Prem aur Vasna - 5 in Hindi Human Science by Kamal Bhansali books and stories PDF | प्रेम और वासना - भाग 5 - प्रेम के रंग हजार, रिश्तों में

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प्रेम और वासना - भाग 5 - प्रेम के रंग हजार, रिश्तों में

प्रेम" शब्द काफी मार्मक और भावुकता भरा होता है। नये, नये रुप में प्रयोग होने वाला शब्द इंसानी अहसास को इंद्रधनुषी रंगों से सजाता है,। प्रेम, प्यार, लव, जैसे शब्दों के बिना कोई भी साहित्य अधूरा ही रहता है और हमारी जिंदगी भी इनके बिना अकेली और वीरानी सी लगती है। आखिर प्रेम या प्यार में ऐसा क्या जादू है ?

हर मानवीय अहसास को नाम की जरुरत होती है, हाँ, भावुकता एक अलग सा अहसास है, जो प्रेम को कमजोर दर्शाता, जिसमें कमजोरी का आभास ज्यादा होता है। स्वस्थ प्रेम के अहसास में दृढ़ता, समपर्ण, सत्य, भक्ति, त्याग जैसे कई तत्वों का समावेश मिलने के बाद जो अहसास बना, उसको ही प्रेम नाम से जाना गया। प्रेम या प्यार शब्द में एक शब्द सदा अधूरा ही रहता, क्योंकि इसमे कुछ न कुछ जुड़ता ही रहना चाहिए, ऐसा नियति का विधान है।

इस विषय के जानकारों का ख्याल है, प्रेम की भूमिका सिर्फ सकारत्मक होने से ही, उसकी उज्ज्वलता सामने आती है, नहीं तो जिंदगी में खुशियों की बरसात नहीं होती, जीवन आनन्द देनें की जगह दुःखी होकर निढाल हो जाता है। यह कोई जीवन प्रेरक सिद्धांत नहीं है, कि नकारत्मक होने से हमारे में कोई प्रेम की कमी हो जायेगी। आगे बढ़ने से पहले ये साफ कर देना जरुरी है कि प्रेम के सम्बंध में स्कारत्मक्ता से हमारा मतलब सहमति से है, और नकारत्मक्ता का मतलब असहमति, जिसे हम इंग्लिश में यश ( Yes)और नो (No) के नाम से बेहतर प्रयोग करते है। अगर हम किसी से प्रेम करे, और सब जगह सहमत हो जाए, यह कभी भी प्रेम की जरुरत नहीं हो सकती बल्कि गलत जगह सहमत न होना, प्रेम को मजबूती प्रदान कर सकता है।

प्रेम शब्द हमारे जीवन का अहम हिस्सा है, पल पल को जीने के लिए यह बहुत जरुरी हो जाता है की हम हर पल के कार्य मे प्रेम की भूमिका को सही पहचान ले, क्योंकि हर रिश्ते में प्रेम का अवदान जरुरी है, और बिना रिश्तों के जीवन भी अधूरा होता है। रिश्ते हमारे जीवन की धूरी है, इनका महत्व भी कम नहीं आंका जाना चाहिए। हालांकि आज के हालात, रिश्तों की अनचाही कहानियां बयान करते नजर आ रहे है।फिर भी, इस दुनिया के सारे कार्य-क्लाप प्रेम और रिश्तों की आपसी समझ से ज्यादातर सम्पन्न किये जाते है। रिश्तों के लिए एक खूबसूरत इंग्लिश शब्द है, जिसे हम Relationship के नाम से प्रायः प्रयोग करते है। यह रिश्ता प्रेम के साथ और दूसरे उद्धेश्यों के लिए आजकल ज्यादा बन रहे है, इस रिश्तें में विश्वास की कमी सदा रह सकती है।

हम आगे बढ़े, उससे पहले हम जरा रिश्तों के बारे में बात कर लेते है, तो समझने की शायद गरिमा बढ़ जाए। हमारे भूखण्ड में शायद ही कोई देश हो, जहां जीवन बिना रिश्तों के आगे बढ़ता हो। बात जब रिश्तों की कर रहे है, तो जो शब्द सबसे पहले हमारा अस्तित्व बोध की और इशारा करता है, वो है " परिवार"। परिवार हर मानव जीवन की ही नहीं, पशु पक्षियों की भी ज़रूरत है। परिवार में माता- पिता से शुरु होकर कई रिश्ते जुड़ते रहते है, मसलन दादा, दादी, चाचा चाची, भाई, बहन इत्यादि, ये सब नजदीकी रिश्ते होते है, जो एक ही खून के रिश्ते भी कहलाते है, दूसरे रिश्ते जो थोड़े से दूर के होते है, वो भुवा,मासी, मामा इत्यादि और यह भी एक खून के अंतर्गत ही आते है। इन्ही रिश्तों की देन से जो रिश्ते परिवार में जुड़ कर नजदीकी हो जाते है, वो भाभी, देवर, जीजा आदि होते है। कुछ रिश्ते इस श्रृंखला में जुड़ते रहते, पर बिना प्रेम वो सिर्फ सम्बोधन तक सीमित रहते है। कुछ रिश्ते खून के न होकर, दिल के होते है, उनमे दोस्ती और प्रेमी -प्रेमिका को जीवन उपयोगी रिश्तों की श्रेणी में रखे जाते है, हालांकि ये रिश्ते समय और समझ के मोहताज होते है। पत्नी का रिश्ता जीवन भर दुःख- सुख का समान अनुभव करने वाला पवित्र रिश्ता कहा जा सकता है। भगवान और इन्सान का रिश्ता सिर्फ नायाब ही नहीं, जन्मों जन्मों के अस्तित्व का रिश्ता है, इसे शक की नजर से नहीं भक्ति के स्वरुप से ही तलाश जा सकता है।

प्रेम की जो जबरदस्त खासियत है, वो सफलता, असफलता की कसौटी से नहीं दिल की आत्मीयता से मूल्यांकित होती है। विपरीत अवस्था में जब जीवन निराशा का मार्ग पकड़ने लगता है, तो प्रेम ही उसे सही रास्ते की ओर वापस भेजने की कोशिश करता है, पर इस प्रयास को समझ की जरुरत होती है।

आज इंसान के पास बहुत कुछ ऐसा है, जिसके कारण वो कई बार भ्रमित हो जाता है, कि प्रेम को मूल्यांकित किया जा सकता है।हकीकत कुछ और ही है, जिससे वो अनजान रहता है और भावुकता भरी जिंदगी में सुख से ज्यादा दुःख का समावेश अपनी जिंदगी में कर लेता है। प्रकृति प्रेम की सही पहचान करने वाली होती है, वो अनात्मक्ता में नहीं आवश्यकता पर विश्वास करती है, इसलिए सदाबहार रहती है। मानव चूँकि स्वभाव से विचित्र होता है, अतः हर समय वो सही दृष्टिकोण से विचलित होता रहता है, वो प्रेम को रिश्तों में अधिकार खोजता रहता है, यही उसकी भूल उसे हर समय तनाव ग्रस्त रखती है।

हमें अगर शुद्ध प्रेम की अपेक्षा है, तो समझना होगा कि प्रेम को समझ की सबसे ज्यादा जरुरत होती है, जिसके अंतर्गत यह स्वीकार करना जरुरी है, कि हर प्राणी का अस्तित्व अलग अलग होता है, रिश्तें तो जगत के बन्धन है जो जीवन को व्यस्थित करने के लिये, एक सामाजिक प्रक्रिया की व्यवस्था मात्र है। इस सत्य को अगर इन्सान आत्मा से बिना मोह समझ लेता तो आज शायद प्रेम में निरन्तरता की खोज करते नजर नहीं आता और हम शायद प्रेम की अंतरात्मा को पहचान सकते। प्रेम जब तक आसक्ति का रुप न ले तब तक तय है, प्रेम से कोई दुःखी नही होता।

चूँकि वर्तमान ही हमारा सत्य है, तो निसंकोच हमें यह स्वीकार करने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि वर्तमान का अर्थशास्त्र हमारे आत्मिक प्रेम को आडम्बरित बना रहा है, और हर दिवस हमें उसको परिभाषित करना पड़ता है। मसलन आप सोसियल मिडिया और अखबारों में प्रेषित उन अनगनित सन्देशों पर गौर कीजिये जिनमें जन्म दिन, हर रिश्तें का हर दिन तथा अपनी सन्तानों के शैक्षिक या दूसरी सफलताओं पर रिश्तेदारों द्वारा ही नहीं परिवार के सदस्यों द्वारा जानकारी दी जाती है, यानी प्रेम को आडम्बरों के हाथों सुपर्द कर दिया जाता है। ऐसे सन्देशों से एक बात समझने की कौशिश अगर करते है, तो लगता है, प्रेम कहीं ने कहीं शंकित हो रहा है और शायद अति भ्रमित भी। मसलन, बच्चों से प्रेम हर माँ बाप का सदियों पुराना है, सिर्फ एक ही फर्क नजर आता है, पहले प्रेम अनुशासित था, परिवार और माता- पिता द्वारा, पर आज बच्चों द्वारा ज्यादा शासित नजर आ रहा है। हालांकि इसमें कुछ भी गलत नहीं कहा जा सकता, शायद समय की यही मांग हो। पर, कहते है, जो तत्व भ्रमित हो जाता है, वो धीरे धीरे लुप्त हो जाता पर, आज सबसे डर की बात है, अगर ऐसा हो जाए, तो निश्चिन्त मानकर चलना चाहिए, मानवता अपने अंतिम दौर की सैर कर रही है। भ्रमित प्रेम लालच और अनुशासनहीनता को तो बढ़ावा देता ही है, पर अहिंसा का भी दामन छोड़ हिंसकता को अपना लेता है। जीवन में प्रेम विवश हो, तब रिश्तों को लोक लिहाज के लिए निभाने की कोशिश करता है, तो विश्वास कीजिये, वो आत्मग्लानि के अलावा कुछ भी नहीं झेल पाता।

चलते चलते, हम आज के जीवन के सफरनामा पर गौर करे तो लगता है, सब कुछ होते हुए भी इंसान तन्हाई पसन्द हो रहा है, या मौजूद हालात उसे तन्हा कर रहा है।
दुआ है, दुष्यंत कुमार की ये पंक्तिया आनेवाले वक्त की सच्चाई न बने तो अच्छा है।
" जिए तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरे तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए "
चिंतन की बात यही है, प्रेम एक सच्चाई है, जो रिश्तों का अपने आयाम तलाशने में मदद करती है, प्यार में समझदारी पूर्ण भावुकता ही सही भविष्य की सही दिशा निर्देश समझाती है, नहीं तो फिर Joseph F.Newton Men के विचार सहमति के लायक लगते है।
" People are lonely because they build walls instead of bridges."
( लेखक: कमल भंसाली)