Gyarah Amavas - 28 in Hindi Thriller by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | ग्यारह अमावस - 28

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ग्यारह अमावस - 28



(28)

दीपांकर दास इस समय किसी और कमरे में था। उसको यह तो नहीं पता था कि वह इस समय कहाँ है पर यह वह कमरा नहीं था जिसमें वह बंद था। उसने कमरे का निरीक्षण किया। यह कमरा बड़ा था। इसमें एक बिस्तर था। साथ में अटैच्ड वॉशरूम था। एक खिड़की थी। उससे बाहर झांकने पर कुछ पेड़ दिखाई दे रहे थे। लेकिन उसने खिड़की को खोलने की कोशिश की तो वह खुल नहीं पाई।
उसे याद था कि कल रात किसी ने उसे खाना दिया था। उसने उस आदमी से शुबेंदु के बारे में पूछा। लेकिन उसने कुछ बताया नहीं। वह उसे खाना देकर चुपचाप चला गया था। उसने खाना खाया और सो गया। नींद खुलने पर उसने खुद को इस कमरे में पाया। वह परेशान था कि यह उसके साथ हो क्या रहा है। उस दिन वह रात में शांति कुटीर से निकला था। वह और शुबेंदु किसी से मिलने जा रहे थे। अक्सर वो दोनों इस तरह बाहर जाते थे। बाहर चलने के लिए शुबेंदु ने ही कहा था। उसने कहा भी था कि देर हो गई है। लेकिन शुबेंदु ने कहा कि जिनसे मिलना है उनसे कल मुलाकात नहीं हो सकेगी। वह विदेश से आया कोई व्यक्ति था जो शांति कुटीर के लिए कुछ पैसे दान करना चाहता था। दीपांकर दास ने कहा था कि यदि ऐसा है तो दोपहर में मिल लेना चाहिए था। शुबेंदु ने कहा कि उसने प्रयास किया था पर दोपहर में समय नहीं मिल पाया।
दोनों कहीं बाहर जाते थे तो कार शुबेंदु ही ड्राइव करता था। शुबेंदु कार चला रहा था। दीपांकर दास को उसने पिछली सीट पर आराम से बैठने को कहा था। शांति कुटीर से निकलते ही वह बैक सीट पर लेट गया था। उसने आँखें बंद कर ली थीं। ना जाने कब वह बेहोश हो गया था। होश में आया तो उस कमरे में शैतान के चोंगे में था। शैतान का मुखौटा पास ही पड़ा था। उसने शुबेंदु को नहीं देखा था। पूछने पर भी उसे उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। वह परेशान हो गया था। पिछले कुछ सालों से वह शुबेंदु के अतिरिक्त किसी पर भरोसा नहीं करता था। उसने अपने आपको पूर्णतया उसे सौंप दिया था। पत्नी सुनंदा के जाने के बाद वह बुरी तरह टूट गया था। उस कठिन समय में शुबेंदु ने उसे सहारा दिया था।
वह एकबार फिर अपने अतीत के बारे में सोचने लगा। वह और शुबेंदु दोनों कॉलेज के समय के दोस्त थे। शुबेंदु कॉलेज के समय से लिखता था। प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ भी उसने अपने लिखने का काम जारी रखा। एक दिन अपने एक उपन्यास की पांडुलिपि लेकर वह उसके पब्लीकेशन के दफ्तर पहुँच गया। कॉलेज पूरा होने के लगभग सात साल बाद दोनों मिल रहे थे। दीपांकर दास के पब्लीकेशन की अच्छी पहचान बन चुकी थी। उसने यह कहकर पांडुलिपि ले ली कि पढ़कर ही बता सकता है। शुबेंदु अपने उपन्यास की पांडुलिपि उसके पास छोड़कर चला गया।
दो महीने बाद शुबेंदु का फोन आया। उसने पूछा कि उसके उपन्यास के बारे में दीपांकर दास का क्या विचार है। दीपांकर दास ने उस दिन पांडुलिपि ले तो ली थी पर उसे पढ़ा नहीं था। वह उसके केबिन की दराज़ में पड़ी हुई थी। एक दो बार उसकी नज़र पड़ी भी थी। पर कुछ बड़े बांगाली लेखकों की रचनाएं उसके पास थीं। उसने अधिक ध्यान नहीं दिया था। फोन आने पर वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहे। उसकी दुविधा समझते हुए शुबेंदु ने कहा,
"दीपांकर मुझे पता है कि तुम्हारा पब्लिकेशन बड़े बड़े लेखकों की रचनाएं छाप रहा है। तुम व्यस्त हो। मैं कोई जल्दबाजी नहीं करूँगा। उस पांडुलिपि को अपने पास रखो। जब भी फुर्सत मिले पढ़ लेना। मुझे इतना यकीन है कि पढ़ने के बाद छापने के लिए ना नहीं कह पाओगे।"
शुबेंदु का आत्मविश्वास दीपांकर दास को अच्छा लगा। उस दिन वह पांडुलिपि लेकर अपने घर चला गया। देर रात तक पढ़ता रहा। जितना पढ़ा वह बांध कर रखने वाला था और आगे पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा था। तीन दिनों तक जितनी देर वह अपने घर पर रहता था शुबेंदु का उपन्यास पढ़ने में ही व्यस्त रहता था। उपन्यास खत्म होने पर जैसा शुबेंदु ने कहा था वह ना करने की स्थिति में नहीं था। पांडुलिपि के अंत में एक मोबाइल नंबर था। ऑफिस पहुँचते ही दीपांकर दास ने उसे फोन करके मिलने के लिए बुलाया। दीपांकर दास ने उसी दिन सबकुछ तय करके किताब छापने का फैसला कर लिया। जल्दी ही अनुबंध पर हस्ताक्षर भी हो गए।
शुबेंदु की पहली किताब ने ही उसे नामी बंगाली लेखकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। दीपांकर दास को जल्दी ही शुबेंदु की और भी खूबियां पता चलीं। उसके पास लेखन की कला के अलावा व्यापारिक बुद्धि भी थी। उसने सुझाव दिया कि यदि वह बड़े स्थापित लेखकों की जगह नए उभरते हुए लेखकों के साथ काम करे तो अधिक लाभ होगा। उसने दीपांकर दास से कहा कि वह अपनी नौकरी छोड़ना चाहता है। उसने उसके सामने पब्लीकेशन हाउस में साझेदारी का प्रस्ताव रखा। कुछ विचार के बाद दीपांकर दास ने स्वीकार कर लिया। उसके सुझावों पर चलते हुए पब्लिकेशन हाउस को बहुत लाभ मिला।
दीपांकर दास की शादी सुनंदा से हो चुकी थी। उनकी बेटी कुमुदिनी छह साल की थी। पब्लिकेशन हाउस की तरक्की से उनके जीवन में भी तरक्की हुई। दीपांकर दास नए और बड़े मकान में आ गया। शुबेंदु एक पारिवारिक सदस्य की तरह उनके घर आता जाता था। वह कुमुदिनी को बहुत चाहता था। जब भी आता था तो कुमुदिनी दौड़कर उसकी गोद में चढ़ जाती थी। सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था। शुबेंदु ने बताया था कि वह अपना दूसरा उपन्यास लिख रहा है। जल्दी ही उसे पूरा कर लेगा।
शुबेंदु कुछ दिनों की छुट्टी लेकर पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के अमलतारा गांव गया था। वहाँ उसकी रिश्तेदारी थी। वह कहकर तो पंद्रह दिन गया था पर पच्चीस दिन बाद भी वह लौटकर नहीं आया। दीपांकर दास ने सोचा कि इतने दिनों के बाद गया है। शायद किसी काम में उलझ गया हो। ऐसा भी हो सकता है कि गांव के शांत माहौल में अपना उपन्यास पूरा कर रहा हो। कुछ और दिनों तक प्रतीक्षा करने के बाद उसने शुबेंदु को फोन किया। उसका नंबर नहीं लगा। दीपांकर दास और सुनंदा परेशान हो गए। उन्होंने उसके गांव में पता करवाया। उन लोगों ने बताया कि वह तो हफ्ते भर रुकने के बाद ही यहाँ से चला गया था। शुबेंदु कहाँ गया इस बात का पता नहीं चल सका। उसका दीपांकर दास और सुनंदा के अलावा कोई नहीं था। जिस रिश्तेदारी में गया था उन्हें भी कुछ नहीं पता था। एक अच्छे खासे आदमी का इस तरह गायब हो जाना विचित्र बात थी। दीपांकर दास ने पुलिस को सूचना दी पर कुछ नहीं हुआ।
दीपांकर ‌दास पहले की तरह अपना पब्लिकेशन हाउस संभालने लगा। कुमुदिनी बड़ी हो रही थी। सुनंदा उसे ओड़िशी नृत्य सिखाने लगी। दस साल की उम्र तक कुमुदिनी ने स्टेज परफॉर्मेंस देना शुरू कर दिया था। वह एक अच्छी नृत्यांगना थी। अपने नृत्य से उसने अपना नाम बना लिया था। उसे पुरुस्कार मिलने लगे थे। अखबारों में उसकी तारीफ छपने लगी थी। पर ना जाने किसकी नज़र लग गई। कुमुदिनी की लाश मिली। उसके साथ दुराचार किया गया था। सुनंदा इस सदमे को सह नहीं पाई। पत्नी और बेटी को खो देने के ग़म ने दीपांकर दास को तोड़ दिया। इतना कि अपनी बेटी के गुनाहगारों के बारे में जानकर भी वह कुछ कर नहीं पाया।
पब्लिकेशन हाउस को संभालने में उसका मन नहीं लगता था। उसने अपना बिज़नेस दूसरे को बेच दिया। अब वह सारा दिन घर में रहकर सिर्फ बीते हुए दिनों को याद करता था। उस स्थिति में एक दिन दरवाज़े की घंटी बजी। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने खड़े शख्स को पहचानने में कुछ क्षण लग गए। वह शुबेंदु था। पहले से बहुत अधिक बदल गया था।‌ कंधे तक लंबे बाल थे। आँखों पर ऐनक थी। पहले से दुबला हो गया था। उसे पहचान कर दीपांकर दास ने कहा,
"शुबेंदु कहाँ थे इतने दिनों तक ? तुमको तलाश करने की कोशिश की। लेकिन तुम्हारा कुछ भी पता नहीं चला। तुम्हारे पीछे सबकुछ बर्बाद हो गया। सुनंदा चली गई। लिपा....."
कहते हुए दीपांकर दास फफक फफक कर रोने लगा था।‌ शुबेंदु ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया था। उसने दीपांकर दास को बताया कि वह हफ्ते भर बाद ही अपने गांव से निकल गया था। लेकिन यहाँ आने के लिए नहीं। गांव में उसे एक सिद्ध पुरुष मिले थे। वह बहुत ज्ञानी थे। उनके ज्ञान से प्रभावित होकर वह उनके साथ चला गया था। वह उसे दूर दक्षिण भारत के एक हिस्से में ले गए थे। वहाँ उसने उनसे ध्यान की एक तकनीक सीखी थी। जिसके कारण उसने मन को एकाग्र व नियंत्रित कर खुश रहना सीखा है। वह इतने दिनों तक उनके साथ ही था। लेकिन कुछ दिनों पूर्व उनकी मृत्यु हो गई। इसलिए वह यहांँ आ गया। यहाँ आने पर उसने कुमुदिनी और सुनंदा के बारे में सुना तो उससे रहा नहीं गया। वह उससे मिलने के लिए आ गया।
कुछ दिनों तक शुबेंदु दीपांकर दास के साथ रहा। उस अवधि में उसने उस पर अपना प्रभाव जमा लिया था। दीपांकर दास को लगने लगा था कि शुबेंदु का साथ ही उसके लिए सबसे बड़ी चीज़ है। वह दिन पर दिन उस पर आश्रित होता जा रहा था। अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं करता था। जैसा शुबेंदु कहता था वैसा ही करता था। शुबेंदु उसे अपने साथ दक्षिण भारत ले गया। वहाँ दीपांकर दास ने कई दिन बिताए। उस अवधि में उसने ध्यान की वह तकनीक भी सीख ली।
एक दिन शुबेंदु ने उससे कहा कि जिन सिद्ध पुरुष का वह शिष्य था वह उसे अपने पुत्र की तरह मानते थे। अपनी बहुत सी संपत्ति वह उसके नाम कर गए हैं। ऐसी ही एक संपत्ति उत्तर भारत के बसरपुर नामक कस्बे में है। उसकी इच्छा है कि वह और दीपांकर दास वहाँ जाकर ध्यान की विशेष तकनीक लोगों को सिखाएं। दीपांकर दास इस बात के लिए तैयार हो गया। दोनों बसरपुर जाकर रहने लगे। उन्होंने शांति कुटीर की स्थापना की।