Dekho Bharat ki Tasveer - 8 in Hindi Poems by बेदराम प्रजापति "मनमस्त" books and stories PDF | देखो भारत की तस्वीर - 8

देखो भारत की तस्वीर - 8

देखो भारत की तस्वीर 8

(पंचमहल गौरव)

काव्य संकलन

समर्पण-

परम पूज्य उभय चाचा श्री लालजी प्रसाद तथा श्री कलियान सिंह जी एवं

उभय चाची श्री जानकी देवी एवं श्री जैवा बाई जी

के श्री चरणों में श्रद्धाभाव के साथ सादर।

वेदराम प्रजापति मनमस्त

भाव सुमन-

पावन धरती की सौंधी-सौंधी गंध में,अपनी विराटता को लिए यह पंचमहली गौरव का काव्य संकलन-देखो भारत की तस्वीर के साथ महान विराट भारत को अपने आप में समाहित किए हुए भगवान राम और भगवान कृष्ण के मुखार बिन्द में जैसे-विराट स्वरुप का दर्शन हुआ था उसी प्रकार इस पंचमहल गौरव में भी विशाल भारत के दर्शन हो रहे हैं भलां ही वे संक्षिप्त रुप में ही क्यों न हों।

उक्त भाव और भावना का आनंद इस काव्य संकलन में आप सभी मनीषियों को अवश्य प्राप्त होंगे इन्हीं आशाओं के साथ संकलन ‘‘देखो भारत की तस्वीर’’ आपके कर कमलों में सादर समर्पित हैं।

वेदराम प्रजापति मनमस्त

गायत्री शक्ति पीठ रोड़ डबरा

जिला ग्वालियर (म.प्र)

मो.9981284867

नाटौली, कैथोदा, सिसगांव

नामा नाहटौली रहा, मन को लीना मोल।

गलियारे गल हार हैं, चौपालें अनमोल।

चौपालें अनमोल, स्‍फटिक भवन सुहाते।

टोड़न केकी, कीर, गीत गीता के गाते।

मानव मन मनमस्‍त, करै खेती के कामा।

भरे हुये भंडार, पंचमहली में नामा।। 274।

मन राजा पीपर चढ़ा, मधुर बसन्‍ती मेह।

बन्‍दन बारों से सजे, कैथोदा के गेह।

कैथोदा के गेह, नेह के चलत पनारे।

उमंग, उमंग के कढ़े, गेहजन अंकुर प्‍यारे।

सजा मेदनी साज, कुकुरमुत्तों का ताजा।

पूजित हो मनमस्‍त, बसन्‍ती का मन राजा।। 275।

पल ना कीजे घरीभर , चलों गाँव सिसगाँव।

शीतल मंद समीर जहां, गहरी पीपल छाँव।

गहरी पीपल छांव, लखो पनघट की शोभा।

कामिनि खींचत नीर, हीर-हारक मन लोभा।

झूल रहे उर-उरज, उरझि कंचुकि के पलना।

मदन बना मनमस्‍त, धीर उसको अब पल ना।। 276।

हथनौरा, देवगढ़, रतनगढ़

अनहद से लेखो सदा, हथनोंरा को जाव।

भीनी-भीनी गंध में, धरती का पुलकाव।

धरती का पुल काउ, पावसी का रंग छाया।

कोयल कीर पुकार, पपीहा पीर भुलाया।

मंदिर द्वारे बैठ, पंचमहली छवि देखो।

घंटन की घर घोर, लेख अनहद से लेखो।। 277।

यहां डेरा डारो अभी, चलो देवगढ़ आज।

इतिहासों को गढ़ रहा, कहता अपना राज।

कहता अपना राज, पंचमहली का गौरव।

दिग् दिगन्‍त में बहै, सत्‍य, ममता का सौरभ।

सौम्‍य, सरस, सुख, शान्ति, जहां पर करै बसेरा।

होता मन मनमस्‍त, मुक्‍तता का यहां डेरा।। 278।

छाया गह मां रतनगढ़, महिमा अपरम्‍पार।

दब, सिद्ध, नर, गन्‍धर्व, होते नित बलिहार।

होते नित बलिहार, सुयश छाया चहुं ओरी।

करहु कृपा की कोरि, विनय सुन लीजे मोरी।

मंदिर बना विशाल, गहन जंगल के मांही।

मन होता मनमस्‍त, बैठ बरगद की छांही।। 279।

काशीपुर-किरौल-किटौरा, सिली-सिलैटा-सैमरा, रावतपुरा

प्रीति दिखाई, किटौरा, काशी, किरौल देख।

जिनके जीवन के सदां, गाती कोयल लेख।

गाती कोयल लेख, मोर नाचत सुख पाते।

तोता रह हरनाम, डिग डिगी घोर बजाते।

जन्‍म कुण्‍डलीं लिखी, इन्‍हीं ग्रामों की भाई।

हो जाते मन मस्‍त, अनौखी प्रीति दिखाई।। 280।

भाई-भाई सिलैंटा, सिल्‍ही-सेमरा ग्राम।

कुअला मोटर पम्‍प धर कमा रहे हैं नाम।

कमा रहे हैं नाम, धान्‍य भरते भंडारे।

हरि, हरि से गये हार, भ्रमित होते प्रभु न्‍यारे।

सुख के अंकुर फूट, भूमि पियरी दरसायी।

मना लेउ मनमस्‍त, यही कविता सी भाई।। 281।

कर्ता के कर्तव लखो, रावतपुर में जाय।

जन जन के व्‍यवहार से, जनजीवन हरषाय।

जन जीवन हरषाय, कर्म के रूपक जानो।

धरती के अवतार, सुयश के भूप बखानो।

अंचल के आधार, धार जीवन-सरिता के।

मुट्ठी में मनमस्‍त, सभी कुछ हैं कर्ता के।। 282।

बीरमढ़ाना-बरगवां-बारकरी, जंगीपुर-गजापुर-गुंझार, गतारी-पहारी-इंद्रानगर

मनमस्‍त बनाती बारकरी, बरगवां, का मैदान।

बीरमढ़ाना भूमि में, ऊग पड़े धन धान्‍य।

ऊग पड़े धन धान्‍य, ईख, जौ चना सुहावैं।

अलसी, सरसों, सोंहा, तिली मूंगफली लगावैं।

मूंगा दाने बने, सनई की लड़ी सुहाती।

पंच महल की गोद सदां मनमस्‍त बनाती।। 283।

थाथी जंगीपुर बना, गजापुर देख गुंझार।

हरियाली मन भावनी, मूंगा मोती हार।

मूंगा मोती हार, प्‍यार है द्वारे-द्वारे।

धन्‍य धन्‍य नर नारि, गीत गौरव के सारे।

अंबराई में बैठ, कोकिला गीत सुनाती।

मान लेउ मनमस्‍त, पंचमहली की थाती।। 284।

नृत्‍य दिखाती पहारी, इन्‍द्रा-गतारी सुहाय।

कनक रास्तन में पड़े, जन जीवन हरषाय।

जन जीवन हरषाय, मंद मकरंद उड़ रहा।

मन हर भंवर गुंजार, गीत मन हरण गा रहा।

गुंजा तोरण द्वार, कीर पपीहा गुण गाते।

मन को कर मनमस्‍त, मयूरी नृत्‍य दिखाते।। 285।

धमनिका-छपरा, छतरपुर-भर्रोली-पतरियापुरा-गनेशपुरा, निबी

मनमस्‍त दिखाई दे रहे, धमनिका-छपरा हार।

हथनोरा की आड़ में, पलते जीवन प्‍यार।

पलते जीवन प्‍यार, कार्य जीवन के करते।

जीवन पै बलिहार, सार जीवन में भरते।

सुख की सरिता बहै, ध्‍यान धरि देखो भाई।

कृषक बांटते धान्‍य, सदां मनमस्‍त दिखाई।। 286।

अरूणायी छतरपुर रही, भर्रोली को देख।

पास पतरियापुरा है, गनेशपुरा अभिषेक।

गनेशपुरा अभिषेक, बना मोहन मतबारा।

बाग, बगीचा, कूप, बीथिका, वगर, बजारा।

सुन्‍दर समय सुहाय, सुरभि सुख शान्‍त बहाई।

मन को कर मनमस्‍त, धन्‍य धरती अरूणायी।। 287।

नये सितारा उगाती, आज निवी को जान।

धन धान्‍यों से लद रही, अपनी ले पहिचान।

अपनी लै पहिचान, नया जीवन दरसाती।

कर्मशील नर-नारि, बने जीवन के साथी।

नव योवन श्रंगार, ग्राम्‍य जन जीवन न्‍यारा।

प्रगती पथ मनमस्‍त, उगाते नये सितारा।। 288।

बाबूपुर, पहारी, लिधौरा

इनके बाना-बलबती, बाबूपुर की गोद।

मानव मन के धनी हैं, खोजें नित नव खोज।

खोजें नित नव खोज, ओज चहरों पर छाया

करैं परिश्रम सदां, मान सबही से पाया।

मृदुभाषी, मृदुहास, वास सुन्‍दर स्‍थाना।

जनगण मन मनमस्‍त, देखलो इनके बाना।। 289।

खेती है जीवन डगर, उन्‍नति का प्रतिरूप।

पहारी ग्राम निहारिये, गहरे मीठे कूप।

गहरे मीठे कूप, मधुर फल दायकु जानो।

फसल गा रहीं गीत, मीत इनको पहिचानो।

जीवन का श्रंगार, धरा सब को देती हैं।

कर्मशील मनमस्‍त, सदां इनकी खेती है।। 290।

देखो जाई निकट से, यहां लिधौरा ग्राम।

धरती का उन्‍माद है, पावो शीतल ठांव।

पावौ शीतल ठांव, बाग अमरूद निहारो।

गन्‍ना गैहूं धान, काट भरलो भण्‍डारो।

जन्‍म सफल हो जाय, करो जब कठिन कमाई।

हो जाओ मनमस्‍त, लिधौरा देखो जाई।। 291।

अजयगढ़, निभैरा, बरगवां

नर-नारी सुख-सार ले, अजय अजयगढ़ आज।

धरती का श्रंगार बन, जिस पर उसको नाज।

जिस पर सबको नाज, अजयगढ़ पत्‍थर प्‍यारा।

महल अटारीं बनैं, चाक, चाकी नग न्‍यारा।

प्‍यारी पड़ुआ भूमि, उमग उगले धन भारी।

हो जाते मनमस्‍त, सभी के घर, नर नारी।। 292।

घूरे-पूरे धान्‍य से निभैरा, सरल उदार।

कर्मशील करुणायतन,कृषक कला के हार

कृषक कला के हार प्रगति के प्रथम चितेरे।

पंचभूत के पंच, सत्‍य शान्ति के डेरे।

मंगल मूरति ग्राम, धान्‍य धन से भर पूरे1

देख लेउ मनमस्‍त, पंच महली के घूरे।। 293।

लुभावने हैं सुन्‍दर महल, अवनि प्रफुल्लित गात।

पावस का पहला चरण, पात, पात से बात।

पात-पात में बात, मौसमी रंग भरे हैं।

ग्राम बरगवां देख, मृदुल मन हरे भरे हैं।

कंचन फसलें खड़ीं, चमकते मोती दाने।

कितना प्‍यारा देश, सत्‍य मनमस्‍त लुभाने।। 294।

सरनागत, बड़ैरा, जनकपुर

थाथी बनता रहा है, सरनागत सा गांव।

पंच महल की अवनि में, प्‍यारा प्‍यारा नाम।

प्‍यारा प्‍यारा नाम, काम हैं प्‍यारे प्‍यारे।

गन्‍ना गैहूं, धान, फसल देखत मन हारे।

मन भावन है बाग, राग कोयल जहां गाती।

होता मन मनमस्‍त, देख पंच महली थाती।। 295।

धर्म ठिकाने पर रहे, बड़ा बड़ैरा जान।

अबनी के आधार हैं, प्रगती के बरदान।

प्रगती के बरदान, विभव के ताज ताज हैं।

काशी के अनुरूप यहां के साज बाज हैं।

केकी नृत्‍य निहार, पिकी के प्‍यार तराने।

मन करते मनमस्‍त, धरा के धर्म ठिकाने।। 296।

ठौर ठिकाना जनकपुर, धनुषयज्ञ से साज।

लक्ष्‍मीपुर शोभा अधिक, लगै धनद को लाज।

लगै धनद को लाज, देख गलियन अंगड़ाई।

धूल धूसरित गात, परम पावन दरसाई।

होली रंग अपार, पार है मुश्किल पाना।

मनभावन मनमस्‍त, यहां के ठौर ठिकाना।। 297।

धबा, गैंड़ौल, सुल्‍तानपुर

निभाते सब संबंध से, ग्राम धबा को जान।

खलिहानों की झलक ने, मोह लिये भगवान।

मोह लिये भगवान, तन्‍दुलन चरण पलोटें।

गैहूं करैं जुहार, चणक धरती में लोटें।

सरसों अलसी मटर, सुहागिल गीत सुनाते।

आपन से मनमस्‍त, अमल सम्‍बन्‍ध निभाते।। 298।

काया-माया गैंड़ौल सी, बनी तारिका आज।

चांदी का अम्‍बर बना, प्रकृति कला का साज।

प्रकृति कला का साज, बना मन को मनहारी।

माया प्रभु की देख, अचम्‍भा होता भारी।

अब तक जानी न‍हीं, अलौकिक तेरी माया।

मन होता मनमस्‍त, पुलकती काया काया।। 299।

साया सुल्‍तानी रहा, दिये अनेकों साज।

जो देखन चाहेा चलो, सुल्‍तानपुर में आज।

सुल्‍तानपुर में आज, सुनो धरती की बाणी।

जो कहती इतिहास, युगों की ओज कहानी।

मिट्टी में मिल गई, गर्व-गौरव की काया।

हिलमिल सब मनमस्‍त, यहां धरती का साया।। 300।

खेरी (सुल्‍तानपुर), सहराई, बुजुर्ग

क्‍यारी कंचल उगलती, खेरी की मृदु भूमि।

हरियल आमों के तले, झूला झूलो झूम।

झूला झूलो झूम, मस्‍त युग की तरूणायी।

जीवन गीत मल्‍हार, पाठ पढ़ मेरे भाई।

श्रंगारित सी भूमि,बनी दुल्हन मनहारी।

झूम रहीं मनमस्त, यहाँ की क्यारी-क्यारी।।301

गुणगाओ नित प्रेम से, सहराई की भूमि।

मंदिर में चहुंओर से, उठै अगर की धूम।

उठे अगर की धूम, आरती मनहर बाणी।

शंख झालरी ध्‍वनी, अमरता की पहिचानी।

कुअला बाग निहार, पाठशाला पर जाओ।

मन होबै मनमस्‍त, सदां धरती गुण गाओ।। 302।

जियो हजारी जिंदगी, बुजुर्ग ग्राम विचार।

सकल कला कल्‍याण मय, यहां का हर घर द्वार।

यहां का हर घर द्वार, प्‍यार के हार बनाता।

मन कहता सौ बार यहां कोई गहरा नाता।

कनक कंगूरे कलश-देव मंदिर मनहारी।

मन को कर मनमस्‍त, जिंदगी जियो हजारी।। 303।

कर्रा, अरूसी-बेलगाड़ा, चैंतूपाड़ा-गजापुर

मस्‍त बिछोना बिछालो, कर्रा ग्राम मझार।

यहां विभीषण से बने, मानव के व्‍यवहार।

मानव के व्‍यवहार, आचरण पावन जानो।

गृह-गहणी के धर्म-कर्म जाकर पहिचानो।

काम कला परवीन, उगलती धरती सोना।

चांदी की बरसात, धवल मनमस्‍त विछौना।। 304।

बजै नगारे अरूसी, बेलगाड़ा के पास।

मौसम के मचलाव में मनहारी विश्‍वास।

मनहारी विश्‍वास, धर्म का धर्म बसेरा।

सत्‍यनीति सुचि प्रीति, गीत डाले हैं डेरा।

करलो जरा विचार, अजी मनमस्‍त पियारे।

कठिन परिश्रम करो, जीत के बजैं नगारे।। 305।

झूला डारे गजापुर, चैतूपाड़ा ग्राम।

अंबराई में बोलतीं कोयल जय सियाराम।

कोयल जय सिया राम, छलांगें हरिणा भरते।

उड़ते सारस-हंस-बंस के साज उभरते।

मानव कर्तव्‍य शील, कृषक पक्‍के हरहारे।

ग्राम-ग्राम मनमस्‍त श्रावणी झूला डारे।। 306।

चांदपुर, धई-करही, असलामपुर

मनके मोरा नाचते, चमक चांदपुर देख।

सिन्‍ध कछारन नेकरे, टीलन के अभिषेक।

टीलन के अभिषेक, समाधी लीन यती हैं।

कुंज करीलन किलक, कौसुमीगंध मती है।

बन प्रयाग सा गया चांदपुर चारहु ओरा।

मन में हो मनमस्‍त, नाचते मन के मोरा।। 307।

सीता सी नारी धई, कर करही विश्राम।

युगल ग्राम के ग्राम्यजन,करते गौरव काम

करते गौरव काम, धरा के धनद कहाये।

धान्‍यों के भंडारे भरे सबको दिखलाये।

कथनी करनी एक, नेक जीवन की गीता।

राम बने मनमस्‍त, देख मन भावन सीता।। 308।

गौरव गाया हमेशा, असलामपुर सा ग्राम।

पावन तीरथ से बने, मंदिर मानव धाम।

मंदिर मानव धाम, परिश्रम प्रिय नरनारी।

शस्‍य श्‍यामलम अवनि महक रहीं क्‍यारी-क्‍यारी।

लहराती मनमस्‍त धरा की कौमल काया।

वृक्षों ने झुक झूम, मौसमी गौरव गाया।। 309

पांच महल

प्रिय थाती पंचमहल के पांच महल पहिचान।

गढ़ पिछोर, द्वि देवगढ़, मगरौरा को मान।

मगरौरा को मान, धरनि का गौरव न्‍यारा।

भितरवार-अभिलेष, लगै जीवन-सा प्‍यारा।

सस्‍य-श्‍यामलम भूमि, झूमती फसलें गाती।

लुटा रहीं मनमस्‍त, मोतियों की प्रिय थाती।। 310।

आठबई

कहानी और लोकोक्ति में, आठ बर्इ पहिचान।

देबई खड़बई, अरू सहबई, धई, अकबई, का गुणगान।

अकबई का गुणगान, सुनो सुनवई की गीता।

बागवई के बाग, खाव मनमस्‍त पपीता।

अक‍बई छोटी गिनत, चलो जहां सत् रजधानी।

सालवई गढ़ अजय, मान मनमस्‍त कहानी।। 311।

नौं दा

सुहाई गणना-दा नवम, पंच महल के बीच।

छिदा, ककरदा, किठौंदा, बस कैथोदा बीच।

बंस कैथेदा बीच, गोहिन्‍दा दो पहिचानो।

मद्दा, ख्‍यादा जोड़, पंचमहली को जानो।

कैथोदा कथ लिखैं, भूमि गौरव अरूणायी।

जनजीवन मनमस्‍त, सनातन रीति सुहाई।। 312।

सहोती सब-प्राकृतिक छटा-परख पारखी कीन।

पर्वत ओढ़ें हरितमा, नदीं बजातीं बीन।

नदीं बजातीं बीन, ताल झरने दे जाते।

पपीहा, केकी, कीर, सातबे स्‍वर में गाते।

भरका, खाई, कछार, उगलते, हीरे मोती।

डांड़े टीले बने यती, मनमस्‍त सहोती।। 313।

डोल ग्‍यारस मगरौनी

ढारै मगरौनी सदां, कर गणपति का ध्‍यान।

मुगल-आंग्‍ल संग्राम कर, रखी शान अरू बान।

रखी शान अरू बान, धर्म की मेख जमाई।

डोल ग्‍यारस पर्व जहां स्‍मृति पहुनाई।

मगरोनी मनमस्‍त, दुश्‍मनों को ललकारे।

कंचन कलशे भरत-गणपती जी को ढारै।। 314