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सुनो...!!!



सुनो...!!!!

तुम बनारस हो जाओ,
मैं उसमें समाहित रस हो जाऊंगी ।

तुम प्रेम मग्न कृष्ण की बांसुरी हो जाओ,
मैं उसकी मधुर ध्वनि में समाहित राधा हो जाऊंगी ।

तुम चौरासी घाट हो जाओ प्रिय,
मैं उनमें उमड़ती आराधना हो जाऊंगी ।

तुम नाविक हो जाओ प्रिय,
मैं गंगा में तैरती तुम्हारे स्पर्श से, नाव हो जाऊंगी ।

तुम अस्सी घाट की सीढियां हो जाना,
मैं उसमें समाहित धूल हो जाऊंगी ।

तुम गंगा का किनारा हो जाना,
मैं उससे स्पर्श होती गंगा का पानी हो जाऊंगी ।

तुम मेरे आराध्य महादेव का सुंदर मंदिर हो जाना,
मैं तुम्हारे प्रेम में समाहित मधुर ध्वनि लिए वहां की घंटी हो जाऊंगी ।

तुम पूजा की थाल हो जाना प्रिय,
मैं उसमें पानी की बूंदों के साथ लिपटा सिंदूर हो जाऊंगी ।

तुम अस्सी की मीठी चाय हो जाना प्रिय,
मैं तुम्हारे होठों के स्पर्श से मोहित मिट्टी का कुल्हड़ हो जाऊंगी ।

तुम घाट में बने वे दो बड़े - बड़े खंभे हो जाना प्रिय,
मैं तुम्हें खुद में समेटे उसका आधार हो जाऊंगी ।

तुम सुबह शाम गंगा की आराधना करते पंडितों के हाथों में पकड़े पवित्र दीप के पात्र हो जाना प्रिय,
मैं उसमें लगातार तेज़ जलती कपूर और रुई की लौ हो जाऊंगी ।

तुम मनीकर्णिका घाट में आई लकड़ी का गट्ठा हो जाना प्रिय,
मैं उसमें तुम्हें और शव को खुद में समाहित करने वाली अग्नि हो जाऊंगी ।

तुम काशी हो जाना प्रिय,
मैं वहां का शंखनाद हो जाऊंगी ।

तुम शिव हो जाना प्रिय,
मैं तुम्हारी पार्वती हो जाऊंगी ।

तुम काशी की होली हो जाना प्रिय,
मैं होली का तुममें समाहित गुलाल हो जाऊंगी ।

तुम मसान की विशिष्टता देखना प्रिय,
मैं मसान के स्पर्श से धूमिल हो, तुम्हारे माथे पर लगी पवित्र राख हो जाऊंगी ।

तुम बनारस की मधुर जलेबी हो जाना प्रिय,
मैं उसमें लिपटी चाशनी हो जाऊंगी ।

तुम बनारस की प्रचलित मलइयो हो जाना प्रिय,
मैं उसमें समाहित तुम्हारे होठों तक आती लकड़ी की चम्मच हो जाऊंगी ।

तुम बनारस की तीखी चाट हो जाना प्रिय,
मैं उस चाट को खुद में समेटे दोना हो जाऊंगी ।

तुम बनारस की संकरी गली हो जाना प्रिय,
मैं उन गलियों में बनी तुम्हारे उंगलियों के स्पर्श को खुद में महसूस करती दीवारें हो जाऊंगी।

तुम महादेव की आराधना में लीन रहना प्रिय,
मैं ब्रह्मचारिणी से तुम्हारी, अपने सुहाग की रक्षा की कामना करूंगी ।

तुम भक्ति वश काशी विश्वनाथ को चंदन अर्पण करना प्रिय,
मैं ब्रह्मचारिणी के चरणों में लिपटा सिंदूर उठा अपने माथे पर सजा लूंगी ।

तुम बनारस का बाजार हो जाना प्रिय,
मैं उसमें लगी दुकानें हो जाऊंगी।

तुम प्रेम से मेरे लिए बनारसी साड़ी खरीदना प्रिय,
मैं तुम्हारे स्पर्श में लिपटी वो खूबसूरत सी तुम्हारे पसंद की साड़ी हो जाऊंगी।

तुम मेरी लेखनी हो जाना प्रिय,
मैं तुम्हारी स्याही को खुद में समेटे कोरा 'पन्ना' हो जाऊंगी ।

तुम बनारस के मनमोहक घाटों का मुझसे जिक्र करना प्रिय,
मैं तुम्हारे होठों से निकले, बनारस का जिक्र करते मनमोहक मेरे दिल को सुकून देने वाले, सुंदर लफ्ज़ हो जाऊंगी ।


-- अरुंधती गर्ग ( Meethiiiiiii 😊 )

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बनारस का जिक्र तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था । हर एक लाइन के साथ और ....., और..... , और लाइंस एड करो की श्रृंखला बढ़ती ही जा रही थी । एक चीज़ का जिक्र खत्म होता , तो दूसरा शुरू हो जाता । इतनी सारी खूबसूरती हैं न वहां...., कि किताबें भर जाएंगी , लेकिन मन संतुष्ट न होगा वहां का जिक्र पन्नों पर उतारते - उतारते । लेकिन चूंकि, ये जिक्र हम अगर और उनसे करते जाते...., उनसे बतियाते हुए लिखते जाते...., तो पढ़ने वाले भी बोर हो जाते । इस लिए हमने इसे यहां पर विराम दे दिया 🥰