में डूबी रात के जल्द ख़त्म करने की दुआ मांगती रही।

शशांक ११ बजे सुबह इलाहाबद पहुँचने वाला था और अनामिका उसे रिसीव करने बस स्टैंड जाने वाली थी। अनामिका बार - बार घडी की सुइयों को देखती पर वे ग्यारह बजाने को मानो तैयार ही न थी। पहली बार अनामिका को ऐसा लगा था जैसे उसकी मरमरी कलाई पर बंधी घडी कोई समय बताने वाला यंत्र न होकर उसकी सौतन हो जिसने उसे अपने प्रियतम से मिलने के रोकने को उसकी कलाई को बाँध दिया है।

शशांक के लिए 'प्रियतम' सोचकर अनामिका लजा उठी थी। उसका अख्तियार मानो अपने ऊपर से शिथिल हो रहा था, बिखर रहा था। आज ब्लैक जीन्स और फ़िरोजी टाप पहना था अनामिका ने। दस बजे ही वह बस स्टेंड पहुंच गई थी।

अनामिका खुद आश्चर्य चकित थी कि वह क्योंकर इतनी बेताब है शशांक से मिलने को, केवल दोस्त ही तो हे वह। वो भी केवल सोशल साईत पर। कहा तो उसने खुद किसी लद्के से दूर रहने का फैसला किया था जब तक वो सिविल सर्विस का एग्जाम बीट नही कर लेती। और जबकि शशांक उससे मिलने ही इसलिये आ रहा था कि लगातार असफ़लता से उसके भीतर उपजी निराशा मे उसे हौसला दे।

शशांक और अनामिका ने पहली नजर में ही एक दूसरे को पहचान लिया था। क्योंकर न पहचानते दोनों ने एक दूसरे की ढेरों तस्वीर देखीं थी। कई बार एक दूसरे को वीडियो काल पर बात की थी।

जो अनामिका की देह से रिसती संदली महक के सानिध्य से शशांक अबोल भीगता रहा तो अनामिका न जाने कितने पल शशांक की गहरी आँखों में देखती रह गई। उसके नरम पंखुड़ियों से होठों पर सुकूत का अख्तियार हो गया।

न जाने कितने पल समय के उस हिस्से का गवाह बने जब दो जवां जिस्मो के भीतर धड़कते दिलों ने एक दूसरे को दोस्ती की हदो और मूक प्रेम को दर्शाते हुए एक - दूसरे को अबोल अडौल देखते रहे थे।

औपचारिक हाय - हैल्लो के बाद अनामिका शशांक को बस स्टेण्ड के पास एक जलपान गृह में ले आयी। शशांक के पास लगेज के नाम पर केवल एक एयर बेग था। उसके चेहरे पर सफर के थकान के कोई चिन्ह भी नहीं थे। जलपान के बाद वो दोनों शहर में यूँ बेमकसद घूमने इसलिये निकल पड़े कि एक - दूसरे के साथ समय बिताने का उनका मकसद पूरा हो सके।

शशांक को लेकर अनामिका चंदशेखर पार्क आयी। इसके भीतर १८६४ में बनाई गई लाइब्रेरी थी। लाइब्रेरी की इमारत की सुंदरता देख कर शशांक के होठों से 'वाह' निकल गया। महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर को नमन करके दोनों पुस्तकालय के भीतर आ गए।

बेशुमार किताबें देखकर शशांक का चेहरा खुशी से दमक उठा था। किताबों के बीच खुद को पाकर एक लेखक का खुश होना लाजिमी था। शशांक को यूँ आनंद विभोर देख कर अनामिका भी बेहद खुश थी। वो भी आखिर क्योंकर न खुश होती आखिर आज वो उस शशांक के साथ घूम रही थी जिसके लिए उसके दिल में न जाने कैसे हसीं जज्बात अंगड़ाई लेने लगे थे।

पुस्तकालय से निकल के दोनों ने लंच किया और फिर दोनों मिंटो पार्क चले आये। वहां से जब निकले तो शाम ढल के रात बन चुकी थी। एक अच्छा रेस्तरां देखकर दोनों डिनर के लिए रुक गए।

डिनर करते हुए शशांक ने अनामिका को पुरानी असफलताएं भूलकर नए सिरे से परिश्रम करने की सलाह दी। बातों ही बातों में शशांक ने अनामिका से कहा कि अगर पुराने विषय से कामयाबी नहीं मिल रही तो विषय चेंज कर सकती हैं।

'मैं भी केमस्ट्री को पढ़ पढ़ कर बोर हो गई हू पर क्या करू इस सब्जेक्ट के अलावा कोई और सब्जेक्ट पर मेरा इतना कमांड नहीं है।'

'जिस चीज से बोर हो रही हो उसे माध्यम बना कर कामयाबी पाना मुश्किल होता है अनामिका।' अनामिका को देखते हुए शशांक बोला 'तुम इतिहास को माध्यम क्यो नही बनाती।'

शशांक की बात सुनकर अनामिका पहले तो हंसी थी और फिर बोली 'शशांक इतिहास से मेरा अब तक दूर - दूर तक कोई नाता नही रहा अगर आपके कहने से ये ले भी लूं तो मुझे गाईड कौन करेगा ?'

शशांक जो अनामिका की हिमगिरी से झरते झरने सी मदिर हंसी मे खोया था वह उसकी बात सुनकर बोला 'अना मे करूँगा तुम्हे गाईड। इतिहास तो मानो स्वयं मुझे परमेश्वर ने सिखाई है। तुम मुझ पर इस मामले मे आँख बन्द कर के भरोसा कर सकती हो।'

न जाने क्या था शशांक की बातों में जो अनामिका बेसाख्ता बोल उठी 'मुझे आप पर बेहद भरोसा है पर आप वहां कानपुर से मुझे कैसे गाईड कर पायँगे ?'

और फ़िर उस रात भरोसे की उस परिभाषा ने जन्म लिया जिसे देखकर देवता भी हर्षित हुए होंगे। शशांक ने कानपुर छोड़कर एक साल के लिए इलाहबाद में रहने का फैसला किया तो अनामिका ने केमस्ट्री जिसकी उसे मुकम्मल जानकारी थी उसकी जगह इतिहास से सिविल सर्विस की प्रिपरेशन करने का फ़ेसला किया।

शशांक को भरोसा था वो एक वर्ष में अनामिका को इतिहास में इतना पारंगत कर देगा कि उसके लिए ये दुनिया का सबसे सहज विषय बन जाएगा और अनामिका को यकीं था वह शशांक के सानिध्य में इतिहास जैसे अनछुए विषय के माध्यम से भी सिविल सर्विस का एग्जाम बीट कर देगी।

शशांक कानपुर जाकर अपना जरुरी सामान लेकर इलाहाबाद आ गया। अनामिका ने अपने रूम से कुछ दूरी पर उसे रूम दिला दिया।

अपनी नौकरी अपना लेखन सब पीछे छोड़कर शशांक ने एक ही ध्येय बना लिया - अनामिका को सिविल सर्विस में सफलता दिलाना। अनामिका भी जी जान से तैयारी में लग गई। अब दोनों का अधिकतर समय साथ में बीतता। कभी कभी तो दोनों पूरी रात एक दूसरे के साथ होते। कभी शशांकअनामिका के रूम पर तो कभी अनामिका शशांक के साथ उसके रूम पर।

यद्यपि रात बहुत काली होती है उसकी कालिमा में बहक जाना लाजिमी होता है किन्तु अनामिका और शशांक ने जिस भरोसे के आधार पर इस पवित्र उद्योग की शुरआत की थी वो कभी नहीं टूटा। इतनी राते साथ बिताने के बाद भी दोनों के ह्रदय निर्मल और देह पवित्र थी।

हालाँकि दोनों ने भरोसे को खंडित न होने दिया था लेकिन साथ साथ रात बिताने वाले उनमे से एक संसार की सर्वाधिक सुन्दर युवती थी और दुसरा वह युवक था जिसे देवो का अपरोक्ष आशीष प्राप्त था। सो दोनों के ह्रदय में पलते प्रेम ने जन्म लिया और दोनों एक दूसरे के प्यार को अपने दिलों में संभाल लिया। और इश्क चुम्बन और अंकपाश से आगे इसलिए न बढ़ा क्योंकि दोनों ही अनामिका की सफलता में कोई वयवधान नहीं डालना चाहते थे।

आखिर शशांक का परिश्रम और अनामिका की तपस्या फलीभूत हुई। अनामिका ने सिविल सर्विस के एग्जाम में सफलता पा ली थी। उस दिन दोनों बेहद खुश थे। पूरे दिन साथ - साथ घूमने के बाद वे शशांक के रूम पर आये थे।

रूम पर आते ही शशांक का कोई फोन आ गया तो वह उससे बात करने लगा। और अनामिका बिस्तर लेट कर आँख मूंदे आराम करने लगी।

जब शशांक ने फोन कट कर दिया तो अनामिका ने वैसे आँख मूंदे पूछा 'शशांक हम शादी मेरी ट्रेनिंग होने से पहले करेंगे या बाद में ?'

जब कुछ देर शशांक की कोई आवाज़ अनामिका के कानो में नहीं पड़ी तो उसने आँख खोलकर देखा - शशांक अपने बैग में कपडे रख रहा था।

'कहीं जा रहे हो क्या ?' अनामिका ने जब पूछा तो उसके चेहरे पर वो दर्द उभर आया था जैसे वो अब एक पल भी शशांक से दूर नहीं रह सकती।

'कानपुर जा रहा हूँ, जरुरी काम है।'

शशांक की बात सुनकर अनामिका ने पूछा 'क्या जरूरी काम, किसका फ़ोन था ?'

'सफ़लता का।'

'कौन सफ़लता ?' अनामिका ने बिस्तर पर उठ कर बैठते उठ हुए पूछा।

'मेरी पत्नी।'

शशांक के इस जवाब से अनामिका पर मानो आसमानी बिजली गिरी थी। वो साकित होकर कुछ पल शशांक को देखने के बाद जबरन मुस्कराते हुए बोली 'मैं तो भूल ही गई थी कि आप पुरुष हो। फरेब ढाना और भावनाओ से खिलवाड़ करना तुम्हारी फितरत में ही शामिल होता है।'

'अना....।'

'मत कहो मुझे अना अब ये हक़ नहीं है आपको।' शशांक की बात बीच में काटते हुए अनामिका बोली 'शशांक आपने मुझे कामयाबी दिलाई वो मेरे ऊपर ऋण है जिसे आप जैसे चाहेंगे मैं चुका दूंगी लेकिन अब मेरे प्यार की ख्वाहिश न करना।'

'अनामिका तुमने मुझसे जब फेसबुक पर दोस्ती की तो मेरी प्रोफ़ाइल में सफलता मेरी पत्नी के रूप में मौजूद है। मुझे लगा आपने देखा होगा। ख़ैर कोई बात नहीं मैं तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।' कहकर शशांक वापस बैग में कपडे रखने लगा था।

शशांक की बात सच थी। अनामिका ने प्रोफ़ाइल में शशांक का शादीशुदा होना देखा था । शशांक की कोई गलती नही थी उसने कुछ छिपाया नही था। अनामिका ही अपनी कामयाबी के रास्ते पर चलते हुए ये सब भूल चूकी थी । उसे अपनी गलती का एह्सास हुआ।

ग्लानि और पछतावे से भरी अनामिका उठकर शशांक के हाथों से कपडे लेकर बैग में सहेजते हुए बोली 'शशांक सॉरी, मेरा प्रेम सिर्फ आपके लिए है पर मैं आपकी दूसरी पत्नी नही बनना चाहती।'

'मैं भी तुम्हे अपनी दूसरी पत्नी नहीं बनाना चाहता।'

शशांक की बात का मतलब न समझ कर अनामिका खड़े होकर उसकी तरफ़ सवालिया नजरो से देखने लगी।

'अनामिका मैं तुम्हे अपनी दूसरी पत्नी नहीं बल्कि अपनी पहली प्रेमिका बनाने का ख्वाहिशमंद हूँ।' शशांक ने अनामिका की आँखों में झांकते हुए कहा तो एक सिहरन से अनामिका के शरीर पे तारी हो गई।

अनामिका कांपते कदमो से शशांक के तनिक और करीब आकर बोली 'मेरे प्रियतम अनामिका नहीं अना कहो मुझे।'

'अना...।' शशांक ने कहकर अनामिका के उजले कान्धो पर अपने हाथ रख दिये और अपने पंजो पर उचक कर अनामिका ने अपने लबो से एक बोसा शशांक के माथे पर रख दिया।

अपने बाहुपाश मे लेकर अनामिका को अपने सीने से लगाते हुए शशांक बोला 'अना बस इतना ही.... ?'

और क्या चाहिये डियर...।' मुस्कराते हुए अनामिका ने कहा और वापस अपने पंजो पर उचक के अपने गुलाबी अधर शशांक के तपते होठों की और बढ़ा दिया।

समाप्त

--सुधीर मौर्य