manthan - 5 in Hindi Fiction Stories by रामगोपाल तिवारी (भावुक) books and stories PDF | मंथन 5

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मंथन 5

मंथन 5

राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश पर अध्यादेश जारी किए जा रहे थे।

आज के रेडियो पर भी एक अध्यादेश जारी किया गया। जिसके तहत हरजिनों व छोटे किसानों को ऋण से ंछूट दे दी गई थी। जो ग्रामीण साहूकार ऋण दिये थे उन्हें अपना पैसा डूबते दिखा। जो ऋण लिये थे उन्हें लगने लगा अब हमें पैसा क्यों देना है। देना तो कानून में से हट गया है तो हम क्यों देवें !

अब लोगों को, दूसरों को अपनी चीजें देने में भी संकोच होने लगा। हरिजन व छोटे किसान पाई-पाई को तरसने लगे।ग्रामीण साहूकार उनके घर के चक्कर काटने लगे। अब साहूकार उन्हें बातवाला इज्जतदार जैसी बातों से विभूषित कर अपना कर्ज वसूल करना चाहते थे, पर लोग कानून से लाभ उठाने में क्यों चूकें।

पटेल रंगाराम के माध्यम से महन्त का लेन-देन चलता था। महन्त ने उन्हें बुलाया कि ऋण कैसे वसूल किया जाये। सारे हथकंडे समझा दिये। डॉक्टर रवि अपनी पत्नी को जल्दी ही आगे लाना चाहता था। अस्पताल में भीड़ फिर से जैसी की तैसी हो गई थी। रवि को अस्पताल से फुर्सत न मिल पाती थी। हरिजन लोग उनके पास सलाह लेने आने लगे थे। गाँव फिर दो हिस्सों में बटने लगा। एक पक्ष में वे लोग थे जो महन्त का कर्ज कर्जदारों से दिलाना चाहते थे । दूसरे पक्ष में रवि डॉक्टर एवं वे लोग जो कर्ज देना नहीं चाहते थे। कानून जिनके साथ था।

देश की आन्तरिक स्थिति के बारे में सोचते-सोचते रवि ने अस्पताल बन्द किया। घर पहुँचकर सीढ़ियों पर जमा-जमाकर पैर रखते हुए ऊपर की मंजिल में पहुँच गया। रश्मि यह सब चुपचाप खड़ी देख रही थी। जैसे रवि ऊपर पहुँचा रश्मि बोली, ‘जिस प्रकार एक-एक सीढ़ी चढ़कर आप ऊपर आये हैं। ठीक मंजिल भी एक-एक पग चलने पर ही पाटी जा सकती है।‘

‘पर रश्मि हमारा काम मंजिल पाने का है। सीढ़ियों का हिसाब रखने का नहीं।‘

‘हमें कितनी लम्बी यात्रा करनी है उसे अलग-अलग हिस्सों में बाँट कर पूरी करते चलें। एक न एक दिन मंजिल मिल जायेगी।‘

‘आज से ही मंजिल पर चलने की तैयारी कर ली जाये।‘

‘क्या मतलब ?‘

‘यही कि बशीर साहब मीसा में पकड़े जा चुके हैं। अब उनका काम तुम्हें करना है।‘

‘‘पर ?‘

‘पर क्या अस्पताल में काम करने के बहाने कल से चला करो। चार-छः दिन के बाद तुम्हारे घर से निकलने का विरोध शान्त हो जायेगा।‘

‘विरोध कौन करेगा ?‘

‘भैया आनन्द भी कर सकँूते हैं।‘

‘उन्हें आप समझा नहीं पाओगे।‘

‘समझाने की जरूरत नहीं है। कल तुम्हें अस्पताल में काम करते देख सभी जान जायेंगे।‘

‘मुझे तो नेतागिरी से नर्स का काम ही अच्छा लगेगा।‘

‘हम दोनों मिलकर बशीर साहब का काम भी पूरा करते चलेंगे।‘

‘ठीक है, आप कहते हैं तो ं ं ं।‘

‘! क्हो कहो रूक क्यों गये।‘

‘ कल से तुम मेरे साथ अस्पताल चला करोगी।

‘जी ।’

रवि के घर में आज जल्दी खाना-पीना हो चुका था। पं0 इन्द्रजीत पत्नी अहिल्या के साथ आसन जमा चुके थे। आनन्द भी पिता के पास आ गया था। आनन्द की पत्नी पास ही खड़ी हो गई।

अब रवि की मां बोली- ‘देख रवि, हमें ज बात अच्छी नहीं लगी कि बहू अस्पताल में काम करे।‘

‘रवि चुप रहा तो आनन्द बोला, ‘तुम्हें पतो नानें कै ज गाँव के का का हो रहो है।‘ अब इन्द्रजीत बोला-, ‘महन्त साहब ने ने खबर भिजबाई है।‘

बात सुनकर रवि बोला-‘क्या खबर भिजवाई है ?‘

‘इतने बड़े आदमी हो कंे बहू- बिटिया से काम ं ं ं।‘

‘काम न करने वाले आदमी बड़े होते हैं यह एक नई बात सुन रहा हूँ।‘

‘हर बात में तुम्हारो सिद्धान्त हमें अच्छो नहीं लगता।‘ आनन्द ने जवाब दिया।

‘तो फिर रश्मि का पढ़ा-लिखा होना बेकार है।‘

‘काये ?‘ इन्द्रजीत जी ने प्रश्न किया।

‘पढ़-लिखकर चहार दीवारी में बन्द रहना तो बेकार ही है।‘

आनन्द ने पुनः कहा-‘ ज गाँव है गाँव।’

‘आनन्द दादा, आप नहीं समझते। गाँव के लोग हमारे पढ़े-लिखे होने से जलते हैं। वे चाहते हैं किं ं ं।‘

‘ पापा जी तो रवि ज ठीक कहतो। अब बहू अस्पताल में जावे करेगी। जाको हमें कछू बुरो भलो नानें।‘

अब अहिल्या बोली, ‘ठीक है जब तुम सब की ज इच्छा है तो हमें कहा ।‘ अब इन्द्रजीत जी बोले-

‘लेकिन तुम अपनो अस्पताल चलाऊ। गाँव की बातिन में मति परो।‘ अब रवि ने प्रश्न किया।

‘कौन सी बातों में पड़ता हूँ ?‘

‘यही महन्त की तरफदारी न करके चमार-कोरियों की तरफदारी कर रहे हो।‘

‘आप महन्त को भला आदमी समझते हो।‘

‘भले आदमी काहे नहीं हैं। गाँव के इतैक बड़े मंदिर के महन्त हैं, इज्जतदार आदमी हैं।‘ रश्मि मन ही मन गुनगुनाई। महन्त और इज्जतदार आदमी, ।

अब रवि बोला, ‘गरीबों का खून चूसिवे वारेे इज्जतदार हेाते हैं।‘

‘वे कहाँ गरीबन को चूस रहे हैं। झैं कै गरीब बिनको गर्ज ही नहीं देयें चाहत।‘

‘अब वे गर्ज वसूली भी नहीं कर सकँूते।‘

‘रंगाराम कह रहे थे कि महन्त साहब ने कहलबाया है कि रवि विनकी तरफदारी न करें, हमारे पैसा वसूल करवा दें। विको परसेन्टेज बिन्हें दे देंगे।‘

‘यह मुझसे नहीं हो सकता।‘

‘तो क्या लोग उनका पैसा देंगे नहीं।‘

‘हाँ पापा जी ।‘

‘ज तो अच्छी बात नाने।‘

‘क्यों अच्छी बात नहीं ?‘

‘जब किसी से उधार लिया है तो देना चाहिए।‘

‘कानून न देने की कहता है।‘ रवि ने कहाँ

‘कानून नीति से गलत है।‘

‘जन्म-जन्मान्तर से जो लोग घुटते रहे हैं। कानून उसका साथ देता है तो नीति से गलत है।‘

वे बोले-‘ ज तो सरासर अन्याय है।‘

‘हम उन्हें युगों से दबाते आ रहे हैं। तब अन्याय नहीं था, आज एक छूट मिली तो आप अन्याय कहने लगे।‘

‘तबईं तुम बिनको साथ दे रहे हो।‘

‘हाँ, उनका साथ देना ही चाहिए।‘

‘महन्त से दुश्मनी महंगी पड़ेगी बेटा।‘

‘महंगी तो इस गाँव की डाक्टरी भी करनी पड़ रही है।‘

‘काहे नहीं शहर चले जातये।‘

‘मुझे, डाक्टरी शहर में नही,ं अपने गाँव में ही करना है।‘

‘अपनी जिन्दगी बर्बाद कर रहे हो। बहू रश्मि ही ज रवि को समझा सकँूते। अरे कछू बड़े शहर में डाक्टरी करतये। आराम से रहतये। पैसा हू मिलतो सो झां डरिहो।‘ अब रश्मि बोली-

‘ पापा जी यहाँ की सेवा करने के लिए भी तो कोई चाहिए।‘

‘ये तो मोय कहा तेरी हूँ ज इच्छा है तो ऐन करौ सेवा।‘

‘हमें अब कहा करनो है। बुढ़ापौ आ गओ है।‘

अब अहिल्या बोली, ‘जे दोनो तो बशीर मियां की बातिन में आ गये हैं। वे तो जेल में डरे ही हैं, जिन्हें और हिल्ले लगांय देतयें।‘

‘नहीं मां उन्हें दोष न दो, जेल जाना भी बुरी बात नहीं है।‘

‘तो कहा अच्छी बात है, सब जयदाद मिट गई, वे अभै हू जही करि रहे हैं।‘

‘करना भी यही चाहिये, सच्चे देशभक्त यही करते हैं। जेल अपने लिए नहीं, देश के लिए गए हैं।‘ अब इन्द्रजीत जी बोले-‘यह जानकार भी कि हम अकेले अपने देश की खातिर सेवा कर रहे हैं। घबराना नहीं चाहिए। हम सब यही सोच लें, फिर हम अकेले कहाँ रहे। सभी तो हमारे साथ हैं।‘

‘सारा गाँव विरोधी है, तुम सबकी साथ की बातें करते हो।‘

‘देख लेना पापा जी ! आज नही ंतो कल। सभी हमारे साथ होंगे।‘

‘ऐसी बातिन बारे तो गाँव में कोऊ नानें।‘

‘तभी तो हमारा विश्वास उनसे अलग है।‘

पिताजी आौर छोटे भाई के मध्यस बढ़ती बातें देखकर आनन्द ने बातें ठण्डी करनी चाहीं।

‘अच्छा, रवि, तुम तो अपनो काम करो। जब ज बात है तो चिन्ता मति करो।‘

‘वाह आनन्द दादा, तुम भी तो सच्चे देशभक्त हो।‘

अहिल्या बोली- ‘वेटा, तें जिनकी बातिन में मत पर, वे तो दोऊ मिल गये हैं।‘ यह कहते हुए इन्द्रजीत और अहिल्या वहाँ से उठकर चले गये।

अब तो दूसरे दिन सुबह से ही रवि और रश्मि अस्पताल में प्रतिदिन साथ-साथ जाने लगे। अस्पताल में सेवा-सुविधाएं बढ़ती गईं। रश्मि के अस्पताल में आने से गाँव के सम्बन्ध में सोचने-विचारने का समय भी मिलने लगा। हरिजनों को सच्चे सलाहकार की जरूरत थी। इसी कारण से लोगों का उसके पास आना-जाना तेजी से बढ़ता जा रहा था। दूसरे गाँव के हरिजन भी सलाह लेने आने लगे थे।

महन्त के लोगों ने कर्ज मांगना बन्द कर दिया। महन्त ने डाक्टर को पत्र भेजा-

डाक्टर रविकान्त जी।,

भगवान के रास्ते में मत आओ। इस परमपिता परमात्मा से कोई नहीं टकरा पाया है, जो तुम टकराओगे। परमपिता के नियमों को तुम बदलना चाहते हो तो क्या बदल सकोगे ? इसलिए बेटा राम जी की सेवा में अपने को भी लगा दो। सौदा मंजूर हो तो खबर देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक

चन्दन दास

रवि ने पत्र पढ़कर रश्मि की ओर बढ़ा दिया। रश्मि ने पत्र पढ़ा और बोली-

ये चन्दन दास तो सल्लो का पापा है।‘

‘कौन सल्लो ?‘

‘अरे सल्लो इसकी लड़की ं ं ं!‘

‘शहर में हमारे मुहल्ले में ही तो रहते हैं। बड़ी कोठी है। अब समझी कि यह वही आदमी है जिसने ं ं ं !‘ बात अधूरी छोड़कर रश्मि सोचने लगी।

‘मेरे साथ नशे की हालत में जबरदस्ती ं ं ं!‘ अब रवि बोला,

‘रश्मि चुप क्यों रह गईं, जिसने ं ं ं !‘ रश्मि झट बोली-

‘जिसने यह पत्र भेजा है।‘

‘तुम कुछ घबरा सी गईं।‘

‘कहाँ, ठीक तो हूँ।‘

‘मुझे लगा कहीं डर गई हो तो इससे हार मान लेते हैं।‘

‘हार मानना, इससे भी बड़ी हार हो जावेगी।‘

‘तो फिर ?‘

‘मैं हरिजनों का खुलकर साथ दूंगी। इसे पुलिस के हवाले ं ं ं!‘

‘ वह इतना सस्ता खिलाड़ी नहीं है मैडम, वह राजनीति से चलता है, पुलिस उसअपनी है। नेता सभी उनका साथ देते हैं। इमरजेन्सी में जिसे चाहे अन्दर करा सकता है। इसने ही बशीर साहब को जेल भिजवाया है।‘

‘ सुना है यह नेताओं के मंुह लगा है। सम्भव है बशीर साहब के वारे में किसी बड़े नेता के कान भर दिये होगे, और पकड़वा दिया।’ इमरजेन्सी में लोग अपने अपने पुराने हिसाब चुकता करने में लगे हैं।

बातें करते-करते रवि झपका लेने लगा। तो रश्मि सोचने लगी, ‘इसी ने बेवश बनाकर सब कुछ लूट लिया अब । इसे मैं नहीं छोड़ूंगी। महन्त-महन्त आज पता चला कि ये सारे गाँव का ही नहीं, मेरा भी दुश्मन है। भगवान के नाम पर सभी को छलता रहता है। अब मैं दसे छोड़ने वाली नहीं हूँ।‘

रवि बोला, ‘क्या बड़बड़ा रही ?

‘ रश्मि बोली, ‘कुछ भी नहीं, सोच रही थी।‘

‘सोच-सोच कर चलने में ही जीवन कट जाता है। और अन्त में सोचना ही शेश रह जाता है।

अब सोचते-सोचते दोनों चुप हो गये!