प्रतिशोध--भाग(२)


उधर गुरु कुल में__
     चूड़ामणि...!तुमने अत्यन्त घृणित अपराध किया है, तुमने एक स्त्री को स्पर्श किया, आचार्य शिरोमणि बोले।।
   नहीं.. आचार्य,ये पाप नहीं है,वो स्त्री अत्यन्त वृद्ध थी,यदि मैं उसे नदी में डूबते हुए ना बचाता तो वो अपने प्राण गवां बैठती, मैंने तो केवल उसकी सहायता की थी, मैं उसे ना बचाता तो स्वयं से आंखें ना मिला पाता,ये अपराध नहीं है गुरुदेव ये तो मानवता है, चूड़ामणि बोला।।
   जो भी हो मुझे नहीं ज्ञात है, परन्तु इस गुरूकुल के शिष्यों को स्त्रियों का स्पर्श वर्जित है तो ये मेरी दृष्टि में अपराध ही हुआ एवं इसका यही दण्ड है कि तुम्हें इस गुरुकुल से निष्कासित कर दिया जाएं, आचार्य शिरोमणि बोले।।
      मेरे ऊपर दया करें गुरूदेव,मेरी शिक्षा अधूरी रह जाएंगी, मेरे माता-पिता की जो मुझसे आशाएं हैं वो टूट जाएंगी,क्षमा करें गुरूदेव,अब ऐसा अपराध कभी ना होगा, कृपया मुझे इस गुरुकुल में रहने दें, मेरा अन्तर्मन रो रहा है, मैं विक्षिप्त सा हो रहा हूं, चूड़ामणि ने अपनी अश्रुपूरित नेत्रों से ये बात आचार्य शिरोमणि से कहीं किन्तु आचार्य शिरोमणि के निर्णय में कोई अन्तर न आया और उन्होंने अपने सबसे प्रिय शिष्य सत्यकाम से कहा कि अभी इसी समय चूड़ामणि को बाहर निकालों, शीघ्र ही मेरे आदेश का पालन करो।।
     जी आचार्य,सत्यकाम बोला।।
और उसने चूड़ामणि को गुरूकुल से बाहर निकाल दिया।।
    इतने निष्ठुर ना बनो सत्यकाम, कुछ तो दया करो, मैं अपने माता-पिता को कैसे अपना मुंख दिखाऊंगा, चूड़ामणि ने सत्यकाम से कहा।।
    नहीं मित्र! मैं विवश हूं, मुझे आचार्य के आदेश का पालन करना ही होगा,सत्यकाम बोला।।
    और चूड़ामणि अपने अन्तर्मन में निराशा और आत्मग्लानि भर कर गुरु कुल से चला गया।।
    रात्रि बीती,भोर हुई,सत्यकाम प्रतिदिन की भांति गंगा किनारे स्नान करने चल पड़ा, कुछ दूरी ही तय की थी तभी उसने देखा कि चूड़ामणि का मृत शरीर रस्सी की सहायता से एक वृक्ष की शाखा से लटका हुआ है,ये देखकर उसे अपने नेत्रों पर विश्वास नहीं हुआ और उसने चूड़ामणि के शरीर को शाखा से उतारकर धरती पर लिटाया,तब तक और भी शिष्य गंगा स्नान के लिए उसी मार्ग से निकले और उनमें से एक ने गुरूकुल जाकर सूचना दी कि चूड़ामणि ने रात्रि को आत्महत्या कर ली है।।
          आचार्य शिरोमणि इतने क्रोधित से चूड़ामणि से कि उन्होंने आने के लिए मना कर दिया,इस बात से सत्यकाम को बहुत आघात लगा कि आचार्य शिरोमणि ने चूड़ामणि के मृत शरीर का भी त्याग कर दिया और उसने ही चूड़ामणि का अंतिम संस्कार किया और उसके घर ये सूचना देने पहुंचा।।
     ये सूचना सुनकर चूड़ामणि की मां मूर्छित होकर गिर पड़ी और पिता भी अपना दुःख ना सम्भाल पाएं,भला युवा पुत्र की मृत्यु किस माता पिता को विचलित ना कर देंगी।
      दु:खी मन से सत्यकाम गुरुकुल लौट आया और कुटिया में जाकर बहुत रोया उसके मन में विचारों का अवाह प्रवाह चल रहा था,दो दिन तक उसका मन विचलित रहा वो अपनी कुटिया से बाहर नहीं निकला और ना ही भोजन किया।।
     उसे अब ये संसार अर्थहीन और उदासीन प्रतीत हो रहा था,उसे ये लग रहा था कि मानव की आखिर महत्वता क्या है? क्या चूड़ामणि का अपराध अक्षम्य था कि उसने स्वयं को इतना बड़ा दण्ड दिया।।
       इसी चिंतन में सत्यकाम की रात्रि बीती और उसे पंक्षियों का कलरव सुनाई दिया,भोर हो चुकी थी,वो अपनी कुटिया से गंगा घाट पर स्नान के लिए चल पड़ा,मार्ग में उसे भजन सुनाई दिया,वो भजन उसे अत्यधिक मधुर लगा,उसने इधर उधर अपनी दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि कोई नवयुवती गेरूएं वस्त्रधारण कर किसी वृक्ष के नीचे अपने इकतारे के संग भजन गा रही है।।
    वो उस वृक्ष के निकट जाकर भजन सुनने लगा,कुछ समय पश्चात् उस युवती ने भजन बंद कर दिया और उठकर जाने लगी मगर जैसे ही वो आगे बढ़ी एक पत्थर की ठोकर से गिर पड़ी।।
      तभी सत्यकाम ने भागकर उस युवती की सहायता करनी चाही।।
     कौन...कौन है? युवती ने पूछा।।
जी, मैं सत्यकाम, सत्यकाम ने उत्तर दिया।।
    क्षमा कीजिए, श्रीमान! मैं देख नहीं सकती, बाल्यकाल में ही नेत्रों की ज्योति गवां बैठी हूं,उस युवती ने कहा।‌
   ओह....कोई बात नहीं देवी जी, मैं हूं ना! मैं आपकी सहायता करता हूं, आपको कहां तक जाना है मैं पहुंचा देता हूं,सत्यकाम बोला।।
      नहीं मैं चली जाऊंगी, मैं तो यहां गंगा स्नान के लिए आईं थीं और आप मुझे देवी जी ना कहें,मेरा नाम माया है,वो युवती बोली।‌
     परन्तु,माया पहले तो कभी आपको यहां नहीं देखा,सत्यकाम ने पूछा।।
    जी पहले मैं यहां नहीं रहती थी, दूसरे गांव में थी अभी कुछ दिन पहले ही इस गांव में आई हूं,माया बोली।।
     माया !आप का भजन बहुत ही मधुर था,सत्यकाम बोला।।
   जी! धन्यवाद,माया बोली।।
   आप यहां अकेले रहतीं हैं,सत्यकाम ने पूछा।।
जी,अनाथ हूं,भजन गाकर जो भी भिक्षा मिल जाती है,बस उसी से जीवन यापन चल रहा है, ईश्वर की भक्ति के सिवाय मुझे कुछ आता भी तो नहीं और नेत्रों में ज्योति नहीं तो कोई और कार्य भी नहीं कर सकती, माया बोली।
     जी बिल्कुल ठीक है, परन्तु अब प्रतिदिन मुझे आपका मधुर भजन सुनने का सौभाग्य प्राप्त होगा, सत्यकाम बोला।।
     और ऐसा औपचारिक सा वार्तालाप करते करते दोनों माया की कुटिया तक जा पहुंचे।।
     आज सत्यकाम को कुछ अच्छा अनुभव हो रहा था,उसे माया की बातें याद आ रहीं थीं और आज उसने भोजन भी किया।।
    आज उसकी मानसिक दशा कुछ स्थिर सी प्रतीत हो रही थी.....

क्रमशः__
सरोज वर्मा__


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