एकलव्य 6 in Hindi Novel Episodes by ramgopal bhavuk books and stories Free | एकलव्य 6

एकलव्य 6

6 द्रोण के आचरण का भाव

वेणु के पिता जी ग्रामप्रधान चन्दन को आज याद आ रही है उस दिन की, जब एकलव्य रात्रि विश्राम हेतु पुत्री वेणु की अभ्यास स्थली में आकर रूके थे। उस दिन वेणु ने उन्हें लक्ष्यबेध कर दिखलाया था। वेणु के लक्ष्यवेध से प्रभावित होकर ही वे अभ्यास के लिये यहां आये हैं। उन्हें ज्ञात हो गया, मेरी पुत्री सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर से ही विवाह करेगी। वेणु के कहने से ही मैंने एकलव्य से मिलने का प्रयास नहीं किया। आज के पूर्व पाण्डव भी तो एकलव्य से मिलने के लिये आये थे। यह बात हमें, अपने ग्राम के लोगों से ज्ञात हो गई थी। हमने सोचा,अर्जुन महान धनुर्धर है। दोनों धनुर्धर, परस्पर मिलना चाहते होंगे। ये कैसा भ्रमित युवक है जो आचार्य द्रोण की मूर्ति के सहारे अभ्यास में लगा हैं। अभी एक चरवाहे ने सूचित किया है कि आचार्य द्रोण स्वयं पाण्डवों के साथ एकलव्य से मिलने के लिये आये थे, सुना है उससे मिलकर लौट भी गये। उनका आगमन यहां कैसे हो गया ? वे चाहते तो एकलव्य को ही हस्तिनापुर बुला लेते। उनका यहां आना संदेह उत्पन्न कर रहा है। चलकर देखना चाहिये। वेणु भी विचित्र है कुछ बताती ही नहीं। वैसे भी वे  दोनों युवा हैं, दोनों को मिलना जुलना ज्यादा अच्छा नहीं। उसी आश्रम में दोनों धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे हैं। यह सोचते हुये ग्रामप्रधान चन्दन एकलव्य से मिलने के लिये उठ खड़े हुए।

यह देखकर ग्राम के कुछ अन्य लोग भी उन्हीं के साथ चले।

जिस समय वे वेणु के पास पहुँचे, वेणु और एकलव्य वार्तालाप में व्यस्त थे। पिता जी के आने की आहट पाकर दोनों का चित्त उनकी ओर चला गया। अंगुष्ठ का कटा हुआ भाग आचार्य द्रोण की मृण्मूर्ति के समक्ष पड़ा था। साथ आये ग्रामीण जन यह सब देखकर ग्रामप्रधान चन्दन के मुख की ओर देखने लगे। चन्दन चिन्तन में थे- गुरूदेव द्रोणाचार्य का यहां पाण्डवों के साथ आना। अंगुष्ठ का कटना। हस्तिनापुर की राजनीति!...........उनकी समझ में सब कुछ आ गया

 सोचते हुये वे बोले- “आचार्य द्रोण ने  पहिले तो निषादजाति के इस युवराज को शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। जब यह अभ्यास के बल पर परिपूर्ण हो गया तो अर्जुन जैसा धनुर्धर इससे ईर्ष्या करने लगा। अन्यथा अंगुष्ठ के कटने का प्रश्न ही खड़ा नहीं था। आचार्य द्रोण और पाण्डवों की महानता वन्दनीय है, मैं तो हस्तिनापुर की राजनीति से पूर्व में ही परिचित हूँ। यदि ऐसा नहीं होता तो निषादराज पांचाल नरेश द्रुपद के निकटस्थ लोगों में न होते। द्रोणाचार्य द्रुपद से शत्रुता का भाव रखते हैं। क्या बिगाड़ा हैं द्रोण का द्रुपद ने ?विद्यार्थी जीवन में कौन किससे क्या नहीं कह देता ? उन भावों को पकड़कर शत्रुता का भाव बना लेना। लगता है आचार्य द्रोण का मस्तिष्क विचार शून्य हो गया। जैसे वे हैं वैसी ही शिक्षा अपने शिष्यों को दे रहे हैं। शिक्षा का भाव, जहां एक दूसरे की प्रगति न हो, बल्कि एक दूसरे की अवनति का भाव आ जावे। अपने आचरण का भाव ही तो आचार्य द्रोण अपने शिष्यों में सम्प्रेशित कर रहे हैं।

 

उनकी यह बात सुनकर  वृद्ध मनीराम काका बोले- “प्रधान जी, शिक्षा व्यवस्था तो इस देश की वर्तमान समय में अवन्तिका के सांदीपनि आश्रम की ही उत्तम है। इस शिक्षा व्यवस्था ने श्री कृष्ण जैसे व्यक्तित्व को जन्म दिया हैं। वे देश की राजनीति में एवं आत्मदर्शन में अपना गहरा स्थान बनाते जा रहे हैं।”

चन्दन ने अपने अनुभव की बात कही, “आप ठीक कहते हैं काका मुझे तो द्रोण की इस शिक्षा व्यवस्था में त्रुटियां ही त्रुटियां दिखाई दे रहीं हैं। सुना है कौरव और पाण्डव आपस में द्वेष भाव रखने लगे हैं। जहां की शिक्षा व्यवस्था द्वेष उत्पन्न करे, ऐसी शिक्षा व्यवस्था को भीष्म पितामह ने बन्द नहीं किया तो किसी दिन ये कौरव और पाण्डव विनाश के मुहाने पर खड़े होंगें।”

एकलव्य उनकी ये बातें चुपचाप सुनता रहा। उसका चित्त गुरूभाव की पराकाष्ठा अनुभव करके निवृत हुआ था इसी कारण यह सब सुनने में वह पीड़ा का अनुभव कर रहा था। किन्तु वेणु कहीं बंधित नहीं थी। उसका चित्त तो पिता की बातों का समर्थन कर रहा था।

एकलव्य समझ गया- वेणु और उसके पिता मेरे इस गुरूभाव से कष्ट का अनुभव कर रहे हैं। इसलिये एकलव्य ने अपना निर्णय सुना दिया- “ग्रामप्रधान जी आप चिन्ता नहीं करें। अब तो अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। आपकी पुत्री का विवाह अर्जुन के साथ ही सम्भव हैं।”

वेणु ने मर्यादा की चिन्ता किये बिना ही कहा, “ईर्ष्या के बल पर सर्वश्रेष्ठ कहलाने वाले अर्जुन से मेरा विवाह सम्भव नहीं हैं।”

वेणु की भावना को उसके पिता समझते हुये बोले, “युवराज यदि वे सर्वश्रेष्ठ होते तो अंगुष्ठ को गुरूदक्षिणा में लेने की आवश्यकता नहीं थी। वेणु उत्कृष्ट धनुर्धर है। वह समझ रही हैं कौन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं कौन नहीं ?’’

एकलव्य को स्वीकारना पड़ा- “तात, वेणु ने अपने मन्तव्य से मुझे अवगत तो करा दिया हैं किन्तु अब मेरा क्या अस्तित्व शेष रह गया हैं ?”

यह सुनकर चन्दन ने कहा- “सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के पश्चात यदि कुछ घटित हो गया तो इस पर किसी का क्या आरोप ? सम्पूर्ण विश्व आपको ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर स्वीकार करता रहेगा।”

एकलव्य के मुख से निस्सृत हो गया- “मान्यता और सत्य में अन्तर होता हैं।”

‘’किन्तु युवराज, जनमानस में व्याप्त मान्यतायें परमसत्य का रूप धारण कर लेती हैं।”

ग्राम प्रधान ने चन्दन की एकलव्य ने बात काटी, ‘’तात आप यह मोह वश कह रहे है।”

यह सुनकर वेणु बोल़ी-“यदि यह बात मोहवश कह रहे हैं तो युवराज, मैं जीवन भर अविवाहित रहने को तैयार हूँ।”

एकलव्य को स्वीकारना पड़ा- “तात, निश्चय ही हमने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली हैं।”

उसकी यह बात सुनकर सभी की मुखाकृति पर दुख सुख की समान भावनायें एक साथ प्रगट हो रहीं थीं। कुछ ही क्षणों के उपरान्त वे एकलव्य को साथ लेकर बड़बनी ग्राम की ओर चल पड़े।

ग्राम प्रधान चन्दन ने ग्रामवासियों के परामर्श से निषादराज हिरण्यधनु के लिये पत्र लिखा-

निषादराज भीलाधिपति हिरण्यधनु जी महाराज,

       ग्राम बड़बनी की आपकी प्रजा की ओर से प्रणाम स्वीकार हो।

       आगे समाचार यह है कि हमारे युवराज एकलव्य हमारे ग्राम की सीमा में आचार्य द्रोण की मूर्ति के सहारे अभ्यास करने में लगे थे। एक दिन पाण्डवों का श्वान आकर, हमारे युवराज के लक्ष्यबेध में भोंक भोंक कर व्यवधान उत्पन्न करने लगा। हमारे युवराज ने बिना नोक के बाणों से उस का मुंह बन्द कर दिया। वह श्वान पाण्डवों के पास पहुँचा। पाण्डवों ने ऐसा धनुर्धर कहीं नहीं देखा था। सभी पाण्डव युवराज के पास आकर उनसे परिचय पूछने लगे। हमारे युवराज ने बता दिया-“मैं निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र आचार्य द्रोण का शिष्य एकलव्य हूँ।” युवराज की यह बात सुनकर सभी पाण्डव वापस चले गये। सुना है पाण्डवों में अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है। उसे हमारे युवराज के लक्ष्यबेध से असहय पीड़ा होने लगी। उसने युवराज के लक्ष्यवेध के सम्बन्ध में, अपने गुरू आचार्य द्रोण को, यह सब बतला दिया होगा। पाण्डव आचार्य द्रोण को साथ लेकर युवराज एकलव्य के पास आये। गुरूदेव द्रोणाचार्य ने एकलव्य से परिचय पूछा। युवराज ने अपना परिचय बतलाया कि मैं आचार्य द्रोण का शिष्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र हूँ। यह सुनकर आचार्य द्रोण हमारे भावुक युवराज से गुरूदक्षिणा माँगने लगे। युवराज उनके अन्दर पनप रही भावना को नहीं समझ पाये। गुरूदेव द्रोणाचार्य ने हमारे युवराज से गुरूदक्षिणा में दांये हाथ का अंगुष्ठ मांग लिया। युवराज ने हँसते-हँसते अपना अंगुष्ठ द्रोणाचार्य के श्री चरणों में अर्पित कर दिया। हमने वह कटा हुआ अंगुष्ठ द्रोण की मृण्मूर्ति के समक्ष रख दिया हैं। आप आकर उसका अवलोकन कर सकते हैं।

इधर हमारी एकमात्र पुत्री वेणु ने प्रतिज्ञा कर ली है कि वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर से ही विवाह करेगी। वेणु भी धनुर्धर हैं। आप आकर उसकी परीक्षा ले सकते हैं। वह भी आँखों पर पट्टी बांधकर लक्ष्यबेध कर देती है। अंगुष्ठ को गुरूदक्षिणा में लेकर, गुरूदेव द्रोणाचार्य ने युवराज को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर दिया है। हम सभी आपके राज्य के ग्रामवासी चाहते हैं हमारी कन्या वेणु युवराज एकलव्य को वरण करे। इस मंगल वेला में पत्रवाहक के साथ ही आप बारात लेकर पधारने की कृपा करें जिससे वरण की प्रक्रिया पूर्ण की जा सके। हम सभी ग्राम बड़बनी के निवासी आपके दर्शन करने के लिये व्यंग्र हैं।

चन्दन

ग्रामप्रधान

ग्राम- बड़बनी

जनपद- निषादराज्य

       एक विशेष पत्र वाहक को इस पत्र के साथ निषादपुरम भेजा गया ।

                                                                   00000

            

पत्रवाहक पत्र देकर तुरंत लौट गया था।

       पत्र पाकर निषादराज अकुला उठे। इच्छा हुई कि दौड़कर अपने पुत्र के पास पहुंच जावें । लेकिन एक राज प्रमुख को ऐसी अकुलाहट शोभा नहीं देती थी अतः चुप रह गये । बस  मन्त्री चक्रधर से विचार विमर्ष कर अपने राज्य के ग्रामप्रधानों की सभा का आवाहन किया।

दूसरे दिन सभा संपन्न हुई। सर्व सम्मति से निश्चय किया गया कि पहले युवराज एकलव्य का विवाह किया जावे,तत्पश्चात् राज की नीतियों के सम्बन्ध में इस अंगुष्ठदान की व्यथा को रखा जावे, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी किया जा सके। देश की सम्पूर्ण भील जातियों के ग्रामप्रधानों के समक्ष, इस भावना की सूचना भेज दी जावे। जिससे उस सभा में सब एकजुट होकर अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकें।

उसी सभा में महारानी सलिला ने बारात के साथ चलने का मन्तव्य प्रगट किया। जिसका सभी ने समर्थन कर दिया।

तीसरे दिन सजधज कर बारात चल पड़ी और सांझ तक ग्राम बड़बनी के निकट जा पहुँची। निषादराज की व्यवस्था उसी बगीचे में की  गई, जहाँ एकलव्य ने अभ्यास किया था। बगीचे में प्रवेश करते ही निषादराज हिरण्यधनु आचार्य द्रोण की मृण्मूर्ति के समक्ष उपस्थित हुये। वे देख रहे थे एकलव्य का कटा हुआ अंगुष्ठ जो आचार्य द्रोण की मूर्ति के समक्ष एक पत्ते पर रख़ा है। यह देखकर उन्हें आचार्य द्रोण के इस कृत्य पर क्रोध आ गया। बड़ी देर तक मौन साधे उस क्रोध के कड़वे घूंट कण्ठ से नीचे उतारते रहे।

उसी समय एकलव्य ने उपस्थित होकर पिताजी के  चरणों में प्रणाम किया। उनकी दृष्टि एकलव्य के दांये हाथ के अंगुष्ठ की ओर गई। उस कटे हुए भाग पर जड़ी बूटियों का लेपन था। निषादराज ने एकलव्य को अपने हृदय से लगा लिया। उसकी पीठ हाथ फेर कर थपथपाते रहे।जब एकलव्य माता जी के पास पहुॅंचा। माताजी की आँखें उसे देखने के लिये व्यथित हो रहीं थीं। माताजी सलिला उसके कटे हुये अंगुष्ठ के भाग को देखकर आचार्य द्रोण की भर्त्सना करने लगीं- “आचार्य द्रोण और पाण्डव बड़े भारी धर्मात्मा बनते हैं उन्हें मेरे पुत्र की धनुर्विद्या छीनने में लज्जा भी नहीं आई। वत्स, तुम भी कितने भावुक हो, वर्षो से अर्जित श्रम, तुमने एक क्षण में भावना में बहकर अर्पित कर दिया। उनका तो इस से कोई सम्बन्ध न था। सम्बन्ध तो तुमने अपने मन से जोड़ लिया। मन से तो हम किसी से भी कुछ जोड़ तोड़ लेते हैं। इसका अर्थ यह तो नहीं कि यह वस्तु उन्हीं की हो गई। जब से मैंने यह सब सुना है मुझे तो तुम्हारी विवेकहीन भावुकता पर सोच आ रहा हैं।”

एकलव्य ने माता जी को सांत्वना दी- “माता जी यह तो अंगुष्ठ ही कटा है। मेरा एक हाथ भी कट गया होता तो भी मैं जीवन से हारने वाला नहीं हूँ।”

उसकी यह बात सुनकर वह गम्भीर गई। उनने देखा कि आचार्य द्रोण के इस कार्य को लोग चाहे जिस दृष्टि से देखें, चाहे प्रशंसा करें अथवा भर्त्सना करें।एकलव्य सब कुछ सुनता रहता है।

इस पर वह कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं करता है। वह समझ रहा है-“अब मैं किस किस का मुंह बन्द करूं ? जिसके मन मेें जैसा आयेगा वह अपनी दृष्टि से इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करेगा ही।”

ये बातें मन में आते ही आचार्य सुमत से सुनी कहानी सलिला के चित्त में मड़राने लगीं-हमारी जाति को किसी गुरू की आवश्यकता नहीं है। हमारी जाति के तपस्वी ऋषि-मुनि ही बड़े-बड़े मनीषियों के गुरु रहे हैं। यह सोचकर उन्हें याद हो आई नारदजी की। वे दूरदर्शी और प्रकान्ड विद्वान थे। महाराज हिरण्यधनु से सुना है किवे धीवर के ही पुत्र थे।

 एक दिन भ्रमण करते हुये नारदजी देवलोक पहुँचे,वहाँ नित्य की तरह भगवान विष्णू से विचार विनिमय करने लगे। इससे नारदजी को घमन्ड हो गया। वे देवताओं की उपेक्षा करने लगे। देवताओं को यह बात समझने में देर नहीं लगी। उन्होंने भगवान विष्णू से नारदजी के इस आचरण की शिकायत की। इसपर भगवान विष्णू ने उपाय सुझाया-‘‘ हे देवताओ नारदजी जब मेरा प्रवचन सुनने आयें और जिस स्थान पर बैठें,आप उस स्थान की थोडी सी रज उठाकर फेंक दें।’’ यह कहकर विष्णू शान्त होगये। प्रतिदिन की तरह नारदजी आगये।वहाँ सभी का उपेक्षित व्यवहार देखकर वे बड़े दुखी हुये और आगे बढत्रकर विष्णू के सम्मुख जा बैठे। विष्णू प्रवचन करने में मग्न रहे। नारदजी का मन प्रवचन सुनने में नहीं लगा। वे उठकर जाने लगे तो देवताओं ने उनके बैठे स्थान की थोडी सी रज उठाकर फिर से फेंक दी। इस बात की अनेक बार पुनरावृति होने पर वे विष्णू से बोले-‘‘ प्रभू आपकी उपस्थिति में मेरा इतना अपमान! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आप भी इन सबसे मिले हुये हो। मैं अपके ही सम्मुख सपथ खाता हूँ कि मैं इनका अनिष्ट कर दूंगा। ’’

 यह सुनकर विष्णू ने उन्हें समझाया-‘‘देवऋषि आप इनसे बदला तो ले सकते हैं।मगर विद्या के साथ-साथ वुद्धि होना अति आवश्यक है। अतः आप पहले अपना कोई गुरु तो बनाओ और उससे पहले सदवुद्धि प्राप्त करो। यह सुनकर नारद विनीत भाव में आ गये। बोले-‘‘‘ हे प्रभू इस चराचर में मैं तो आप को ही अपना गुरू मानता हूँ। आप मुझे अभी इसी समय मन्त्र दीजिये। भला आपसे उत्तम गुरू मुझे कौन मिल सकता है।’’

 प्रभू ने हंसते हुये कहा-‘‘ नारदजी ?यह सामर्थ मुझ में नहीं है। यह पद भगवान से भी बड़ा है। आप मृत्यु लोक जाइये और वहाँ किसी को अपना गुरू बना लीजिये।’

    ‘‘आपही बताइये मैं आप को छोड़कर वहाँ किसे अपना गुरू बनाऊं।’’ नारदजी ने पूछा।

       ‘‘प्रातः होते ही जिस व्यक्ति पर तुम्हारी दृष्टि पड़े उसे ही अपना गुरु बना लीजिये। वही आपका कल्याण करेंगे तथा गुरु मंत्र देंगे। गुरु की बुद्धि मेरी बुद्धि से भी अति तीव्र होती है।’’विष्णू ने उत्तर दिया।

        ‘‘नारायण’’!! एक गहरी सांा लेते हुये नारद मृत्युलोक को रवाना होगये और वहाँ पहुँचकर प्रभात की प्रथम किरण के साथ नयन बिछाये गुरु की प्रतिक्षा करने लगे। उन्हें सामने से एक काला कलूटा व्यक्ति आता दिखाई दिया। जिसके कन्धे पर मछली पकड़ने का जाल रखा हुआ था। जो कि लंगोटी मात्र ही पहने हुआ था।

         जल्दी ही नारद ने लपककर‘जय गुरुदेव’ का घोष करते हुये उनके चरण स्पर्श किये। वह मछुआरा उन्हें खडे-खड़े निहारता रहा। नारद ने विनीत भाव से कहा-‘‘निषाद जी आप मेरे गुरु हैं। आप मुझे गुरुमंत्र दीजिये।’’ पहले उन्होंने टाल-मटोल की ,किन्तु नारद के विनीत भाव को देखकर वे उन्हें शिष्य बनाने को तैयार हो गये। नारद ने वह जाल उनसे लेकर आपने कन्धे पर रख लिया। नदी के तीर पर जाकर उन्होंने उनके चरण पखारे और विधिवत उन्हें अपना गुरु बना लिया।

        उसी दिन संध्या के समय रास्ते में उन्हें  विष्णूजी मिल गये। उन्हें देखते ही नारदजी बोले-‘‘ महाराज मैंने गुरु बना लिया है। परन्तु वह तो........।

   ‘‘हां......हां .....वह मछुआरा है ,यही न नारद।’’ विष्णू ने वाक्य पूरा किया।

   ‘‘हां....महाराज।’’नारद ने उत्तर दिया।

   ‘‘गुरु जात-पात से ऊपर का पात्र है। नारद तुमने तुम्हारे मन में ऐसा कुत्सित विचार कैसे आया? इसके लिये तुम्हें नरक की यातना भोगना पड़ेगी।’’ यह सुनकर नारद गिड़गिड़ाये-‘‘प्रभू इससे छुटकारा कैसे मिलेगा?’’

       विष्णू बोले-‘इसका उपाय मैं क्या जानू! इसका उपाय तो तुम्हारे गुरु ही बतलायेंगे।’’उनकी ये बातें सुनकर अपने गुरु के पास चीत्कार करते हुये नारद भागे-‘‘ गुरुदेव बचाओ, गुरुदेव बचाओ।’’

        गुरुदेव नारद का चीत्कार सुनकर आश्रम से वाहर निकल आये। वे समझ गये नारद क्यों व्यथित हैं। वे धीरे से नारद के कान में फुसफुसाये।अब नारद गुरुदेव के बतलाये मार्ग पर चल पडे़। सीधे विष्णू के धाम में पहुँचे और प्रभू को सामने पाकर बोले-‘‘ नाथ, स्वर्ग नर्क सब आपके बनाये हुये हैं। आज में यह जानने आया हूँ कि नर्क कैसा होता है?कृप्या मुझे नर्क का नक्शा बनाकर समझाइय कि मुझे वहाँ किधर से जाना पड़ेगा।े।’’ विष्णू टलमटोल करने लगे। नारद जिद पर अड़ गये। विवश होकर उन्हें नक्शा बनाना पड़ा।

       नारद ने पूछा-‘‘ प्रभू नर्क विलकुल ऐसा ही है जैसा आपने नक्शा बनाया है।’’

          वे बोले-‘‘ नारद विलकुल ऐसा ही है।’’

          नारद ने प्रश्न किया-‘‘ प्रभू इस नक्शे और उस नरक में कुछ अन्तर तो होगा।’’

          ‘‘नारद इसमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है।’’ विष्णू ने उत्तर दिया। यह सुनकर नारद ‘‘नारायण नारायण’’ कहते हुये उस नक़्शे पर पैर रखकर लाँघते हुये आगे बढ़ गये।

       विष्णू ने पूछा-‘‘नारद तुमने यह क्या किया।’’

       नारद ने उत्तर दिया-‘‘ प्रभू मेरे गुरु ने  नरक को पार करने का यही रास्ता बताया था।’’

            विष्णू ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुये कहा-‘‘ देखा ,नारद गुरु मुझ से बड़ा है ना।’’

       आचार्य सुमत ने यह कहानी हमारे गौरव को व्यक्त करने के लिये ही सुनाई थी। आज यह समझ नहीं आता है कि लोग हमारे इस इतिहास को  विस्मृत क्यों कर गये!

            उधर आज रात्रि हिरण्यधनु को नींद नहीं आ रही हैं उन्होंने अंगुष्ठदान की बात सुनी है पीड़ा तो उसी समय से उनके मन में समाहित हो गई है। जब से मृण्मूर्ति के समक्ष एकलव्य का कटा हुआ अंगुष्ठ देखा है, यह वेदना और तीव्र हो गई है, विवाह की प्रसन्नता लुप्त है। वे जैसे ही आंखें बन्द करते हैं अंगुष्ठ का कटा हुआ भाग सामने आ जाता है। उन्हें याद आ रहीं है इतिहास के उन पृष्ठों की कथा जो एक बार उनके कुलगुरू ने हिमालय की कंदराओं से बाहर आकर उनके पिता को सुनाई थी और जिनमें निषादजाति का पुरातन इतिहास छिपा है।

..........सतयुग के प्रारम्भ में राज्य नाम की कोई चीज नहीं थी। उस समय न कोई दण्ड था और न दण्ड देने वाला। सारी प्रजा आपस में धर्म के नाते ही एक दूसरे की रक्षा करती थी। उसके पश्चात् लोग मोह में पड़ गये। संसार में जिस सनातन वेद वर्णित सहभाव और सहअस्तित्व का उल्लेख था, उसे लोभ मोह के दूषित भावों ने नष्ट कर डाला। इससे धर्म नष्ट हो गया। मानव के हित में कोई उपाय खोजा जाने लगा। उसके पश्चात लोगों ने उपनी बुद्धि से नीतिशास्त्र की रचना कर डाली। उसमें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का वर्णन किया गया। इस नीतिशास्त्र की रचना के पश्चात मृत्यु नामक मानस पुत्री सुनीथ से राजा अंग के द्वारा वेन का जन्म हुआ। वह रागद्वेश के आघीन होकर प्रजा में अर्धम का प्रचार करने लगा। नहीं नहीं यह सत्य नहीं है, राजा वेन ने उस नीतिशास्त्र के अनुसार शासन करना चाहा। उसने ब्राह्मणों को दण्ड से ऊपर नहीं माना। उसने सभी को समान समझा और दण्ड के आधीन जाना। यह देख वेदवादी ब्राह्मणों ने उसे मार डाला। देश में तब और अधिक अराजकता फैलने लगी। यह देखकर उन ब्राह्मणों ने उसके वांये और दांये भाग का मंथन किया। नहीं नहीं यह कहानी भी प्रतीक के माध्यम से कही गई है, सच तो यह है कि उस वेन नामक राजा के दो पत्नियाँ थीं एक राज्य के वाम भाग की पत्नी, दूसरी राज्य के दांये भाग की पत्नी। उन ब्राह्मणों ने वाम नामक पत्नी के संसर्ग से पुत्र उत्पन्न किया। उस पुत्र ने भी घोषणा कर दी कि वह इन ब्राह्मणों के अस्तित्व को दण्ड से उपर मानने के लिये तैयार नहीं है तो ब्राह्मणों ने उसे निषीद अर्थात तुम राज्य के योग्य नहीं हो ऐसा कहकर राज्य से पृथक कर दिया। इस तरह हम निषादजाति का जन्म हुआ। उसके पश्चात वेन राजा की दूसरी पत्नी के संसर्ग से पृथु नामक पुत्र का जन्म हुआ। पृथु उन ब्राह्मणों, मुनियों के अनुसार राज्य कार्य करने के लिये तैयार हो गया। उसने उन ब्राह्मण मुनियों को दण्ड से ऊपर स्वीकार कर लिया। आगे चलकर यही संस्कृति आज तक फल फूल रही है।

‘‘हमें गर्व है, हम राजा पृथु के बड़े भ्राता निषाद की सन्तान हैं।‘‘यह सोचते हिरण्यधनु ने लम्बी स्वांस खींची और पुनः सोचने लगे, भीष्म पितामह जैसे ज्ञानी वहां बैठे हैं। उन्होंने आज तक इस इतिहास को इन कौरव और पाण्डवों और उनके गुरू द्रोणाचार्य को नहीं सुनाया। यदि यह इतिहास इन्हें सुना दिया होता तो उस दिन मेरे वत्स एकलव्य को निषादजाति का कहकर राजकुमारों के साथ शिक्षा देने से मना न करते। मुझे तो लगता है-आचार्य द्रोण को पूर्व से भी यह इतिहास ज्ञात नहीं होगा, अन्यथा वे ऐसा न करते। इन ब्राह्मणों ने मानव के इस सच्चे इतिहास को छिपाने का प्रयास किया है। राजा पृथु से पूर्व के इतिहास पर वे मौन रह जाते हैं यही इस भारत वर्ष का दुर्भाग्य है।

इस चिन्तन से उनके मन को किन्चित विराम मिला। उन्होंने करवंट बदली। महारानी सलिला पास में ही लेटी हुई थीं। वे भी चिन्ता में डूबी सो नहीं पाई। वे अनुभव कर रही थीं कि निषादराज भी चिन्तन में हैं। यह सोचकर बोली-“स्वामी चिन्ता में हैं।”

हिरण्यधनु बोले-देवी आज चित्त इस बात की खोज में हैं कि हमसे चूक कहां हो गई हैं ?

“स्वामी हमसे चूक कहां हो गई है ?”

“देवी, हमसे चूक यहां हो गई कि हमने यह मान लिया उन्हें जो न्याय लगा है वह न्याय है और उन्हें जो अन्याय लगा है वह अन्याय है। इसी का दण्ड हमें आज भी भोगना पड़ रहा हैं।”

“स्वामी अर्धरात्रि व्यतीत हो गई है। प्रातः ही विवाह के कार्यक्रम में व्यस्त होना है। इसीलिये चिन्तन को किन्चित विराम देकर विश्राम कर लें।”

यह कहकर महारानी सलिला चुप रह गई जिससे निषादराज सोने का प्रयास करें, किन्तु उनका चित्त विराम नहीं ले रहा था। वे फिर अपने कुलगुरू द्वारा सुनाये गये निषाद जाति के इतिहास के नये प्रसंग में खो गये।

..........राजर्षि शान्तनु ने गंगा तट पर एक परम रूपवती युवती को देखा। शान्तनु उनके रूप को देखकर मोहित हो गये। उन्होंने उससे निवेदन किया कि तुम मुझे पति के रूप में स्वीकार कर लो। उस गंगा नाम की युवती ने शर्त रख दी कि मुझे आपकी पत्नी होना स्वीकार है, लेकिन मैं अच्छा बुरा कुछ भी करूं आप मुझें रोकेंगे नहीं अन्यथा मैं आपका साथ छोड़कर चली जाऊँगी। शान्तनु ने उसकी बात स्वीकार कर ली। वे गंगा समुदाय की पुत्री थीं। समय व्यतीत होने पर एक एक करके गंगा के गर्भ से सात पुत्र हुये परन्तु ज्योेंही पुत्र होता गंगा उसे गंगा की धारा में प्रवाहित कर देती, अर्थात अपने गंगा समुदाय में ले जाकर उसके पालन पोशण हेतु परिजनों को सौंप देती। राजा यह सब नहीं समझ पाये। जब उसके आठवां पुत्र हुआ तो मोह वश उन्होंने गंगा को उसे गंगा की धारा में समर्पित करने से रोका। शर्त के अनुसार वह उस पुत्र को छोड़कर चली गई, आज वही गंगा पुत्र देववृत भीष्म पितामह हैं।

निषादराज कों याद आने लगा इसी कथा से जुड़ा एक और प्रसंग- जब सत्यवती  अठठारह-उन्नीस वर्ष की थी, यह बात उसी समय की है। नौका चलाने का कार्य निषाद पुत्री सत्यवती करती थी। एक बार पारासर ऋषि ने यमुना पार करना चाही तो वे बोले-‘‘ तुम मुझे पार ले चलो।’’

सत्यवती बोली-‘‘आइये महाराज मैं आपको पार ले चलती हूँ।’’ सत्यवती ने नाव खेली और पारासर जैसे महान तपस्वी को उसमें बैठाकर पार ले चली।

        जब वह नाव के चप्पू को मस्ती में चलाती थी तो उसका वक्षस्थल उभार खाकर वातावरण में मस्ती उत्पन्न करने लगा। एक तो वह गजब की सुन्दरी, दूसरे उत्तेजक लावण्य, तीसरे जल विहार,चौथे अकेली यौवना, पाँचवे सुबह का समय जबकि कोई पथिक जल मार्ग पार करने न आया हो। ऐसे में महाषर्र््िा अपना अस्तित्व भूल गये। उनमें काम उत्तेजना जागृत होगई। वे सत्यवती से आग्रह करने लगे-‘‘ हे रूप सुन्दरी में तुम्हारे कारण काम से अत्यन्त पीड़ित हो उठा हूँ। तुम मेरी वासना को शान्त करो अन्यथा अनिष्ट होगा।’

सत्यवती ने उन्हें समझाया-‘आप ऋषि हैं। दूसरे आप उम्र में बहुत बड़े हैं। तीसरे जल और आकाश इस पाप के साक्षी होंगे। चौथे मैं कन्या हूँ। पाँचवी बात यह है कि मैं एक निषाद हूँ। अतः मैं आपके योग्य नहीं   ें हूँ।’

 इस पर’ऋषि ने उत्तर दिया-‘‘ हे सुन्दरी तू मेरी शक्ति से परिचित नहीं है। मैं अपनी यौगिक क्रिया से तुम्हारी आयु समान करके अपनी देह में शक्ति संचार कर लूंगा। दूसरे अपने तपोबल से जल और आकाश को ढक दूंगा। तीसरे तुम्हारे जो पुत्र होगा ,वह विद्वान और पूज्यनीय होगा।तुझे प्रसव पीड़ा भी नहीं होगी। हे निषाद बालिके! तुम्हें यह सुनकर आश्चर्य होगा कि मैं  जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन करता रहा हूँ लेकिन आज मैं पुत्र उत्पन्न करने की लालसा से, तुम्हारे सौन्दर्य ने मुझे अपना ऋषित्व क्षणभर के लिये त्यागने को विवस कर दिया है। मैं तुम्हें ऐसा आर्शीवाद देता हूँ जिससे तुम्हारे शरीर से निकलने वाली सुगन्ध आसपास के वातावरण को सुगन्धित करती रहेगी। अब तुम्हारा नाम मत्सगंन्धा न होकर योजनगंन्धा होगा।’’

इसी समय ’ऋषि ने एक गहरी स्वास ली जिससे आकाश में चारो ओर कुहरा फैल गया।....और तव’ऋषि अपने अस्तित्व को भूलकर शरीर की भूख मिटाने में लीन हो गये।जीवन के यथार्थ को भेागकर सामान्य प्रणियों की तरह पश्चाताप करते हुये बोले-‘‘ प्रिय सत्यवती जो होना था होगया। मेरी अमानत पैदा होने के बाद पाँच वर्ष के वय में शिक्षा प्राप्त करने हेतु  मेरे पास चला आयेगा। तुम जब भी उसे याद करोगी वह तुम्हारे पास आजाया करेगा।’यह कहकर पारासर ऋषि सोचने लगे- यह कहकर मैं अपने को बचाने का प्रयास कर रहा हूँ। किससे बचा रहा हूँ अपने आपको। समाज से नहीं नहीं ,हम तपस्वी  समाज से पृथक हैं। हमने अच्छे-वुरे जो भी बीज बो दिये, वे श्रेष्ठ ही कहे जायेंगे। क्यों कि श्रेष्ठ पुरुष जो भी करें वही आचरण है। यह सोचकर बोले-‘‘ठीक है मेरे चलने का समय होगया है, चलूं?’’सत्यवती ने कहा-‘‘ अभी कैसे? विवाह करके जाते,  इस स्थिति में मुझे छोड़कर जाना आप ठीक समझते हैं तो चले जायें। और वे मूक बने चले गये थे। कुछ दिनों तक मैं चुप रही। जैसे ही मेरा पेट दिखने लगा , मैंने पिता जी को साफ-साफ बतला दिया। बिन व्याही माँ की जो दशा होती है वही सत्यवती की हुई।

ठीक नौ माह बाद सत्यवती ने जिस बालक को जन्म दिया उसका नाम लोगों ने व्यास  दिया। व्यास यानी ‘गोल’ जिसके पिता का पता न हो ,गोल-माल। एक कहावत है वर्णशंकर संतान बड़ी प्रतिभाशाली होती है। उसमें दो संस्कृतियों का समन्वय जो होता है,वह असाधारण होगा ही।

यों सत्यवती के गर्भ से यमुना की रेत में महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ।

इधर गंगा के चले जाने के कुछ वर्षों पश्चात राजर्षि शान्तनु ने निशादों में देवांगना के समान सुंदर एक कन्या को देखा। शान्तनु ने उससे पूछा- “तुम कौन हो ?”

प्रश्न सुनकर वह लजाते हुये बोली- “मैं निषाद कन्या सत्यवती पिताजी की अनुपस्थिति में नाव चलाती हूँ।”

‘‘आप निषाद कन्या ! देवांगनायें भी आपके रूप सौन्दर्य को देखकर ईर्ष्या करती होंगी। विधि ने आपके अंगों को जाने किस तूलिका से अंकित किये है।’’

अपने रूप सौन्दर्य की बात सुनते हुये वह बोली, ‘‘राजन, आप कहना क्या चाहते हैं ?’’

‘‘मैं आपसे विवाह करना चाहता हूँ।’’

‘‘किन्तु राजन, इसके लिये आपको हमारे पिताजी से अनुमति लेना पड़ेगी।’’

‘‘आपकी बात उचित है। हम उनसे मिलेंगे।’’

जब निषादराज ने राजा को समक्ष देखा तो प्रश्न किया, ‘‘राजन आप यहाँ कैसे ?’’

प्रश्न सुनकर शान्तनु ने अपनी बात कही, ‘‘मैं आपकी कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहता हूँ।’’

‘‘राजन् यह कैसे सम्भव है ?’’

‘‘निषादराज यह सम्भव क्यों नहीं है ?’’

‘‘आप लोग हमारी जाति के साथ भेदभाव रखते हैं। आप यदि मेरी पुत्री से विवाह करना ही चाहते हैं तो मेरी एक शर्त है।’’

‘‘राजा शान्तनु ने आश्चर्य व्यक्त किया, ‘‘कैसी शर्त ?’’

‘‘यही कि, मेरी पुत्री का पुत्र ही आपके राज्य का उत्तराधिकारी होगा।’’

राजा शान्तुन गंगा से उत्पन्न आखिरी बचे अपने वीर और योग्य पुत्र देवव्रत के कारण उसकी बात को स्वीकार नहीं कर पाये। वापस राजधानी चले आये।

राजप्रासाद के  परिजनों से समाचार पाकर देवव्रत ने पिताजी को व्यथित देखा। देवव्रत ने पूछा तो शांतनु नेे उसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। यह सुनकर देवव्रत निषादराज के घर जा पहुँचे। उनकी एकमात्र शर्त जानकर, बिना विचार किये ही उन्होंने भीशण प्रतिज्ञा कर डाली कि मैं आजीवन ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन करूँगा। आपकी पुत्री का बड़ा पुत्र ही हमारे राज्य का उत्तराधिकारी होगा।

उसी प्रतिज्ञा के कारण देववृत भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

राजर्षि शान्तनु की पत्नी सत्यवती के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुए। चित्रांगंद और विचित्र वीर्य। अभी दोनों राजकुमार युवा भी न हो पाये थे कि राजा शान्तनु की मृत्यु हो गई। चित्रांगद वीर पुरूष था, उसने असुरों पर चढ़ाई कर दी और वह उस युद्ध में मारा गया।

देवव्रत भीष्म ने भाई का संस्कार किया। उसके पश्चात अपने छोटे भाई विचित्र वीर्य को गद्दी पर बैठाया। उसी समय काशी नरेश की तीन पुत्रियों का स्वयंवर हो रहा था। भीष्म ने उन तीन कन्याओं को बलपूर्वक अपहरण कर रथ पर बैठाया और अपनी राजधानी ले आये। वे स्वयं तो ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा से बंधे थे। उनमें सबसे बड़ी अम्बा ने देवब्रत से कहा, “मैं पहले ही, मन ही मन राजा शल्य को वरण कर चुकी हूँ। स्वयंवर में उन्हें ही वरण करती।

शल्य एक प्रतापी राजा था।उसने अपहरण की हुई अम्बा को लेले से इन्न्कार कर दिया। इसी वियोग में वह वन को चली गई। वहाँ उसकी भेंट शेखवत्य से हुई। उसने उसे होत्रवाहन से मिलाया।और होत्रवाहन उसे परशुरामजी के पास लेकर गया। परशुरामजी ने प्रतिज्ञा  की कि वे उसका विवाह भीष्म से करा देंगे।

 परशुरामजी उसे हस्थिनापुर लेगये और भीष्म को अपने निर्णय से अवगत कराया। भीष्म ने उनकी बात स्वीकार नहीं की। परशुरामजी ने कहा-‘‘ अब मैं इसका विवाह विचित्र वीर्य से भी नहीं होने दूंगा।’’ परशुरामजी भीष्म के गुरु थे। उनका युद्ध के लिये आवाह्न पाकर वे युद्ध के लिये तैयार होगये। दोनों में वयालीस दिनों तक अनिर्णित घनघेार युद्ध होता रहा। युद्ध देखते-देखते भूख-प्यास के कारण अम्बा की मृत्यु होगई।यह देखकर युद्ध रुक गया।

वह मरते समय भीष्म को शाप दे गई कि मेरे कारण ही तुम भीष्म बने हो अतः मैं ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनूंगी।  कहते हैं कि इसी ने पुर्नजन्म लेकर महाभारत के युद्ध में शिखन्ड़ी  बनी जिसकी आड़ में भीष्म मारे गये।ष्

 शेष दो कन्या, अम्बिका और अम्बालिका का विचित्रवीर्य के साथ विवाह कर दिया  था। विचित्रवीर्य भोगविलासी था। कुछ ही समय में उसे क्षय रोग हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। अब राज्य का कोई उत्तराधिकारी न रहा तो बड़ा धर्म संकट उत्पन्न हो गया। सत्यवती ने भीष्म से कहा, “इन रानियों से तुम पुत्र उत्पन्न करो।”

यह सुनकर भीष्म ने कहा, “माता जी यह तो बिलकुल असंभव है ! मैंने ब्रह्मचर्य व्रत ले रखा है।”

वे माता जी सत्यवती की बात स्वीकार नहीं कर सके तब सत्यवती ने वेदव्यास को बुलाया और उनसे कहा, “तुम मेरे बड़े पुत्र हो। मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ तुम इन रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।”

वेदव्यास माताजी की आज्ञा को अस्वीकार नहीं कर पाये। इस तरह अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पाण्डु को उत्पन्न किया। अम्बालिका की प्रेरणा से उसकी दासी ने व्यास जी के द्वारा विदुर को उत्पन्न किया।

इस नियोग में  कुछ बातें महत्वपूर्ण हुईं। अम्बिका ने शर्म के कारण और व्यासजी के काले कलूटे रूप के कारण तथा उनकी आयु अधिक होने के कारण  स्वाभाविक रूप से उसने अपनी दोनों आँखें बन्द करलीं।

अम्बालिका समाज के अज्ञात भय के कारण पीली पड़ गई।

...और दासी मर्यादा जो कि कुआंरी थी। वह मन ही मन पुत्र की इच्छा भी रखती थी। इसी कारण वह खुलकर व्यासजी से मिली और उसने भरपूर आनन्द लिया।

इन तीनों से नियोग के प्श्चात व्यासजी ने परिणम बतला दिया-

व्यास ने कहा-‘‘अम्बिका ने मुझ से घृणा की है और अपनी आँखें बन्द करलीं हैं ।इसीलिये इसके जो पुत्र होगा वह अन्धा होगा। इसीके परिणाम स्वरूप इसके धृतराष्ट्र्र नामक अन्धा पुत्र हुआ।

अम्बालिका भय ये पीली पड़ गई थी जिससे मेरे अन्दर अतृप्ति का सेचार हुआ।इसीलिये इसके जो पुत्र. होगा वह पीलिया रोग से पीड़ित कोगा। अतः उसके पाण्डु नामक पुत्र हुआ। जिसको पीलिया नामक रोग था।

इसके बाद व्यासजी ने दासी मर्यादा को आर्शीवाद दिया-‘‘ तूने मुझे सरलता और निद्वेषता का परिचय दिया है अतः तुम्हारे जो पुत्र होगा वह धर्मपरायण एवं वुद्धिमान होगा।’’            

इस प्रकार धृतराष्ट्र्र,पाण्डु और विदुर का जन्म हुआ।

यह सब सोचते हुए  हिरण्यधनु इस निष्कर्ष पर पहुंचे, कि आज हमारी समझ में यह नहीं आता है हम निषादजाति के लोग छोटे कैसे हो गये। ये कौरव ये पाण्डव ये विदुर निषाद जाति की कन्याओं के वंशज हैं। क्या ये लोग अपने इस सारे वृत्तान्त को भूल गये ? अभी तो भीष्मपितामह बैठे हैं इस सारे वृत्तान्त को कैसे भुलाया जा सकता है

हिरण्यधनु सोच में रात्रि पर्यन्त नहीं सो सके। वेणु के बारे में वे सोचने लगे, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर से विवाह करने वाली वेणु को पुत्रवधू के रूप में पाकर मैं आत्मसंतोश का अनुभव कर रहा हूँ। जब यह संदेश हस्तिनापुर पहुँचेगा कि वेणु ने एकलव्य का अंगुष्ठ कटने के उपरान्त भी एकलव्य को वरण कर, उसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित कर दिया है। तो यह बात भी पाण्डवों को असह्य हो जावेगी। मुझे गर्व है इस घटना से जुड़कर ही सही, वेणु जैसी लक्ष्यबेधी धनुर्धर हमारी पुत्रवधू बन रही है।

यह सोचकर वे विस्तर से उठते हुये अपने आप में नये उत्साह का संचार अनुभव करने लगे। आज विवाह समारोह में सम्पूर्ण राज्य से भील जातियों के प्रमुख व्यक्ति भाग लेने के लिये आये थे।

विवाह में निषाद वंश की परम्पराओं के अनुसार वरण की प्रक्रिया शुरू हो गई। वेणु ने एकलव्य को पुष्पहार पहनाकर वरण कर दिग् दिगन्त में उसके यश-गौरव-गाथा की पताका फहरा दी। इससे विषाद का सारा वातावरण तिरोहित हो गया और प्रमोद का वातावरण गूँज उठा।

महारानी सलिला इस अवसर पर सोच रही थी, कुछ खोकर हमें बहुत कुछ मिल गया है। इस संकट की घड़ी में वेणु ने जो आत्मसन्तोष प्रदान किया है वह अवर्णनीय है। कौरव और पाण्डव अब यह समझ लें हम निहत्थे नहीं हैं। उनमें तो ऐसी कोई विदुषी नारी नहीं है जो धनुर्धर हो।

जब सभी के समक्ष अग्नि की परिक्रमा के साथ विवाह की परम्परा पूर्ण हो गई उसके पश्चात विशाल भोज का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सभी आनन्द का अनुभव कर रहे थे। रात्रि में भील और निषाद ललनाओं ने अपने सांस्कृतिक गीत-नृत्य प्रस्तुत किए, जिसे देखकर बाराती और घराती प्रसन्न होते रहे ।

दूसरे दिन मान सम्मान पूर्वक ढोल धमाके के साथ पुत्रवधू वेणु को विदा कराकर बारात निषादपुरम के लिये चल पड़ी।

उस क्षण बड़बनी ग्राम के लोग वेणु बिटिया के जाने से, अपने को निस्सहाय सा अनुभव कर रहे थे। सभीके सामने प्रश्न खड़ा था- “अब दस्युओं से हमारी रक्षा कौन करेगा ?”

उन्हें याद आ रही है उस दिन की जब दस्युओं ने लूटपाट के उद्देश्य से बड़बनी पर धावा बोला था। किन्तु वेणु बिटिया की बाण विद्या से वे उल्टे पांव लौटने को विवश हो गये थे।

एक वृद्ध कह रहे थे, “अब हमारी बिटिया अकेले एक ग्राम की ही नहीं वल्कि सम्पूर्ण निषादराज्य की रक्षक बन गई हैं।”

यह सुनकर तो सभी आनन्द के सागर में डुबकियाँ लगाते हुये अपने अश्रुओं के प्रवाह को रोक नहीं पा रहे थे।

            

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