Pavitra Prem - 2 in Hindi Love Stories by किशनलाल शर्मा books and stories PDF | पवित्र प्रेम (भाग2)

पवित्र प्रेम (भाग2)

"हुज़ूर बात तो कोई न कोई ज़रूर है।आप बताना न चाहे तो कोई बात नही।
"नादिरा ऐसी कोई बात नही है।"
"शहज़ादे मेरे भी दिल है।मैं सब समझती हूँ,"नादिरा बोली,"आप जितना ज्यादा अपने दिल की बात को दबाने का प्रयास करेंगे।वह बात उतनी ही ज्यादा चेहरे से ज़ाहिर होगी।आपके दिल मे मची उथल पुथल को मैने आपके चेहरे पर पढ़ लिया है।फिर भी आप बताना नही चाहते तो कोई बात नही।"
नादिरा की बात ने हुमायूं पर जादू सा असर डाला था।हुमायूं ने अपने दिल की बात आखिर बता ही दी थीं।नादिरा में सामने अपने प्रेम का रहस्य खोलते हुए बोला,"नादिरा अब तुम्हें मेरे दिल का राज। मालूम हो गया है अब तुम्हें मेरी मदद करनी होगी"
"आप हुक्म तो कीजिए सरकार।"
,"पहले तो मुझे यह पता चलना चाहिए कि गुलनार के दिल मे मेरे लिए क्या है?वह भी मेरी तरह सोच रही है या नही,,?"
भारत की राजधानी दिल्ली थीं।दिल्ली का सुल्तान हर समय भोग विलास मे डूबा रहता था।राजमहल षड्यंत्रों का अड्डा बन चुका था।सुल्तान को औरते अपने इशारो पर नचाती थी।दरबारी नर्तकी नगीना ने बादशाह को अपनी मुट्ठी में कर रखा था।विलाशी बादशाह। से दिल्ली की सल्तनत को आज़ाद कराने के लिए मदद मांगने के लिए आलम खान काबुल आया था।
"ठीक है हुज़ूर।"
नादिरा ने हुमायूं की मदद करने का वादा तो कर लिया लेकिन समझ मे नही आ रहा था।किस तरह से गुलनार के दिल की बात जाने। आलम खान काबुल के बादशाह बहादुर जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर। का शाही मेहमान था।गुलनार,आलम खान के साथ काबुल आयी थी।हुमायूं और गुलनार का आमना सामना क्षणिक देर के लिए ही हुआ था।एक झलक में ही राजकुमारी की सुंदरता ने हुमायूं का मन मोह लिया था।और वह उसे दिल दे बैठा।क्या राजकुमारी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।अगर गुलनार के दिल मे हुमायूं जैसा कुछ भी न हुआ हो और वह नादिरा की बात सुनकर नाराज हो जाये तो?
उसकी यह गुस्ताखी बादशाह बाबर तक भी पहुंच सकती है।ऐसा होने पर बादशाह उससे खफा भी हो सकते है।
इसलिए नादिरा को जो भी कदम उठाना था।बहुत सोच समझकर ही उठाना था।नादिरा औरत थी।जवान थी।प्यार मोहब्बत की बातों को अच्छी तरह समझती थी।वह मन ही मन सोचती रही और आखिर एक तरकीब उसे सूझ ही गयी
उसने गुलाब और अन्य फूलो का एक शानदार गुलदस्ता बनवाया।इस गुलदस्ते को लेकर वह शहज़ादी गुलनार के निजी कक्ष में जा पहुंची।
"खादिम को नादिरा कह्ते है,"वह बड़े अदब से झुककर बोली,"मैं राजकुमार हुमायूँ की बांदी हूँ।"
"उसकी बात सुनकर गुलनार बोली,"कैसे तकलीफ की तुमने यहां आने की?"
"राजकुमार हुमायूं की तरफ से मैं फूलो का गुलदस्ता आपको भेंट करने के लिए आयी हूँ।मुझे उम्मीद है आप मुझे निराश नही करेंगी।आप इस गुलदस्ते को कबूल करेंगी।इसी उम्मीद से मैं यहां तसरीफ लायी हूँ।
नादिरा की बात सुनकर शहज़ादी गुलनार ने नादिरा को देखा और गुलदस्ता भेट करने का रहस्य समझ मे आने पर उसने शरमाकर नज़रे झुका ली।नादिरा के हाथ से गुलदस्ता लेते हुए बोली,"मेरी तरफ से राजकुमार को शुक्रिया कहना।"
नादिरा चतुर बांदी थी।वह गुलनार के चेहरे और बोली के लहजे से ताड गयी।प्यार का अंकुर शहज़ादी के दिल मे भी फुट चुका है
(शेष कथा अंतिम भाग में)

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