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सूर्यपालसिंह ग्रन्थावली - समीक्षा

पुस्तक (समीक्षा)

सूर्यपालसिंह ग्रन्थावली भाग-1

प्रथम संस्करण 2021

पूर्वापर प्रकाशन

निकट प्रधान डाकघर,लाहिडीपुरम-

सिविल लाईन गौण्डा उ.प्र.

‘समीक्षा की अपनी धरती’

समीक्षक-वेदराम प्रजापति मनमस्त

डबरा ग्वालियर म.प्र.

मो.9981284867

सम्मानीय,श्री सूर्यपाल सिंह जी की ग्रन्थावली भाग-1 के आवरण पृष्ठ का जो चित्रांकन है,वह अंदर की गहन अनभूति की अनूठी झलक है,जिसमें गौण्डा की सजल माटी की सौंधी सुगंध सर्जन के विभिन्न आयामों का दिग दर्शन कराती सी लगीं। ग्रन्थावली का ब्रह्द स्वरुप भी आज के वेश और परिवेश की महिति कल्पना का अनूठा सा प्रतिबिम्ब है। यह लगभग 541 पृष्ठों को सुबासित कर रहा है। ग्रन्थावली का प्रथम भाग अपने अन्तर्गत पाँच कृतियों को समाहित कर,काव्य की अनेक विधियों से हस्ताक्षरित है।

इस संग्रह में काव्य की अवधारणाओं को इस प्रकार क्रमशः स्थान दिया गया है। 1.पर अभी संभावना है। 2.रात साक्षी हैं। 3.धूप निकलेगी। 4.सपने बुनते हुए तथा 5.नये पत्ते। हर सर्ग का अपना अलग बजूद है। भाव और भावनाओं को गहन चिंतन दिया गया है। भाषा की सरलता अपना विशेष स्थान रखती है जो दुरुहता को भी आसान बनाती है। व्याकरण के अनुबंधो के साथ शब्द सामाजस्य रचना की अप्रतिम कसौटी है। यह कृति संवेदित काव्यात्मक रचनाओं का सापेक्ष संकलन है।

प्रथम सर्ग-‘पर अभी संभावना है।’

इसमें कविता की भूमिका पर गहन मार्मिक चिंतन दिया गया है। कविता का भूतकाल,वर्तमानकाल तथा भविष्यकाल क्या रहा है,इसपर अनेक काव्य मनीषियों के गहन संवात नया संदेश देते दिखे है। कवि की अपनी बात संशक्तता के साथ उभरी है।

यथा-‘मनुष्य के साथ ही मानवीय संवेदनाऐं,उनके स्पंदन रहेगें ही। कविता के बिम्ब बदल सकते हैं,शैली में बदलाव आ सकता है पर कविता रहेगी ही।’

कविता विषय को अनेकों आचार्यों ने परिभाषित भी किया है जिसमें श्री शैलेन्द्रनाथ मिश्र जी अध्यक्ष हिन्दी विभाग गौण्डा के द्वारा ‘रात साक्षी हैं।’ के माध्यम से इस अंक पर गहरा चिंतन दिया है। इसी क्रम में कविता और गजल पर विस्तृत चिंतन-राही मासूम रजा और अली सरदार जाफरी के माध्यम से काफी कुछ कहा गया है जो ‘नये पत्ते’ की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाता है। इस प्रकार कविता कई आयामों के माध्यम से,आज जन जीवन में अपने आपको स्थापित किए हुए है।

ग्रन्थावली के अनुसार सिंह जी की कविताऐं अपने आपको नवीन संदर्भो में स्थापित किये हुए हैं। यथा-

‘विविधता तो सर्जना की भूमि है,एकता अनुरुपता होती नहीं।’

तंग गलियों में सभी को ठेलकर,एकता को हम उगा सकते नहीं।

(एकता का दीप)

चिंतन गहराई की ओर चले तो रचनाऐं अपने आप से बोलतीं हैं,बतियातीं है साथ ही सचेत भी करतीं है। इस दिशा में रचना ‘आदमी बड़ा हुआ।’ में गहरी उड़ान मिलती है यथा-

विकास की नई नजर,न गम गलत करो मगर।

आदमी की काट जड़,आदमी बड़ा हुआ।’

श्री सिंह जी-सही बात कहनें में नहीं डरे, उन्होंने अपनी रचना-‘जलते गुजरात को देखा’ डंके की चोट की है। इसी प्रकार का चिंतन कई रचनाओं में जैसे-‘अस्मिता की लड़ाई के माध्यम से कही गई है।

अपनी साहसिक जवान का नमूना दिया है कविता-आदमी-में ।यथा-

आदमी रहा होगा कभी अमर पुत्र,आज वह चुसा हुआ आम है।

यह रचना अपने सरुर में झुकी नहीं है। इसी प्रकार अन्य रचनाऐं नवीन संदेश देती हैं।

दूसरा सर्ग- रात साक्षी है- में कथा मौन की काफी गहराई लिए हुए है। इसमें आठ संदर्भो में सीता के पुर्न-मिलन आयाम से सभी संदर्भ अंश-एक रात के अलग-अलग मौन संवाद रहे है। इसमें-महर्षि वाल्मीक,सीता,राम,हनुमान,कुश-लव तथा लक्ष्मण भी सारी रात जागरण कर- अपने अंन्तर्मन की व्यथा-कथा में डूबे रहे। प्रातः की दर्शनावली पर सभी का चिंतन रहा-क्या होगा कलॽ यथा-

विपदाओं के बीच आस्था लोरी गुन-गुन गाती हैं।

पर भोले लव की जिज्ञासा,मन विचलित कर जाती है।

सभी के मन में कल क्या होगा का चिंतन आसंकित करता रहा। सीता की एक और अग्नि परीक्षाॽ सभी को अशांत किए हुए हैं। सभी अपने आप से प्रश्न करते दिखे हैं। यथा-

सीते-क्या तूँ केवल सीता,नारी का पर्याय न तू।

तेरी पीढ़ा नारी पीढ़ा,उससे किंचित अलग न तू।

समय की सार्थकता में साहस ही एक बड़ा संबल होता है जो यहाँ कवि की रचना में बोलता सा दिखा है। यथा-

अंतर्मन साथ रहे तो,कहाँ अंधेरा का डर है।

घोर तमस में आत्म किरण से,आलौकिक होता घर है।

रचना की जीवंतता एवं सार्थकता का यह अनौखा प्रतिबिम्ब हैं। इसी तरह के अनेक संवाद,सर्ग की सफलता को उजागर करते दिखे। रचना के सभी पात्र अपनी कथा व्यथा में डूबे रहे। यहाँ पर हनूमान जी का चिंतन बहुत गहरा उतरा है। यथा-

नहीं डरा लंकेश शक्ति से,विपिन अशोक उजारा।

आज यहाँ अपनों में बैठा,अपने घर से हारा।

इस प्रकार के अनेक चिंतनीय विषय रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किये गए है। अनेक रचनाओं के द्वारा मानव मन और समाज के कई अनूठे दृश्य उजागर किये गए है।

तृतीय सर्ग- धूप निकलेगी- यह सर्ग गजल साधना को समर्पित है,जिसमें लगभग 101 गजलों को समाहित किया गया है। गजल का पैमाना इसमें गजल अपने आप प्रस्तुत करती दिखी। गजल की गहराई और बजन प्रत्येक मानव की आत्मा को आनंदित करने के साथ-साथ नवीन संदेश देकर,नव निर्माण करती दिखी। कल्पना की गहरी उड़ाने. चिंतन का नया भोर सा लगा। इस विषय में इस प्रकार समझें। यथा- किया है हवन तो हथेली जलीं हैं।

कहो किस तरह,जिंदगी यह पली है।

गजल कर्तव्यशीलता का इसारा देती हुई अपने सही बजूद पर उतरी है। यथा-

कंगूँरे तुम्हारे गुलाबी हुए है।

तभी तो जमूरे,नबाबी हुए है।

गजलें समय के धरातल पर,चिंतन की अपनी परिधि में समय की गहरी तस्वीर प्रस्तुत करती है। ग्रन्थावली में सभी गजलें अपना नया पैमाना परोसतीं हैं जो मानव चिंतन को नई राह दिखातीं है।

चौथा सर्ग- सपने बुनते हुए- यह सर्ग कविता का सच्चा यथार्थ दर्शाता है। कविता क्या होती हैॽ तथा उसका गंतव्य क्या होना चाहिए उपसंहार की परिणिति क्या होगी इस प्रकार के अनेक प्रश्नों को लिए कविता का अपना क्षेत्र रहा है। इस सर्ग में लगभग अड़सठ संवेगो को लिए कविताऐं उपस्थित हुई है। इन कविताओं का चिंतन काफी अलग दिखा। समाज की विकीर्णता एवं विखण्डनता के साथ-साथ सामाजस्य करने तक का पथ संचलन रहा है। प्रत्येक कविता नये भोर की चाह लिये हुए चिंतन आँगन में,नव संसार सृजन का संदेश देती है। यथा-दिनकर उगाना है,पगडंडी हूँ,जीने का अधिकार,ओ बटोही तथा समय कसौटी आदि रचनाएँ समाज को नया मार्ग दिखातीं है कविता का यह सर्ग विशेषतः मानव जीवन का सामाजिक दृश्य बखूवी प्रस्तुत करता है।

पंचम सर्ग- नये पत्ते-इस सर्ग में हिन्दी गजल पर गहरी कलम चली है। उर्दू गजलों की गहराई को हिन्दी की तस्तरी में इतनी कुशलता से परोसा गया है कि लोग हिन्दी की गजलों में,उर्दू गजलों से कहीं अधिक खोए-खोए से दिखे। गजल का हिन्दी पैमाना ज्यादा कारगर लगा। लोगों ने उर्दू अरबी की दुरुहता से निजात पाई। गजल के सुरुर को समझने में बड़ी आसानी मिली। लोग गली-गली,चौराहे-चौराहे पर हिन्दी गजल की दुहाई देते दिखे। गजलों का सिलसिला तेरासी संख्या तक अपनी तरह गया है। प्रत्येक गजल अपना नया फलक लिये चली है।गजल का दामन, मानव जिंदगी से बंधा है। प्रत्येक गजल मानव दिल की अलग-अलग कहानी कहती है साथ ही नई आस को लिये भरोसा भी दिलाती है। नमूने के तौर पर सिंह जी की गजलों की बानगी देखिए यथा-

जली बस्तियों की,कहानी न पूछों।

ठगी बेबसी की, निशानी न पूछो।

एक उदाहरण इसी क्रम दृष्टव्य है-

जिधर देखिए,आज कोहरा घना है।

यहाँ चोर को चोर,कहना मना है।

सिंह जी रचनाओं में अनेक छंद विधानों को स्थान देते दिखे है। गजलों के अलावा मुक्तक भी अपनी कहानि में पीछे नहीं रहे है जो अपने मन की बात कहने में निडर से लगे। यथा-

जाना,वहाँ तो,मेरा प्रणाम कह देना।

पूँछे न भी,प्रेम का पैगाम कह देना।

दुनियाँ बचानी यहाँ,उन्माद से साथी,

उन्माद उगाने का,अंजाम कह देना।

इस प्रकार मुक्तक भी अपने बजन में काभी गहरे उतरे है। समय के दौर में अपनी बात कहने हमें कहीं नहीं चूके है। मुक्तक की धरती काफी संजीली और उत्तेजक रही है। यथा-

न सपने खत्म होते है,किसी के हार जाने से।

नई कौपल निकलतीं है,जरा सा प्यार पाने से।

नई दुनियाँ, अगम सागर,लहर उठती कहीं गिरती।

बढ़ें नाविक,न डरते जो,भँवर की मार खाने से।

सिंह जी ने कविताओं की दुनियाँ में अनेक छंद भी बदले है। उन्होंने कविता,गजल,मुक्तक के अलावा रुबाईं भी मानव चिंतन को,नये संदेशों के साथ प्रस्तुत की है जो अपना नया बजूद भी रखतीं हैं। ऐसे लगता है कि ये रुबाई मानव राहों की सहचरीं सी है।यथा-

तुम कहते हो,हमको जख्म मिले है।

जख्मों के पूरे यहाँ,सिलसिलें है।

घावों पर मरहम ,कैसे लगा पाँए,

जब जनता है बंधक,औंठ सिले है।

इस प्रकार से यह कविता संकलन अंक,अनेक आयामों के साथ,गहन चिंतन परोसता दिखा। रचनाऐं अपने सारे पैमानों के साथ,मानव जीवन की समय सार्थक रहीं है। अंतिम पृष्ठ के छाया चित्र भी जीवन के अनेक मूलभूत प्रश्नों को उकेरते दिखे। कलम के धनी,चिंतन के मसीहा दादा श्री सूर्यपाल सिंह जी को,उनके दीर्घायु जीवन की मंगलकामना के साथ,अभिनंदन की कढ़ी को-सहस्त्रसः वंदन।

समीक्षक

वेदराम प्रजापति मनमस्त

गुप्ता पुरा डबरा जिला ग्वा.(म.प्र.)

मों.9981284867