Distinction - 8 in Hindi Fiction Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | भेद - 8

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भेद - 8

8.

समय के साथ कुछ और दिन यूं ही गुज़र गए| सृष्टि ने दादी के साथ हुए वार्तालाप को अपने तक ही रहने दिया| अपनी माँ के पूछने पर उसने कहा कि-

“माँ! दादी आपको बहुत प्यार करती हैं | उन्होंने आपके लिए कभी भी कोई  ऐसी बात नहीं की| जिससे आपको चोट पहुंचे| आज मुझे उनके साथ सोते हुए बरसों  हो गए हैं| वह हमेशा आपकी बहुत तारीफ़ करती हैं| आपके किए गए त्याग को बहुत मान देती हैं| पर मुझे आपके किए हुए उस त्याग को जानना है माँ| मैं आपकी बेटी हूँ |” तब विनीता ने अपनी बेटी सृष्टि से कहा....

"चलो अच्छा हुआ सृष्टि तुम अपनी दादी के त्याग को महसूस कर पाई| दरअसल मैं भी तुम्हारे दादा और दादी जी की वजह से ही इस घर में आई थी| उन्होंने मुझे कभी भी  किसी काम को करने से न रोका....और न ही टोका| मैं उनकी वज़ह से ही इतने सालों से नौकरी करने भी जा पाई| पर ज़रूरी नहीं कि सभी का समय अच्छा गुज़रे या समय हमारे हिसाब से चले|”

“माँ! काफी कुछ तो मैं समझ चुकी हूँ| पर मुझे आपके मुँह से वह वज़ह जाननी है| जिसकी वज़ह से आपका और पापा का मन नहीं मिला| मैं कोई भी कयास नहीं लगाना चाहती| मैं आप दोनों को बहुत प्यार करती हूँ |” सृष्टि ने माँ से बहुत प्यार से कहा|

“बेटा! जब समय हमारे साथ नहीं होता तभी ऐसा होता है| मुझे भी वो निर्णय लेना पड़ा जो एक पढ़ी-लिखी स्त्री नहीं लेती क्यों कि व्यक्ति की समर्थता उससे बगावत भी करवाती है| पर मैंने शांत रहना स्वीकार किया| पर क्या मैं शांत रह पाई? बहुत कचोटता है आज तक यह सब मुझे| तुम्हारे बड़े और समझदार होने का इंतजार कर रही थी|....

पर हां अब दादी से तुम्हारी इतनी सारी बातें हो चुकी है....तो मुझे लगता है अब किसी रोज़ हम दोनों दादी को साथ लेकर बैठ सकते हैं| ताकि तुम्हारे मन के संशय भी दूर हो सके| हो सकता है तुमको मेरी किसी बात पर विश्वास न आए क्योंकि सभी बातें तुम्हारे पापा से जुड़ी हुई है|”

माँ की बातों को सुनकर सृष्टि को उन पर बहुत प्यार आया क्यों कि अब उनकी नज़रों में वह समझदार हो चुकी थी|

उसने माँ को वादा भी किया कि वह उनकी बातों को तसल्ली से सुनकर समझने की कोशिश करेगी....और अपनी कोई तीव्र प्रक्रिया नहीं देगी| विनीता ने बस सृष्टि से यही कहा....

“जिस दिन तुम्हारी छुट्टी होगी....और तेरे कॉलेज का कोई प्रोजेक्ट या काम नहीं होगा तभी हम साथ बैठकर तसल्ली से बात करेंगे| तू हमारे जीवन की बहुत कीमती पूंजी है....जिसको हम किसी भी क़ीमत पर खोना नहीं चाहते सृष्टि| तेरे पापा अच्छे इंसान हैं| मैं उनसे कभी लड़ना नहीं चाहती पर आज भी पुरानी परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है....जिनकी वज़ह से किसी न किसी बात पर मेरी उनसे लड़ाई हो जाती है| सिर्फ़ एक शिकायत है| जिसका समाधान पहले नहीं निकला था, पर शायद अब तुमसे साझा करने के बाद निकल आए|”

अपनी बात बोल कर मां ने सृष्टि के सिर पर हाथ रखकर उसे प्यार किया  और उसे उचित समय का इंतज़ार करने को कहा| सृष्टि अपनी माँ की बातों को सुनकर अब थोड़ा ठीक महसूस कर रही थी क्योंकि अब उसको उम्मीद थी कि माँ उसके साथ बहुत कुछ वह साझा करेगी जिसे वह सुनना चाहती है|