Galatfahmi - Part 5 books and stories free download online pdf in Hindi

ग़लतफ़हमी - भाग ५

अभी तक आपने पढ़ा दीपा ने अपने जीवन के विषय में अजय को बहुत कुछ बता दिया था लेकिन क्या सब कुछ बता दिया था पढ़िए आगे: -

दीपा, अजय से कह रही थी, "अजय मेरी बात तब पूरी नहीं हुई थी, मुझे तुम्हें और भी कुछ बताना है।"

"हां बताओ ना दीपा क्या बात है?"

"अजय मैं प्रेग्नेंट हूं, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अजय अब मैं क्या करूं? मैं यहां अकेली ही रहती हूं किसी और को बता भी नहीं सकती। डॉक्टर के पास जाने की हिम्मत नहीं है मुझमें"

दीपा अजय को यह बता रही थी, तभी उसके फोन की घंटी बजी, नया नंबर था लेकिन दीपा ने उठा लिया। उस तरफ से जो आवाज़ आई, वह काफी दर्द भरी आवाज़ थी, "हैलो दीपा"

अपना नाम सुनते ही उस आवाज़ को दीपा ने पहचान लिया, "राहुल, राहुल कहां हो तुम ? क्या हुआ ? तुम्हारी आवाज़ दर्द से भरी क्यों लग रही है ?" दीपा ने एक साथ कई प्रश्न कर डाले।

"दीपा मैं संजीवनी अस्पताल में हूं, उस दिन होटल आते समय मेरी बाइक का एक्सीडेंट हो गया। मैं गिरा उसके बाद मुझे होश ही नहीं रहा, किसी ने मुझे अस्पताल तक छोड़ दिया। सारे फोन नंबर मोबाइल के साथ ही ख़त्म हो गए। मुझे होश ही नहीं था दीपा, आज ही होश में आया हूं। शायद दिमाग पर जोर से चोट लगी थी। तुम जल्दी से आ जाओ दीपा मैं बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं।"

दीपा ने तुरंत ही फोन काटा और अजय से बोली, "अजय राहुल अस्पताल में है, मुझे जल्दी से वहां ले चलो। मुझे बहुत डर लग रहा है। "

"हां हां चलो दीपा, चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा।"

दीपा कार चलाने की हालत में नहीं थी, इसलिये अजय उसके साथ कार चला कर उसे अस्पताल ले गया।

अजय ने माया को फोन कर कहा, "माया तुम घर चले जाना, मुझे समय लग जायेगा"

माया ने घर पहुंचते ही अपना बैग उठाया और कपड़े तथा सामान जमाना शुरू किया। उसने एक पत्र लिख कर टेबल पर रख दिया, जिसमें लिखा था, "अजय मैं तुम्हारी ज़िंदगी से दूर जा रही हूँ, तुम जब चाहो दीपा से विवाह कर सकते हो, तलाक के कागज़ भी तुम्हें मिल जायेंगे। तुम इतना नीचे गिर सकते हो अजय मैं सोच भी नहीं सकती थी। तुमने मुझे जो दर्द दिया है, अब वह जीवन भर मेरे साथ रहेगा। तुम्हारी इस बेवफ़ाई के लिए मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूंगी। "

वह सोच रही थी कि अजय के घर आने के बाद आख़िरी बार उससे मिल कर हमेशा के लिए चली जाएगी।

अस्पताल में राहुल के कमरे में पहुंचकर उसे देखते ही दीपा उससे लिपट कर रोने लगी।

"राहुल क्या हो गया? इतने दिनों से तुम यहां थे ? मैंने तुम्हें कितने फोन किए, राहुल मैं बहुत डर गई थी। मुझे लग रहा था तुम मुझे छोड़ कर कहीं चले गए।"

"तुम्हें छोड़ कर मैं कहाँ जा सकता हूँ। तुम्हें इतनी बड़ी ग़लतफ़हमी कैसे हो गई दीपा ? क्या तुम्हें मेरे प्यार पर विश्वास नहीं था। दीपा मुझे अस्पताल कौन लेकर आया, मुझे गिरने के बाद से कुछ भी याद नहीं था। डॉक्टर ने काफी अच्छी तरह मेरा इलाज किया, आज ही सुबह मुझे धीरे-धीरे सब याद आया है। तुम्हारा नंबर मुझे याद आते ही मैंने तुम्हें फोन लगाया। मैंने बैंगलुरु फोन कर दिया है लेकिन घर पर यह कुछ भी नहीं बताया। माँ बहुत डर जाएगी उनसे यही कह दिया कि मोबाइल खो गया था और ऑफिस में बहुत काम था इसलिए फोन नहीं कर पाया।"

उन दोनों की बात चल रही थी इसलिये अजय बाहर चला गया, बात करते-करते दीपा को एकदम अजय की याद आई।

"अरे अजय ! कहां है? मैं बाहर देखती हूं राहुल।"

"अजय अंदर आओ ना, मैं तुम्हें राहुल से मिलवाती हूं।"

अजय अंदर आया तब दीपा ने राहुल को बताया, "राहुल यह मेरे बॉस हैं, अजय। इन दिनों इन्होंने ही मेरी बहुत मदद की है।"

अजय ने राहुल से हाथ मिलाया और जल्दी से ठीक होने के लिए उसे शुभकामनाएं देते हुए विदा ली।

अजय के जाने के बाद दीपा राहुल के पास ही रुक गई लेकिन अभी उसने राहुल को अपनी प्रेगनेंसी के विषय में कुछ भी बताना उचित नहीं समझा।

अजय जब घर पहुंचा तो माया तब अंदर के कमरे में तैयार हो रही थी।

उसे देखते ही अजय ने कहा, "अरे वाह क्या बात है, इस समय तैयार हो रही हो, कहीं बाहर चलने का प्लान किया है क्या ?"

"हां अजय बहुत बड़ा प्लान किया है, अभी पता चल जाएगा।"

"ठीक है, मैं फ्रेश होकर आता हूं।"

बाहर कमरे में आते ही अजय की नजर टेबल पर रखे हुए कागज़ पर पड़ गई।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक

क्रमशः