The Author Yash Patwardhan Follow Current Read संघ परिचय By Yash Patwardhan Hindi Anything Share Facebook Twitter Whatsapp Featured Books Only 10 years Remain Only 10 Years Remain… Wake up, India… Starting onJune 1st, I... The Things we never Became - Part 2 The Things we never Became By Prachi Gurjar PART IITHE HOUSE... The Whispering Jungle and the Guardian’s Oath The Whispering Jungle and the Guardian’s OathDeep in the hea... When We Were Forever - 4 PART 4WHEN THE UNIVERSE POURED DOWNSunday passed slowly.The... Worst Story of My Life When I was in Primary School When I was a student in nursery standard my class teacher wa... Categories Short Stories Spiritual Stories Fiction Stories Motivational Stories Classic Stories Children Stories Comedy stories Magazine Poems Travel stories Women Focused Drama Love Stories Detective stories Moral Stories Adventure Stories Human Science Philosophy Health Biography Cooking Recipe Letter Horror Stories Film Reviews Mythological Stories Book Reviews Thriller Science-Fiction Business Sports Animals Astrology Science Anything Crime Stories Share संघ परिचय (2.7k) 4.6k 14.4k राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,आज कोई भी इस नाम से अंजान नहीं होगा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समान्य भाषा में लोग RSS या फिर संघ बोलते है।संघ की बात आते ही हमारे दिमाग मे एक छबी आती है कि कुछ लोग खाकी चड्डी पहने हुए दंड ले के खडे है।संघ की स्थापना सन् २७ सितंबर १९२५ को विजयादशमी के पावन दिन पर महाराष्ट्र के नागपुर शहर में हुई थी। संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी। सब लोग उनको डॉक्टरजी के नाम से जानते हैं।उनको सब आद्य सरसंघचालक मानते हैं। डॉक्टर जी ने चिकित्सा क्षेत्रमें अभ्यास किया था। वे पहेले कॉंग्रेस में थे किंतु कॉंग्रेस के विभाजनकारी रवैय्ये से उन्होंने पार्टी छोड़ दी। वे समाज में देख रहे थे कि हिंदू समाज संगठित नहीं होने के कारण काफी परेशानीयों का सामना कर रहा है। तभी उन्होंने संघ की स्थापना की। संघ का मुख्य उद्देश्य हिन्दू समाज संगठित करना और व्यक्तीनिर्माण द्वारा राष्ट्रनिर्माण करना है। डॉक्टर जी के जाने के बाद "गुरुजी" यानी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर दूसरे सरसंघचालक बने।वर्तमान मे मोहन जी भागवत सरसंघचालक है। संघ मुख्य रूप से शाखा चलाता है। अब आपके दिमाग मे आएगा की शाखा मतलब क्या? शाखा का मतलब डाली। जिस तरह वृक्ष मे विविध डालियाँ होती है।जिससे वो वृक्ष मजबूत होता है ठीक उसी तरह संघ एक वट-वृक्ष है और शाखा इस वृक्ष की डालियाँ।संघ की शाखा मे जो भी व्यक्ति आता है उसको 'स्वयंसेवक' कहा जाता है। सरसंघचालक की सूची ये प्रमाण से है। • डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टरजी (१९२५ - १९४०) • माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी (१९४० - १९७३) • मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस (१९७३ - १९९३) • प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया (१९९३ - २०००) • कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी (२००० - २००९) • डॉ॰ मोहनराव मधुकरराव भागवत (२००९ -) स्वयंसेवक के जीवनमे शाखा-कार्य और शाखा का विशेष महत्व होता है। शाखा मे शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रम होते हैं। शाखा के प्रारंभ मे 'भगवा ध्वज' जो अपने संस्कृति का प्रतीक है वो लगाया जाता है। उसके बाद दंड-प्रहार होता है। इसमे स्वयंसेवक के हाथ मजबूत होते हैं और विकट परिस्थितियों मे स्व-बचाव के लिए उपयोगी होता है। फिर इसी तरह के और कार्यक्रम जेसे की दोड़,समता,दंड-युद्ध,नि-युद्ध और खेल जेसे शारीरिक कार्यक्रम होते हैं। समता का मुख्य उद्देश्य अनुशासन,समरसता है। नि-युद्ध मतलब बिना शस्त्र के युद्ध करना। इसमे अपने दोनों हाथ ही शस्त्र होते हैं। शारीरिक गुणों के विकास के साथ साथ मानसिक गुणों का विकास भी आवश्यक है।बौद्धिक द्वारा व्यक्ती का मानसिक विकास होता है।बौद्धिक मे भारत का गौरवशाली इतिहास, महापुरुषों का सं-स्मरण आदि जेसे कार्यक्रम होते हैं। शाखा में आने से शारीरिक और मानसिक गुणों के साथ नियमितता,अनुशासन,प्रमाणिकता,राष्ट्रभक्ति आदि जेसे गुणों का सिंचन होता है। दैनिक शाखा का मुख्य उद्देश्य "व्यक्ती निर्माण द्वारा राष्ट्रनिर्माण" है। छोटे बच्चों को शाखा मे ले जाने से उनमे देशभक्ति,त्याग की भावना,सेवा करने के गुणों के विकास होता है। शाखा में सूर्य-नमस्कार के जरीये सूर्य-देव की आराधना होती है और वो स्वास्थ्य के लिये खूब लाभदायक होती है। शाखा में गीत,अमृतवचन,सुभाषित भी सिखाये जाते हैं। जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास भी होता है। संघ का नाम सुनते ही कुछ लोग कहते हैं कि संघ सिर्फ हिंदूओ की बात करता है। सब उत्सुकता से पूछते है कि शाखा में क्या हिंदू ही आ सकते है? इसका जवाब ये है कि जो भी व्यक्ति भारत भूमि को मातृभूमि मानते हैं,जो भारत देश को सर्वे-सर्वा मानते हैं वहीं लोग शाखा मे आ सकते हैं। रामायण मे प्रभु श्री राम ने भी कहा है कि "जननी जन्मभूमि,स्वर्गदपी गरियसी" शाखा में एक गीत द्वारा,एक अमृत-वचन द्वारा,एक सुभाषित द्वारा,समाचार-समीक्षा द्वारा व्यक्ती में समान्यज्ञान और कुछ नया जानने की उत्सुकता होती है। शाखा मे कई प्रकार के दायित्व वाले लोग होते हैं। जेसे की मुख्य शिक्षक,कार्यवाह,प्राथना-गायक,गट-नायक,ध्वज प्रमुख आदि। जिसमें कार्यवाह और मुख्य शिक्षक को शाखा के माता-पिता माना जाता है।एक गीत की पंक्ति द्वारा शाखा का महत्व समझाया गया है। "शाखा पूजा स्थान हमारा, पूजा है संस्कार हमारा, एक नहीं अगणित सेवक हम, राष्ट्रदेव आराध्य हमारा।" इसमे कहा है कि शाखा एक मंदिर का स्थान होता है,वो पूजा का स्थान है और पूजा से संस्कारों का सिंचन होता है। ये कार्य करने मे हम अकेले नहीं है,हमारे पास कई लोग जुड़े हैं। शाखा वो राष्ट्र देव, भारत माता का मंदिर है।शाखा के अंत में प्राथना गायी जाती हैं। जिसमें भारत माता की भक्ति होती है। प्राथना की कुछ पंक्तियां मे लिखता हूँ। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिंदुभूमे सुखं वघिॅतोहम, महामड़्गले पुण्यभूमे त्वदथेॅ, पतत्त्वेष कायो नमस्ते नमस्ते। अर्थात है परम वात्सल्य मातृभूमि,तुझे हंमेशा प्रणाम करता हु,तूने सब सुख दे कर मुजे बड़ा किया है,है महा मंगलमयी भूमि तेरे ही कारण मेरी यह काया है और वो तुझे अर्पित है मे तुझे कई बार प्रणाम करता हु। दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशों में कार्यरत है। संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है। जिनमे कुछ राष्ट्रवादी, सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में कार्य करने वाले, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में संघ परिवार के संघठन सक्रिय रहते हैं। संघ मुख्य रूप से शाखा ही चलाता है।अनेक संगठन हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित हैं और स्वयं को संघ परिवार के सदस्य बताते हैं। अधिकांश मामलों में, इन संगठनों के शुरूआती वर्षों में इनके प्रारम्भ और प्रबन्धन हेतु प्रचारकों (संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक) को नियुक्त किया जाता था। इसके अलावा संघ के कई सारे आयाम है जेसे की विश्व हिंदू परिषद,विद्या भारती,भारतीय चित्र साधना(चित्र भारती),भारतीय मजदूर संघ,भारतीय किसान संघ आदि एसे कई आयाम संघ के अनेक क्षेत्र मे सक्रिय है। संघ मानता है जो भी भारत देश मे रहेता है वो सभी के वंशज एक ही है और वो हिन्दू है। संघ शुरुआत से ही राजनीति से दूर रहा है। लेकिन विचारधारा समान होने की वजह से कुछ लोग मानते हैं कि संघ एक राजनैतिक दल से जुड़ा है लेकिन ये सही नहीं है। सरसंघचालक जी ने भी कहा है कि संघ किसी भी राजनैतिक प्रवृति नहीं करता। जो देश की बात करेगा,देश की भलाई की बात करेगा उसके साथ संघ निरंतर खडा रहेगा।आपातकाल के दोरान सभी विपक्षी दल के नेता जेल मे थे तब संघ के स्वयंसेवको ने ही सब के बीच संवाद स्थापित किया था। महात्मा गाँधी की १९४८ में संघ के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी जिसके बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की रिपोर्ट आ जाने के बाद संघ को इस आरोप से बरी किया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया। संघ के स्वयंसेवको ने कई मोको पर अपनी जान पर खेलकर देश की,समाज की सेवा की है। १९४७ मे जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया तब शुरुआत में स्वयंसेवकों ने ही सीमा की रक्षा की थी। कश्मीर का भारत मे विलय कराने मे गुरुजी का विशेष योगदान रहा।१९६३ मे चीन के युद्ध दोरान हवाईपट्टी पर से बर्फ हटाने का काम भी स्वयंसेवक ही कर रहे थे।युद्ध के दोरान सरहानिय कार्य के लिए जवाहर लाल नहरु ने स्वयंसेवकों को प्रजासत्ताक दिन मे परेड के लिए आमंत्रित किया था।१९६५ के पाकिस्तान युद्ध के दोरान संघ के स्वयंसेवको ने दिल्ली का यातायात की जिम्मेदारी संभाली थी।जिससे पुलिस वाले सेना की मदद कर सके।हाल ही मे कोरोना महामारी मे स्वयंसेवक हॉस्पिटल मे जा कर मेडिकल स्टाफ की मदद कर रहे थे। संघ एक राष्ट्रभक्ति की पाठशाला है जिसमें सब को दाखिला लेना ही चाहिए। इसमे फीस के तोर पर थोड़ा समय देना होता है। इसका परिणाम देश को,समाज को बहुत ही लाभदायक होता है। Download Our App