Gyarah Amavas - 42 in Hindi Thriller by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | ग्यारह अमावस - 42

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ग्यारह अमावस - 42



(42)

नज़ीर के लिए चुपचाप घर में बैठना मुश्किल हो रहा था।‌ वह पुलिस के लिए मुखबुरी करता था। उसे लगता था कि वह बहुत होशियार और बहादुर है। लेकिन जब गगन ने उसे मात दे दी तो उसका मन परेशान हो गया था। घर पर बैठे हुए वह सोचता था कि जिस गगन के दब्बूपन पर सब हंसते थे उसने एक ही बार में उसे मात दे दी। यह सोचकर अपने आप पर उसका विश्वास कम होने लगा था। वह अपनी ही नज़रों में गिरना नहीं चाहता था। इसलिए उसने तय किया कि वह इस तरह शांत नहीं बैठेगा।
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे अपनी टीम के साथ बात कर रहा था। तभी हेड कांस्टेबल ललित ने आकर बताया कि नज़ीर उससे मिलने आया है। यह सुनकर सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे को अाश्चर्य हुआ। उसने कहा कि उनकी मीटिंग खत्म होने वाली है। उसे कुछ देर बाद अंदर भेज दे। वह अपनी टीम से बात करने लगा। पर उसके मन में चल रहा था कि आखिर नज़ीर उससे मिलने क्यों आया है ? उसे लग रहा था कि शायद उसे पैसों की दिक्कत होगी। उसे अफसोस हुआ कि उसने इस बात का ध्यान नहीं रखा।
मीटिंग खत्म होने के बाद जब नज़ीर उससे मिलने अंदर आया तो सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने कहा,
"माफ करना मैं तुम्हारे पैसे नहीं भिजवा पाया।"
यह कहकर उसने कुछ पैसे निकाल कर उसकी तरफ बढ़ा दिए। नज़ीर ने पैसे पकड़ने की जगह हाथ जोड़कर कहा,
"मैं यहांँ पैसे लेने के लिए नहीं आया हूँ। मुझे आपसे कुछ बात करनी थी।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने अपना हाथ पीछे हटा लिया। नज़ीर को बैठने का इशारा करते हुए कहा,
"क्या बात करनी है तुम्हें ?"
नज़ीर कुछ देर शांत रहने के बाद बोला,
"सर मुझसे हार मानकर घर नहीं बैठा जा रहा है। यह बात मुझे कचोटती रहती है कि मेरी गलती की वजह से एसपी गुरुनूर कौर उन लोगों के कब्ज़े में हैं।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने महसूस किया कि नज़ीर की आवाज़ में द‌र्द है। उसने समझाया,
"ऐसा मत सोचो नज़ीर। तुमने बहुत अच्छा काम किया। जो हुआ उसमें तुम्हारी गलती नहीं थी। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं। जल्दी ही सबकुछ ठीक हो जाएगा।"
"सर फिर मुझे भी अपनी कोशिशों का हिस्सा बना लीजिए। मैं हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठना चाहता हूँ।"
नज़ीर ने यह कहकर एकबार फिर हाथ जोड़ दिए। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने एक बार फिर समझाने की कोशिश करते हुए कहा,
"नज़ीर अब तुम उन लोगों की निगाह में आ चुके हो...."
नज़ीर ने उसकी बात काटते हुए कहा,
"सर यह तो कोई बात नहीं हुई। वो लोग तो पुलिस वालों को भी जानते हैं। पर आप लोग अपने कर्तव्य से पीछे तो नहीं हटते हैं। मुझमें और आपमें यही फर्क है कि आप पुलिस फोर्स का हिस्सा हैं। जबकि मैं बाहर से काम करता हूंँ। लेकिन आप जानते हैं कि मैंने हमेशा पूरे मन से काम किया है। तभी आपने इतने बड़े केस में मुझे शामिल किया था।"
यह सुनकर सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे सोच में पड़ गया। नज़ीर इस केस में उसकी मदद करने के लिए तड़प रहा था। उसने सच कहा था। जब भी उसे कोई काम दिया गया था उसने पूरी लगन से किया था। उसने कहा,
"नज़ीर मैं तुम्हारी भावना को समझ रहा हूंँ। पर मैं तुमसे क्या मदद ले सकता हूँ। केस के लिए मुझे एक टीम मिली हुई है।"
"आप अपनी टीम के साथ काम कीजिए। मैं आपसे यही कहना चाहता हूँ कि मैं अपनी तरफ से कोशिश करूँगा। इंशाअल्लाह इस बार आपको कोई अच्छी खबर दूँगा।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने कहा,
"ठीक है....पर सावधानी से काम करना।"
"अब मैं आपके लिए कोई मुसीबत खड़ी नहीं करूँगा। कुछ ऐसा करूँगा जो आपके लिए मददगार साबित हो।"
नज़ीर उठकर जाने लगा। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने उसे रोककर कहा,
"तुम दोबारा मेरी टीम का हिस्सा बन गए हो। अब ये पैसे रख लो। बाकी पहले की तरह मिलते रहेंगे।"
नज़ीर ने पैसे ले लिए। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे का शुक्रिया अदा करके वहाँ से चला गया।

ब्लैक नाइट ग्रुप के सदस्यों को मीटिंग के लिए उसी स्थान पर बुलाया गया था जहाँ पिछली मीटिंग हुई थी। सभी मीटिंग वाले कक्ष में उपस्थित थे। सामने आसन पर जांबूर बैठा हुआ था। इस समय कक्ष में पूरी तरह शांति थी। इस शांति में एक तनाव था। सभी जांबूर के कुछ कहने का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ देर बाद जांबूर गुस्से से अपने आसन से उठकर खड़ा हो गया। जिस तरह से वह गुस्से में खड़ा हुआ था वह उसके भीतर चल रहे तूफान को दर्शा रहा था। वहाँ मौजूद सभी लोग उसकी इस हरकत पर सहम गए। जांबूर ने कहा,
"मैं उनमें नहीं हूँ जो हार मान लूँ। जो अनुष्ठान हमने आरंभ किया है उसे अंत तक करूँगा। चाहें कितनी भी बाधाएं पैदा हों। माना कि अभी समय उनका साथ दे रहा है। एकबार फिर उन्होंने हमारी बलि हमसे छीन ली। लेकिन मैं समय को अपनी तरफ मोड़कर रहूँगा।"
वह रुका। उसने अपने सामने बैठे लोगों पर नज़र डालते हुए कहा,
"हम सब ज़ेबूल के पुजारी हैं। मैं ज़ेबूल के लिए बलि जुटाने का काम उसकी इस सेना को सौंपता हूँ जो मेरे सामने बैठी है। वक्त कम है। लेकिन ज़ेबूल का खास सिपाही बनने का यह सबसे अच्छा अवसर है। जो ज़ेबूल की यह विशेष सेवा करेगा उसे खास शक्तियां प्राप्त होंगी। जाओ और अपने काम में लग जाओ।"
मीटिंग खत्म हो गई। सब लोग एक एक करके उस कक्ष से चले गए। सबके जाने के बाद काबूर ने कहा,
"इस समय खतरा बहुत है। ऐसे में इन लोगों पर बलि की ज़िम्मेदारी डालना खतरनाक हो सकता है।"
जांबूर ने कहा,
"खतरा तो हम शुरू से ही उठा रहे हैं। खतरे से डर गए तो कुछ नहीं हो पाएगा। कुछ पाने के लिए मुश्किलें तो झेलनी ही पड़ती हैं।"
जांबूर यह कहकर वहाँ से चला गया। काबूर चुपचाप वहाँ खड़ा रहा। उसके मन में इन सबको लेकर कई बातें थीं। वह परेशान था। इधर उसके मन में डर आ गया था जो बढ़ता ही जा रहा था।

एसीपी मंदार पात्रा ने सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे को मिलने के लिए बुलाया था। वह उसका इंतज़ार कर रहे थे। वह बहुत गंभीर मुद्रा में बैठे थे। आज फिर एसपी गुरुनूर कौर के पिता ने फोन करके अपनी बेटी के बारे में पूछा था। वह गुरुनूर को लेकर बहुत चिंतित लग रहे थे। एसीपी मंदार पात्रा ने उन्हें जवाब तो दे दिया कि पुलिस अपनी पूरी कोशिश कर रही है। लेकिन उसके बाद से ही उनका मन उदास हो गया था। जबसे एसपी गुरुनूर कौर गायब हुई थी तबसे हर दूसरे दिन उसके पिता का फोन आता था। एसीपी मंदार पात्रा यही जवाब देते थे। पर उनका मन खुद ही उनसे पूछ रहा था कि यह कैसी कोशिश है, जिसका कोई परिणाम ही नहीं निकल रहा है। वह समझ रहे थे कि गुरुनूर के पिता एक फौजी रह चुके हैं। इसलिए उन्होंने अब तक इतना धैर्य बनाकर रखा है। अपनी पत्नी को भी समझा कर रखा है। उनकी जगह और कोई होता तो अब तक मीडिया में ना जाने कितनी बातें कर चुका होता। एसीपी मंदार पात्रा चाहते थे कि अब किसी भी तरह से इस केस को उसके अंत तक पहुँचाया जाए।
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने उनके केबिन में प्रवेश किया। एसीपी मंदार पात्रा ने उसे बैठने का इशारा किया। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे अपनी कुर्सी पर बैठकर उनके कुछ कहने का इंतज़ार करने लगा। कुछ क्षण बीत गए। एसीपी मंदार पात्रा किसी विचार में खोए हुए बैठे रहे। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने महसूस किया कि वह बहुत गंभीर हैं। हिम्मत करके उसने कहा,
"सर आपने बुलाया था।"
एसीपी मंदार पात्रा ने उसकी तरफ देखकर कहा,
"आकाश इस केस में अब तक पुलिस के हाथ केवल नाकामयाबी आई है। वह शैतान अभी तक हमारी पहुँच से दूर है। इस केस से संबंधित हमारे तीन पुलिसकर्मी गायब हैं। इस केस की अगुवाई कर रही एसपी गुरुनूर कौर केस की तफ्तीश करते हुए गायब हो गई। सब इंस्पेक्टर रंजन सिंह और शिवराम हेगड़े का भी कुछ पता नहीं है। यह हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है।"
"जी सर....यह सचमुच बहुत शर्मिंदा करने वाली बात है।"
"हम शर्मिंदा होकर नहीं बैठ सकते हैं। ना ही हमें बड़ी बड़ी बातें करना है। अब बस एक्शन होगा।"
एसीपी मंदार पात्रा ने पूरी दृढ़ता के साथ कहा। उसके बाद वह सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे को अपने प्लान ऑफ एक्शन के बारे में बताने लगे। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे को सब समझाने के बाद उन्होंने कहा,
"अब कोई चूक या कोताही नहीं। हमें इस तरह से काम करना है कि केस के लिए नहीं अपने वजूद के लिए कुछ कर रहे हैं। अपनी टीम को मेरा यह संदेश अच्छी तरह समझा देना।"

सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने कहा,
"बिल्कुल सर बात अब हमारे वजूद की ही है। उसे बनाए रखने के लिए सबकुछ दांव पर लगाएंगे।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने उन्हें सैल्यूट किया और वहाँ से चला गया।

सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने फौरन अपनी टीम की एक मीटिंग बुलाई। उसने नज़ीर को भी उस मीटिंग में बुलाया था। उसने अपनी टीम को एसीपी मंदार पात्रा के प्लान ऑफ एक्शन की पूरी जानकारी दी। उन्हें प्लान बताने के बाद वह बोला,
"क्योंकी अमावस आने ही वाली है इसलिए वो लोग भी बलि का कार्यक्रम करने की तैयारी में होंगे। उन्हें दो चीज़ों की ज़रूरत है। एक बलि चढ़ाने के लिए एक किशोर लड़के की। दूसरी एक ऐसे स्थान की जहांँ इस काम को अंजाम दिया जा सके। हमें इन्हीं बातों का खयाल रखना है।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने अपनी टीम को हिस्सों में बांटकर उनकी ज़िम्मेदारी समझा दी। उसकी टीम के सदस्य चले गए। अब केवल नज़ीर था। उसने नज़ीर से कहा,
"एसपी मैडम उस रात के बाद से गायब हैं। तुम्हारी ज़िम्मेदारी है कि पता करने की कोशिश करो कि उन्हें कहाँ ले जाया गया है।"
नज़ीर ने कहा कि वह जल्दी ही अच्छी खबर लेकर आएगा।
सबके जाने के बाद सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने लैपटॉप पर ईमेल चेक किया। उसने कोलकाता पुलिस को सूचना दी थी कि दीपांकर दास के विषय में जो भी जानकारी मिले उसे ईमेल द्वारा भेजा जाए। अब वह इस केस पर काम कर रहा है।
कोलकाता पुलिस ने एक ईमेल भेजा था।