Avdhut sant kashi baba - 1 books and stories free download online pdf in Hindi

अवधूत संत काशी बाबा - 1

अवधूत संत काशी बाबा 1

श्री श्री 108 संत श्री काशी नाथ(काशी बाबा) महाराज-

बेहट ग्वालियर(म.प्र.)

काव्य संकलन

समर्पण-

जीवन को नवीन राह देने वाले,

सुधी मार्ग दर्शक एवं ज्ञानी जनों,

के कर कमलों में सादर समर्पित।

वेदराम प्रजापति मनमस्त

डबरा

चिंतन का आईना-

जब-जब मानव धरती पर,अनचाही अव्यवस्थाओं ने अपने पैर पसारे-तब-तब अज्ञात शक्तियों द्वारा उन सभी का निवारण करने संत रुप में अवतरण हुआ है। संतों का जीवन परमार्थ के लिए ही होता है। कहा भी जाता है-संत-विटप-सरिता-गिरि-धरनी,परहित हेतु,इन्हुं की करनी। ऐसे ही महान संत अवधूत श्री काशी नाथ महाराज का अवतरण ग्वालियर जिले की धरती(बेहट) में हुआ,जिन्होंने अपने जीवन को तपमय बनाकर,संसार के जन जीवन के कष्टों का,अपनी सतत तप साधना द्वारा निवारण किया गया। हर प्राणी के प्राणों के आराध्य बनें। आश्रम की तपों भूमि तथा पर्यावरण मानव कष्टों को हरने का मुख्य स्थान रहा है। संकट के समय में जिन्होनें भी उन्हें पुकारा,अविलम्ब उनके साहारे बने। ऐसे ही अवधूत संत श्री काशी नाथ महाराज के जीवन चरित का यह काव्य संकलन आपकी चिंतन अवनी को सरसाने सादर प्रस्तुत हैं। वेदराम प्रजापति मनमस्त

गुप्ता पुरा डबरा ग्वालियर

मो.9981284867

प्रथम आराध्य,

श्री गणपति नाम रुप गुण आराधना-

दोहा- प्रकृति शक्ति के रुप है,श्री गणपति महाराज।

बत्तीस- रुपों स्तुती,सुफल करें सब काज।।

1. श्री बाल गणपति-

चौ. सकल सृष्टि के जो है ईसा।

सुमिरण कर गणपति बत्तीसा।।

सृजक बाल गणपति को जानो।

रुप चतुर्भुज जिन पहचानों।।

केला,कटहल,गन्ना,आमा।

भू-उर्वरकता के है धामा।।

श्री गणेश कह कीजे काजा।

सकल सिद्धि दायक महाराजा।।

हो विकास पथ,जो जन ध्याता।

बाल सुलभ जीवन सुख पाता।।

2. श्री तरुण गणपति-

रुप किशोर सुमिर नित प्यारे।

लाल रंग,अष्टभुज बपु धारे।।

मोदक फल अस्त्र-शस्त्र निधाना।

ऊर्जा रुप गणपति भगवाना।।

संघर्षी जीवन परिधाना।

ह्रद प्रसन्नता कृपानिधाना।।

युवा रुप शक्ति अधिकारी।

संकट नाशक जन हितकारी।।

दास अभय दर्शन कर होई।

सरल स्वभाव भक्त जो देई।।

3. श्री भक्त गणपति-

सुमिरण भक्त गणपति कीजे।

श्वेत वरण,अदभुत फल लीजे।।

चार भुजाऐं,सुख के धामा।

सजे हुए-फल-फूलों सामा।।

अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष प्रधानों।

चतुः पुरुषार्थमय पहिचानों।।

पूजन कृषक करैं एहि रुपा।

पावहिं सुख,समृद्धि,अनुरुपा।।

जीवन सुफल करहु जप नामा।

करुणा रुप,सकल सुख धामा।।

4.श्री वीर गणपति-

वीर रुप गणपति सुख दाता।

सोडष हस्त,युद्ध के ज्ञाता।।

गदा,चक्र,अंकुश,कृपाणा।

अन्य कई अस्त्रों का बाना।।

साहस,विनय रुप ऐहि माँही।

कर पूजन,सुख-संम्पति पाँही।।

अग्रिम पूज्य,जगत सुख दाता।

गण नायक,बल,बुद्धि प्रदाता।।

जग नायक,जग पालक ईसा।

करुणा पुंज,कुपालू,महीसा।।

5.श्री शक्ति गणपति-

चतुर्भुजी बपु,भक्ति सरुपा।

शक्ति गणपति,आशिष रुपा।।

अस्त्र-सस्त्र,बल बुद्धि विज्ञाता।

आर्शीरवादी कर,फल दाता।।

अभय मुद्र है,शक्ति निधाना।

जीवन ज्ञान रुप परिधाना।।

सह शक्तिन ब्राजहि जग माही।

पावहिं सिद्धि,साधना-ध्याही।।

असरण सरण जगत हितकारी।

अभय भाव,पावहिं नर नारी।।

6.श्री दिवज गणपति-

दिवज गणपति है ईश हमारे।

ज्ञान- सम्पदा के रखवारे।।

चतुर्मुखी,भुज चार,निराले।

रुद्रा-ताड़-छड़,कमंडल वाले।।

दिव जन्मा है,ब्रम्हा समाना।

शिक्षा वेद,इन्ही का वाना।।

जन हितकारी,सुखद विधाता।

ज्ञान-संपदा,सब जग दाता।।

प्रथम पूज्य में,रेख तुम्हारी।

भ्रात षडानन,जग हितकारी।।

7.श्री सिद्धि गणपति-

सिद्धि गणपति ध्यान जो कीजे।

पीत वरण,भुज चार,सु-लीजे।।

मोदक सुण्ड,बुद्धि फल दाता।

सिद्धि विनायक,रुप कहाता।।

मुद्रा शान्ति,सुमंगलकारी।

सुमिरत नाम,भक्त भयहारी।।

कुशलकारी-कारण हो स्वामी।

जगत विहारी,जयति नमामी।।

सोम्य रुप,सुख सदन-हजारी।

करुणा पुंज,जगत हितकारी।।

8.श्री उच्छिष्ट गणपति-

उच्छिष्ट गणपति का कर ध्याना।

नील- वरण, ऐश्वर्य- प्रधाना।।

एकहस्थ वाद्य यंत्र विराजा।

करते सफल सभी के काजा।।

मोक्षदाय,संतुलन है वाना।

सुमिरण नितकर,फल पा नाना।।

नीलवरण,नीलाभ बिहारी।

जगत बंध्य हो,जग हितकारी।।

जंघा शक्तीं सदा विराजे।

मोक्ष प्रतीत,सकल सुख साजे।।

दोहा-सुभारंभ के रुप हो,प्रथमः पूजन जान।

सकल कामना पूर्ण हो,श्री गणेश कर ध्यान।।

9.श्री विघ्न हरण गणपति-

विघ्न हरण गणपति को ध्यावो।

अष्ट भुजा,रंग स्वर्ण सुहावो।।

संख चक्र सोहे कर माहीं।

भिन्न-भिन्न आभूषण पाहीं।।

सकारात्मक सोच प्रदाता।

बाधा दूर करेहि,सुख दाता।।

विघ्न विनासक,पावन कामा।

विष्णु समान,आपका नामा।।

अनगिन आभूषण-परिधाना।

बाधा दूर करहि- भगवाना।।

10.श्री क्षिप्र गणपति-

क्षिप्र गणपति ध्यान जो कीजे।

रक्त वरण आभा,छवि लाजे।।

चार भुजा,कल्प वृक्षी रुपा।

रत्न-कलशमय शुण्ड सरुपा।।

संमृद्धी दाता,जीवन नीका।

सकल कामना पूर्ती,प्रतीका।।

क्षणहि प्रसन्न होए महाराजा।

करुणा दायक है तब साजा।।

मनो- कामना, पूरण कारी।

जयति-जयति हो जगत बिहारी।।

11.श्री हेरम्ब गणपति-

पाँच सिरों वाले- भगवाना।

हेरम्ब गणपति का कर ध्याना।।

शेर सवारी,दश भुज जानों।

फरसा,फँदा, मणिका,पानों।।

फल,माला,छड़,मोदक धारे।

सिर पर मुकुट,गरीब निवारे।।

दुर्बल रक्षक,हेरम्ब नामा।

सकल मोक्ष दायक,विश्रामा।।

मोदक प्रिय हो,मोदक रुपा।

रुप विलक्षण हो जग भूपा।।

12.श्री लक्ष्मी गणपति-

सिद्धि-बुद्धि संग,लक्ष्मी गणपति।

इनसे पाओ उत्तम गति-मति।।

अष्ट भुजामय,रुप निधाना।

मुद्रा अभय,सभी सुख खाना।।

तोता एक हस्थ पर राजे।

विजय विभूती,जहाँ पर गाजे।।

मंगल मुरति सदा सुहाए।

जग मंगलमय,मंगल छाए।।

आप सदा हो जगत बिहारी।

परमानंद, परेश, सुखारी।।

13.श्री महागणपति-

रक्तवरण त्रय नेत्र प्रधाना।

महागणपति का कर ध्याना।।

दश भुज शोभित शक्ति सरुपा।

अस्त्र-सस्त्र कई,अदभुत रुपा।।

प्रतिनिधित्व दश दिशा प्रमाना।

जीवन सार्थक कर,कर गुणगाना।।

ब्राजत सदा द्वारिका धामा।

पावहि जीव सकल सुख-सामा।।

कृष्ण पूज्य,भय जीवन नाशी।

जगदानंद,जाग्य-जग भाषी।।

14.श्री विजय गणपति-

विजय गणपति हैं मूषक वाहन।

उर्ध्व सुण्ड,विजयी जग,चाहन।।

काय विशाल,तुरत फल दाता।

सतत- संतुलन- रुप प्रदाता।।

अष्ट विनायक का कर ध्याना।

जीवन सुफल करण जग माना।।

समय साध्य को,हो फल दाता।

मन रंजन कर,जो जग ध्याता।।

सकल कामना पूरण कीजे।

अभय भाव,सेवक को दीजे।।

15.श्री नृत गणपति-

नृत गणपति को नित्य निहारो।

कल्प वृक्ष तरि,रुप है प्यारो।।

चार भुजाएँ परसु के साथा।

कई अस्त्र संग,उन्नत माथा।।

ललित कला के,कला निधाना।

प्रेरक सकल जगत,कल्याणा।।

नृत गणपति है रुप तुम्हारा।

हो प्रसन्न मुद्रा,जग सारा।।

तमिलनाडू ब्राजहि,महि माही।

अरुल मिंगु मंदिर के सांई।।

16.श्री उर्ध्व गणपति-

अष्ट भुजा,संग शक्तिन पाना।

उर्ध्व गणपति का कर ध्याना।।

टूटा दन्त एक,कर माही।

दूजा कर,आशीषमय पाँही।।

कमल पुष्प संग,उच्च प्रसासन।

तांत्रिक- मुद्रा, राजत आसन।।

दुष्ट दलन हित,दंत तुम्हारा।

जय-जय-जय-जय,जग उच्चारा।।

सब मुद्राएँ जग हितकारी।

सकल कामना,पावनकारी।।

दोहा-मंगलकारक रुप है,मंगलकारक नाम।

ज्ञान-मोक्ष-दातार हो,सुफल कामना धाम।।

17.श्री एकाक्षर गणपति-

तीन नेत्र सिर चन्द्र सुहावे।

एकाक्षर गणपति नित ध्यावे।।

सौम्य रुप को ध्यान में लाओ।

मन मस्तिष्क नियंत्रण पाओ।।

शुभ-सुभारंभ रुप भगवाना।

बीज मंत्र है,-गं- प्रधाना।।

ओम रुप एकाक्षर राजा।

चन्द्राकार रुप-सुखसाजा।।

कर्नाटक- हप्पी के स्वामी।

जयति-जयति-जय होए नमामी।।

18.श्री वर गणपति-

वर गणपति,वरदान प्रदाता।

रत्न कुम्भ-सुण्डी लए ध्याता।।

विजय ध्वजा,देवीकर,छाओ।

धारित अस्त्र-सस्त्र कई पाओ।।

जीवन समर विजय जो चाओ।

इसी रुप से नित-प्रति पाओ।।

पावन रुप,रम्य छवि छाजे।

सकल साधना,समृद्धि साजे।।

बेल गाँव कर्नाटक स्वामी।

जगत ईश हो,जयति नमामी।।

19,श्री त्र्यक्षर गणपति-

ओम रुप जिसको सब माना।

त्र्यक्षर गणपति भगवाना।।

निर्माता,पालक लय जाना।

ब्रम्हा,विष्णु,महेश समाना।।

अध्यात्मिक आराधन जानो।

स्वयं-स्वयं को ही पहिचानो।।

त्र्यक्षर- मय रुप तिहारा।

जग कारक,कारण विस्तारा।।

कर्नाटक- नरसी पुरा राजा।

त्रिरमा कुदालू रुप सुख साजा।।

20.श्री क्षिप्र प्रसाद गणपति-

इच्छा पूरण रुप-प्रधानों।

क्षिप्र प्रसाद गणपती जानों।।

दंड देए जो हर क्षण माही।

सजा मांफ जिनकी परिछाई।।

शांत-संमृद्धी- रुप निहारो।

जय-जय-जय गणेश उच्चारो।।

तमिलनाडु,मैसूर बिहारी।

करुणा पुंज,रुप भयहारी।।

क्षिप्र प्रसाद रुप तब जाना।

इच्छा पूरण कारक माना।।

21.श्री हरिद्रा गणपति-

हरिद्रा गणपति,हल्दी रुपा।

राजत राजन,सब जग भूपा।।

निरा रोग हों,नित कर ध्याना।

व्यवसायी रक्षक,जग जाना।।

इच्छा पूरण,जय प्रभू नामा।

पूरण होवै,सब मन कामा।।

कर्नाटक रिष्य श्रंग विराजे।

रुप- हरिद्रा, अदभुत राजे।।

इच्छा पूरण कर जग सारी।

हरिद्रा गणपति,नीरोग कारी।।

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