Ek Duniya Ajnabi - 37 in Hindi Social Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | एक दुनिया अजनबी - 37

एक दुनिया अजनबी - 37

एक दुनिया अजनबी

37-

विभा का मन खोखला होता जा रहा था | बेटी-दामाद के पास रहकर भी वह अपने पिछले दिनों में घूमती रहती | हम मनुष्य कितना भी प्रयत्न कर लें किन्तु अपना भूत नहीं भुला पाते | हम काफ़ी अकड़ के साथ कह सकते हैं 'वर्तमान में जीओ'किन्तु क्या सच में ही हम जीते हैं वर्तमान में ? लौट-फेरकर वृत्तों में घूमते हुए हम फिर उसी शून्य पर आकर खड़े हो जाते हैं, जहाँ से चले थे|

जाने कहाँ-कहाँ भटका है प्रखर ! कभी ये गुरु, कभी वो गुरु !कभी कोई मंत्र तो कभी किसी को दान !ऐसे जीवन की समस्याओं के समाधान मिलते हैं क्या ? लेकिन जब आदमी कमज़ोर पड़ जाता है तब उसे जो दिखाई देता है, उसीके पीछे भागने लगता है |कुछ दिनों में थककर फिर कहीं दूसरी ओर मुड़ जाता है |

माँ विभा भीतर से खोखली होती जा रही थी | उसके पास केवल एक संपत्ति थी अपनी बेटी के परिवार की जो उसके निर्बल शरीर को लड़खड़ाकर गिरने से सँभाल रही थी --कुछ मित्र ऐसे थे जिनसे अपनी पीड़ा साँझा कर सकती थी, उनके सहारे वह सहज बनी हुई थी |

चेहरा जहाँ सहज, सरल लगता वहीं मन का हिस्सा खोखला होता जा रहा था |जब मनुष्य किसी बात को भूलने का प्रयास करता है, वह और तेज़ी से उसके चिपटने लगती है| विभा का यही हाल था, वह जितना अपनी यादों को भूलने का प्रयास करती, उतनी ही उनमें और बँधने लगती |

शुरू से ही एक ऊँचे 'लाइफ़-स्टाइल' में रहने के कारण भी प्रखर को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था |कुछ समझ ही न आता, दिमाग़ में जैसे कोई कचरा भर गया था |

निवेदिता अब उसके व्यवसाय में उसके साथ जुड़ गई थी | मस्तिष्क से तेज़, नया सीखने में रूचि रखने वाली निवि चतुर थी | वह जानती थी कि प्रखर ने कितने लोगों को व्यवसाय में ट्रेंड किया है, वह भी सीख जाएगी |इस प्रकार से दोनों का अधिक समय साथ रहना उन्हें और समीप लाता रहा |

वह अपनी शिक्षा पर भी उतना ध्यान देती, अस्पताल के मरीज़ों को भी मिलने जाती और अब प्रखर के साथ भी गंभीरता से जुड़ गई थी |इस बँगाली लड़की के डॉक्टर पिता का निधन कुछ दिन पूर्व ही हुआ था, वह भी हृदय-रोग से पीड़ित थे |

आधुनिक समय की समस्याएँ हृदय व मस्तिष्क पर हावी होकर चलती हैं |आधुनिकता का लबादा ओढ़े समस्याएँ मनुष्य को पंगु बनाती जा रही हैं | भयंकर स्ट्रैस से पीड़ित मनुष्य चैन से दो कौर खाकर आनंद प्राप्त करने के स्थान पर एक दौड़ में शामिल है | किसीके उपदेश से किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता |

सुनीला ने अपनी माँ को देखा था, उनका पूरा जीवन ही एक तड़प था, उसने माँ का मानसिक व हृदय का दबाव महसूस किया था | इसीलिए उसके मन में दिल का अथवा मस्तिष्क का डॉक्टर बनने का विचार आया था कि वह जितनी हो सके मनुष्यता की सेवा कर सके |

" चलो, आज मंदा मौसी के पास चलते हैं ---" एक दिन सहसा कॉफ़ी -हाऊस में बैठे-बैठे सुनीला ने कहा |

"मंदा मौसी ---? " प्रखर ने इतने दिनों में कभी यह नाम नहीं सुना था |"

इस दुनिया से बहुतों ने इसको छोड़कर अलग-अलग काम करने शुरू कर दिए हैं ---कोई चाय की दुकान चला रहा है तो कोई ट्रक चला रहा है, ऑटो भी कई लोग चला रहे हैं और हमारी मंदा मौसी ---मिलोगे तभी पता चलेगा ---"सुनीला ने प्रखर को बताया |

"अरे ! मैं कब से तुम्हें उनसे मिलाना चाहती थी पर व्यस्तताओं के चलते मौका ही नहीं मिल पा रहा था ---" मंदा मौसी न जाने कितने फ़ोन कर चुकी थीं लेकिन पता नहीं क्यों प्रखर से कभी ज़िक्र ही नहीं किया था उसने !